शनिवार , 20  जुलाई  2024

आज का दिन




कहानी | थैंक्यू वैरी मच सर!

  • 19:21:PM
  • 30 June 2024

उस दरवाज़े में से अंदर जाने के लिए हम दोनों को अच्छा-ख़ासा झुकना पड़ा था. सामने की दीवार के सहारे एक महिला कुछ करने में व्यस्त थी. सब कुछ से अप्रभावित, तन्मय, तल्लीलन-सी. उसकी ओर चलते सुरेश बता रहे हैं, “सर, यह देखिए… यह चूल्हा. छोटा-सा, बिल्कुल अलग तरह का. ये छोटी-छोटी टोकरियाँ. ये खाना बनाना-खिलाने के कुछ बर्तन. कुछ पत्थर व लोहे के और कुछ स्टील के. ये जो मालकिन हैं दुकान की…..” महिला के पास तक पहुँच कर सुरेश जी मणिपुरी शब्दों का सहारा ले-लेकर विनम्र हुए से कुछ कह रहे हैं. शायद वह उस महिला तक पहुँचा ही नहीं या कि फिर उसने समझा ही नहीं. सुरेश जी ने थोड़ा और झुककर फुसफुसाहट से कुछ कहा है. महिला ने इनकार में गर्दन हिला दी है. होटल के और भी छोटे पिछले दरवाज़े की ओर बढ़ते सुरेश जी व्यथित भाव से बता रहे थे, “सर, वो औरत जो पराँठा-पकौड़े बनाती है, आज कहीं चली गई है. इसलिए इस समय चाय से ही काम चलाना होगा….”

दुकान के पीछे खुला खूब हरा-भरा-सा वह हिस्सा. किसिम-किसिम के पेड़ पौधे. बैठने के लिए छोटी-छोटी चार-छ: बैंचें और पेड़ों के तनों से पत्थरों को टिकाकर बना दी गईं कुर्सियाँ. हम लोग एकांत में बिछी एक बैंच पर बैठे थे. इधर भी यहाँ-वहाँ बैठे छात्र-छात्राएँ, बातों-बहसों में मस्त थे. हम तक उड़-उड़कर आतीं उनकी खिलखिलाहटें, हँसने की बुलंद आवाज़ें निर्भय, निर्द्वंद्व, कलकल, छलछल करती बहती आती-सी उनकी वो किलकती-सी हँसी. यकायक दिखा कि गुन-गुनकर गाती-सी तीन आवाज़ें सुरेश के ठीक सामने आकर बज-सी उठीं, “हैलो सर, आज इधर कैसे?” पूछने में सम्मान भी, हर्ष और विस्मय भी. सुरेश का चेहरा खिला-चहका-सा हो गया. परिचय कराया जा रहा है – “सर, यह रागिनी है- और ये दोनों इनकी दोस्त. बहुत अच्छे इंटेलीजेंट हैं ये लोग. तीनों अंग्रेज़ी में रिसर्च कर रही हैं. और अब जैसे सुरेश की आवाज़ पहले से अधिक मृदु और मिश्री मिली-सी हो गई है- “और हाँ, बेटे, आप हमारे सर हैं. जिस कॉलेज से मैं यहाँ आया हूँ, उसी में पढ़ाते हैं. लिखते हैं सो यहाँ का सब देखना-जानना चाहते हैं. यह होटल दिखाने के लिए इधर लाया हूँ सर को.
वह सुरेश के मन का कोई भय था या आशंका या उन छात्राओं का अधिक-से-अधिक विश्वास पा लेने की कोई कोशिश… जो भी था उन्होंने लेखक होने की बात को कई बार रेखांकित-सा करते हुए कहा था. ज़रा देर की बातचीत ने ही बता दिया था कि वे तीनों ‘सुबुद्ध, शालीन और हँसमुख तो हैं ही, चंचल और वाचाल भी कम नहीं है. बड़ी और ख़ास बात यह कि तीनों ही अच्छी तरह से हिंदी समझ बोल रही थीं.

जिस सहज-सरल और तेज ढंग से अपरिचय और संकोच हम लोगों के बीच से ग़ायब हुआ, उसकी उम्मीद न मैंने की थी, न सुरेश जी ने. बातों के बीच कुछ दूरी पर खड़े उस पेड़ पर मेरी नज़र पड़ी. दिख अमरूद की तरह का रहा था, लेकिन उस पर जो फल लटक रहे थे, वे अमरूद नहीं थे. बेल के फल से भी बड़े. उसके लगभग दोगुने आकार के. कुछ-कुछ पीले और हरे-भरे से ढेर सारे फल. मैंने छात्राओं से उसका नाम जानना चाहा. तीनों बताने को उतावली दिखीं, पर बताना रागिनी ने शुरू किया -“जी सर, हम इसे यूँ काटते हैं ….फिर यूँ खोलते हैं…. तब इसमें नींबू जैसा सफेद-सा वो निकलता है…. कि बस, अरे वाह! हाँ, छूकर देखिए आप! संतरे जैसा है छूने में.” बहुत कुछ आया उस बताने में, किंतु नाम का ज़िक्र कहीं नहीं आया. आगे तीनों ने एक साथ कहना शुरू कर दिया. जिस प्रवाह और धुन में बताया जा रहा था, उससे साफ़ था कि नाम न बता पाने ने तीनों को ही उद्विग्न-व्यग्र कर दिया है. तीनों वहाँ के आसपास के बारे में बता रही हैं. ऐसे जैसे मैं प्ले ग्रुप का विद्यार्थी हूँ और वे सब किसी पब्लिक स्कूल की बहुत क़ाबिल मैडम… “सर देखिए, यह तालाब है. तालाब यहाँ घर-घर में मिलेगा आपको. जी, मछली पालते हैं न लोग! इसमें पानी इकट्ठा होता रहता है. ये होटल वाला वो वहाँ उधर इसी के पानी से बर्तन धो रहा है. … और सर ये पोदीना है. यहाँ बहुत होता है. यहाँ यह कहीं भी उगता दिख जाएगा आपको. हाँ, पीसकर चटनी की तरह भी और पकौड़े भी बनते हैं इसके. ये तुलसी के पौधे हैं. पकौड़े-सब्ज़ी दोनों में उपयोग होता है इसका. ये जो पत्ते देख रहे हैं न आप – जी, इतने बड़े इस पौधे के इन पत्तों की सब्ज़ी बनती है. ये मरोई है. पालक की तरह डालकर बेसन-में मिलाकर- कई तरह से खाने में काम आती है. हाँ, बोड़ा भी. जी, पकौड़े को यहाँ बोड़ा बोलते हैं. इस होटल के पकौड़े खाए हैं क्या आपने सर?”

