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अपनी नई किताब ‘स्मृति और दंश’ में बलवंत कौर लिखती हैं कि हिन्दुस्तान की सियासत ने ‘बर्बरता और हैवानियत’ के मंजर को भूलना तो दूर, इतनी बार दोहराकर याद रखवाया है कि कुछ लोगों या समुदायों के लिए उन्नीस सौ सैंतालीस कभी ख़त्म ही नहीं हुआ. जो लोग विभाजन की कहानियाँ सुनते हुए बड़े हुए थे, उन्नीस सौ चौरासी से दो हज़ार [….]