सफ़रनामा | भोपाल का ताल, खुला आसमान और पठान की ग़ज़लें

  • 10:57 am
  • 19 April 2020

( ‘आख़िरी चट्टान’ मोहन राकेश का यात्रा वृतांत है.  गोआ से कन्याकुमारी तक की यह यात्रा उन्होंने दिसम्बर 1952 और फ़रवरी 1953 के बीच की थी. बकौल लेखक, ‘यात्रा से लौटते ही मैंने यह पुस्तक लिख डाली थी. उन दिनों हर चीज़ की छाप मन पर ताज़ा थी. पूरे अनुभव को लेकर मन में एक उत्साह भी था, इसलिए कहीं-कहीं अतिरिक्त भावुकता से अपने को नहीं बचा सका.’ यहां उसी यात्रा के दो पड़ाव…)

अब्दुल जब्बार पठान

दिसम्बर सन् बावन की पचीस तारीख़. थर्ड क्लास के डिब्बे में ऊपर की सीट बिस्तर बिछाने को मिल जाए, वह बड़ी बात होती है. मुझे ऊपर की सीट मिल गयी थी. सोच रहा था कि अब बम्बई तक की यात्रा में कोई असुविधा नहीं होगी. रात को ठीक से सो सकूँगा. मगर रात आई, तो मैं वहाँ सोने की जगह भोपाल ताल की एक नाव में लेटा बूढ़े मल्लाह अब्दुल जब्बार से ग़ज़लें सुन रहा था.

भोपाल स्टेशन पर मेरा मित्र अविनाश, जो वहाँ से निकलने वाले एक हिन्दी दैनिक का सम्पादन करता था, मुझसे मिलने के लिए आया था. मगर बात करने की जगह उसने मेरा बिस्तर लपेटकर खिड़की से बाहर फेंक दिया, और ख़ुद मेरा सूटकेस लिए हुए नीचे उतर गया. इस तरह मुझे एक रात के लिए वहाँ रह जाना पड़ा.

रात को ग्यारह के बाद हम लोग घूमने निकले. घूमते हुए भोपाल ताल के पास पहुँचे, तो मन हो आया कि नाव लेकर कुछ देर झील की सैर की जाए. नाव ठीक की गई और कुछ ही देर में हम झील के उस भाग में पहुँच गए जहाँ से चारों ओर के किनारे दूर नज़र आते थे. वहाँ आकर अविनाश के मन में न जाने क्या भावुकता जाग आई कि उसने एक नज़र पानी पर डाली, एक दूर के किनारों पर, और पूर्णता चाहने वाले कलाकार की तरह कहा कि कितना अच्छा होता अगर इस वक़्त हममें से कोई कुछ गा सकता.

”मैं गा तो नहीं सकता, हुज़ूर” बूढ़ा मल्लाह हाथ रोककर बोला. ”मगर आप चाहें, तो चन्द ग़ज़लें तरन्नुम के साथ अर्ज़ कर सकता हूँ – और माशाल्लाह चुस्त ग़ज़लें हैं.”

”ज़रूर – ज़रूर!” हमने उत्साह के साथ उसके प्रस्ताव का स्वागत किया. बूढ़े मल्लाह ने एक ग़ज़ल छेड़ दी. उसका गला काफ़ी अच्छा था और सुनाने का अन्दाज़ भी शायराना था. काफ़ी देर चप्पुओं को छोड़े वह झूम-झूमकर ग़ज़लें सुनाता रहा. एक के बाद दूसरी, फिर तीसरी. मैं नाव में लेटा उसकी तरफ़ देख रहा था. उस सर्दी में भी वह सिर्फ़ एक तहमद लगाए था. गले में बनियान तक नहीं थी. उसकी दाढ़ी के ही नहीं, छाती के भी बाल सफ़ेद हो चुके थे. मगर जब वह चप्पू चलाने लगता, तो उसकी मांसपेशियाँ इस तरह हिलतीं जैसे उनमें फ़ौलाद भरा हो.