चाय के आ जाने ने कुछ देर को हमें ख़ामोश कर दिया था. मुझे लगा कि शायद सड़क किनारे लगे उन दरख़्तों का नाम इन्हें मालूम होगा. पूछने के साथ लगा कि जैसे तीनों जानती हैं और बताना चाहती हैं. जो कहा गया वह वही और उतना भर था जो औरों से सुना जा चुका था. मज़ेदार बात यह कि तीनों में से कोई यह मानने को तैयार नहीं थी कि नाम उसे मालूम नहीं है. चाय का मग हाथ में लिए फ़ोन मिलाया है- “हैलो, हाँ, जरा इधर आना तो….” मिनट भर में सामने बैठे छात्रों के समूह में से एक युवक उछलता-कूदता-सा हमारे पास आ पहुँचा. ख़ूब मस्त, आनंदित-सा. रागिनी बता रही है- सर, ये गुनेश्वर है. इंग्लिश डिपार्टमेंट का सुपर हीरो. कोई भी प्रोग्राम हो, इसे तो रहना-ही-रहना है.” युवक के भोले-से इस चेहरे पर शर्म जैसा भाव आया. शायद कुछ और नहीं सूझा था तब उसे- “सर, रागिनी दीदी गाती बहुत अच्छा हैं.” सुरेश ने भी गुनेश्वर की प्रशंसा में कई वाक्य कहे… रागिनी ने मेरा सवाल गुनेश्वर से पूछा है. प्यारी-सी मुसकान के साथ कई बार उसने जल्दी-जल्दी अपना सिर खुजाया है. लेकिन जो कुछ कहा-बताया वह पहले सुने जा चुके से ज़रा भी अलग नहीं था. “अब चलें सर.” कहकर सुरेश जी यकायक उठ खड़े हुए. मैं बैठा रहा. सोचा कि शायद मुझे वहीं छोड़कर वे अकेले विभाग चले जाएँगे. पर नहीं- उन्होंने पहले गुनेश्वर और उन छात्राओं को आधे घंटे में हिंदी विभाग में आने को तैयार किया, फिर मुझे साथ लेकर वहाँ से चल दिए. उनके साथ चलते हुए मैं अनुमान लगा रहा था कि सुरेश जी ने मुझे वहाँ अकेले छोड़कर चले आना क्यों नहीं चाहा. किसी डर से या आशंका से या कि फिर मेरे किसी…?

आधे घंटे से पहले ही वे लोग विभाग में आ पहुँचे थे. सुरेश जी और मैं अगल-बगल बैठे थे और एकदम पास ठीक हमारे सामने वे चारों. उनका हँसना, बोलना, बार-बार सवाल करना और कुछ भी बताने लगना इतना सरल-निश्छल और लगाव जीता-सा कि जो देखे-सुने वो सोचे कि न जाने कितने बरसों से हम लोग एक-दूसरे से ऐसे ही रोज़-रोज़ मिलते-बोलते-बतियाते आ रहे हैं. खिलखिलाहटें थमीं तो बातों का सिलसिला शुरू करने के लिए मैंने उन छात्राओं से उनके सपनों-इरादों के बारे में जानना चाहा. उत्तर रागिनी की तरफ से आया- “अभी तो नौकरी से आगे कोई सपना नहीं है. जी हम तीनों टीचिंग में आना चाहती हैं …जी, मेरा नाम आपने जान लिया रागिनी और इसका अमृतेश्वरी. और इस वाली फ्रेंड का….” ढंग से न सुनने में आया, न समझने में. कई बार बुलवाया, पर व्यर्थ. रागिनी ने गुनेश्वर की जेब में से डॉट पेन निकालकर अपने हाथ में थमी नोट बुक खोलकर लिखा- लिनथेडगेभी…. मुझे सही उच्चारण कर सकने की कोशिश में लगा देख रागिनी ने आसान एक मुक्ति बताई- “अभी आप केवल लिन कहकर काम चला सकते हैं.” यकायक रागिनी का चेहरा उदास-सा हुआ और आवाज़ भी कुछ भारी सी लगी- “इसके फ़ादर की डेथ हो गई….” कुछ पल की ख़ामोशी के बाद फिर आत्मविश्वास मिले गर्वित से स्वर में कहा- “ख़ुद कार चलाकर जाती है अपनी माँ को उनके वर्किंग प्लेस पर पहुँचाने. घर के सारे काम करती है और ये जो मेरी फ्रेंड है इसकी शादी हो गई है. यह भी घर के सारे काम करके आती है सुबह-सुबह.” अभी तक चुप बैठी लिन को शायद लगा कि उसे खुद भी कुछ कहना चाहिए. सोत्साह बोलना शुरू हुआ- “पता है, मैं घर का पूरा काम करके… हाँ! साफ़-सफ़ाई, खाना-बर्तन सब करके, कपड़े भी धोकर आई हूँ यूनिवर्सिटी.”… “ और मैं…”यह अमृतश्वेरी की आवाज़ थी- “मैं यहाँ हॉस्टल में रहती हूँ. …नहीं, नहीं, ख़ूब काम करती हूँ. हॉस्टल वार्डन मैम की भी हेल्प करती हूँ उनके कामों में….” चाहा कि कहूँ- अमृतेश्वरी, औरत कहीं की भी हो, मेहनत तो वह करती ही-करती है. उस पर भी पहाड़ की औरत-ग़रीब की औरत? पर वह कह नहीं पाया. शायद इसलिए कि इस बीच मीलों मील दूर पैदल, साइकिल या बस से सुबह स्कूलों-कॉलेजों में आने वाली लड़कियों के समूहों के समूह, कतारों-की-कतार भागती-दौड़ती-सी मेरी आँखों में आना-जाना शुरू कर चुकी थीं. लड़कियाँ-युवतियाँ! हाँ, तमाम तरह की इल्लतें-किल्लतें-आफ़तों को भी झेलकर पढ़ने आतीं हज़ारों-हज़ार लड़कियाँ.

