विलियम शेक्सपियरः जो शायर-लेखक नहीं था
ज़रा सोचिए… अगर मैं आपसे कहूँ कि विलियम शेक्सपियर का जन्म हिंदुस्तान में हुआ था – तो? और अगर यह भी जोड़ दूँ कि उनका जन्म बंबई में, ब्रिटिश माता-पिता के घर हुआ था – तो? फिर यह भी बताऊँ कि वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कैप्टन थे, बाद में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट बने, और हिंदुस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक घूमते-फिरते रहे!!!
और हाँ, यह भी कि वह एक उम्दा फ़ोटोग्राफ़र और साहसी खोजी थे… मगर शायरी में कुछ ख़ास नहीं थे.
अब ज़रा ठहरिए—तलवार निकालने और मेरी गर्दन क़लम करने से पहले ज़रा रुकिए, तलवार की ज़रूरत नहीं है.
ये वो स्ट्रैटफ़र्ड-अपॉन-एवन वाले महान नाटककार नहीं—न ‘हैमलेट’ वाले, न ‘रोमियो-जूलियट’ या ‘मैकबेथ’ वाले. यह एक दूसरे शेक्सपियर हैं—नाम मिलता है, देश वही, लेकिन कहानी बिल्कुल अलग. और हाँ, दोनों के बीच क़रीब तीन सौ साल का फ़ासला भी है. मेरे वाले शेक्सपियर 19वीं शताब्दी के हैं.
कैप्टन विलियम हेनरी इरविन शेक्सपियर (1878-1915) एक ऐसे शख़्स थे जिन्हें आप किसी एक ख़ाने में नहीं रख सकते. फौजी थे, अफ़सर, खोजी भी, और अपने ढंग के कलाकार भी. इंडियन पॉलिटिकल डिपार्टमेंट में काम करते हुए उन्होंने अरब के रेगिस्तानों को नापा—सचमुच नापा. 1914 में कुवैत से रियाद और वहाँ से अक़ाबा तक की उनकी यात्रा कोई मामूली सफ़र नहीं रहा होगा; यह एक ऐसा अभियान था जिसने ब्रिटिश हुकूमत को उस इलाक़े की ज़मीन, कबीलों, रास्तों और सियासत की असलियत समझाई. समंदर के किनारे बसा अकाबा जॉर्डन देश का तटीय शहर है, जो देश के दक्षिणी भाग में अकाबा की खाड़ी में है; यह खाड़ी लाल सागर से मिलती है. आज ये इज़राइल, ईजिप्ट (मिस्र) और सऊदी अरब की सीमाओं के निकट जाना-माना पर्यटन स्थल है और औद्योगिक बंदरगाह के रूप में भी गिना जाता है.

विलियम शेक्सपियर. स्रोतः इम्पीरियल वॉर म्यूज़ियम
विलियम शेक्सपियर को कभी-कभी “शेक्सपियर ऑफ़ अरेबिया” भी कहा गया—और कुछ लोग तो उन्हें टी. ई. लारेंस से पहले का ‘अरब फ़तेह करने वाला’ मानते हैं. फ़र्क बस इतना था कि यह आदमी कैमरा भी साथ लेकर चलता था—और जो देखता था, उसे शीशे की प्लेट पर दर्ज कर लेता था.
उनका जन्म बंबई में हुआ—एक ऐसे परिवार में जहाँ सिविल सर्विस जैसे हवा में घुली हुई थी. पिता इंडियन सिविल सर्विस में थे, माँ गृहिणी. उस ज़माने की तरह, बचपन का बड़ा हिस्सा उन्होंने अपने माता-पिता से दूर, इंग्लैंड में बिताया. वहीं पढ़ाई हुई, और वहीं ढलाई शुरू हुई. किंग विलियम्स कॉलेज में पढ़ते उन्हें दूसरी भाषा सीखने का शौक़ लगा, घुड़सवारी में हाथ साफ़ हुआ—और शायद वहीं से एक बेचैनी भी साथ लगी, जो आगे चलकर उन्हें रेगिस्तान तक ले गई.
फ़ौज में सेकंड लेफ़्टिनेंट बनकर हिंदुस्तान आए, डेवॉनशायर रेजिमेंट में सेवा की, फिर 17वीं बंगाल कैवेलरी में चले गए. यहीं उन्होंने सीखा कि सरहद सिर्फ़ नक़्शे पर नहीं होती—लोगों के बीच भी होती है, और भाषा ज्ञान से ही पार की जा सकती है. बॉम्बे प्रेसीडेंसी में उनके निशाने की चर्चा थी—शिकार के क़िस्से थे—और वहाँ उन्हें “टाइगर हेनरी” कहा जाने लगा.
