मैं फ़ोटोग्राफ़र होने का कोई दावा नहीं करता, न ही हूँ. हाँ, इतना ज़रूर है कि ज़िंदगी ने मुझे कुछ नामी फ़ोटोग्राफ़रों के क़रीब बैठने का मौक़ा दिया, जिनकी सोहबत में मैंने तस्वीर को देखना और समझना सीखा—कभी उनकी बातों से, कभी उनकी ख़ामोशियों से. वही लोग थे जिन्होंने मुझे बार-बार समझा कर ठीक-ठाक तस्वीर लेने का हौसला दिया और [….]
मुम्बई | ऋत्विक घटक बांग्ला सिनेमा के उन महान फ़िल्मकारों में हैं, जिन्होंने बंगाल विभाजन की पीड़ा, विस्थापन, शरणार्थी जीवन और सामाजिक विघटन को अपनी फ़िल्मों में गहरी संवेदना और वैचारिक तीक्ष्णता के साथ चित्रित किया. उनका सिनेमा यथार्थवाद, मेलोड्रामा, ब्रेख़्तियन शैली, मिथकीय प्रतीक और अभिव्यक्तिवादी ध्वनि के अनोखे संयोजन के [….]
सहमत की पुरानी साथी विदुषी नीला भागवत का लंबी बीमारी के बाद कल 14 अप्रैल 2026 को इंतकाल हो गया. वह ग्वालियर घराने की एक मशहूर कलाकार थीं. उन्हें न सिर्फ़ अपनी परंपरा से गहरा लगाव था, बल्कि वह उसमें नए प्रयोग करने की महारत भी रखती थीं. नीला जी अपने आस-पास की दुनिया और समाज से बहुत क़रीब से जुड़ी हुई थीं. उनकी इस [….]
(आजकल दिल्ली के क़िला राय पिथोरा परिसर में एक अभूतपूर्व प्रदर्शनी ‘द लाइट एंड द लोटस’ चल रही है. यह लेख उन 127 साल पुराने पिपरहवा में मिले बुद्ध के अवशेषों और रत्नों की घर-वापसी की कहानी है, जिन्हें नीलामी की दहलीज़ से बचाकर भारत वापस लाया गया. लेखक इस प्रदर्शनी के माध्यम से बुद्ध की कलात्मक विरासत और आज के अशांत [….]
एक दरवाज़ा, जो एक कहानी की ओर खुलता है
मेरे घर का दरवाज़ा जब खुलता है, तो सामने कोई आम मंज़र नहीं होता—होता है एक ख़ामोश क़िस्सा, जो हर सुबह मेरी तरफ़ एकटक देखता है. [….]
कुछ दिन पहले एक नेकदिल मौसी ने, अपनी पुरानी मुस्कुराहट के साथ, रजनी को एक अजीब-ओ-ग़रीब तोहफ़ा भेजा—वो थे शंख, शंकु या कोन या यूं कहिए तीन समुद्री सीपियाँ. ये कोई छोटी सीपियाँ नहीं थीं ख़ासे बड़े शंख थे. उनमें से एक ने तो आते ही दिल चुरा लिया—जैसे भीड़ भरे बाज़ार में कोई अजनबी चेहरा अचानक अपना-सा लगने लगे. [….]
नई दिल्ली | हिन्दी की वरिष्ठ लेखक ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा पर राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई दी है. [….]
गाड़ी तेज़ी से भाग रही थी. सामने दूर तक फैली हुई डामर की चमकती हुई पट्टी, किनारों पर भागते पेड़, और बीच-बीच में नीले बोर्ड जिन पर लिखा था-एनएच 44, यानि नेशनल हाइवे 44.
गुड़गांव से चंडीगढ़ की ओर जाते हुए एक पल ऐसा आया जब सड़क ने मुझे [….]
प्रयागराज | वीथिका की ओर से हुए साहित्यिक आयोजन ‘पीढ़ियां’ में देश के विख्यात साहित्यकार और आलोचक शामिल हुए. साहित्यकारों की तीन पीढ़ियों पर केंद्रित वीथिका का यह कार्यक्रम इतवार को इलाहाबाद संग्रहालय में हुआ. इस विशिष्ट आयोजन में साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया, लेखन प्रक्रिया के बारे में बात [….]
नेहा दीक्षित की पहली किताब ‘द मेनी लाइव्ज़ ऑफ़ सईदा X: द स्टोरी ऑफ़ ऐन अननोन इंडियन’ 2024 के आख़िर में छपकर आई थी. इस किताब का मर्म और महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि अब तक इसके हिंदी, तमिल और मलयालम अनुवाद भी छप चुके हैं. राजकमल प्रकाशन ने ‘कोई एक सईदा’ नाम से इसका हिंदी अनुवाद [….]
बचपन का भी वो बहुत पहला और कच्चा-सा हिस्सा था, जब न ‘सराय’ का मतलब पता था, और न ही यह मालूम था कि ‘रोहिल्ला’ होता क्या है. उस वक़्त की यादें भी कैसे बची हैं, ये सोच कर भी मैं हैरान हूँ. दिल्ली के सराय रोहिल्ला स्टेशन से हमारा घर कुल चार सौ मीटर पर था. घर के पास से बहुत-सी रेल लाइन गुज़रती थीं जिन पर से रेलगाड़ी [….]
नई दिल्ली | राजकमल प्रकाशन के 81वें स्थापना दिवस पर शनिवार शाम को आयोजित ‘सहयात्रा उत्सव’ में समकालीन साहित्य और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार-विमर्श हुआ. इस अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व के छठे संस्करण में पाँच युवा वक्ताओं—कलाकार उन्नति चौधरी, शोधार्थी-अध्येता पंकज कुमार, कवि पराग [….]
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