तमाशा मेरे आगे | सेंट जॉन-इन-द-विल्डरनेस चर्च, नैनीताल
खूबसूरत छपाई वाली ये पतली-सी किताब मैंने 1978 या 79 की सर्दियों में नैनीताल क्लब के बाहर मॉल रोड पर घूमते हुए एक रेहड़ी वाले से खरीदी थी. चार रंगीन स्लाइडों के सेट के साथ इस गाइडनुमा किताब की क़ीमत कुल आठ रुपये थी. 1914, यानि 111 साल पहले, कानपुर में छपी, नैनीताल स्थित सेंट जॉन-इन-द-विल्डरनेस चर्च के बारे में यह 28 पृष्ठों की किताब आज भी मेरे लिए एक अनमोल उपहार है, शायद अनजाने में हासिल की गई मेरी पहली संग्रहणीय किताबों के ज़खीरे में से एक. ग़लती से आज इसे शेल्फ़ से बाहर खींचते वक़्त मेरे मन में कभी अपने पसंदीदा पहाड़ नैनीताल, जिसे लोग हिल-स्टेशन कहते हैं, (जो सुनने में बेतुका-सा लगता है) के बारे में कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं.
मेरे पास उस साल की नैनीताल की कोई तस्वीर नहीं है. चर्च की यह तस्वीर मेरी नहीं है. उन दिनों हमारे परिवार के कोडक बॉक्स 120 फ़ॉर्मेट कैमरा से तस्वीरें खींचना एक महंगा शौक़ था. इसलिए एक रोल फ़िल्म, उसकी प्रोसेसिंग और प्रिंट के ख़र्चे को बचा कर पिक्चर पोस्टकार्ड ख़रीदना ही मेरे लिए मुमकिन था. बहुत बाद में मैंने 35 मिमी फ़िल्म फ़ॉर्मेट कैमरा ख़रीदा.
उन दिनों, हल्के गुलाबी पत्थरों से बने इस ख़ूबसूरत चर्च तक पहुँचने का रास्ता तल्ली ताल के पीछे से घने बांज, देवदार और चीड़ के पेड़ों के बीच से होकर कच्चे या खच्चर वाले रास्ते से होकर जाता था. दोपहर के समय भी पगडंडी वाले रास्ते तक बहुत कम धूप पहुँच पाती थी. रास्ते के ऊपर घनी पत्तियाँ छाई रहतीं और किसी भी मौसम में ठंडक का एहसास होता. चर्च के पीछे की पहाड़ियाँ एक वीरान जंगल थीं, पूरी तरह से पेड़ों से ढंकी हुई, और वहाँ स्थानीय लोगों के बहुत कम घर थे.
किलबारी और स्नो व्यू रिज तक का रास्ता भालुओं के हमलों के लिए बदनाम था. बाहर से आने वाले लोग केवल साफ़ धूप वाले दिनों में ही ऊपर जाते थे, ऊपर से झिलमिलाती, नीली, राजमा के आकार की सुंदर नैनी झील को देखने के लिए, नया कि हिमालय को देखने जो हमेशा बादलों से ढंका रहता था. सर्दियों में बहुत कम लोग नैनीताल आते थे. दिल्ली से कोई सीधी बस नहीं थी, नैनीताल जाने वाली बस हल्द्वानी या काठगोदाम से लेनी पड़ती थी. इनमें से कुछ बसें भीमताल होते हुए नैनीताल पहुँचती थीं. रास्ते में मैदानी इलाकों से आवश्यक सामान लाते खच्चरों की रेल का दिख जाना देखना आम बात थी.