1903 में उनकी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया—उन्हें हिन्दुस्तानी ब्रिटिश सरकार के विदेशी विभाग में ले लिया गया. अब काम बंदूक से कम, दिमाग़ और भाषा से ज़्यादा था. वो ब्रिटिश-हिन्दुस्तानी साम्राज्य के सबसे युवा वाइस-कॉन्सल या राजदूत बने. काम था—ख़बरें जुटाना, क़बीलों को समझना, रिश्ते बनाना, और अरबी, फ़ारसी, हिंदुस्तानी जैसी ज़बानों में डूब जाना. 1909 से 1914 के बीच उनकी तैनाती कुवैत में रही—जहां उनकी मुलाक़ात हुई शेख इब्न सऊद से. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वो शख़्स आगे चलकर सऊदी अरब का बुनियाद रखने वाला राजा बनेगा.

इब्न सऊद. फ़ोटोः शेक्सपियर. ©sothebys.com
शेक्सपियर ने इब्न सऊद को सिर्फ़ समझा ही नहीं—उन पर भरोसा किया, और उनका भरोसा जीता भी. 1910 से 1915 तक वह उनके फ़ौजी सलाहकार रहे. ब्रिटिश साम्राज्य और सऊद परिवार के बीच जो शुरुआती पुल बना, उसमें शेक्सपियर की भूमिका बेहद अहम थी. कहा जाता है, उनके तैयार किए गए समझौते पर ही ब्रिटिश सरकार और सऊद परिवार के बीच उनकी मौत के तुरंत बाद दस्तख़त हुए—जिसने सऊदी हुकूमत को शुरुआती पहचान दिलाई. इब्न सऊद ने शेक्सपियर के लिए कहा था: “मेरा भरोसा पहले ख़ुदा पर है, और फिर तुम पर.” समझने के लिए इतना काफ़ी है कि यह रिश्ता सिर्फ़ सियासत का नहीं था.
धीरे-धीरे शेक्सपियर ने सिर्फ़ अरबी भाषा ही नहीं, पूरा जीवन-ढंग सीख लिया. अरबी ज़बान में फ़र्राटे से बातचीत, ख़ानाबदोश बेडुइन का पहनावा, उनके तौर-तरीक़े, उनका खान-पान—सब कुछ अपनाया. इससे वह अंग्रेज़ अफ़सर कम, उनके जैसे ज़्यादा लगने लगे. ऊँटों के काफ़िलों के साथ उन्होंने ऐसे रास्ते तय किए, जहाँ यूरोप के किसी नक़्शे की रेखा नहीं पहुँची थी. कुएँ, पगडंडियाँ, खजूर के पेड़, तालाब, रीति-रिवायत, रेगिस्तान की बनावट—सब कुछ दर्ज किया.
शेक्सपियर ने अपने अरब अभियानों के दौरान फ़ोटोग्राफ़ी को नए दोस्त बनाने के रूप में इस्तेमाल किया. अपने ग्लास-प्लेट कैमरे से वे पैनोरमिक तस्वीरें बनाते थे. इन तस्वीरों को वे अपने तंबू के अंदर ही डेवलप करते थे, जिसमें काला कपड़ा खिंचा होने की वजह से उसमें रौशनी बिल्कुल नहीं जाती थी. रेगिस्तान की मुश्किलों के बावजूद वो ख़ुद उनकी प्रोसेसिंग भी कर सके. उनकी तस्वीरों से मध्य अरब में रहने वाले ख़ानाबदोश कबीलों और उस अनजान इलाक़े की ऐसी तस्वीरें और वो रिकॉर्ड मिलते हैं जो पहली बार किसी इंसान ने कैमरे में क़ैद किये थे. एक घुमक्कड़ फ़ोटोग्राफ़र होने के नाते शेक्सपियर ने अरब जगत की कुछ यादगार और अमिट तस्वीरें खींचीं. उनकी तस्वीरें कुवैत और सऊदी अरब की शुरुआती तस्वीरों में सबसे ज़्यादा मशहूर हैं, जिनके प्रिंट्स बाद में सोथबीज़ द्वारा नीलाम की गए.
