जैसा हाल देस का, वैसा घर का हाल. आजकल घर में एस.आई.आर. चल रहा है. जी हाँ, स्पेशल इन्सेंटिव रिवीज़न—कोने-कोने में झांक कर तफ़्तीश हो रही है. आप कहेंगे, ये क्या मज़ाक है, घर में कुल चार जन हैं, वहाँ कौन देसी, कौन बिदेसी. घर में कहाँ घुस आएंगे कोई. अरे, एक तो आप समझते नहीं हैं. ये कोई अपने वाले, दूसरे वाले, बंगाली [….]
नई दिल्ली | भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में गुरुवार को शाम को एक सभा हुई. राजकमल प्रकाशन और रज़ा फ़ाउंडेशन की ओर से यह संयुक्त सभा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई. वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के वक्तव्य से सभा की शुरुआत [….]
आपने कभी नीला कुंजारी (नीलकुरंजी) के फूल देखे हैं, जो 12 साल में सिर्फ़ एक बार खिलते हैं? नहीं? तो आप नीले रंग के सम्मोहक जादू से नावाक़िफ़ हैं, आप नहीँ जानते कि नीले रंग के उस शेड को देखने, निहारने और अपनी आँखों में बसाने के लिए इंसान क्या कुछ कर सकता है. नीलकुरंजी का नीला क़ुदरत के रंग सँजोने की कला के नाम इक सिजदा है. [….]
मुझे यह भी नहीं मालूम
कि मैं कितनों को नहीं जानता.
शुक्ल जी से मैं कभी मिला नहीं, मुलाक़ात का कोई ज़रिया नहीं बना, कभी आमना-सामना भी नहीं हुआ. हाँ, दूर से उन्हें कई बार देखने-सुनने का मौक़ा मिला, उनका लिखा पढ़ता रहा, उनके बारे में ख़बरें देखता रहा. उन्हीं की कविता से ली गई पंक्ति से कहा जाए तो मैं सचमुच उनको नहीं जानता था. [….]
इतिहासकार इरफ़ान हबीब 94 साल के हो गए हैं. अपनी ज्यादातर सक्रियता उन्होंने घर के दायरे में सीमित कर ली है, पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तक अब भी चले जाते हैं. विभाग के चेयरमैन प्रो.हसन इमाम की मेज़ के सामने एक बड़ी-सी मेज़ उनके आने के इंतज़ार में ख़ाली दिखाई देती है. यों घर की अपनी स्टडी में [….]
रात हो चुकी थी, वैसे भी मैं वहाँ देर से पहुँच था. ख़ुदा का घर बंद हो चुका था और ताला ‘अंदर’ से लगा था. उसके साथ सटे हुए बंगले में मौज-मस्ती का आलम था. मैं बस बाहर से ही नमस्ते कर आगे बढ़ने ही लगा था कि उस घर के रास्ते ने मुझे सोचने पर और यह तस्वीर लेने पर मजबूर कर दिया. उस तक पहुँचने के लिए इस सँकरे रास्ते नें मुझे [….]
“उनकी दुनिया में दाख़िल होने का हुनर मैंने साध लिया था, यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि मकड़ी के जाले का व्यूह भेदने वाला कोई चालाक कीड़ा करता है—ख़ुद को जाल में फंसने से बचाने के लिए अपने पंखों को समेटकर, कम से कम जगह घेरते हुए—मैं अंदर दाख़िल होती और उसी रास्ते से लौटते हुए पूरी एहतियात बरतती कि कहीं जाले के धागों में [….]
नई दिल्ली | लेखक विचारक नहीं हो सकता. अगर वह विचारक हो गया तो दूसरों की न सुनेगा, न कहेगा, वह अपनी ही कहेगा. लेखक जैसा होता है, उसका कुछ अक्स उसके पात्रों में दिख ही जाता है. मेरा मानना है कि ख़ुद को आदमी बनाने की जो गति पहले थी, वह मंद हुई है. अब वह विपरीत दिशा में जा रही है. पहले लगता [….]
सत्रह दिसंबर की रात सूफ़ी परंपरा में मातम की नहीं, विसाल की रात है. मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए मौत कोई अंत नहीं, बल्कि माशूक़ से मुलाक़ात थी. मेरे लिए रूमी को याद करना, उनके लिखे को पढ़ना, उसे सुनाना हर बार नए शब्दों में लिखना—अपने दिल पे पड़े बोझ को हल्का करने जैसा होता है. रूमी की ज़िंदगी, इश्क़ का उनका फ़लसफ़ा, [….]
नई दिल्ली | राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से बुधवार की शाम को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष: भेंट, पाठ, चर्चा’ का आयोजन किया. समकालीन हिन्दी उपन्यासों में स्त्री-स्वर, स्त्री-अनुभव और रचनात्मक विस्तार को रेखांकित करने के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यक्रम में राजकमल प्रकाशन से छपे [….]
खूबसूरत छपाई वाली ये पतली-सी किताब मैंने 1978 या 79 की सर्दियों में नैनीताल क्लब के बाहर मॉल रोड पर घूमते हुए एक रेहड़ी वाले से खरीदी थी. चार रंगीन स्लाइडों के सेट के साथ इस गाइडनुमा किताब की क़ीमत कुल आठ रुपये थी. 1914, यानि 111 साल पहले, कानपुर में छपी, नैनीताल स्थित सेंट जॉन-इन-द-विल्डरनेस चर्च के बारे में यह 28 [….]
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