तीसरी ग़ज़ल सुनाकर वह ख़ामोश हो गया. उसके ख़ामोश हो जाने से सारा वातावरण ही बदल गया. रात, सर्दी और नाव का हिलना, इन सबका अनुभव पहले नहीं हो रहा था, अब होने लगा. झील का विस्तार भी जैसे उतनी देर के लिए सिमट गया था, अब खुल गया.

”अब लौट चलें साहब,” कुछ देर बाद उसने कहा. ”सर्दी बढ़ रही है और मैं अपनी चादर साथ नहीं लाया.”

अविनाश ने झट से अपना कोट उतारकर उसकी तरफ़ बढ़ा दिया. कहा, ”लो, तुम यह पहन लो. अभी हम लौटकर नहीं चलेंगे. तुम्हें ग़ालिब की कोई चीज़ याद हो, तो वह सुनाओ.”

बूढ़े मल्लाह ने एतराज़ नहीं किया. चुपचाप अविनाश का कोट पहन लिया और ग़ालिब की एक ग़ज़ल सुनाने लगा. ”मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए…”

हम लोग उसे ‘बड़े मियाँ’ कहकर बुला रहे थे. उसने ग़ज़ल पूरी कर ली, तो मैंने उससे उसका नाम पूछा.

”मेरा नाम है साहब, अब्दुल जब्बार पठान,” उसने कहा. ‘पठान’ शब्द पर उसने ख़ास ज़ोर दिया.

”मियाँ अब्दुल जब्बार, तुमने बहुत अच्छी चीज़ें याद कर रखी हैं,” मैंने कहा. ”और इससे भी बड़ी बात यह है कि इस उम्र में भी तुम इतने रंगीनमिज़ाज हो…”

”मर्दज़ाद हूँ साहब,” वह बोला. ”तबीयत की रंगीनी तो ख़ुदा ने मर्दज़ाद को ही बख़्शी है. जिसे यह चीज़ हासिल नहीं, वह समझ लीजिए कि मर्दज़ाद ही नहीं.”

”इसमें क्या शक है!” अविनाश हँसकर बोला. अपनी उम्र में तो काफ़ी गुलछर्रे उड़ाए होंगे तुमने.”

अब्दुल जब्बार मुस्कराया. सफ़ेद मूँछों के नीचे उसके होठों पर आई मुस्कराहट में रसिकता भर आई. ”उम्र तो हुज़ूर बन्दे की अज़्ल के रोज़ तक रहती है,” वह बोला. ”मगर हाँ, जवानी की बहार जवानी के साथ थी. बहुत ऐश की,बेवक़ूफ़ियाँ भी बहुत थीं. मगर कोई अफ़सोस नहीं है. वो दिन फिर से मिलें, तो वही बेवक़ूफ़ियाँ नए सिरे से की जाएँगी, और फिर भी कोई अफ़सोस नहीं होगा.”

”मतलब वैसे अब उस तरह की बेवक़ूफ़ियों की नौबत नहीं आती?” अविनाश ने पूछ लिया.

”अब हुज़ूर? हिम्मत में किसी मर्दज़ाद से कम अब भी नहीं हूँ. कहिए जिस ख़बीस का ख़ून कर दूँ. मगर जहाँ तक नफ़्स का सवाल है, उसकी मैं तौबा करता हूँ….अच्छा, कुछ देर ख़ामोश रहकर ज़रा एक चीज़ सुनिए…”

मैंने समझा था कि वह कोई सूफ़ियाना क़लाम सुनाने जा रहा है. मगर वह बिना एक शब्द कहे चुपचाप नाव चलाता रहा. गहरी ख़ामोशी थी. चप्पुओं के पानी में पड़ने के सिवा कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी. हम लोग उत्सुकता के साथ उसकी तरफ़ देखते रहे. वह मुस्करा रहा था. मगर अब उसकी मुस्कराहट में पहले की-सी रसिकता नहीं, एक संज़ीदगी थी. ”सुन रहे हैं?” उसने कहा.

