रविवार , 19  मई  2024

खजुहा यों तो बिंदकी तहसील का छोटा-सा क़स्बा है, सोया हुआ-सा ख़ामोश मगर कुछ ऐतिहासिक महत्व की इमारतें (या कहें कि खण्डहर) और कुछ बहुत पुराने मंदिरों वाला क़स्बा. मंदिरों का वास्तुशिल्प और उनके बड़े परिसर उनके पुरानेपन के गवाह हैं. वह जिसे खजुहा का क़िला कहते हैं, दरअसल बाग़ बादशाही और शाही ख़ेमे वाली इमारतों के अवशेष हैं, जो काफ़ी दूर तक फैले हुए हैं. बाग़ बादशाही मुग़ल बादशाह बाबर की उस रवायत की आख़िरी निशानी है, जिसमें बड़े बाग़ और वहाँ ठहरने के लिए गुबंद वाली ख़ूबसूरत बारादरियाँ बनाई जाती रहीं. खजुहा का यह बाग़ शाहजहाँ के दो बेटों औरंगज़ेब और शाह शुजा के बीच 5 जनवरी 1659 को हुई उस लड़ाई की स्मृति है, जो दिल्ली की गद्दी हासिल करने की ख़ातिर लड़ी गई थी. अपनी जीत के बाद औरंगज़ेब यहाँ हफ़्ते भर तक रहा, इस जगह का नाम बदलकर औरंगाबाद रखने के साथ ही उसने यहाँ चारबाग़ लगाने, बारादरी, मस्जिद और कारवाँसराय बनाने का हुक़्म दिया था. बाग़ के चारो तरफ़ ऊंची दीवार और दो मंज़िला गेट बने, पूरे बाग़ में पानी की सप्लाई के लिए नहरें बनाई गईं. भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की सरपस्ती वाले बाग़ बादशाही में अब जो कुछ बचा है, उससे इन इमारतों की भव्यता का अंदाज़ भर लगाया जा सकता है. मुग़लों की बादशाहत जाने और अंग्रेज़ी हुकूमत आने के बाद लंबे समय तक इस जगह का इस्तेमाल नील बनाने के लिए होता रहा. अब यहाँ आने वाले कौतुहलवश आते हैं या यूँ ही घूमने और वक़्त बिताने के इरादे से. आसपास के बच्चों के लिए यह खेलने का बढ़िया ठिकाना है. इमारतों के खण्डहर और बिखरी हुई ईंटों के बारे में वहाँ मौजूद एक मुलाजिम ने प्रस्ताव दिया कि हज़ार रुपये ट्रॉली देकर ईंटें मैं ले जा सकता हूँ. हालांकि आसपास की आबादी वाले ज़्यादा सह्रदय निकले. उनसे पूछा तो बोले – उठा ले जाइए. थोड़ी जगह ही साफ़ होगी.

फ़ोटो | सुनील उमराव

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