पुस्तक मेला | कुछ नई किताबें, कुछ नए विमर्श

  • 9:26 pm
  • 13 January 2026

नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेले के चौथे दिन राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर हुए कार्यक्रमों में तीन नई किताबों― महेश कटारे के उपन्यास ‘आल्हकथा’, नंद भारद्वाज की किताब ‘कृष्णा सोबती की कथा यात्रा’, रुचिरा गुप्ता के अनूदित उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ का लोकार्पण हुआ, ‘लेखक से मिलिए’ शृंखला में ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ किताब के लेखक यूनुस खान, ‘सरकफंदा’ उपन्यास की लेखक वन्दना राग, ‘कहानी से संवाद’ किताब की लेखक रश्मि रावत और ‘कामनाओं की मुंडेर पर’ कहानी-संग्रह की लेखक गीताश्री ने पाठकों से मुलाक़ात और बातचीत की.

नंद भारद्वाज की किताब ‘कृष्णा सोबती की कथा यात्रा’ कृष्णा सोबती के लेखन की व्यापकता को रेखांकित करती है और बताती है कि उनके लेखन को किसी एक दौर, जगह या कुछ चुने हुए विषयों तक बाँधकर नहीं देखा जा सकता. किताब पर बातचीत के दौरान नंद भारद्वाज ने कहा, मैं कृष्णा सोबती को अपने विद्यार्थी जीवन से पढ़ता रहा हूँ. कृष्णा सोबती को समझे बग़ैर हिन्दी के एक बड़े पक्ष को समझना असंभव होगा. सांप्रदायिक समस्याओं को जिस तरह वे अपनी लेखनी में सहेजती रही हैं, वह अतुलनीय है. कृष्णा सोबती की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनके लेखन ने भाषा को स्त्री और पुरुष की भाषा से अधिक मनुष्य की भाषा पर लाकर भाषाई ढांचे को तोड़ा है, बेशक वे उसकी स्वतंत्रता की बड़ी पैरोकार हैं लेकिन उसकी मुक्ति को सामाजिक विकास की प्रक्रिया के साथ देखती हैं. कृष्णा सोबती की लेखनी हमेशा लोक से जुड़ी हुई रही है, इसलिए उनका लेखन सार्थक रहा.

यूनुस ख़ान की किताब ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ पर दूसरे सत्र में चर्चा हुई. इस किताब में शैलेन्द्र के गानों, फ़िल्म की पटकथा और किरदारों का विश्लेषण उस समय और समाज की रौशनी में किया गया है. चर्चा में शामिल रहे यूनुस ख़ान ने कहा, इस किताब में शैलेन्द्र के सिनेमा के सफ़र और गानों के बनने की दिलचस्प कहानियों के बारे में बताया गया है. फ़िल्मी गानों के अपने दायरे, अपनी सीमा-रेखा होती है. उन्हें फ़िल्म की स्क्रिप्ट और किरदारों की उँगली पकड़कर चलना पड़ता है, धुन के खाँचे में फ़िट होना पड़ता है. इस किताब में चैप्टर दर चैप्टर यही लिखा गया है कि गीतकार, संगीतकार, कहानीकार, पटकथा लेखक, निर्देशक, गायक, प्रोडक्शन टीम किस तरीक़े से बातचीत करके गाने बनाते थे. इस किताब का मक़सद शैलेन्द्र के गीतों का उत्सव मनाना है. गीताश्री ने कहा कि इसे पढ़ते हुए पाठक का नज़रिया बदल जाता है. जब किताब में गानों का ज़िक्र आता है तो उन्हें सुनने का मन करता है, और फ़िल्मों का नाम आते ही उन्हें देखने का. इस तरह किताब आपको बार-बार रोकती है, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है.

रुचिरा गुप्ता के उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ का लोकार्पण हुआ. अंग्रेज़ी से इसका अनुवाद प्रणव शर्मा ने किया है. अनुवादक से बातचीत के क्रम में रुचिरा गुप्ता ने बताया कि यह कृति देह व्यापार को कम करने की दिशा में एक साहित्यिक प्रयास है. यह बिहार के फारबिसगंज स्थित एक नट समुदाय की कहानी है, जिसकी मुख्य पात्र हीरा है. क़र्ज़ चुकाने के लिए उसके पिता ने उसे सेक्स ट्रेड में बेचने का फ़ैसला कर लिया. उपन्यास हीरा के इसी संघर्ष और प्रतिरोध की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है.