सुरेश जो जल्द लौटने की कहकर रजिस्ट्रार ऑफ़िस चले गए थे. उनके जाने ने कुछ देर को तो बातों के प्रवाह में बाधा डाली थी, लेकिन बाद में ऐसा लगा कि जैसे हम सबके व्यवहार और बातों में पहले से ज़्यादा मुखर-सा एक खुलापन आ गया है. मैंने तब उन छात्राओं की हिम्मत और कर्मठता की तारीफ़ करते हुए कहा था कि तुम लोग सचमुच बहादुर हो. बहादुर शब्द ने मुझे तब बात आगे बढ़ाने के लिए एक सवाल सुझा दिया था- “लड़की होने के नाते किन-किन, कैसे-कैसे डरों से जूझना-गुजरना पड़ता है आपको यहाँ? ”ज़रा से अंतर से तीनों के मुँह से एक ही शब्द निकला -“डर!” लहजा सवाल करता-सा ताज्जुब करता-सा, इनकार करता-सा चेहरे पर सुर्ख़-सी एक पर्त और आवाज़ कुछ-कुछ तुर्श-सी. उत्तर अमृतेश्वरी दे रही थी -“डर! किस बात का?” “ सर, डर तो हमारे माँ-बाप ने हमें सिखाया ही नहीं.” रागिनी और उसकी हिलती गर्दन तथा दमक-सी उठी आँखों ने अनबोले ही कह दिया था कि अमृतेश्वरी जो कह रही है वह सच है-“सर, यहाँ की स्त्रियाँ बहुत बहादुर और मेहनती होती हैं. जी, थोड़ा-बहुत ऐसा-वैसा, हरकतें-शरारतें या नशा-वशा वो हर जगह चलता है. आपने होटल वाले उस आदमी को काम करते देखा. उसकी औरत सब बना-पका देती है और वो ये सब साफ़-सूफ करके मदद करता है उसकी.” कुछ देर कोई आवाज़ नहीं. देखा गर्दन झुकाए अमृतेश्वरी ख़ामोश बैठी है. होंठ चबाती-सी, न जाने क्या कुछ सोचती-सी. चेहरे पर के तनाव-खिंचाव को लिए-लिए बहुत आहिस्ता से मुझसे पूछा है-“सर आपने थांगजाम मनोरमा का नाम सुना है? इरोम शर्मिला के बारे में क्या कुछ जानते हैं आप? क्याा आपको मणिपुर में महिलाओं द्वारा किए गए पहले और दूसरे विद्रोह के बारे में कुछ मालूम है? अगर नहीं तो मैं आपको बता रही हूँ कि मणिपुर की औरत ने हर अन्याय और ज़ुल्म के विरोध में अपनी आवाज़ उठाई है- संघर्ष किया है.” कमरा यकायक ख़ामोशी से भर गया था. शर्मिला के नाम के साथ ही अजीब-से ग्लानि बोध ने मुझे आ घेरा था. शर्मिला की आज की स्थिति के लिए हमारी सरकारें और राजनेता तो जो जितने दोषी हैं, वो अपनी जगह, पर नागरिक के नाते मेरी-हमारी भी ज़िम्मेदारी और ग़लती कम नहीं है. ज़रा-ज़रा बात के लिए हंगामा बरपा कर देने वाले हम मैदानी या दक्षिणी प्रदेशों के लोगों ने आख़िर क्यों शर्मिला के समर्थन में कोई बड़ा-कारगर हो सकने वाला आंदोलन कभी नहीं किया? ‘पूर्वोत्तर के युवाओं की मुश्किलों-सवालतों को लेकर ढंग से कोई आवाज़ कभी क्यों नहीं उठाई?

