नई दिल्ली | दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फ़ारूक़ी की किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का कल शाम लोकार्पण हुआ. गुरुदत्त की ज़िंदगी और उनके समय के भारतीय सिनेमा की गहरी पड़ताल करती यह किताब राजकमल प्रकाशन से छपी है. यह कार्यक्रम हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में 18वें हैबिटेट फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान आयोजित एक विशेष सत्र में हुआ. [….]
4 फ़रवरी, 2010. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का न्यू गेस्ट हाउस. पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा मसनवी पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे सत्र के बाद का समय. डाइनिंग हॉल में भारत के सुदूर इलाक़ों से एवं ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तज़ाकिस्तान, बांग्लादेश से बड़ी संख्या में आए प्रतिभागी. सब तरफ चर्चाएं, खिलखिलाहटें, बातें ही बातें. बड़ी मुश्किल और कोशिश के बाद जैसे-तैसे हम [….]
लखनऊ | भारतीय समकालीन कला के परिदृश्य में छापाकला (प्रिंटमेकिंग) एक सशक्त, संवेदनशील और वैचारिक माध्यम के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुकी है. शहर की कोकोरो आर्ट गैलरी में छह मई से शुरू हुई नामवर छापाकार मनोहर लाल भुगरा की कृतियों की रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी “छापा… जीवन की छाप (Imprint of a lifetime)” इसी विशिष्टता को रेखांकित करती है. यह [….]
संवाद बुकशेल्फ़ | ऐसे में जब शहरी लैंडस्केप से किताबों की दुकानें ग़ायब होती जा रही हैं और ऑनलाइन ठिकाने या प्रकाशक ही किताबें ख़रीदने का अकेला ज़रिया बनते जा रहे हैं, यह स्तंभ हिंदी और अंग्रेज़ी की नई-पुरानी किताबों से आपका परिचय कराने और उनके बारे में मुख़्तसर जानकारी देने की कोशिश है. इनमें संपादक की पसंद की किताबें भी शामिल होंगी. पढ़ने वालों की सहूलियत के लिए [….]
क़िस्से लिखना और गढ़ना इसलिए आसान लगता हैं क्योंकि उन्हें लिखते वक़्त लेखक ख़ुदा बन जाते हैं. लेखक के बस में है कि वो जब चाहे क़िस्सों को, किरदारों को जहाँ चाहें मोड़ दें, जिसे चाहें मार दें, जिसे चाहें बचा लें, जिस दर्द को चाहें ख़ामोश कर दें. पर असल ज़िंदगी… वो किसी की नहीं सुनती, लेखक की भी नहीं. वो अपने वक़्त पर दरवाज़े बंद करती है, अपने हिसाब से लोग छीनती है, [….]
‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ ऐसी किताब है, जो मंटो को सिर्फ़ एक लेखक नहीं, बल्कि एक जीवित, जटिल और बेहद मानवीय इंसान के रूप में सामने लाती है. यह पुस्तक किसी एक लेखक की दृष्टि नहीं, बल्कि कई लेखकों और साथियों की नज़र से मंटो को समझने की कोशिश है—यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है. इसमें कृश्न चंदर, मुहम्मद तुफ़ैल, शाहिद अहमद देहलवी, इस्मत चुग़ताई, बलवंत [….]
ज़रा सोचिए… अगर मैं आपसे कहूँ कि विलियम शेक्सपियर का जन्म हिंदुस्तान में हुआ था – तो? और अगर यह भी जोड़ दूँ कि उनका जन्म बंबई में, ब्रिटिश माता-पिता के घर हुआ था – तो? फिर यह भी बताऊँ कि वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कैप्टन थे, बाद में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट बने, और हिंदुस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक घूमते-फिरते रहे!!! [….]
मैं फ़ोटोग्राफ़र होने का कोई दावा नहीं करता, न ही हूँ. हाँ, इतना ज़रूर है कि ज़िंदगी ने मुझे कुछ नामी फ़ोटोग्राफ़रों के क़रीब बैठने का मौक़ा दिया, जिनकी सोहबत में मैंने तस्वीर को देखना और समझना सीखा—कभी उनकी बातों से, कभी उनकी ख़ामोशियों से. वही लोग थे जिन्होंने मुझे बार-बार समझा कर ठीक-ठाक तस्वीर लेने का हौसला दिया और [….]
मुम्बई | ऋत्विक घटक बांग्ला सिनेमा के उन महान फ़िल्मकारों में हैं, जिन्होंने बंगाल विभाजन की पीड़ा, विस्थापन, शरणार्थी जीवन और सामाजिक विघटन को अपनी फ़िल्मों में गहरी संवेदना और वैचारिक तीक्ष्णता के साथ चित्रित किया. उनका सिनेमा यथार्थवाद, मेलोड्रामा, ब्रेख़्तियन शैली, मिथकीय प्रतीक और अभिव्यक्तिवादी ध्वनि के अनोखे संयोजन के [….]
सहमत की पुरानी साथी विदुषी नीला भागवत का लंबी बीमारी के बाद कल 14 अप्रैल 2026 को इंतकाल हो गया. वह ग्वालियर घराने की एक मशहूर कलाकार थीं. उन्हें न सिर्फ़ अपनी परंपरा से गहरा लगाव था, बल्कि वह उसमें नए प्रयोग करने की महारत भी रखती थीं. नीला जी अपने आस-पास की दुनिया और समाज से बहुत क़रीब से जुड़ी हुई थीं. उनकी इस [….]
(आजकल दिल्ली के क़िला राय पिथोरा परिसर में एक अभूतपूर्व प्रदर्शनी ‘द लाइट एंड द लोटस’ चल रही है. यह लेख उन 127 साल पुराने पिपरहवा में मिले बुद्ध के अवशेषों और रत्नों की घर-वापसी की कहानी है, जिन्हें नीलामी की दहलीज़ से बचाकर भारत वापस लाया गया. लेखक इस प्रदर्शनी के माध्यम से बुद्ध की कलात्मक विरासत और आज के अशांत [….]
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