एक व्यूह का टूटनाः पटकथा का पुनर्लेखन

“उनकी दुनिया में दाख़िल होने का हुनर मैंने साध लिया था, यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे कि मकड़ी के जाले का व्यूह भेदने वाला कोई चालाक कीड़ा करता है—ख़ुद को जाल में फंसने से बचाने के लिए अपने पंखों को समेटकर, कम से कम जगह घेरते हुए—मैं अंदर दाख़िल होती और उसी रास्ते से लौटते हुए पूरी एहतियात बरतती कि कहीं जाले के धागों में कहीं फंस न जाऊँ…” दरअसल यह किसी चालाक कीड़े और मकड़ी की दास्तान नहीं है, यह तो अरुंधति राय हैं, जिन्होंने अपनी माँ श्रीमती राय के बारे में बात करते हुए अपनी एहतियात का ज़िक्र किया है ताकि माँ के पास होने के दिनों में किसी तरह के आपसी टकराव या मनमुटाव को टाला जा सके.

उनकी नई किताब ‘मदर मेरी कम्स टु मी’ ऐसी मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि का कोलाज पेश करती है, जिसमें अनिश्चतताओं से भरा बचपन है, दुश्वारियाँ और दुर्व्यवहार है, ग़रीबी और अस्थिरता है और यह भी कि कैसे ये सारे तत्व मिलकर किसी इंसान की शख़्सियत गढ़ सकते हैं. हम जो भी हैं, अपने बचपन के तजुर्बों का जमा हैं. अब यह हमारे ऊपर है कि बचपन के उन अनुभवों और बुज़ुर्गों से मिले मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक आघात का इस्तेमाल हम किस तरह करते हैं. अरुंधति बड़ी होशियारी से अपने बचपन के हर अनुभव को ज़िंदगी से मिले हुए एक सबक में बदल डालती हैं, कोई शिकवा नहीं, ख़ुद को उत्पीड़ित या आहत जताने का वह कोई जतन नहीं करतीं. मुश्किल हालात या कोई तकलीफ़देह वाक़या जब भी पेश आया, उन्होंने हर बार उसे थोड़ा और आगे बढ़ने या आगे बढ़ने के रास्ते तलाश करने के मौक़े के तौर पर इस्तेमाल किया या कई बार तो सब कुछ बर्दाश्त करके सिर्फ़ अपना वजूद बचाए रखने के लिए.

अपनी माँ की शख़्सियत के बारे में वह लिखती हैं कि वह हमेशा अपने ही बच्चों को शक की निगाह से देखतीं और हरमुमकिन कोशिश करतीं कि वे आपस में मिल-जुलकर न रहने पाएं. बिना किसी लाग-लपेट के अरुंधति ने अपनी ज़िंदगी और बचपन की कहानी बड़े मन से बताई है, सीधे-सादे अल्फ़ाज़ में दर्ज करके पढ़ने वालों को सौंप दी है. यह किताब उनका आत्मकथ्य है, और उनकी माँ की जीवनी भी, जिन्होंने उनको ज़लील करने और जब भी मौक़ा मिला, अपने ग़ुस्से का निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि इन सबके बावजूद लेखिका के मन में अपनी माँ के प्रति किसी तरह का ग़ुस्सा, कड़वाहट या द्वेष नहीं है, वह ग़रीबी और अनिश्चितता वाली, मुश्किल हालात और बदसलूकी से भरी अपनी शुरुआती ज़िंदगी के बारे में बताती जाती हैं.

यह एक गहरी अनुभूति वाला आख्यान भर है, जो हमें यह बताता है कि अपनी माँ से मिला तमाम अपमान सहकर भी, क्यों और किस तरह अरुंधति की वह सोच और शख़्सियत बन गई, जो आज उनकी पहचान है. इस आख्यान में कोई दुराव-छिपाव नहीं झलकता, इसमें कुछ भी वर्जित नहीं है, न ग़ुस्से के उनके दौरे और बदमिज़ाजियां, और न बदज़बानी और वह अपमान जो अरुंधति को सहना पड़ा, यहाँ तक कि बीमार पड़ने के बाद श्रीमती रॉय के नहाने-धोने जैसे रोज़मर्रा के अनुष्ठान भी इसमें शामिल हैं. और इन सारे क़िस्सों से श्रीमती रॉय की शख़्सियत का जो ख़ाका बनता है, बहुत बार वह किसी व्यंग्य चित्र-सा लगता है, ज़्यादातर उनके किरदार का दोहरापन सामने आता है मगर हमेशा ही दिलचस्प, और इस क़ाबिल भी कि उनके बारे में लिखा जाए.