मेरी समझ में नहीं आया कि वह क्या सुनने को कह रहा है. ”क्या चीज़?” मैंने पूछ लिया.

”यह आवाज़,” वह बोला. रात की ख़ामोशी में चप्पुओं के पानी में पड़ने की आवाज़. शायद आपके लिए इसमें कोई ख़ास मतलब नहीं है. पहले मुझे भी इसमें कुछ ख़ास नहीं लगता था. मगर तीन साल हुए एक रात में अकेला इस झील को पार कर रहा था. ऐसी ही रात थी, ऐसा ही अँधेरा था, और ऐसा ही ख़ामोश समाँ था. जब मैं झील के बीचोबीच पहुँचा, तो यह आवाज़ उस वक़्त मुझे कुछ और-सी लगने लगी. हर बार जब यह आवाज़ होती, तो मेरे ज़िस्म में एक सनसनी-सी दौड़ जाती. मुझे लगता जैसे कोई चीज़ हलके-हलके मेरी रूह को थपथपा रही हो. फिर मुझे महसूस होने लगा कि वह चप्पुओं के पानी में पड़ने की आवाज़ नहीं, एक हल्की-हल्की ख़ुदाई आहट है. मुझे उस वक़्त लगा कि मैं ख़ुदा के बहुत नज़दीक हूँ. मैंने दिल-ही-दिल सज्दा किया और आइन्दा के लिए गुनाहों से तौबा की क़सम खाई. उसके बाद से जब कभी मैं रात के वक़्त नाव लेकर झील में आता हूँ, तो मुझे यह आवाज़ फिर वैसी ही लगने लगती है. तब मैं अपनी उस तौबा को याद करता हूँ और अल्लाह का शुक्र मनाता हूँ कि उसने मुझे इस तरह तौबा का मौक़ा बख़्शा. फिर मैं नए सिरे से तौबा का अहद करता हूँ और अल्लाह से उसकी मेहर के लिए फ़रियाद करता हूँ.”

वह ख़ामोश हो गया. सिर्फ़ पानी से चप्पुओं के टकराने का शब्द सुनाई देता रहा. मैं बाईं करवट होकर हाथ की उँगली से पानी में उठती लहरों को छूने लगा. एक तीखी ठंडी चुभन नसों को बींधती सारे शरीर में फैल गई. तभी मुझे उसकी कही ख़ून करने की बात याद हो आई. एक तरफ़ वह सब गुनाहों से तौबा का अहद किए था और दूसरी तरफ़ किसी भी इन्सान का ख़ून कर देने को तैयार था.

”मियाँ अब्दुल जब्बार,” मैंने सीधे उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा,” इन्सान का ख़ून करने को तुम गुनाह नहीं समझते?”

”हुज़ूर, मैं पठान हूँ,” वह हाथ रोककर बोला. ”मेरी निगाह में गुनाह का ताल्लुक़ इन्सान की रूह के साथ है, जान के साथ नहीं. मैं किसी की इज़्ज़त लूटता हूँ, किसी को ज़लील करता हूँ, किसी की चोरी करता हूँ, तो उसकी रूह को सदमा पहुँचाता हूँ. यह गुनाह है. मगर मैं किसी ख़बीस की जान लेता हूँ, तो एक नापाक रूह को जिस्म की क़ैद से आज़ाद करता हूँ. यह गुनाह नहीं है.”

मैं मन-ही-मन मुस्करया और पानी तरफ़ देखने लगा. चप्पुओं से बनते लहरों के साँप लचकते हुए एक-दूसरे में विलीन होते जा रहे थे. मेरी एक उँगली फिर पानी की सतह को छूने लगी.

”तो कम-से-कम नफ़्स के लिहाज़ से अब तुम बिल्कुल पाक ज़िन्दगी बिता रहे हो?” मैंने पूछा.