नैना देवी मंदिर की मधुर घंटियाँ हम जैसे नास्तिकों और आलसी शहरी लड़कों को भी सर्दियों की उस ठंडी सुबह में, जब सूरज भी काम से छुट्टी ले चुका होता था, प्रसाद के लिए क़तार में लगने के लिए खींच लाती. मॉल सड़क शांत हुआ करती थी. आज जैसा रेला, भीड़ भाड़, या शोर नहीं होता था. मुझे उस बांसुरी वाले की याद आती है, जो सामने दीवार पर झुककर दर्द भरे मगर जादुई सुर बजाता था. शांत झील के किनारे बेंच पर बैठना अनोखा सुकून देता था, जो किसी भी ‘नशे’ से कहीं ज़्यादा सुरूर देता था. स्थानीय लोग ज़्यादा मुस्कुराते थे और सैलानियों की मदद करते थे. सैलानी पहाड़ी लोगों, पहाड़ और उसकी संस्कृति का सम्मान करते थे. खच्चरों को मारुति या मार्शल गाड़ियों के बजाय रास्ता चलने का पहला अधिकार था. शांत ‘ठंडी सड़क’ पर, जो केवल पैदल चलने वालों के लिए थी, हाथ थामे टहल रहे प्रेमियों को कोई घूरता नहीं था. लाल बुरांश और चीड़ की जादुई ख़ुशबू ही थी, जो हमें घर वापस आने पर याद आती और सताती थी.

स्केटिंग रिंक और फ़ुटबॉल मैदान बच्चों और युवाओं की हँसी और उत्साह से गूंज रहे थे. वहाँ बैठे बुज़ुर्ग या धूप सेंक रहे होते थे या फिर अपनी टीम के बारे में कमेंटरी कर रहे होते थे. शुक्र है कि नानक रेस्टोरेंट तब तक नैनीताल नहीं पहुँच था, न ही उसके गोलगप्पे और चिकन टिक्का पर टूटने वालों की पागल भीड़ अभी मेरे पहाड़ तक पहुंची थी . उन दिनों हम ‘ओल्ड मॉन्क’ के बारे में सोचे बिना गरमा-गरम और मीठी चाय के अनगिनत गिलास पीते थे. कैपिटल सिनेमा में देर शाम का शो ही नशे और मनोरंजन के लिए काफ़ी होता था. धूप भरी दोपहरियों में हम नैनीताल के सबसे महंगे होटल, द मेट्रोपोल के बाहर खड़ी चमचमाती कैडिलैक कारों को देखते थे. उन होटलों के कुछ ड्राइवर भी बॉलीवुड अभिनेताओं जैसे ख़ूबसूरत दिखते थे. जब एक दशक बाद मुझे उस होटल में ठहरने का मौक़ा मिला, तब मैंने उनके पैडलबोर्ड लगे तीन-स्तरीय जर्मन पाइप ऑर्गन (पियानो) को तक़रीबन बर्बाद ही कर दिया था. इसके बावजूद वहाँ के मैनेजर नें हमें सुसज्जित टी लाउंज में बेहतरीन चाय परोसी.
नैनीताल ही वो सब था, जिसका मैं दिल्ली रहते हुए सपना देखता था और नैनीताल ही वो जगह थी जहाँ मैं अपनी एक छोटी-सी कुटिया बनाना चाहता था, जिसमें मेरी अपनी एक छोटी सी लाइब्रेरी हो ‘पूरी तरह और सिर्फ़ मेरे लिए’ — ठीक वैसे ही जैसे मेरे दोस्त बिपिन पांडे की ऊँची ढलानों पर व्हाइट हाउस कॉटेज थी. उनके पिता की घोड़ा स्टैंड के बगल में एक दुकान थी. बिपिन ही मुझे (एनटीएमसी) नैनीताल माउंटेनियरिंग क्लब ले गए और पर्वतारोहण के प्रति मेरे जुनून को जगाया. मैं सोचता हूँ कि जाने अब बिपिन कहाँ हैं!!! आख़िरी बार मैं उनसे कैलाश-मानसरोवर यात्रा के दौरान जिप्ती कैंप में मिला था. पहाड़ इतना याद आता है कि उसकी यादें आज नहीं तो कल मुझे मार ही डालेंगी. फ़िलहाल तो मैरी हॉपकिंस अपनी नशीली आवाज़ में गाकर मुझे मार रही हैं, ‘वो दिन थे मेरे दोस्त, जिनके बारे में हमने सोचा था कि कभी ख़त्म नहीं होंगे…’ (those were the days my friend, we thought they’ll never end..). वैसे इस गाने के लिखने और रिकार्ड करवाने वाले एक और महान कलाकार थे – पॉल मेकार्टनी. मैरी हॉपकिंस भी पहाड़ों से ताल्लुक रखती थीं. पॉल मेकार्टनी और मैरी हॉपकिंस के सभी अँग्रेज़ी गाने आप ज़रूर सुनें.
