ऋत्विक घटक का सिनेमा सबसे मौलिकः अविनाश दास

  • 4:51 pm
  • 18 April 2026

मुम्बई | ऋत्विक घटक बांग्ला सिनेमा के उन महान फ़िल्मकारों में हैं, जिन्होंने बंगाल विभाजन की पीड़ा, विस्थापन, शरणार्थी जीवन और सामाजिक विघटन को अपनी फ़िल्मों में गहरी संवेदना और वैचारिक तीक्ष्णता के साथ चित्रित किया. उनका सिनेमा यथार्थवाद, मेलोड्रामा, ब्रेख़्तियन शैली, मिथकीय प्रतीक और अभिव्यक्तिवादी ध्वनि के अनोखे संयोजन के लिए जाना जाता है. उन्होंने केवल आठ फीचर फिल्में बनाईं, पर उनकी विभाजन त्रयी विशेष रूप से चर्चित रही. जनवादी लेखक संघ मुम्बई एवं स्वरसंगम फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में मीरा रोड स्थित विरंगुला केन्द्र में आयोजित कार्यक्रम में लेखक-पत्रकार और अनुवादक ज़ाहिद ख़ान और जयनारायण प्रसाद द्वारा संपादित किताब ‘ऋत्विक घटक : नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ का विमोचन हुआ. इसी अवसर पर ज़ाहिद ख़ान द्वारा हिन्दी में अनूदित कृष्ण चंदर के उर्दू नाटक ‘दरवाज़े खोल दो’ का भी विमोचन किया गया.

कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता पुलक चक्रवर्ती ने कहा, “ऋत्विक घटक मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित फ़िल्मकार थे. उन्होंने 1948 में ‘भारतीय जन नाट्य संघ’ (इप्टा) से जुड़कर अपनी सांस्कृतिक यात्रा शुरू की. विभाजन, अकाल और सामाजिक अन्याय ने उन्हें मार्क्सवाद की ओर आकर्षित किया. वे इप्टा के सक्रिय सदस्य रहे. नाटक लिखे-निर्देशित किए और 1951 में पार्टी के लिए ‘ऑन द कल्चरल फ्रंट’ नामक महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किया. जिसमें उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सांस्कृतिक नीति पर जोर देते हुए कहा कि ‘कला को जनता की पीड़ा और आकांक्षाओं को व्यक्त करने वाला होना चाहिए.’ ऋत्विक घटक का इप्टा से जुड़ाव सिर्फ़ संगठनात्मक नहीं था, बल्कि वे सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी कलाकार थे. मार्क्सवाद उनकी फ़िल्मों की रीढ़ बना रहा. उनकी रचनाएँ पूंजीवाद की विनाशकारी प्रवृत्तियों, वर्ग संघर्ष, विभाजन की त्रासदी और बौद्धिक संकट के ख़िलाफ़ निरंतर विद्रोह का रूप लेती रहीं.

घटक ने फ़िल्म कला के माध्यम से मानवता और सामाजिक न्याय के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता निभाई. घटक की प्रसिद्ध फ़िल्म ‘मेघे ढाका तारा’ शरणार्थी परिवार की त्रासदी के माध्यम से स्त्री-त्याग और शोषण की मार्मिक कथा कहती है. और उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है. ‘कोमल गांधार’ थिएटर आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्मिलन की आकांक्षा को राजनीतिक विभाजन के संदर्भ में प्रस्तुत करती है. जबकि फ़िल्म ‘सुवर्णरेखा’ विस्थापन, जाति-वर्ग और नैतिक संकट की दार्शनिक पड़ताल करती है. ‘अजान्त्रिक’ में मनुष्य और मशीन के संबंध को प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया गया है. बांग्लादेश में बनी फ़िल्म ‘तितास एक्टी नदीर नाम’ एक लुप्त होती नदी-सभ्यता की महाकाव्यात्मक कथा है. जबकि ‘जुक्ति, तक्को आर गप्पो’ राजनीतिक बहस और बौद्धिक संकट पर आधारित अर्ध-आत्मकथात्मक फ़िल्म है. उनकी प्रारंभिक फ़िल्म ‘नागरिक’ और ‘बाड़ी थेके पालिए’ भी उल्लेखनीय हैं.”

सुपरिचित फ़िल्म निर्देशक अविनाश दास ने कहा, “ऋत्विक घटक का सिनेमा सबसे ज़्यादा ओरिजिनल सिनेमा है. उन्होंने अपनी फ़िल्मों से सिनेमा का पूरा व्याकरण खड़ा किया है. उनका कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ाव भावनात्मक था. जब वैचारिक मतभेद गहराए, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी.” अविनाश दास ने एक फ़िल्म डायरेक्टर की विवशताओं का जिक्र करते हुए बताया कि “फ़िल्म बनाने में कितनी मशक्कत, चिरौरी और तानों का सामना करना पड़ता है.” उन्होंने डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी के हवाले से कहा कि ‘डायरेक्टर का जन्म अपमानित होने के लिए होता है.’ ऐसे में ऋत्विक घटक द्वारा अपनी शर्तों पर सिनेमा बनाना एक बड़ी उपलब्धि है.” उन्होंने मीरा रोड के ‘स्वरसंगम फाउंडेशन’ की तुलना कलकत्ता के उस सृजनात्मक माहौल से की, जिसमें ऋत्विक घटक और मृणाल सेन एक-दूसरे को सहयोग देते थे.”