कुछ तो हुआ ही था बातों के बीच शर्मिला का नाम आने के साथ. हममें से कोई भी पहले जैसा नहीं रहा था. लंबी-सी उस चुप्पी के बाद बात चलाने की कोशिश की तो एक-एक कर तीनों छात्राओं ने अपने-अपने हाथ खड़े कर दिए. एक ही रट कि अब जो भी कहना-बताना है वह गुनेश्वर बताएगा. देर से अपने चांचल्य और उछाह को काबू में रखे गुनेश्वर शांत बैठा था. जैसे वो वहाँ था ही नहीं या कि उसने अपने होंठ सी लिए हों. अपना ज़िक्र आते ही एकदम से जैसे उसमें जान पड़ गई. भोला-सा उसका चेहरा लजाया-लजाया-सा लाल होने लगा. बैठे-बैठे धड़ का हिलना शुरू. न किसी के कुछ कहे-पूछे जाने का इंतज़ार, न रोके-टोके जाने की कोई चिंता. होंठों पर हँसी की तरह फैली मुसकान- “सर, शहीद राही का एक शेर सुनाऊँ? अच्छा, शेर नहीं, पहले एक ग़ज़ल सुनता हूँ. हाँ, गाकर….” हाँ-ना का न कोई अर्थ था, न उसे कोई इंतज़ार. सुनाना शुरू करते ही लड़कियों की तालियाँ बजने लगीं. वाह-वाह शुरू हो गई. मुझे सुनते रहना था, सुनता रहा. ख़ुद रुका तो रागिनी से गाने की ज़िद शुरू कर दी-“ये हमारी रागिनी दीदी बहुत अच्छा गाती हैं. ताली बजाना शुरू कर दिया है ख़ुद गाते हुए-“सत्यं, शिवं, सुंदरम्‌….” गाने से हटाकर कुछ कहने-बताने को तैयार करने में देर भी लगी, मुश्किल भी हुई. लेकिन जब ज़रा-ज़रा से सीधे-सीधे प्रश्नों के उत्तर में उसने बोलना शुरू किया तो लगा कि जैसे वह गाने वाले ही मन, भाव और अंदाज़ में धाराप्रवाह बोल रहा है. तेज़ी से बदलती गुनेश्वर की मुद्राएँ-भाव-भंगिमाएँ, अलग-अलग तरह की शब्दावली-वाक्यावली. प्रेम, विवाह, फैशन या युवा, बंद और आतंक से जुड़े छोटे-छोटे कुछ सवालों के उत्तर में जो जैसे उसने कहा, वह जैसे उसकी ख़ुद छटपटाहट थी, बिलबिलाहट थी.

दिमाग़ से होकर दिल तक आतीं बहुत ताज़ादम-सी उसके मन की, उसके मणिपुर की बातें थीं. वे सब उसके देश की बातें थीं- “आपके यहाँ भारत के और इलाक़ों में लड़का-लड़की कभी नहीं मिले फिर भी शादी हो जाती है. हमारे यहाँ एक-दूसरे को जानकर ही मिलेंगे. स्टुडेंट लाइफ़ में या वैसे कहीं प्यार हो गया तो शादी कर लेंगे. यहाँ पैरेंट्स भी शादी तय करते हैं, मगर बहुत कम. ज़्यादातर शादी आपसी सहमति से. नहीं, मजबूर नहीं करता कोई. ज़्यादातर अपनी मर्ज़ी से. रासलीला देखा है यहाँ का आप? जी सर, उसमें जो राधा पहनती है न, वो वाला ड्रेस पहनती है दुल्हन शादी के टाइम. इधर आपकी तरफ जैसा दहेज नहीं है. आप अपनी बेटी को एक बिस्तर, एक अलमारी दे देंगे तो भी ठीक है- चलेगा. आपकी तरफ लड़का पावरफ़ुल होता है, वो माँगता है. आजकल यहाँ भी देने लगे हैं सामान ख़ुशी में. हाँ, ख़ुशी में, दहेज नहीं. अब बहुत खर्च होने लगा है. एक दो लाख नहीं- उससे भी ज़्यादा. अब यह ऐसा दौर आ रहा है कि होड़ और कंप्टीशन की वजह से ग़रीब परेशान होगा आगे. क्यों नहीं टूटते भी हैं रिश्ते. डाइवोर्स हैं, पर बहुत कम. सौ में दस.” रागिनी ने सुधारा-“सौ में दो-तीन.” विवाह टूटने के मुद्दे पहले तो कोई परेशानी या झगड़ा या लड़के का न कमाना या कोई और बड़ी ख़राबी आ गई हो उसमें. लड़की का तैसे बच्चा न होना. आजकल का नया प्रॉब्लम है मोबाइल वाला. टेलीफ़ोन से पहले बातचीत, बाद में मन नहीं हुआ तो मना या फिर शादीशुदा आदमी का औरत के ऊपर आँख चलाना. मोबाइल का शौक – ये नया समस्या है. आजकल बहुत हो रहा है. हमारे मणिपुर में तो अभी कुछ साल पहले से 2003 से ही आया है, पर समस्या बहुत बढ़ गई है. एकदम ज़ोरदारी से यूज़ करना मोबाइल को. अब एक से काम नहीं चलता, दो-दो, तीन-तीन मोबाइल रखता है यहाँ. इतने कम समय में इतना सब हो गया. हाँ, क्योंज नहीं लड़की-औरत भी करता है. हाँ, मोबाइल के मिसयूज़ से हुआ है इधर ये.