चौथे सत्र में वन्दना राग के उपन्यास ‘सरकफंदा’ पर चर्चा हुई. यह उपन्यास विभाजन की डरावनी निरन्तरता के बारे में है, जहाँ लोग देश से प्यार का दम तो भरते हैं लेकिन आपसी बन्धुत्व की भावना को ख़त्म करने में लगे हैं. मनोज कुमार पाण्डेय से बात करते हुए वंदना राग ने कहा कि बिल्ली इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण पात्र है. उसे दरकिनार करके उपन्यास नहीं पढ़ा जा सकता है. बिल्ली एक लाइब्रेरियन है, एक मेटॉफर भी. लाइब्रेरियन ही हमें तमाम तरह की किताबों और ज्ञान से परिचित कराते हैं. जब तक हमारे जीवन में किताबें हैं तभी तक हम मोक्ष पा सकते हैं. मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि जब लाइब्रेरियन नहीं रहेगा, किताबें ख़त्म हो जाएंगी तब जीवन कैसे जिया जाएगा. इसमें बिल्ली के माध्यम से एक गुहार है एक पुकार है जो कोमल भावनाओं को बचाए रखना चाहती है.

‘आल्हकथा’ इतिहास और लोक-स्मृतियों को आधार बनाकर महोबा के महान योद्धाओं आल्हा-ऊदल और उनके ऐतिहासिक व सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को एक रचनात्मक आकार देने का प्रयास करता उपन्यास है. लेखक महेश कटारे ने कहा आज के समय में सभी लोगों में आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है. इस आगे बढ़ने के क्रम में वे प्रवाह में बहे चले जा रहे हैं, उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास की जानकारी नहीं है. उन्हें नहीं मालूम कि किस तरह उनका उत्थान हुआ, किस तरह उनका पतन हुआ. वे कौन से कलाकार, रचनाकार हुए जिन्होंने भारतीयता को समृद्ध किया. हम जानते हैं कि उत्तर भारत में रामायण, महाभारत के बाद सर्वाधिक लोकव्याप्ति आल्हा की ही रही है. इन ग्रंथों, गाथाओं की जानकारी नई पीढ़ी से ग़ायब होती जा रही है इसलिए मुझे लगा कि बुंदेलखंड के इन गीतों को सामने लाना चाहिए.

अगले सत्र में रश्मि रावत की आलोचनात्मक किताब ‘कहानी से संवाद’ पर चर्चा हुई. लेखक ने कहानी विधा, पाठक-लेखक संवाद और समकालीन कथा साहित्य के बदलते स्वरूप पर अपने विचार साझा किए. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, आलोचना शब्द का अर्थ आज के समय में नकारात्मक रूप में प्रयोग किया जा रहा है, यह किताब आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाती है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी रचना को विश्लेषित कर अपने काम को पूरा मान लेते हैं. हमारे पूरे समाज से ही आलोचना का गुण गायब हो गया है. अभिव्यक्ति को सिकोड़ने की कोशिश की जा रही है. आलोचना भी एक बेहद गंभीर विधा है जो साहित्य की अलग विधाओं को रचने के समान समय की मांग करती है. प्रचलित राय पर अधिक समय देने के बाद भी अंतत: महसूस होने के बाद ही आलोचना बनती है.

अपने कहानी-संग्रह ‘कामनाओं की मुंडेर पर’ पर चर्चा में गीताश्री ने कहा, मैं बहुत सारी बंदिशें, बहुत सारे बंधन झेलकर आई हूँ. मैंने उन तमाम स्त्रियों को देखा है जिनमें आकांक्षाएं हैं, सपने हैं, महत्वाकांक्षाएं हैं, जो कामनाओं की मुंडेर पर खड़ी हैं. आज हमने अपना रास्ता खोज लिया है, लेकिन आज भी ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ हैं जिनके सपने अपने ही घर के भीतर दफ़्न हैं. उनके लिए उनका विवाह ही जेल है.

उन्होंने कहा, मैं लड़ाका हूँ, थोड़े अच्छे शब्दों में कहें तो योद्धा हूँ. मैं उन स्त्रियों के लिए लड़ती हूँ जिनसे उनका हक़ छीन लिया गया या जिन्हें पता ही नहीं है कि यह उनका हक़ है. अपने हक़ के लिए लड़ना ही पड़ता है, बिना लड़ाई कुछ नहीं मिलता है.

इस दौरान पाठकों ने गीताश्री से बातचीत की और उन्होंने अपने नए संग्रह से कहानी ‘अफ़सानाबाज़’ का अंशपाठ किया.

(विज्ञप्ति)


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