फ़ुटबॉल नर्सरी | मिनर्वा अकादमी और रंजीत बजाज

एक बड़ी चकाचौंध में छोटी-सी कोई गहमागहमी अनदेखी रह जाती है. बड़े इवेंट के बीच छोटा- सा इवेंट अनचीन्हा रह जाता है. बड़े-बड़े संघर्षों के बीच एक छोटी-सी लड़ाई बिला जाती है. बड़े- बड़े सपनों के बीच उम्मीद की एक छोटी-सी किरण अनचाही-सी रह जाती है. जैसे बड़े लोगों के बीच बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं. कि बच्चों की प्रतिभा के घर्षण से पैदा हुई कोई चिंगारी आँखों का नूर बनने से रह जाती है.

जिस समय उत्तरी अमेरिका के 16 शहरों में फ़ुटबॉल के सितारे अपनी चमक बिखेर रहे थे, ठीक उसी समय यूरोप के हेलसिंकी में भारत की किशोर प्रतिभाएं फ़ुटबॉल के ही खेल में अपनी प्रतिभा से एक ऐसा स्पार्क, ऐसी चिंगारी पैदा कर रहे थे, जिसे देश में भले ही व्यापक रूप से लक्षित न किया जा सका, मगर जिसने उम्मीद की लौ जला दी. इस चिंगारी को अगर भारतीय खेल तंत्र बचा कर रख सका, तो इसके बड़ी आग में तब्दील हो जाने और देश की प्रतिष्ठा को रोशन किए जाने की उम्मीद तो बनती ही है. एक बड़ी उम्मीद.

कहते हैं कि कई बार जो काम बड़े नहीं कर पाते वो अक्सर छोटे बच्चे कर दिखाते हैं. जिस समय भारतीय फ़ुटबॉल टीम की प्रतियोगिता जीतना तो दूर की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति तक दर्ज नहीं करा पा रही है (इस समय सीनियर भारतीय मेंस टीम की फीफा रैंकिंग 136वीं है), उस समय हमारे छोटे बच्चे दुनिया के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट जीत रहे हैं.

बीती 11 जुलाई को फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में यूरोप के तीसरे सबसे बड़े और प्रतिष्ठित युवा फ़ुटबॉल प्रतियोगिता को चंडीगढ़ स्थित मिनर्वा क्लब की अंडर 12 टीम फ़िनलैंड की सबसे सफल और दो बार की मौजूदा चैंपियन टीम एच जे के हेलसिंकी टीम को हराकर जीत रही थी. पिछली बार ये प्रतियोगिता वो जीतते-जीतते रह गई थी. वो फ़ाइनल में इसी मेज़बान टीम से हार गई थी.

इस भारतीय टीम ने पूरी प्रतियोगिता में शानदार खेल दिखाया. उसने भाग लेने वाली 125 टीमों में सबसे ज्यादा 50+ गोल किए. मिनर्वा अकादमी की टीम ने प्री-क्वार्टर फ़ाइनल में ‘हेलसिंघिन पोनिसटस’ को रिकॉर्ड 19–0 से करारी हराया. भारतीय टीम यहीं नहीं रुकी. क्वार्टर फ़ाइनल में एचजेके को 6–0 और सेमीफ़ाइनल में कप्यलान पल्लो को 9–0 से हराया. वांगशेम कोन्याक और टी. किपगेन जैसे युवा खिलाड़ियों ने शानदार खेल दिखाया.

इसके तुरंत बाद 12 से 18 जुलाई तक स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में आयोजित गोथिया कप भी लगातार दूसरी बार जीत रहे थे. जिस दिन न्यूजर्सी में स्पेन विश्व कप जीत रहा था उससे एक दिन पहले भारत के ये बच्चे ब्राजील के आरएस स्पोर्ट्स क्लब की टीम को 2-1 से हराकर अपना यूरोपीय डबल पूरा कर रहे थे. टीम ने इस प्रतियोगिता में भी शानदार खेल दिखाया और कुल नौ मैचों में 87 गोल किए.

भारतीय टीम की इस सफलता के पीछे एक शख़्स खड़ा है, और वो है रंजीत बजाज. एक ऐसा उद्यमी, एक ऐसा खेल मैनेजर, एक ऐसा खेल प्रशासक जो भारतीय फ़ुटबॉल खेल प्रबंधन को,उसकी ख़ामियों को चुनौती देने का साहस रखता है. उसे ठीक करने का ख़म ठोंकता है. और ख़ुद एक उदाहरण बन कर सामने आता है.

भारतीय फ़ुटबॉल खेल प्रबंधन में उन्हें एक ‘रिबेल’, एक ‘विद्रोही’ के रूप में देखा और जाना जाता है. वे भारतीय फ़ुटबॉल महासंघ की गलत नीतियों,ख़राब प्रबंधन और दरकते बुनियादी ढांचे के आलोचक रहे हैं. उनका मानना रहा है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, बल्कि सही विज़न और एक सही सिस्टम की कमी है. भारत में फ़ुटबॉल के विकास के लिए उनका मूलमंत्र है ग्रासरूट स्तर पर मेहनत की जाए.

अपने विज़न को हक़ीक़त में बदलने के लिए ही उन्होंने चण्डीगढ़ में मिनर्वा अकादमी की स्थापना की. इसके माध्यम से ही वे देशभर के गांवों और क़स्बों से प्रतिभाओं को लक्षित कर उन्हें एक मंच प्रदान कर रहे हैं और तराश कर वैश्विक एक्सपोज़र देने का काम कर रहे हैं. उनकी अकादमी में बहुत सारे बच्चे पूर्वोत्तर राज्यों से हैं. उनकी अकादमी ने 250 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी देश को दिए हैं. 2017 में भारत में आयोजित अंडर 17 फीफा विश्व कप में शामिल भारतीय टीम के नौ खिलाड़ी इसी अकादमी से थे. मिनर्वा एकेडमी की अंडर-15 टीम स्पेन के एमआईसी कप में लिवरपूल एफसी की अंडर-15 टीम को 6-0 से हरा चुकी है. मिनर्वा एकेडमी की अंडर 14 टीम ने अपराजित रहते हुए यूरोप के तीन प्रतिष्ठित ख़िताब—गोथिया कप, डाना कप और नॉर्वे कप जीतकर ट्रेबल पूरा किया है. और इसी साल अंडर 12 टीम ने हेलसिंकी और गोथिया कप जीतकर डबल पूरा किया.

वे फ़ुटबॉल को लेकर इस हद तक जुनूनी हैं कि जब उनकी टीम को यूरोपीय दौरे के लिए कोई स्पॉन्सरशिप नहीं मिली तो व्यक्तिगत रूप से ऋण लेकर टीमों का दौरा सुनिश्चित किया.

वे देश के हर ज़िले में अकादमी खोले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं. उनका सपना और उनका लक्ष्य भारत को 2034 फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई कराना है. वे निरंतर युवा खिलाड़ियों का एक बड़ा पूल तैयार करने और आधुनिक, विज्ञान-आधारित प्रशिक्षण को लागू करने में व्यस्त हैं.

एक जूनून का नाम है रंजीत बजाज और उसका परिणाम है मिनर्वा अकादमी. बस देखना है अपनी भीतर की ये आग वे कब तक बचाए रखते हैं.

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