फैशन यंग जेनरेशन में बहुत बढ़ रहा है. लड़का-लड़की दोनों करता है. टीन ऐजर्स-कॉलेज गोइंग में बहुत ज़्यादा. पहनने का हर चीज़ अलग ब्रांडेड चाहिए. लड़की को ड्रेस में डिफ़रेंट स्टाइल चाहिए. लड़कियों में ज़्यादा फ़ैशन. हेयर स्टाइल, फ्रॉक, जींस, टॉप. बाल निखारेंगी. और हाँ, चश्मे- लड़का-लड़की दोनों के. बहुत-बहुत क़ीमती चश्मे, जूते, चप्पलें, कपड़े सब.

अभी ये कंप्यूटर की ऐज है. डॉक्टर बोलता है टी.वी., कंप्यूटर नुकसान पहुँचाता है, पर वो नहीं है तो आदमी समझता है कि कुछ नहीं है उसके पास. उधर हाल ये कि बिजली बहुत कम मिलता है. यूनिवर्सिटी में उल्टा है. यहाँ ख़ूब मिलता है. वी.आई.पी.इलाक़े में मिलता है. कैंडिल लाइट या कैरोसिन लाइट में पढ़ना पड़ता है और इलाकों में तो. यहाँ टी.वी. ख़ूब देखता है, पर पहाड़ी इलाक़ों में टी.वी. उतना नहीं है. बेहिसाब कटौती. दूर इलाक़ों में जाओ तो बिजली नाम की चीज़ ही नहीं दिखेगा. इंफाल में बिजली की फैसिलिटी है. आप देखिए कि वी.आई.पी. लाइन और लोकल लाइन को अलग-अलग हिसाब से बिजली मिलता है यहाँ.

तीनों लड़कियाँ बीच-बीच में ठीक है, सही है, बिल्कुल कह-कहकर गुनेश्वर की बातों की पुष्टि करती रही थीं. इस बक्त रागिनी ने ‘ठीक है, बिल्कुल ठीक है” कहकर गुनेश्वर के कथन का समर्थन किया था. जी किया कि मैं इन्हें यू.पी., बिहार या दिल्ली में होने वाली बिजली की किल्लत या कटौती के बारे में कुछ बताऊँ, लेकिन गुनेश्वर के बोलने के प्रवाह और विषय में बदलाव आ सकने की आशंका के चलते टाल गया. गुनेश्वर के बोलने को एक विषय-एक दिशा देने के इरादे से मैंने धीमी चिंतित-सी आवाज़ में पूछा- “और ये जो बंद और ब्लॉकेड्स हैं वो…?” कुर्सी पर बैठे तेज़ी से मुद्राएँ बदलते गुनेश्वर की तेज आवाज़ में हँसी सुनाई दी. मिलने के बाद से अब तक सबसे लंबी और बुलंद आवाज़ में हँसी. एक ऐसी हँसी जो उसकी ख़ुशी का इज़हार तो नहीं थी. सूनी, सन्नाटा पसराती अजीब ख़ाली-खोखली हँसी. कानों में चुभन और किरकिराहट-सी पैदा करती हैँसी. गर्दन कई बार ऊपर-नीचे हुई. मुँदती-सी आँखें कुछ छोटी हुईं. अब इसके बोलने की आवाज़ और गति में खूब धीमापन आ गया था- “सर, आप पूछा तो बताता हूँ. वैसे मणिपुर का लोग यह सब बरसों से कह रहा है. लेकिन सुनता कौन है? केंद्र की सरकार तो जैसे आँख-कान सब मूँद कर काम करती है. सेना का अफ़सर और यहाँ का नेता जो बोल देता है सो सच मान लेती है. लेकिन सर, आप पूछा तो है पूछा तो बताता है. इसलिए ठीक से बताता है कि आप हमारा हिंदी वाला प्रोफ़ेसर का गेस्ट है. सच ये है कि मणिपुर के लोगों की लाइफ़ को सबसे ज्यादा नुक़सान बंद और ब्लॉकेड से होता है. शाप बन गया है बंद और ब्लॉकेड हमारे लिए. ग़रीब-मजदूर का तो जीना ही मुश्किल कर रखा है इसने. स्टेट का भी क्या कम नुकसान हो रहा है इससे. करोड़ों-करोड़ का नुक़सान पर जो रोक सकता है उन सबका आँख बंद, कान बंद, मुँह बंद!”

