मौलाना रूमीः इल्म से इश्क़ तक का सफ़र
सत्रह दिसंबर की रात सूफ़ी परंपरा में मातम की नहीं, विसाल की रात है. मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए मौत कोई अंत नहीं, बल्कि माशूक़ से मुलाक़ात थी. मेरे लिए रूमी को याद करना, उनके लिखे को पढ़ना, उसे सुनाना हर बार नए शब्दों में लिखना—अपने दिल पे पड़े बोझ को हल्का करने जैसा होता है. रूमी की ज़िंदगी, इश्क़ का उनका फ़लसफ़ा, और उनके शब-ए-उर्स की रौशनी में मैं कल फिर से उतरा, जहाँ सवाल कविता बन जाते हैं और ख़ामोशी बोलने लगती है.
हर साल सत्रह दिसंबर की रात क़ोन्या (तुर्की का एक बड़ा शहर) की फ़िज़ाओं में एक अजीब-सी रौशनी उतर आती है. वहाँ की ख़ामोशी मातम का सन्नाटा नहीं होती, बल्कि किसी गहरे यक़ीन की होती है. इस रात को शब-ए-अरस कहा जाता है—वह रात जब मौत को जुदाई नहीं, बल्कि मिलन समझा जाता है. मौलाना जलालुद्दीन रूमी के लिए यह रात रुख़्सती की नहीं, विसाल की थी. हिंदुस्तान की सूफ़ी परंपरा में जिसे हम उर्स कहते हैं, वही भावना फ़ारसी परंपरा में शब-ए-अरस के नाम से जानी जाती है—वली का दुनिया से जाना नहीं, बल्कि रब से एक हो जाना.
30 सितंबर 1207 को बल्ख़ में जन्मे रूमी, एक बड़े आलिम बहाउद्दीन के बेटे थे. बचपन से ही उन्हें इल्म की सख़्त तालीम मिली—क़ुरआन, हदीस, फ़लसफ़ा, तर्कशास्त्र, गणित और फ़ारसी, अरबी तथा तुर्की भाषाएँ. युवा रूमी अपने समय के प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते थे. क़ोन्या में उनके ख़ुत्बे सुनने दूर-दूर से लोग आते थे. मगर रूमी ख़ुद जानते थे कि सिर्फ़ इल्म से दिल को तसल्ली नहीं मिलती, इसलिए वे कहते हैं—
“कल मैं अक़्लमंद था, दुनिया को बदलना चाहता था;
आज मैं आशिक़ हूँ, ख़ुद को बदल रहा हूँ.”
रूमी की ज़िंदगी तब पूरी तरह बदल गई जब शम्स-ए-तबरेज़ उनसे मिले (शम्स की दिलचस्प कहानी किसी और दिन). शम्स ने उनके इल्म को नकारा नहीं, बल्कि उसे इश्क़ की आग में झोंक दिया. रूमी से मसीत का मिम्बर छूट गया, किताबें ख़ामोश हो गईं, और वही आलिम शायर बन गया. रूमी ने कहा—
“मैं ख़ामोश था, इश्क़ ने मुझे ज़बान दी;
मैं मिट्टी था, उसने मुझे आग बना दिया.”
रूमी की शायरी का रूहानी सुर “तलाश’ का है—एक ऐसी तलाश जिसमें सवाल भी दुआ बन जाते हैं. उनकी जानी मानी नज़्म में वह पूछते हैं, “वह ख़ूबसूरत माशूक़ कहाँ चला गया? वह लम्बा, सलीक़ेदार सरू कहाँ चला गया?” यह सवाल किसी इंसानी जुदाई का नहीं, बल्कि उस हक़ीक़त की तलाश का है जो हर वक़्त पास होकर भी ओझल रहती है. रूमी कहते हैं कि वह माशूक़ शमा की तरह हमारे बीच रौशनी बाँटता रहा, फिर अचानक ऐसा ग़ायब हुआ कि दिल को यक़ीन ही नहीं आता. दिन भर दिल पत्ते की तरह काँपता है और आधी रात तन्हाई में वही सवाल उठता है—वह कहाँ चला गया?
शम्स, जो एक बवंडर जैसे रूमी की ज़िंदगी में आए थे वैसे ही किसी रूहानी आवाज़ जैसे गुम हो गए . शम्स के ग़ायब होने के बाद रूमी की तन्हाई और गहरी हो गई, और उसी तन्हाई से मसनवी और ग़ज़लों का समुंदर उमड़ पड़ा. इसी तलाश में रूमी पूछते हैं—
“वह हसीन माशूक़ कहाँ चला गया?
यह सवाल किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि उस हक़ीक़त के लिए है जो उनकी हर साँस में शामिल है. रूमी कहते हैं—
“उसने हमारे बीच शमा की तरह रौशनी फैलाई,
फिर वह कहाँ गया—मुझे छोड़कर कैसे चला गया?