”क़सम खाकर तो नहीं कह सकता हुज़ूर,” अब्दुल जब्बार संजीदगी छोड़कर फिर अपनी रसिकता में लौट आया. ”यार लोगों की मजलिस में शिरकत की दावत हो, तो इन्कार भी नहीं किया जाता. वैसे दमख़म आपकी दुआ से अब भी इतना है कि…” और जिन मार्के के शब्दों में उसने अपने पुरुषत्व की घोषणा की, उन्हें मैं ज़िन्दगी-भर नहीं भूल सकता.

सर्दी बढ़ रही थी. ”तो हुज़ूर अब नाव को किनारे की तरफ़ ले चलूँ, काफ़ी वक़्त हो गया है,” उसने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा. हमने अब उससे और कोई चीज़ सुनाने का अनुरोध नहीं किया. नाव धीरे-धीरे किनारे की तरफ़ बढने लगी.

किनारे पर पहुँचकर जब हम चलने को हुए, तो अब्दुल जब्बार ने कहा, ”आज शाम को कुछ मछलियाँ पकड़ी हैं. दो-एक सौग़ात के तौर पर लेते जाइए.”

मगर अविनाश वहाँ होटल में खाना खाता था और मैं उसी का मेहमान था, इसलिए मछलियों का हमारे लिए कोई उपयोग नहीं था. हमने उसे धन्यवाद दिया और वहाँ से चले आए.

नया आरम्भ

मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है, कम-से-कम मुझे यह लगता तो है ही, कि बस या ट्रेन में मैं जिस खिड़की के पास बैठता हूँ, धूप उसी खिड़की से होकर आती है. इस दिशा में पहले से सावधानी बरतने का कोई फल नहीं होता क्योंकि सड़क या पटरी का रुख़ कुछ इस तरह से बदल जाता है कि धूप जहाँ पहले होती है, वहाँ से हटकर मेरे ऊपर आने लगती है. फिर भी मुझसे यह नहीं होता कि खिड़की के पास न बैठा करूँ. गति का अनुभव खिड़की के पास बैठकर ही होता है. बीच में बैठकर तो यूँ लगता है जैसे गतिहीन केवल हिचकोले खाए जा रहे हैं….

भोपाल से मैं अमृतसर एक्सप्रेस में बैठ गया था. कोशिश करके जगह भी बना ली थी. मगर धूप सीधी आकर मेरे चेहरे पर पड़ रही थी. मेरे हाथों में एक पुस्तक थी, जिसे मैं बहुत देर से खोले था मगर पढ़ नहीं पा रहा था. कभी दो-एक पंक्तियाँ पढ़ लेता और फिर धूप से बचने के लिए उससे ओट करके खिड़की से बाहर देखने लगता. मेरे सामने की सीट पर बैठा एक लड़का यह देखकर मुस्करा रहा था कि मैं धूप से बचना भी चाहता हूँ और खिड़की के बाहर देखना भी चाहता हूँ. उसने अपनी जगह से थोड़ा सरकते हुए मुझसे कहा, ”इधर आ जाइए. इधर धूप नहीं है.”

मैं उठकर उसके पास जा बैठा और खिडक़ी से बाहर देखने लगा. कुछ देर बाद किसी ने मुझे कन्धे से पकड़कर हिलाया तो मैं चौंक गया. टिकट इंस्पेक्टर टिकट देखने के लिए खड़ा था. मैंने टिकट निकालकर उसे दिखा दिया. टिकट इंस्पेक्टर ने तब साथ बैठे उस लड़के की तरफ़ हाथ बढ़ाया. लड़के ने जेब से एक बड़ा-सा रूमाल निकाला. उसमें एक टिकट और कुछ आने पैसे थे. टिकट इंस्पेक्टर ने उसका टिकट लेकर ध्यान से देखा और पूछा, ”कहाँ से बैठे हो?”

”बीना से,” लडक़े ने कहा.

”मगर तुम्हारा टिकट तो बीना से भोपाल तक का है.” और उसने बताया कि एक तो भोपाल पीछे रह गया है, दूसरे बीना से भोपाल तक भी उस गाड़ी में थर्ड क्लास में सफ़र नहीं किया जा सकता. ”तुम्हें पता नहीं था कि यह लम्बे सफ़र की गाड़ी है?”