किताब के संपादक लेखक ज़ाहिद ख़ान ने कहा, “हिंदी पट्टी में ऋत्विक घटक को मुख्यतः ‘मधुमती’ और ‘मुसाफिर’ जैसी फ़िल्मों के स्क्रिप्ट लेखन के लिए जाना जाता है. जबकि उनका नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मृणाल सेन और सत्यजित राय के साथ जीनियस और प्रतिभावान डायरेक्टर के रूप में होता है.” उन्होंने ऋत्विक घटक को मूल रूप से नाटककार बताया, जो इप्टा से जुड़े रहे और बाद में सिनेमा की ओर गए. क्योंकि उन्हें लगता था कि सिनेमा के पास अधिक दर्शक हैं. प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले ज़ाहिद ख़ान ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, “ऋत्विक घटक अपनी कला और फ़िल्मों के माध्यम से मानवता और मानवीय मूल्यों को क्षरण से बचाने के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे. फ़िल्म बनाने के पीछे ऋत्विक घटक का क्या मक़सद था ? इसका जवाब उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में दिया था, ‘फ़िल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति के लिए भलाई करना है. यदि आप मानवता के लिए भलाई न करें, तो कोई भी कला सच्ची कला का कार्य नहीं है.” उन्होंने कार्यक्रम में शामिल श्रोताओं से अपील की कि “ऋत्विक घटक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के लिए किताब ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ को ज़रूर पढ़ें.”

मुंबई विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर वरिष्ठ कवि डॉ.हूबनाथ पांडे ने ऋत्विक घटक की फ़िल्मों को समझने के अपने शोध संस्मरण साझा किए और बताया कि “बंगाली न समझने के बावजूद, उन्होंने विजुअल्स के सहारे घटक की फ़िल्मों को देखा.” उन्होंने ‘खुद्दार’ फ़िल्म के सीन का उदाहरण देकर परसोनिफिकेशन यानी मानवीकरण की घटक की अनोखी अवधारणा पर प्रकाश डाला. डॉ. पांडेय ने हर महीने कम से कम एक फ़िल्म दिखाने की पेशकश की और कहा कि “हमें फिल्में देखना सीखना होगा.” उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी की स्थापना की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “वी.शांताराम की फ़िल्म सोसाइटी बंद हो चुकी है. इसकी दोबारा शुरुआत मीरा रोड से की जा सकती है. मेरे पास दस हजार फ़िल्मों का संकलन है.” जलेस के केन्द्रीय कमेटी सदस्य संजय भिसे ने कहा “ऋत्विक घटक का महत्व इस बात में है कि उन्होंने सिनेमा को मात्र मनोरंजन नहीं माना, बल्कि उसे इतिहास, राजनीति और मानवीय संवेदना का माध्यम बनाया. उनकी फ़िल्मों में विभाजन की त्रासदी निजी जीवन की कहानियों से जुड़कर व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय संदर्भ ग्रहण करती है. उन्होंने सिनेमा की भाषा को नए ढंग से गढ़ते हुए दर्द को विद्रोह और कविता में रूपांतरित किया. जिससे उनका सिनेमा आज भी गहरे प्रभाव के साथ याद किया जाता है.”

कलकत्ता से विशेष रूप से आए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक जयनारायण प्रसाद ने सत्यजीत राय, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक के बीच के संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने ‘मेघे ढाका तारा’ फ़िल्म का विशेष उल्लेख किया और कहा, “विभाजन की पीड़ा और शरणार्थियों की समस्या को इस फ़िल्म में अद्भुत रूप से प्रस्तुत किया गया है.” कार्यक्रम में रंगमंच और सिने अभिनेता अजय रोहिल्ला ने ऋत्विक घटक के सिनेमा की स्ट्रांग विजुअल सेंस की तारीफ की. वरिष्ठ पत्रकार, कवि और कथाकार हरि मृदुल ने कहा, “घटक बड़े कथाकार भी थे और उनकी कहानियों का हिन्दी अनुवाद आ गया है.” फ़िल्मों में कथा, पटकथा लेखन से जुड़े कवि फरीद ख़ान ने ‘मेघे ढाका तारा’ का उल्लेख करते हुए ऋत्विक घटक को यथार्थवादी सिनेमा का महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बताया. ‘स्वरसंगम फाउंडेशन’ के चैयरमैन एवं विरंगुला केन्द्र मीरा रोड के अध्यक्ष हृदयेश मयंक ने कहा, “प्रो. हूबनाथ पांडेय के प्रस्ताव पर स्वरसंगम फाउंडेशन शीघ्र ही कमेटी की बैठक बुलाकर फ़िल्म सोसाइटी निर्माण संबंधी विचार करेगी.” कार्यक्रम का सूत्र दर सूत्र जोड़ते हुए शानदार संचालन वरिष्ठ कवि रमन मिश्र ने किया. हरिप्रसाद राय ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए इसे एक समृद्ध करने वाला अनुभव बताया.

प्रस्तुति : संजय भिसे/ हृदयेश मयंक


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