रागिनी ने धीमे से बोला है-“बिल्कुल सही.” उसकी दोनों दोस्तों की गर्दनें भी हाँ कहती-सी जल्दी-जल्दी दो-तीन बार हिली हैं-“आप पूछा कि ज़िम्मेदार- तो पहले तो आप ये जानो कि सरकार का नियम बहुत ग़लत. गरीब आदमी का तो जैसे कोई इंपोर्टेंस ही नहीं है यहाँ. सरकार प्रजा के हित में ज़्यादा काम नहीं करता है. ज़्यादातर जो कदम उठाता है वो गाँवों को उजाड़ना, लोगों की बर्बादी और नेता-अफ़सर का पैसा कमाना. अब जैसे डैम बनाने की बात है या फिर इस-उस के नाम पर अमीरों को ज़मीन बाँटना. सबसे ज़्यादा गुस्सा यहाँ लोगों में आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल एक्ट को लेकर है. इसके कारण आम आदमी आर्मी, फोर्स, गवर्नमेंट और मिलीटेंट के बीच में फँस गया है. यहाँ का पब्लिक पूरा-का-पूरा लोग सब. हर समय एक ही डर कि पता नहीं कब क्या हो जाए! ये यहाँ ब्लास्ट या वहाँ ब्लास्ट. आपको बताता हूँ कि सब मिलीटेंट नहीं हैं यहाँ! मुट्ठी भर लोग लगा है इस सबमें. जो है वो यहाँ रहता भी तो नहीं है. दूर के इलाक़ों में रहता है, बॉर्डर पर या फिर म्याँमार में रहता है. ख़ूब ठाठ से रहता है और फिर बाद में मिलीटेंट भी तो सरकार बनाता है न! नेताओं ने क्या कुछ नहीं कराया- तोड़फोड़, ब्लॉकेड, हड़ताल? नेताओं ने क्या कुछ किया तब सरकार बनाया-चलाया अपनी-अपनी जगह. लोग बताता है कि नेता-अफ़सर और मिलीटेंट के मेल से चलता है सब. आप बताओ सर, ये मारना, घर जलाना, लूटना, चोरी-वोरी जैसा बहुत कुछ इंडिया में और जगह भी तो ख़ूब होता है. लेकिन मिलीटेंट को मारने-उन्हें साफ़ करने के नाम पर मनमानी करने का ये जो तरीक़ा है, वो बहुत ग़लत है. हम उन्हें रिपोर्ट नहीं करता. हम यह नहीं चाहते कि बंदूक वाला आए और किसी से भी पैसा ले जाए, किसी को मार जाए. सर, इस सबसे यहाँ का प्रजा बहुत दुःखी है. कोई आया और फ़ायर करके चला गया और बाद में ये जो मिलिट्री और फोर्स है वहाँ के निर्दोष बच्चों-औरतों पर ज़ुल्म ढाती है, चाहे जिसे पकड़ ले जाती है. किसी को नहीं पता होता कहाँ ले जाएगी, क्यां करेगी. पकड़ना-मार देना ठीक नहीं है. क़ानूनी तरीक़ा अपनाओ. करने वालों को पकड़ो, उन्हें कोर्ट में लाओ.”

तीनों छात्राओं की गर्दन हिले जा रही हैं. बोलते-बोलते गुनेश्वर कभी मेरे कभी उन छात्राओं के चेहरे को देखकर जैसे अपनी बातों के असर को नाप-जाँच लेना चाहता है. उसके बोलने में धीमे-धीमे तीखे-से ख़राश की मात्रा बढ़ती जा रही है-“ये क्याम कि कमांडो आया और किसी को पकड़ ले गया. ग़लती को देखना और सज़ा देना तो कोर्ट का काम है न. जी सर, ऐसा सब बहुत होता है यहाँ! किसी को ले गया पकड़कर, कोई-कोई को छोड़ दिया, कोई-कोई को मार दिया. मिलीटेंट भी करता है कि किसी का कुछ ग़लत लगा, जासूसी किया तो उसे पकड़ ले गया या मार दिया.” पता नहीं क्याु देख-पढ़ लिया था तब मेरी आँखों में. यकायक विचलित उत्तेजित हुआ-सा आवेशित ढंग से एक ही शब्द ‘सच’ को वह कई बार बोल गया था. किंचित अंतराल के बाद रेखांकित-सा करते हुए कई बार- “सच, सच, सच, जी सर, सच में हो रहा है यहाँ सब यह. अख़बार ने, ह्यूमन राइट्स वालों ने, जो कर सकता था किया. स्पेशल पावर वाला स्पष्ट तो सेंट्रल गवर्नमेंट को ही ख़त्म करना है न. ये रूल ग़लत है. उसने बहुत लोगों की ज़िंदगी बर्बाद की है. मिलीटेंट के नाम पर कई बार कुछ भी कर देता है फ़ोर्स का लोग. रेप या एनकाउंटर जैसा कुछ होगा तो जनता में तो ग़ुस्सा फैलेगा ही! इसी कारण ये बंद-ब्लॉकंड. केवल ग़ुस्सा. हम करना नहीं चाहते, लेकिन करना पड़ता है बार-बार. ये सब जो बंद ब्लॉकेड है, ग़ुस्से में पब्लिक भी करने लगता है.”

थोड़ा रुककर जैसे शांत करना चाहा है खुद को गुनेश्वर ने. गुनेश्वर तो गुनेश्वर लड़कियों को भी जैसे उदासी और ख़ामोशी ने जकड़ लिया है. इस समय के उनके चेहरे पर के तनाव, विषाद, भय और आक्रोश को देखकर कोई यह विश्वास नहीं कर पाएगा कि जरा देर पहले कितने चहके-चमकते और उल्लसित थे इन चारों के चेहरे. हाथ की उँगलियों को होठों से सटाकर खँखारने की तरह दो-तीन बार खाँसा है गुनेश्वर. जैसे कुछ ख़ास-से मुश्किल को बाहर लाने की कोशिश की है उसने. बंद का फ़ायदा तो लिया कुछ लोगों ने. ख़ूब लिया. लेता ही है. इसलिए भी तो कराया जाता है बंद. टू मन्थ का बंद अभी ख़त्म हुआ. आपको सिक्सलटी ऐट डेज़ का ब्लॉकेड कहीं और मिलेगा, क्या? इसके कारण खाने-पीने की चीज़ें नहीं. एल.पी.जी का सिलेंडर दो-ढाई सौ की जगह सात सौ-हज़ार तक. पेट्रोल अस्सी रुपए तो कभी कहीं और ज्यादा- एक सौ बीस रुपए लीटर तक. ग़रीब कैसे जिएगा इस हाल में. जिस चीज़ का पहले पाँच लगता था अब दस हो गया. एक किलो लोकल राइस का पहले तेरह-चौदह था. अब पंद्रह-सत्रह में और क्वालिटी वो वाला नहीं. जी- राइस दो क्वालिटी का. एक लोकल दूसरा दुकान का- बाहर का चावल. दुकान वाला पहले बीस रुपए किलो अब सत्ताईस. आजकल खाने की चीजों का बहूत प्रॉब्लम.” नफ़रत मिला गुस्से का एक भाव सुनाई दिया है आवाज़ में- “बाहर से एस्कोर्ट में लाई जाती हैं बहुत-सी चीज़ें और यहाँ लाकर ब्लैक में बेची जाती हैं. दुकानदार जमा कर लेते हैं. सच में, जीना मुश्किल कर दिया है इन बंद और ब्लॉकेड्स ने.”