”जी, मैं लम्बे सफ़र के लिए ही इसमें बैठा हूँ.” लड़के ने कहा, ”मैं बम्बई जा रहा हूँ.”

लड़के की इस बात से आसपास बैठे सब लोग हँस दिए. इंस्पेक्टर भी हँस दिया. बोला, ”फिर तुमने टिकट बम्बई तक का क्यों नहीं लिया?”

लड़के की बड़ी-बड़ी आँखें कुछ सहम गईं. ”जी, मेरे पास जितने पैसे थे, उनसे यही टिकट आता था”, उसने कहा. इंस्पेक्टर क्षण-भर अनिश्चित दृष्टि से उसे देखता रहा. फिर जैसे उसे भूलकर दूसरों के टिकट देखने लगा.

मैं भी पल-भर ध्यान से लड़के की तरफ़ देखता रहा. गोरा रंग और दुबला-पतला शरीर. खाल बहुत पतली, क्योंकि चेहरे की हरी नाडि़याँ बाहर दिखाई दे रही थीं. उम्र ग्यारह-बारह साल से ज़्यादा नहीं लगती थी, हालाँकि वह एक वयस्क की तरह गम्भीर होकर बैठा था. उसकी हैंडलूम की हरी कमीज़ और भूरा पाजामा दोनों ही अब बदरंग हो रहे थे. चेहरे के दुबलेपन को देखते हुए उसकी आँखें और कान बहुत बड़े लगते थे. आँखों के नीचे, जो वैसे सुन्दर थीं, स्याह गड्ढे पड़ रहे थे.

”तुम्हारा घर बम्बई में है?” मैंने उससे पूछा.

”जी, मेरी मौसी वहाँ रहती है,” उसने कहा.

”बीना में तुम किसके पास थे?”

वहाँ मैं नौकरी करता था. अब नौकरी छोड़कर मौसी के पास जा रहा हूँ?”

”तुम्हारे माता-पिता…?”

”वे दंगे के दिनों में मारे गए थे.”

मैं पल-भर चुप रहा. फिर मैंने पूछा, ”बम्बई में मौसी से मिलने जा रहे हो?”

”जी नहीं. अब मैं वहाँ मौसी के पास ही रहूँगा. मौसी ने मुझे चिट्ठी लिखकर बुलाया है. मेरे मौसा गुज़र गए हैं और पीछे चार-पाँच साल के दो बच्चे हैं. घर में अब कमाने वाला कोई नहीं है. मैं तो यहाँ भी नौकरी करता था, वहाँ भी कर लूँगा. रोटी और पन्द्रह रुपये मिल जाएँगे. अपने लिए तो मुझे रोटी ही चाहिए. रुपये मौसी को दे दिया करूँगा. पास रहूँगा तो बच्चों की देखभाल भी हो जाएगी.”

मैं फिर कुछ देर उसके चेहरे की नीली धारियों को देखता रहा. ”तुम्हें वहाँ जाते ही नौकरी मिल जाएगी?” मैंने पूछा.

”जब तक नौकरी नहीं मिलेगी तब तक कोई और काम कर लूँगा.” उसने कहा.

”तुम और क्या काम कर सकते हो?”

”बोझ उठा सकता हूँ.”

मेरे होठों पर एक खुश्क-सी मुस्कराहट आ गई. वह अपनी दुबली-पतली बाँहों से हल्का-सा भी बोझ उठा सकता है,उसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी.

”तुम कितना बोझ उठा सकते हो?” मैंने पूछा.

”जी, बड़ा तो नहीं, मगर छोटा-मोटा सामान तो उठा ही सकता हूँ. मैं उम्र में उतना छोटा नहीं हूँ जितना देखने में लगता हूँ.”

”क्या उम्र है तुम्हारी?”

”सोलह साल.”

”सोलह साल? तुम्हें ठीक पता है तुम्हारी उम्र सोलह साल है?”

लड़के ने गम्भीर भाव से सिर हिलाया. ”जी, पार्टीशन से पहले मैं पत्तोकी में पाँचवीं जमात में पढ़ता था.”

