इतिहास सच्चा और नुक़्स से ख़ाली होना चाहिएः इरफ़ान हबीब
इतिहासकार इरफ़ान हबीब 94 साल के हो गए हैं. अपनी ज्यादातर सक्रियता उन्होंने घर के दायरे में सीमित कर ली है, पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तक अब भी चले जाते हैं. विभाग के चेयरमैन प्रो.हसन इमाम की मेज़ के सामने एक बड़ी-सी मेज़ उनके आने के इंतज़ार में ख़ाली दिखाई देती है. यों घर की अपनी स्टडी में पढ़ाई-लिखाई और शोध की उनकी पुरानी सक्रियता बरक़रार है. अपने पुराने दस्तावेज़ संभालने के साथ ही जर्नल के लिए आए लेखों पर काम में जुटे रहते हैं. इस काम के बीच मुलाक़ातियों के लिए भी वक़्त निकालते हैं. उनके घर पहुँचा तो बरामदे में ही बैठे मिल गए, मेज़ पर कुछ किताबें रखी थीं और जालंधर से आए एक सज्जन उनसे बातचीत में मुब्तला थे. उन्हें सलाम करके हम तीनों यानी ज़ीशान भाई, शावेज़ और मैं एक ओर खड़े हो गए ताकि उन लोगों की बातचीत में ख़लल न पड़े.
बात ख़त्म करके उन सज्जन ने फ़ोन नंबर माँगा तो इरफ़ान साहब उठकर अंदर चले गए, एक टेलीफ़ोन डायरी लेकर वापस लौटे और उसका आख़िरी पन्ना खोलकर सामने कर दिया – लीजिए इसमें से नोट कर लीजिए. अपना फ़ोन नंबर अब याद नहीं रहता. वह विदा हुए तो इरफ़ान साहब ने हम लोगों को बैठने के लिए कहा, और ख़ुद कुछ और कुर्सियाँ लाने के लिए उठ खड़े हुए. मैंने इशारा किया और शावेज़ अंदर जाकर कुर्सियां उठा लाए. बैठते ही मैंने उनके रेलवे स्टेशन वाले व्हीलर्स के स्टॉल पर देखे जाने का ज़िक्र किया तो बताया कि वो पुराने दोस्त हैं, स्टेशन जाता हूँ तो उनसे भी मुलाक़ात कर आता हूँ. अपनी साइकिल वाली तस्वीरों के सहेजे जाने के बारे में बताने पर कहने लगे, आप लोगों की मुहब्बत है. मैं तो अब साइकिल नहीं चलाता हूँ. उसी मुलाक़ात में इतिहास को लेकर यह मुख़्तसर बातचीत भी हुई,
• यूरोप के विद्वानों ने इतिहास और मिथक को हमेशा ही अलग रखा है. हमारे यहाँ अक्सर इस फ़र्क को दरकिनार करके इन दोनों का घालमेल देखने में आता है. समाज को यह किस तरह प्रभावित करता है?
• देखिए, वास्तव में हमारे यहाँ भी जो इतिहास लिखा जाता है, उसके लिए तो वही तरीक़ा इख़्तियार किया जाता है, जो बाक़ी दुनिया का है. चाहे वह प्राचीन इतिहास हो या आधुनिक इतिहास. आप हिस्ट्री काँग्रेस के पर्चे उठाकर देख लीजिए, उनमें कोई ऐसा पर्चा नहीं होता, जिसमें शोध और परीक्षण के वैज्ञानिक तरीक़ों पर अमल न हुआ हो. उनकी प्रोसीडिंग्स में कभी कोई आधारहीन बात छपी नहीं मिलेगी. अब तक तो ऐसा ही होता आया है. जो प्रोफ़ेशनल हिस्टोरियन हैं, उनके सिद्धांत तो वही हैं, जो दुनिया भर में हैं.
हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही ऐसे देश हैं, जहाँ माइथोलॉजी का बहुत असर होता है, इसकी वजह से ज़रूर असर पड़ा है—वो चाहे इस्लामिक माइथोलॉजी हो या हिंदू माइथोलॉजी, हैं तो दोनों ही माइथोलॉजी. लेकिन फिर भी हिंदुस्तान में इतिहास को लेकर जो व्यापक झुकाव है, मैं समझता हूँ कि वह वाजिब और तर्कसंगत है. हुकूमतों के मिज़ाज को तो ख़ैर आप छोड़ ही दीजिए.
अब अगर प्राचीन इतिहास के किसी विद्वान से आप यह कहेंगे कि हज़ारों साल पहले हमारे पुरखे हर किस्म के इल्म के उस्ताद थे, कि हवाई जहाज बनाने से लेकर बिजली बनाने तक का हुनर उन्हें आता था तो वह हँसेगा. अब तक तो मुझे हिन्दुस्तान का ऐसा कोई प्रतिष्ठित विद्वान नहीं मिला, जो इनके मिथकों को इतिहास का आधार बनाता हो. भविष्य के बारे में कुछ नहीं कह सकते हैं.
• हाल के वर्षों में इतिहासकारों को किसी ख़ास वैचारिकी से जोड़कर देखने या फिर किसी ख़ास ख़ेमे का पक्षकार ठहराए जाने के चलन ने जिस तरह ज़ोर पकड़ा है, आपकी राय में इतिहास पढ़ने वालों पर या शोध पर उसका असर हो सकता है?
