अफ़्रीका के और अफ़्रीकी मूल के खिलाड़ियों ने दुनिया में फ़ुटबॉल खेल और फ़ुटबॉल खेल की दुनिया बदल दी है. भौगोलिक दुश्वारियां, उपनिवेशीय शासन द्वारा छोड़ी गई बदग़ुमानियाँ, सैन्य शासकों और तानाशाहों के बदमग़्ज़ियां, उनसे छुटकारा पाने के लिए अनवरत [….]
नई दिल्ली | दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फ़ारूक़ी की किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का कल शाम लोकार्पण हुआ. गुरुदत्त की ज़िंदगी और उनके समय के भारतीय सिनेमा की गहरी पड़ताल करती यह किताब राजकमल प्रकाशन से छपी है. यह कार्यक्रम हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में 18वें हैबिटेट फ़िल्म फ़ेस्टिवल के दौरान आयोजित एक विशेष सत्र में हुआ. [….]
4 फ़रवरी, 2010. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का न्यू गेस्ट हाउस. पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा मसनवी पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे सत्र के बाद का समय. डाइनिंग हॉल में भारत के सुदूर इलाक़ों से एवं ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तज़ाकिस्तान, बांग्लादेश से बड़ी संख्या में आए प्रतिभागी. सब तरफ चर्चाएं, खिलखिलाहटें, बातें ही बातें. बड़ी मुश्किल और कोशिश के बाद जैसे-तैसे हम [….]
लखनऊ | भारतीय समकालीन कला के परिदृश्य में छापाकला (प्रिंटमेकिंग) एक सशक्त, संवेदनशील और वैचारिक माध्यम के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुकी है. शहर की कोकोरो आर्ट गैलरी में छह मई से शुरू हुई नामवर छापाकार मनोहर लाल भुगरा की कृतियों की रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी “छापा… जीवन की छाप (Imprint of a lifetime)” इसी विशिष्टता को रेखांकित करती है. यह [….]
मैं फ़ोटोग्राफ़र होने का कोई दावा नहीं करता, न ही हूँ. हाँ, इतना ज़रूर है कि ज़िंदगी ने मुझे कुछ नामी फ़ोटोग्राफ़रों के क़रीब बैठने का मौक़ा दिया, जिनकी सोहबत में मैंने तस्वीर को देखना और समझना सीखा—कभी उनकी बातों से, कभी उनकी ख़ामोशियों से. वही लोग थे जिन्होंने मुझे बार-बार समझा कर ठीक-ठाक तस्वीर लेने का हौसला दिया और [….]
मुम्बई | ऋत्विक घटक बांग्ला सिनेमा के उन महान फ़िल्मकारों में हैं, जिन्होंने बंगाल विभाजन की पीड़ा, विस्थापन, शरणार्थी जीवन और सामाजिक विघटन को अपनी फ़िल्मों में गहरी संवेदना और वैचारिक तीक्ष्णता के साथ चित्रित किया. उनका सिनेमा यथार्थवाद, मेलोड्रामा, ब्रेख़्तियन शैली, मिथकीय प्रतीक और अभिव्यक्तिवादी ध्वनि के अनोखे संयोजन के [….]
सहमत की पुरानी साथी विदुषी नीला भागवत का लंबी बीमारी के बाद कल 14 अप्रैल 2026 को इंतकाल हो गया. वह ग्वालियर घराने की एक मशहूर कलाकार थीं. उन्हें न सिर्फ़ अपनी परंपरा से गहरा लगाव था, बल्कि वह उसमें नए प्रयोग करने की महारत भी रखती थीं. नीला जी अपने आस-पास की दुनिया और समाज से बहुत क़रीब से जुड़ी हुई थीं. उनकी इस [….]
प्रयागराज | वीथिका की ओर से हुए साहित्यिक आयोजन ‘पीढ़ियां’ में देश के विख्यात साहित्यकार और आलोचक शामिल हुए. साहित्यकारों की तीन पीढ़ियों पर केंद्रित वीथिका का यह कार्यक्रम इतवार को इलाहाबाद संग्रहालय में हुआ. इस विशिष्ट आयोजन में साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया, लेखन प्रक्रिया के बारे में बात [….]
नई दिल्ली | राजकमल प्रकाशन के 81वें स्थापना दिवस पर शनिवार शाम को आयोजित ‘सहयात्रा उत्सव’ में समकालीन साहित्य और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार-विमर्श हुआ. इस अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’ विचार-पर्व के छठे संस्करण में पाँच युवा वक्ताओं—कलाकार उन्नति चौधरी, शोधार्थी-अध्येता पंकज कुमार, कवि पराग [….]