और हाँ, एक दिलचस्प बात—इब्न सऊद की पहली तस्वीर खींचने का श्रेय भी शेक्सपियर को ही जाता है. कहते हैं, उस समय तक इब्न सऊद ने कैमरा देखा भी नहीं था.
1914 में उन्होंने कुवैत से रियाद तक क़रीब 2900 किलोमीटर की यात्रा की और फिर वहाँ से अक़ाबा तक. इस यात्रा के दौरान उन्होंने नफ़ूद के रेगिस्तान को पार करते हुए उसे विस्तार से समझा और उसका विवरण लिखा. फिर आई जर्ब की लड़ाई—24 जनवरी 1915 को. शेक्सपियर, इब्न सऊद के साथ थे. सामने इब्न रशीद की ताक़त और फ़ौज.

सऊदी अरब की लड़ाई. फ़ोटोः शेक्सपियर. ©sothebys.com
जब रेगिस्तानी मैदान पर घमासान लड़ाई चल रही थी, उस घड़ी वो एक ऊँचाई वाले टीले पर खड़े “हो रही लड़ाई की तस्वीरें ले रहे थे—इब्न रशीद के किसी सिपाही ने उन्हें गोली मारी – यानि उनके अपने ही किसी सिपाही ने. उनका इंतक़ाल वहीं लड़ाई का मैदान में हुआ. इतिहासकारों ने इसे “अरब दुनिया का सबसे बड़ा नुक़सान” कहा. कुछ तो यह भी मानते हैं कि अगर वो ज़िंदा रहते, तो शायद ‘लॉरेंस आफ़ अरेबिया’ फ़िल्म की कहानी ही कुछ और होती. उन्हें कुवैत में दफ़नाया गया जहां उनकी क़ब्र आज भी है—शहर के बीचोंबीच.
सोचिए अपने कैमरे पर झुका एक फ़ोटोग्राफ़र आख़िरी फ़्रेम कंपोज करता. बंदूक की एक गोली धाँय से दिल के पार होते ही शटर भी साथ बंद कर दे.
इब्न सऊद की सेना हार गई. सैकड़ों लोग मारे गए. और शेक्सपियर की चीज़ें—उनका कैमरा, उनकी तस्वीरें—सब लूट ली गईं. लेकिन जो बचा—वह कम नहीं था. काँच की प्लेटों पर उतरी हुई उनकी तस्वीरें आज भी शुरुआती अरब दुनिया की सबसे अहम झलकियों में गिनी जाती हैं. ख़ानाबदोश ज़िंदगी, बेदुइन समुदाय, रेगिस्तान की खामोशी, क़बीलाई दुनिया—सब कुछ.
उनकी कुछ तस्वीरें के सिल्वर प्रिंट जो रॉयल ज्योग्राफ़िकल सोसाइटी के पास बरसों से सुरक्षित थे सोथबीज़ की एक नीलामी में सन् 1980 में आए. उनकी डायरी और उनके नक़्शे आज भी इतिहास के दस्तावेज़ हैं.
कभी-कभी ऐसे लोगों के बारे में पढ़ते हुए ठहर जाना पड़ता है, सोचना पड़ता है—कैसी रही होगी वो बेचैनी, जो एक आदमी को बंबई से उठाकर अरब के रेगिस्तान तक ले जाती है? कैसा रहा होगा वह जज़्बा—जो उसे सिर्फ़ देखने नहीं, समझने और दर्ज करने पर मजबूर करता है? शायद इसी के लिए कोई यूँ कह गया है:
कुछ लोग लफ़्ज़ों में दुनिया लिख जाते हैं,
कुछ लोग ख़ामोशी में रास्ते बना जाते हैं…
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महान नाटककार और जिन्हें “द बार्ड” के नाम से भी जाना जाता है – विलियम शेक्सपियर के जन्मदिन का तो पक्का पता नहीं मिलता, हाँ स्ट्रैटफ़ोर्ड-अपॉन-एवन के चर्च में ईसाई रीति से उनका नामकरण-संस्कार या दीक्षा 26 अप्रैल, 1564 को हुई थी – चर्च की परंपरा के अनुसार उनका जन्म तीन दिन पहले हुआ होगा यानि 23 अप्रैल, 1564. विलियम शेक्सपियर को मेरा प्रणाम.
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कवर | सऊदी अरब के शेख़ों का ऐतिहासिक गठबंधन/©sothebys.com

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