दिन भर दिल पत्ते की तरह काँपता है और आधी रात तन्हाई में वही सवाल उठता है.”
लेकिन रूमी यह भी जानते हैं कि माशूक़ बाहर नहीं, भीतर है. इसलिए वे कहते हैं—
“तुम बूँद नहीं हो समुंदर में,
तुम समुंदर हो, एक बूँद में.”
यही समझ सूफ़ी को तसल्ली देती है और जुदाई को भी इबादत बना देती है. 17 दिसंबर 1273 को रूमी का विसाल हुआ. लेकिन उन्होंने पहले ही कह दिया था कि इसे मौत न कहा जाए.
“जब तुम मेरा जनाज़ा देखो,
तो यह मत समझना कि मैं चला गया;
मैं क़ैद से आज़ाद हुआ हूँ.”
उनके लिए जिस्म का छूटना रूह की हार नहीं, बल्कि उसकी कामयाबी थी. इसी लिए उन्होंने कहा कि उनकी क़ब्र ज़मीन में नहीं, आशिक़ों के दिलों में है.
आज, जब दुनिया शोर से भरी है और इंसान सुकून के लिए भटक रहा है, रूमी की आवाज़ और ज्यादा साफ़ सुनाई देती है. वह हमें डर से नहीं, इश्क़ से जीना सिखाते हैं. वह कहते हैं—
“जहाँ ज़ख़्म है, वहीं से नूर दाख़िल होता है.”
और शायद यही वजह है कि सात सौ पचास साल बाद भी रूमी हमारे ज़ख़्मों से बात करते हैं.
रूमी को पढ़ना किसी पुराने सूफ़ी को पढ़ना नहीं, बल्कि ख़ुद के भीतर झाँकना है. और शब-ए-अरस (उर्स) को समझना मौत से दोस्ती करना है. रूमी की दुनिया में मौत कोई अँधेरा नहीं, बल्कि नूर की ओर उठाया गया पहला क़दम है—एक ऐसी मुलाक़ात, जिसके बाद सवाल नहीं बचते, सिर्फ़ इश्क़ रह जाता है.

वो हसीन महबूब कहाँ गया?
मैं हैरान हूँ, वो खूबसूरत सरू का पेड़ कहाँ चला गया?
वो जिसने हमारे बीच दिए की तरह अपनी रोशनी फैलाई।
वो कहाँ चला गया? अजीब बात है, वो मेरे बिना कहाँ चला गया?
मेरा दिल पत्ते की तरह काँपता है हर रोज।
आधी रात को अकेला, वो महबूब कहाँ चला गया?
जाओ उसे ढूँढ़ो, किसी गुज़रते मुसाफ़िर से पूछो—
वो दिल को सुकूँ देने वाला साथी, कहाँ चला गया?
बगीचे में जाओ, और माली से पूछो—
वो सुंदर गुलाब का पौधा, कहाँ चला गया?
छत पर जाओ, और चौकीदार से पूछो—
वो अनोखा सुल्तान, कहाँ चला गया?
पागल की तरह, मैं मैदानों में खोजता हूँ!
मैदानों का वो हिरण, कहाँ चला गया?
नदी सी बह रही हैं मेरी आँसू भरी आँखें
इस समंदर में वो मोती, कहाँ चला गया?
रात भर मैं चाँद और सितारों से पूछता हूँ—
वो महताब से प्यारा चेहरा, कहाँ चला गया?
अगर वो मेरा है, तो वो किसी और के साथ क्यों है?
जब वो यहाँ नहीं है, तो वो किस “वहाँ” चला गया?
गर उसका दिल और रूह जुड़ गए हैं अल्लाह से ,
और उसने छोड़ दी है ये दुनिया, तो वो कहाँ चला गया?
वो शम्स तबरीज़ी, जिसके बारे में कहते हैं,
“सूरज कभी नहीं मरता”—वो कहाँ चला गया?
-रूमी की कविता. अँग्रेज़ी से अनुवादः राजिंदर
अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.
दुनिया जहान
-
बेसबब नहीं अपनी जड़ों की तलाश की बेचैनीः राजमोहन
-
और उन मैदानों का क्या जहां मेस्सी खेले ही नहीं
-
'डि स्टेफानो: ख़िताबों की किताब मगर वर्ल्ड कप से दूरी का अभिशाप
-
तो फ़ैज़ की नज़्म को नाफ़रमानी की दलील माना जाए
-
करतबी घुड़सवार जो आधुनिक सर्कस का जनक बना
-
अहमद फ़राज़ः मुंह से आग लगाए घूमने वाला शायर
-
फॉर्म या कंटेंट के मुक़ाबले विचार हमेशा अहम्
-
सादिओ मानेः खेल का ख़ूबसूरत चेहरा