अपनी माँ को लेकर उनके मन में मिलीजुली भावना बनी रही, वह लिखती हैं, “मैंने अपनी माँ को इसलिए नहीं छोड़ा कि मैं उनसे प्यार नहीं करती थी, बल्कि इसलिए छोड़ा ताकि मैं उनसे प्यार करती रह सकूँ.” अरुंधति अपने पाठकों को यह एहसास कभी नहीं होने देतीं कि माँ के साथ अपने जटिल रिश्तों के बावजूद वह अपनी माँ से चिढ़ती रही थीं, और फिर धीरे-धीरे उनका यह रिश्ता मोहब्बत और इज़्ज़त में बदल जाता है—ख़ासकर तब, जब उन्होंने देखा कि एक मर्दप्रधान और रूढिवादी समाज पति के बिना जीने वाली औरतों से किस अमानवीय तरीक़े से पेश आता है और ऐसे माहौल में उनकी माँ अपने मान की हिफ़ाज़त करते हुए किस मज़बूती से जीती जाती थीं. आख्यान में उनके पिता की मौजूदगी उनके माँ-बाप की साझा ज़िंदगी की जटिलता को और गहराई देती है, साथ ही माहौल को थोड़ा हल्का करने में मदद करती है.

अपना विवेक और संयम साधे रखकर, अरुंधति अपने बचपन के घुमावदार रास्तों पर भटकती हैं, उनकी गणित की टीचर मिस मिटन की यादें, इसका एक आदर्श उदाहरण हैं कि कैसे बचपन के हर तजुर्बे ने उन्हें ख़ुद से बातें करने और बतौर लेखक अपनी भाषा ईजाद करने में मदद की, जैसा कि वे बाद में बताती हैं. अलग-अलग हक़ीक़त जीते हुए, माँ और बेटी, दोनों ही ज़िंदगी के नाटक की नायिकाएँ हैं, जो उन्हें सौंपी गई पटकथा नए सिरे से लिखती हैं और उसे एक तरह के सुनहरे इतिहास में बदल देती हैं.

दिलचस्प बात यह है कि ज़िंदगी के शुरुआती दुःखों और तकलीफ़ों के बावजूद वह ख़ुद को पीड़ित नहीं ठहरातीं, किसी तरह की हमदर्दी या मेहरबानी की उम्मीद नहीं करतीं. बचपन के डर और गहरा असुरक्षा भाव ही अरुंधति की ज़िंदगी की दिशा तय करता है. वह ख़ुद ही पहले ख़ानाबदोश जैसी और बाद में अकेलेपन की ऐसी ज़िंदगी का चुनाव करती हैं, जो हमारे समय के राजनीतिक मुद्दों और विमर्श से घिरी रहती है, जिसमें व्यक्तिगत और सार्वजनिक के बीच आवाजाही बनी रहती है, क्योंकि एक एक्टिविस्ट के तौर पर बिना किसी लाग-लपेट के वह समकालीन राजनीति से मुठभेड़ करती हैं. एक लेखक-एक्टिविस्ट के नाते उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा हासिल है—जो अपने फ़ैसलों की वजह से रिश्तों में चुनौतियों और क़ानूनी परेशानियों से गुज़रती हैं.

जब वह दिल्ली आने के बाद रोज़मर्रा की ज़िंदगी के संघर्षों से पार पाने की अपनी शरारतों और अपने कॉलेज के दिनों की शाश्वत दोस्ती के बारे में बताती हैं, तो आप उनके साथ हँसते हैं. वह लिखती हैं, “ज़िंदगी की अनिश्चतताओं के बीच दोस्ती ही मेरा सहारा है.” और इस दोस्ती की बदौलत ही उन्हें एक घर मिला, जहाँ वह सुरक्षा और स्थायित्व महसूस करती हैं. उनकी लिखाई इतनी दिलकश है कि वह आपको भाने लगती हैं, इसलिए नहीं कि उनका पहला उपन्यास ही बेस्टसेलर हुआ, जिसने उन्हें न सिर्फ़ ख़ुद पर बल्कि अपने दोस्तों पर भी खुलकर ख़र्च करने की आज़ादी दी, बल्कि एक ऐसे शख़्स के तौर पर जो संवेदनशील और ईमानदार है.

वह कहती हैं कि इस किताब के ज़रिये वह किसी समाधान या समापन की तलाश में नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि वह उन्हें मिल गया क्योंकि वह श्रीमती रॉय की मृत्यु से बात शुरू करती हैं, जिसने उन्हें स्तब्ध कर दिया था, और उनकी स्मृति के साथ इसे पूरा करती हैं.
इस दुनिया से रुख़सत होने से पहले उनकी माँ के प्रेम की अंतिम घोषणा, “दुनिया में ऐसा कोई नहीं है, जिसे मैंने तुमसे ज़्यादा प्यार किया हो!” और अरुंधति का यह जवाब, “मेरी लिए तुम दुनिया की सबसे अनोखी और अद्भुत महिला हो. मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ.” दोनों को आज़ाद कर देता है.

रजनी भगत अरोड़ा कम्युनिकेशन कंसल्टेंट हैं. दिल्ली में रहती हैं.

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