और वह बताने लगा कि किस तरह वह पाकिस्तान से बचकर आया था. जब उनके घर पर हमला हआ, तो उसके माता-पिता ने उसे आटे के ड्रम में छिपा दिया था. उसकी ख़ुशक़िस्मती थी कि हमलावरों ने ड्रम का ढँकना उठाकर नहीं देखा. वहाँ से बचकर वह किसी तरह एक काफ़िले के साथ जा मिला और हिन्दुस्तान पहुँच गया. तीन साल वह शरणार्थी कैम्पों में रहा. फिर उसे यह नौकरी मिल गई. वे लोग उसे अपने साथ बीना ले आए. पर उसे वे हर महीने ठीक से तनख़्वाह नहीं देते थे. कभी कह देते कि उसकी तनख़्वाह कपड़ों में कट गई है, और कभी कि जो चीज़ें उसने तोड़ी हैं, उनकी क़ीमत उसकी तनख़्वाह से कहीं ज़्यादा है. कभी कह देते कि उन्होंने उसके नाम से लाटरी डाल दी है, जिसमें हो सकता है उसका एक लाख रुपया निकल आए. नौकरी छोड़ने पर उन्होंने उसका पूरा हिसाब करके उसे कुल चार रुपये दिए थे.

”तुम इससे पहले अपनी मौसी के पास क्यों नहीं चले गए?” मैंने पूछा.

”पहले मुझे उन लोगों का पता नहीं मालूम था,” वह बोला. ”बीना में एक बार अपने वतन का एक आदमी मिल गया, तो उसने बताया कि वे लोग बम्बई में चेम्बूर कैम्प में हैं. मैंने उन्हें चिट्ठी लिखी कि वे कहें तो मैं उनके पास बम्बई आ जाऊँ. पर तब मौसा ने लिखा था कि मुझे लगी हुई नौकरी छोड़नी नहीं चाहिए. वे मौक़ा देखेंगे, तो अपने-आप मुझे बुला लेंगे.” फिर कुछ रुककर उसने पूछा, ”जी, यह टी.टी. मुझे गाड़ी से उतार तो नहीं देगा?”

”नहीं, वह उतारेगा नहीं,” मैंने कहा. ”अगर उतारना चाहेगा, तो हम उससे बात कर लेंगे.”

”तो मैं ज़रा लेट जाऊँ,” वह बोला. ”लगता है मुझे बुख़ार हो रहा है.”

मैंने उसके शरीर को छूकर देखा. शरीर सचमुच गरम था. मैं अपनी पहली जगह पर चला गया, और वह वहाँ लेट गया.

गाड़ी होशंगाबाद स्टेशन पर रुकी, तो वह सो रहा था. बाहर देखते हुए मुझे साथ के डिब्बे में अपने एक परिचित प्रोफ़ेसर नज़र आ गए. मैं उतरकर उनके पास चला गया. वे कहीं से एक शिक्षा-सम्मेलन का सभापतित्व कर आए थे और अब किसी मीटिंग के सिलसिले में बम्बई जा रहे थे. पहले वे मुझे उस सम्मेलन के विषय में बताते रहे. फिर मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे. फिर अपनी हाल की यूरोप-यात्रा का क़िस्सा सुनाने लगे. नतीजा यह हुआ कि गाड़ी चल दी और मैं उन्हीं के डिब्बे में बैठा रह गया.

इटारसी स्टेशन पर लौटकर अपने डिब्बे में आया, तो वहाँ भीड़ पहले से बहुत बढ़ चुकी थी. भीड़ में रास्ता बनाकर अपनी जगह पर पहुँचा, तो देखा कि वह लड़का सामने की सीट पर नहीं है. लोगों से पूछा, तो पता चला कि वह इटारसी तक आ ही नहीं पाया – टिकट इंस्पेक्टर ने उसे होशंगाबाद स्टेशन पर ही उतार दिया था.

आवरण फ़ोटोः प्रभात


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