• वो तो यह कह देते हैं सिलेबस में कि यह पढ़ाइए आप. जैसे कि वर्ण व्यवस्था को आप मध्यकालीन इतिहास में रखेंगे, यह उनके सिलेबस में है. ये कहना तो बहुत मुश्किल है कि कहाँ इस पर अमल हो रहा है, कहाँ नहीं हो रहा है, लेकिन जो जाने-माने इतिहासकार हैं, उनके यहाँ तो यह नहीं है. अब यह तो मेरे ख़्याल में एक हद तक हर मुल्क में होता होगा कि कोई पौराणिक आख्यान, कोई मिथक विकसित किया जाए. जैसे कि अमेरिका में बहुत ज्यादा है. हिन्दुस्तान में यह धार्मिक विचारों के हवाले से आता है, यह भी कि ख़ासतौर पर हिंदुत्व को इसकी बुनियाद बनाया जाए. जैसे कि पाठ्यक्रम में यह कहना कि वर्ण व्यवस्था तो मध्यकाल में आकर ख़राब हुई, उसके पहले अच्छी थी. इस क़िस्म की तो अनैतिहासिक बातें हैं. अरे, आपके कह देने से यह बात सही थोड़े ही हो जाएगी. बहरहाल, जहां तक हिन्दुस्तान के इतिहासकारों का सवाल है, मुझे तो नहीं लगता कि उनके लेखन पर ऐसी चीज़ों का कोई असर पड़ा है. इतिहास के जर्नल्स में तो वैसे ही लेख निकलते हैं, जैसे कि पहले आते थे-तार्किक और वैज्ञानिक.
• इतिहास के कुछ विद्वान मानते हैं कि छोटी कक्षाओं में विषय के तौर पर इतिहास की पढ़ाई होनी ही नहीं चाहिए बल्कि इसे उस उम्र से शुरू करना चाहिए जब वे तर्क और विवेक की कसौटी बरतने के लायक़ हो जाएं. आप इस राय से कितना इत्तफ़ाक़ रखते हैं?
• मेरे ख्याल में तो इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, बेशक नहीं है. बचपन से उनको अपना इतिहास मालूम होना चाहिए. एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि वो उनको अच्छी बातें भी सिखाएं. अशोक और अकबर के बारे में बताएं, गाँधी के बारे में बताएं. हमारा इतिहास कोई वर्ण व्यवस्था और मज़हबी झगड़ों का इतिहास भर तो नहीं है. तो यह सब हमें स्कूल के लेवल पर करना ही चाहिए. अगर हम राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास नहीं पढ़ाएंगे तो हमारा तो बहुत नुकसान हो जाएगा.
• इतिहास के तथ्यों से छेड़छाड़ और उनमें बदलावों के आग्रह भी जब-तब सामने आते रहते हैं. ऐसे में एक इतिहासकार होने के नाते आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
• इतिहास में भी यह है कि इसके कुछ पहलुओं के बारे में तो आपको बहुत इल्म है, और कुछ के बारे में आप बहुत कम जानते हैं. जैसे कि प्राचीन भारत में अशोक के बारे में सिर्फ़ उसके कुछ शिलालेख हैं, और कुछ दंतकथाएं (उपाख्यान) हैं. और ये कथाएं भी ख़ासी ग़ैर-यक़ीनी हैं. ऐसे बहुत से तरीक़े हैं, जिनसे गुज़रकर हम सही नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि यह वाकई हो सकता है या नहीं. कसौटी पर परखे बिना मानने या ख़ारिज करने की कोई वजह नहीं. देअर इज़ ऑलवेज़ अ डाउट यू नो! मसलन यह कहना कि जाति प्रथा तो अच्छी थी, लेकिन मुग़लों के आने की वजह से ख़राब हो गई. यह तो बिल्कुल अनैतिहासिक बात हुई न! मनुस्मृति तो मुसलमानों के बारे में सुने जाने के सदियों पहले से मौजूद है. तो इतिहास को दरअसल सच्चा और नुक़्स से ख़ाली होना चाहिए. इसमें तो कोई शक नहीं कि संतुलन भी होना चाहिए. यह इतिहासकारों की ज़िम्मेदारी है कि वे सभी तथ्यों की हर पहलू से जाँच-पड़ताल ज़रूर करें.
• अपने विषय से अलग आप क्या पढ़ रहे होते हैं?
• एक तो जो जर्नल मैं एडिट करता हूँ, उसके लिए कोई आर्टिकल आता है तो उसमें दिए गए संदर्भों को पढ़ते हैं, रिसर्च करते हैं ताकि उनकी जाँच-परख हो जाए. अपने जो पुराने डाक्यूमेंट्स हैं, उनको देखते-संभालते रहते हैं. बाक़ी जो समय मिलता है तो नॉवेल वगैरह पढ़ते हैं, जैसे नॉर्मल आदमी पढ़ता है. डिटेक्टिव नॉवेल में मुझे ज्यादा दिलचस्पी है. शरलॉक होम्स का लिखा मन से पढ़ता हूँ. यों साहित्य में मुझे कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है. ज्यादातर डाक्यूमेंट्स में ही पड़ा रहता हूं—फ़ारसी डाक्यूमेंट्स के मुक़द्दमे.
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