बेशुमार किताबों की भीड़ में भी उस किताब का वजूद सबसे अलग मालूम होता था. चार रंगों वाली भीत के सामने एक बदन का ख़ाका. गहरे भूरे रंग के फीते वाली चुटिया. ऐन ऊपर राही मासूम रज़ा और नीचे की तरफ़ लिखा किताब का नाम—कारोबारे तमन्ना. [….]
इतिहासकार इरफ़ान हबीब 94 साल के हो गए हैं. अपनी ज्यादातर सक्रियता उन्होंने घर के दायरे में सीमित कर ली है, पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तक अब भी चले जाते हैं. विभाग के चेयरमैन प्रो.हसन इमाम की मेज़ के सामने एक बड़ी-सी मेज़ उनके आने के इंतज़ार में ख़ाली दिखाई देती है. यों घर की अपनी स्टडी में [….]
न्यू अलबर्ट कम्पनी की ‘रामायण‘ की स्क्रिप्ट सुधारते वक्त पंडित राधेश्याम ने शायद सोचा भी न हो कि रामायण से जुड़कर उन्हें ऐसी ख्याति मिलेगी जो समय की सीमाओं के पार हमेशा गूंजती रहेगी. हालांकि ‘राधेश्याम रामायण’ इसके दस साल बाद अस्तित्व में आई मगर इस घटना ने थिएटर से उनके बचपन के लगाव को साकार करने के साथ ही पारसी [….]
बरेली शहर के क़िला बाज़ार से होकर द्रोपदी कन्या इंटर कॉलेज की तरफ़ जाने वाली गली में दाख़िल होकर जैसे ही आगे के छोटे-से चौराहे पर पहुँचते हैं, ख़ासी भीड़भाड़ वाली एक दुकान की दीवार पर ‘रवि के मशहूर समोसे’ की मुनादी करता फ़्लेक्स जड़ा हुआ नज़र आता है, कड़ाह घेर कर खड़े लोग समोसों के निकलने के इंतज़ार में बेताब मिलते हैं. [….]
रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘लोन फ़ॉक्स डासिंग’ के हिंदी में अनुवाद करने के प्रस्ताव के साथ एक शर्त यह भी थी कि अगर मैं अनुवाद न करना चाहूँ तो कोई बात नहीं, पर मुझे भेजी गई किताब की प्रति लौटा ज़रूर दूँ. और बॉन्ड की कहानियाँ पढ़ते, अपने और दोस्तों के बच्चों को पढ़ाते रहने के अपने बरसों तजुर्बे की बिना पर मैंने हामी भर दी थी. अनुवाद [….]
उस गहरे भूरे रंग की तस्वीर में धूसर वनस्पतियाँ हैं, पहाड़ और चट्टानें हैं और खेतिहरों की ज़िंदगी में आधुनिकता की नुमांइदगी करने वाला एक ट्रैक्टर भी, इस विराट भू-दृश्यावली के एक कोने में गोलबंद होकर बैठी कुछ इंसानी छवियाँ हैं और इन सबके ऊपर उड़ते एरावत पर सवार एक शख़्स है, जिसके सिर पर अंकल सैम की तरह का लाल धारियों वाला ऊंचा टोप है. यह रणेंद्र [….]
‘मतलब हिन्दू’ पढ़ लेने के बाद मुझे लगता है कि अम्बर पाण्डेय के इस उपन्यास का शीर्षक किसी पहेली की तरह है, जिसे दरअसल पढ़ने वाले को ही बूझना है, जिसका जवाब देना है, यह कुछ वैसे ही है जैसे कि हम ‘ख़ाली जगह भरो’ वाले अभ्यास के दिनों में किया करते थे. मतलब के पहले की ख़ाली जगह भरने के लिए पाठक उपन्यास के अपने अनुभव और अपनी मनोदशा [….]
बरेली | ‘मेज़ॉक’ कहानियों का ऐसा कोलाज है, जिसमें प्रकृति है, प्रेम है, ज़िंदगी की नैसर्गिक सहजता और उन्मुक्तता और ख़्वाहिशें हैं, महानगरीय ज़िंदगी की चुंबकीय चकाचौंध और उसकी भूलभुलैया है, रोज़गार के सवाल हैं और व्यवस्था के मकड़जाल भी, सैलानियों को खींचते पहाड़ हैं, और पहाड़ से गए लोगों की बाट जोहती मद्धिम पुकार है, मगर जिसकी अनुगूँज [….]
दुनिया की हर तहज़ीब, हर ज़बान के अफ़सानों में परियों का तसव्वुर ज़रूर मिलता है—कोह-ए-क़ाफ़ पर आबाद निहायत हसीन मख़लूक़, सातवें आसमान पर बसेरा करने वाली नरम दिल महबूब शय या फिर बहिश्त से निर्वासित और धरती पर रहने को शापित. पंखों के सहारे उड़ने और मनमुताबिक कहीं पहुँच जाने या फिर लोप हो जाने वाली परियाँ [….]
(पिछली सदी के शहर बरेली और यहाँ के लोगों की तमाम दास्तानें ऐसी हैं, जो इतिहास की किताबों में नहीं मिलने वाली हैं. कुछ ऐसी हैं, जो पुराने लोगों की यादों में रह गई हैं और बहुतेरी लोप चुकी हैं. क़ायदे से तो इस क़िस्से की शुरुआत भी इस तरह होनी चाहिए – एक समय की बात है, हमारा शहर तब स्मार्ट सिटी नहीं हुआ था. लोगों को स्मार्ट होने [….]
बरेली में ख़्यालगोई की पुरानी रवायत कोविड आने के पहले तक जैसे-तैसे चलती ही रही थी, मगर ज़िंदगी की बहुतेरी ख़ूबसूरत चीज़ों की तरह यह रवायत भी महामारी की भेंट चढ़ गई. नवरात्रि के मौक़े पर कालीबाड़ी में जुटने वाले मेले का एक आकर्षण ख़्यालगोई का दंगल भी हुआ करता था, जिसमें दूसरे शहरों के नामचीन ख़्यालगो भी शिरकत करते थे और सुनने वालों की भीड़ [….]
प्रवीण ने एक ख़बर की क़तरन भेजी, जिसके मुताबिक़ प्रयाग के आज़ाद पार्क में दो कैंटीन खोलने के लिए टेंडर मांगे गए हैं, इसमें सवा सौ लोगों के बैठने का बंदोबस्त होगा और इडली-डोसा और गरम समोसे के साथ ही राजस्थानी जलेबी और बिहारी बाटी-चोखा भी खाने को मिलेगा. ख़बर में जिस सद्भावना का ज़िक्र नहीं है कि वो यह कि इस लंबे-चौड़े पार्क में [….]
उन दिनों जब मम्मन पहलवान बदायूंनी के पेड़ों के बारे में रिपोर्ट बना रहा था, उसके इतनी दूर जाकर असर करने का तो गुमान भी नहीं था. बल्कि यूट्यूब की उस रिपोर्ट पर आज कराची से ख़तनुमा लंबी टिप्पणी मिलने से पहले तक नहीं था. सैयद फ़िरोज़ आलम शाह ने वह रिपोर्ट देखकर कराची में मम्मन ख़ाँ के ख़ानदानियों का पेड़े वाला ठिकाना खोज [….]