मैंने कहा था- अबकी बार “बिल्कुल ठीक” उनमें से किसी ने नहीं अब थोड़ा आश्वस्त और स्थिर-सी हुई है गुनेश्वर की आवाज़. उसमें मिठास का एक पुट भी है और हिदायत जैसा एक संकेत भी- “यहाँ के बारे में बढा-चढ़ाकर बातें नहीं करनी चाहिए बाहर के लोगों को. हमारा अपना कल्चर है, ट्रेडिशन है, लिटरेचर है और चीज़ों में हम कहाँ किसी से कम हैं! मौक़ा और माहौल मिले तो यहाँ कुछ भी करके दिखा सकता है. आप यहाँ कहीं भिखारी देखा क्याा? यहाँ का आदमी भी नहीं माँगता. मेहनत करना जानता है और बहादुरी से जीता है. भारत से जुड़ा है हम. ज़्यादातर भारतीय कहता-मानता है खुद को. हमारे बारे में जो डरावनी बात फैलाई जाती है, वैसा नहीं होना चाहिए. हम वो नहीं हैं जो कुछ लोग मान रहे हैं. नहीं, हम वैसे नहीं हैं. मीडिया यहाँ आकर देखा-जाना क्याै कभी यहाँ का सच? लोग पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी की बात करते हैं तो वो सिर्फ़ यहीं नहीं पूरे नॉर्थ ईस्ट में है. मिलीटेंट तो नहीं शामिल होता उसमें. मना करता है उसका कुछ भी करने को. लोग डरता है तो फिर कैसे करेगा वो कुछ भी. सर, आपको पता है क्यार जब यहाँ का लोग असेंबली जलाया. हम कहते हैं नागालैंड बॉर्डर पर करो सीज़ फायर. हाँ, असेंबली जलाया इतिहास में पहली बार.

शायद 2001 का 18 जून था वो. तब बो.ए. में थे हम लोग. ये काम जनता ने किया. घर-घर से आकर इकट्ठा हुए सब. सरकार से नाराज थी जनता. तुम हमारे हित नहीं कर सकते तो क्याक मतलब है असेंबली का. जी , तब अठारह आदमी मरा-जी, औरत भी. मसला-एन.एस.सी.एन.(आई/एम) का लीडर है. सीज़ फायर की बात हुई थी. उन्होंने कहा मणिपुर की बाउंड़्री में होना चाहिए. मणिपुर की प्रजा ने कहा कि हम समस्या के हल में सहयोग करता है, पर यहाँ सीज़ फायर नहीं लगाने देंगे. अगर नेता का कहा हो जाएगा तो फिर उसके संगठन का आदमी ख़ुद यहाँ बंदूक़ लेकर खुला आज़ाद घूमेगा. इसकी वजह से हुआ विरोध. गवर्नमेंट लगाना चाहती हैं यहाँ के लोग नहीं चाहते.”

विभाग का कर्मचारी आकर बता गया है कि सुरेश जी आ गए हैं और ऑफ़िस में बैठे आपका इंतजार कर रहे हैं. यानी कि अब बातों का यह सिलसिला जल्दी ही रुक जाना है. कर्मचारी के बाहर जाते ही रागिनी उठ खड़ी हुई है- “सर, अमृतेश्वरी को दो बजे तक हॉस्टल पहुँच जाना चाहिए था और लिन को घर-मगर तीन तीस हो गए हैं.” हाँ-हाँ, कहती वे दोनों भी खड़ी हो गई हैं झट से. खड़ा मैं भी हो गया हूँ और गुनेश्वर भी- “अच्छा ठीक है- लेकिन जाने से पहले बस एक सवाल और ऐसे इन हालात में यहाँ की औरत को क्या-कैसा सहना-जीना पड़ रहा है अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में…?”

एक-दूसरे का हाथ थामे कुछ देर तीनों चुप खड़ी रहीं. अनमनी उदास-उदास सी. सवाल दोहराया तो सहमी-सकुचाई-सी आवाज़ में उत्तर रागिनी ने ही दिया-“क्या बताएँ सर. बताएँ भी तो कैसे? मुश्किल क्या एक तरह की है यहाँ की औरत के सामने. हम कुछ बोल नहीं सकते. अकेले कहीं जा नहीं सकते. सारे समय डर लगा रहता है. नहीं पकड़कर ले जाने का डर नहीं, बल्कि यह कि पता नहीं कब कहाँ ब्लास्ट हो जाए, कब फ़ोर्स वाला किसी को पकड़ने आ जाए. कुछ होते ही पूरे इलाक़े की घेराबंदी तलाशी. तलाशी का मतलब बेइज्ज़ती और ज़ोर-ज़ुल्म. अँधेरा होने से पहले सब लोग घर वापस. घर का कोई आदमी बिना इनफ़ॉर्मेंशन अगर लेट आता है तो घर की औरत की जान पर बन आती है. रात भर अगर नहीं आया तो तय है कि वो कहीं पड़ा मिलेगा-मरा मिलेगा. अगर वो जवान है तब तो फिर जरूर. कभी-कभी नहीं सर, अकसर होता है यहाँ ऐसा. कुछ दिन न हो तो इंतज़ार-सा रहता है कि कल होगा या फिर अगले दिन होगा. पर होगा ज़रूर. आपको मालूम है सर-यहाँ लड़का लोगों की बहुत कमी हो गई है मणिपुर में. या तो उसे मार दिया जा रहा है या फिर डर से वह बाहर भाग रहा है यहाँ से. जी, लड़कियों की संख्या ज्यादा हो गया है, यहाँ….”