चलिए उस दुबली-सी किताब और सेंट जॉन-इन-द-वाइल्डरनेस चर्च पर वापस आते हैं.
श्रीमती आई. डी’ओ. इलियट द्वारा तैयार की गई इस किताब में वह हमें बताती हैं कि यह एक एंग्लिकन चर्च है और नैनीताल की सबसे पुरानी इमारतों में से एक है. चर्च के लिए जगह 1844 में बिशप डैनियल विल्सन द्वारा चुनी गई थी. इसकी आधारशिला अक्टूबर 1846 में रखी गई थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के एक कार्यकारी इंजीनियर, कैप्टन यंग ने इसकी डिज़ाइन योजना बनाई और स्थानीय लोगों के चंदे से जुटाए गए 15,000 रुपये की लागत से इस चर्च का निर्माण कराया गया. गोथिक शैली में निर्मित, इस चर्च का लोकार्पण 2 अप्रैल 1848 को हुआ था. चर्च में एक स्मारक है, जो 1880 के भूस्खलन में मारे गए लोगों की याद में बनाया गया था. तब से कई भूस्खलन हुए हैं, जिनसे चर्च की इमारत के कुछ हिस्से बार-बार क्षतिग्रस्त हुए. आपकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना के साथ, श्रीमती आई. डी’ओ. इलियट महोदया, हम आपकी इस बहुमूल्य और उपयोगी पुस्तिका के लिए आपका धन्यवाद करते हैं.
आख़िरी बार मैं अपनी पत्नी रजनी के साथ 1993 या 1994 में चर्च गया था. तब तक इसका बाहरी हिस्सा, अंदर की बेंचें और इसकी बड़ी-बड़ी ख़ूबसूरत रंगीन कांच की खिड़कियाँ (स्टेन्ड ग्लास विंडोज़) सब कुछ ठीक-ठाक था. उस दौरान खींचे गए रंगीन नेगेटिव्स को मैंने कहीं सुरक्षित रख दिया है वरना उस वक़्त की तस्वीरें आपसे साझा करता (मतलब अब उनका कोई पता नहीं). चर्च के रखवाले और एक अटेंडेंट ने लगभग 12 इंच लंबी धातु की चाबी से हमारे लिए चर्च का मुख्य द्वार खोला था. मुझे मालूम नहीं कि क्या अब भी चर्च में रविवार की प्रार्थना सभा होती है. जल्दी ही मुझे वहाँ लौटना है, सच मानो मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है, नैनीताल.
‘सेंट जॉन-इन-द-विल्डरनेस’ नाम से एक और चर्च है, जो जॉन द बैपटिस्ट को समर्पित एक प्रोटेस्टेंट चर्च है. इसका निर्माण 1852 में हुआ था और यह हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पास, मैक्लॉडगंज के रास्ते में, फोर्सिथगंज में है. अपने नाम के अनुरूप, यह चर्च आज भी जंगल में है और बहुत कम लोग इसे देखने आते हैं.
आप सब पाठकों को वक़्त मिले तो आप भी जा कर चर्च का हालचाल पता कर लिया कीजिए और उसे मुझ तक भेज दिया करें, मुझे सुकून मिलेगा – मेरा व्हाट्सएप नंबर है – 9810018857
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