बोला रागिनी ने था लेकिन चेहरे तीनों के ही तपे से दिख रहे थे. एक पल को लगा कि मेरे सामने ये तीन लड़कियाँ नहीं, तीन अग्निशिखाएँ खड़ी हैं. ख़ुद की अपनी आग से अपने आसपास को जलाती झुलसाती सी. वे चारों मेरे एकदम पास केवल एक कुर्सी के फ़ासले पर खड़े थे. समय दौड़ता-सा लगा था तब. सम्मोहित-सा खड़ा मैं सोच रहा था, हमारी ज़िंदगी में ये ऐसी बातें-मुलाकातें आख़िर तय कैसे, कहाँ से और किसके द्वारा होती हैं? अलीगढ़ से इतनी दूर यह इंफाल, यहाँ की यह यूनिवर्सिटी, उसका हिंदी विभाग और अंग्रेज़ी के शोध-छात्र ये बच्चे और इनसे आज की इतनी देर की यह मुलाकात- ये बातें! कौन बता सकता है कि इनसे आज यहाँ क्यों मिलना हुआ या फिर आगे कभी फिर मिलना हो सकेगा या नहीं? मिले थे तो एकदम उत्फुल्ल चहकते-से थे ये चारों. विदा के इन पलों में अपनी उम्र से कई गुना अधिक धीर-गंभीर दिखे रहे हैं ये! इतनी इस देर में इनकी उस मस्ती और हँसी को आख़िर कौन कहाँ छीन झपट ले गया इनसे? अच्छे भले इनके यौवन को जैसे वार्धक्य ने आ घेरा है. यहाँ आसपास न कहीं धुआँ है, न कैसी ही कोई आग या रात लेकिन इनकी ये आँखें धुँधाई-सी क्यों दिख रही हैं? इनके चेहरे पल में गुलाबी, पल में लाल-से क्यों हो रहे हैं? मेरी हथेली गुनेश्वर के कँधे पर जा टिकी है, “आने वाले दिनों को लेकर तुम क्या सोचते हो गुनेश्वर?”

चेहरा सुर्ख़-सा हो गया झट से. जैसे किसी शोले के ऊपर की राख को अनजाने हटा-कुरेद दिया हो किसी ने. देर लगी बोलने में. बोलना भी क्या- अटकते-से जैसे-तैसे कह दिए गए कुछ शब्द- “क्या तो हम सोचेगा और क्या हमारे सोचने से हो जाएगा! पर यह ज़रूर कि अगर सरकार जल्दी नहीं सोचेगा-चेतेगा तो हालत और ज़्यादा बिगड़ेगा. यहाँ का यंग और ज़्यादा हथियार खरीदेगा और ज़्यादा मिलीटेंट बनेगा. और क्या बोल सकता है हम सर! लेकिन हमारा एक रिक्वेस्ट है सर!”

मैं चौंका-हड़बड़ाया-“रिक्वेस्ट! क्या? हाँ, बोलो गुनेश्वर. – “सर आप दिल्ली जाकर पी.एम. को, होम मिनिस्टर को यहाँ की सही-सही बातें बताना. मिलकर बताना या लिखकर, पर बताना ज़रूर. उन्हें बताना कि मणिपुर की प्रजा की समझ में यह नहीं आता कि जब सेंट्रल गवर्नमेंट पंजाब-कश्मीर के, पाकिस्तान के मिलीटेंट से बातें कर सकती है, उनसे सौदा-समझौता कर सकती है तो हमारे इरोम शर्मिला से बातें क्यों नहीं कर सकती? वो तो कभी वॉयलेंस की, लेने-बाँटने की बात भी कभी नहीं किया – तो फिर …!”

“ठीक सर! बिल्कुल ठीक सर! प्लीज़ सर!” इस बार भी इतना यह पहले रागिनी ने ही कहा था, उसके बाद उसकी दोनों दोस्तों ने. और चल पड़ने से जरा पहले की वह आवाज़ अकेली रागिनी की थी-“सर, आप हमारी इतनी बातें ध्यान से सुना, आराम से सुना. पहली बार सुना है किसी ने हमसे ऐसे हमारे डरों और चिंताओं की बातों को. वो भी किसी मणिपुरी ने नहीं – एक भायंग ने-दिल्ली के पास से आए एक इन्सान ने. हम और क्या कर सकता है सर! हम थैंक्यू वैरी मच बोलता है सर! हम अपना रेस्पेक्ट पे करता है सर!” उसके बाद रागिनी की दोनों दोस्तों ने भी ‘ठीक सर, थैंक्यू वैरी मच सर” बोला था-लेकिन यह पहली बार था कि इस समय गुनेश्वर ने भी अवरुद्ध से कंठ से उनके साथ- “ठीक सर, थैंक्यू वैरी मच सर” बोला था.








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