पुस्तक अंश | मजबूती का नाम महात्मा गांधी
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प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल गांधी नाम के भाव के आधारभूत मूल्यों, खासतौर पर अहिंसा को लेकर लम्बे समय से सोचते रहे हैं. इसी चिन्तन का नतीजा है वह सूत्र जो उनकी नई किताब का शीर्षक है ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ जिसने आम चलन में स्वीकृत उस मुहावरे को पलट दिया जिसके मुताबिक महात्मा गांधी एक मजबूरी का नाम हैं. वे कहते हैं कि वे अगर मजबूरी हैं तो सिर्फ उन लोगों के लिए जिनके पास गांधी की मजबूती की कोई काट नहीं है, जो उनसे नफरत करते हुए भी उनको अनदेखा नहीं कर सकते. वे इस तथ्य पर भी ज़ोर देते हैं कि गांधीजी की अहिंसा धार्मिक परम्पराओं में बताई गई अहिंसा नहीं है, वह उनकी मौलिक जीवन-दृष्टि है जो करुणा और संयम पर टिकी है. उनके लिए वह ऐसा मूल्य है जो किसी भी परिस्थिति में त्याज्य नहीं है, क्योंकि उससे मनुष्य का भविष्य जुड़ा है. यहाँ इसी किताब का एक अंशः
गांधीजी के जीवन में कई ऐसी घटनाएँ हैं, कई ऐसे पल हैं जिन पर लोगों को ताज्जुब होता है. ‘दी राइज एंड दि फॉल ऑफ थर्ड-रीख’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक विलियम श्रायर चौथे दशक के शुरुआती वर्षों में ‘शिकागो ट्रिब्यून’ के संवाददाता के तौर पर चार-पाँच वर्ष गांधीजी के साथ रहे थे. उन्होंने गांधीजी की एक-एक एक्टिविटी को कवर किया. वे गांधीजी के साथ गोलमेज कॉन्फ्रेंस के लिए लन्दन गए थे. उन्होंने लिखा है कि जब गांधीजी लंकाशायर जाना चाहते थे तो वहाँ की पुलिस बहुत चिन्तित थी, गांधीजी की सुरक्षा के लिए. पुलिस को लग रहा था कि मजदूर गांधीजी पर हमला कर देंगे क्योंकि उनके कारण लंकाशायर की मिलें बन्द होने की नौबत आ गई थी. स्वदेशी आन्दोलन के कारण, बायकाट के कारण. बड़ी मुश्किल से पुलिस ने इजाजत दी गांधीजी को. ठीक है! आप चले जाइए. अब आप तो जिद्दी आदमी हैं, आप मानेंगे नहीं! लेकिन काफी चिन्तित थी इंग्लैंड की पुलिस गांधीजी की सुरक्षा को लेकर ! और मित्रो! आपमें से किसी ने यदि वो चित्र देखे हों–लंकाशायर के मजदूरों के बीच गांधीजी! उन चित्रों के बारे में शब्दों में कहना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है. कुँवर नारायण जी और अशोक जी जैसे कवि कभी कुछ कहें तो कहें! उन चित्रों का जो मर्म है… जिस व्यक्ति को उन्हें अपने रोजगार छीनने वाला, पेट पर लात मारने वाला मानना चाहिए, उस व्यक्ति का स्वागत वे मजदूर-स्त्री और पुरुष ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें बरसों का बिछड़ा कोई भाई या बापू मिला हो! क्यों? क्योंकि गांधीजी ने अपने व्यवहार से, केवल शब्दों से नहीं व्यवहार से बार-बार यह रेखांकित किया कि भारत के जनसाधारण की लड़ाई ब्रिटेन के जनसाधारण के खिलाफ नहीं है. भारतीय जनसाधारण की लड़ाई ब्रिटेन के साम्राज्यवाद के खिलाफ है. उपनिवेशवाद के खिलाफ है. इस लड़ाई में ब्रिटेन के साधारण मजदूर को मेरे साथ होना चाहिए. मेरे खिलाफ नहीं! और इसलिए हिंसा का कोई भी कर्म चाहे वह किसी भी तरह के नैतिक जस्टिफिकेशन के साथ क्यों न किया गया हो, मेरे लिए इसलिए स्वीकार्य नहीं हो जाएगा कि वह भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई के पक्ष से की गई हिंसा है. हिंसा अगर गलत है तो गलत है, और हिंसा गलत इसीलिए है क्योंकि हिंसा जिस सजेस्टिव पावर की रचना करती है, जिस प्रतीकात्मक शक्ति की रचना करती है, वह प्रतीकात्मक शक्ति बहुत खोखली है. उसमें कोई नैतिक बल नहीं है. ब्रिटेन की पुलिस को चकित होना ही था. विलियम श्रायर ने बहुत मजेदार शब्दों में ब्रिटिश पुलिस के उस अचरज का वर्णन किया है कि क्या करें हम इस आदमी का, हमें चिन्ता थी कि इसे बचाना पडेगा. बचाना तो पड़ा लेकिन हमले से नहीं प्रेम से! हमें चिन्ता ये हो रही थी कि इतने लोग गांधीजी का आलिंगन कर रहे हैं कहीं गांधीजी के प्राण न निकल जाएँ. इसलिए थोडी सख्ती से मजदूरों को अलग करके गांधीजी को निकालना पड़ा.
गांधीजी के बारे में ये बातें करना ऐसा लगता है कि हम अजूबा व्यक्ति के बारे में बातें कर रहे हैं. ये स्वाभाविक है इसलिए कई मित्रों को लगता है कि गांधीजी की अब क्या प्रासंगिकता रह गई है. गांधीजी जिस माहौल में थे, जिस तरह के वातावरण में थे जिस दुनिया में थे वो दनिया पीछे छूट गई. अब क्या होगा? मैं केवल एक बात कहना चाहता हूँ इस प्रसंग में मित्रो-दीपक की प्रासंगिकता दिन की रोशनी में नहीं होती. अँधेरा जितना घना होता है दीपक उतना ही प्रासंगिक होता है. सचमुच का जो अहिंसक समाज होगा उसमें गांधी शब्द के गहरे अर्थों में अप्रासंगिक होंगे. क्योंकि कम्बन रामायण के रामराज्य वर्णन की चाल पर कहें तो उस समाज में सभी अहिंसक होंगे. अलग से किसी को अहिंसक होने की आवश्यकता नहीं होगी. कम्बन के राम राज्य में कोई सच नहीं बोलता क्योंकि कोई झूठ नहीं बोलता. इसलिए झूठ की तुलना में सच-ये फैसला करने की जरूरत नहीं. कोई अपरिग्रह नहीं करता कंबन के रामराज्य में क्योंकि कोई परिग्रह नहीं करता. कोई सदाचारी नहीं है क्योंकि कोई व्यभिचारी नहीं है. गांधीजी का जीवन सफल हो या असफल उस पर फैसला देने का अधिकार कम से कम मुझे नहीं है. बड़े इतिहासकार, बड़े विचारक ये फैसला देंगे. लेकिन गांधीजी का जीवन एक बहुत ही सार्थक प्रयत्न है हर तरह की मॉरल डायकाटॉमी के परे जाने का और इस अर्थ में वह हम सबके लिए कम से कम मेरे लिए एक सतत प्रेरणा के भी स्त्रोत हैं और सतत चुनौती के भी. मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो ये मानें कि मैं गांधी नहीं हो सकता. निश्चय ही मैं उस अर्थ में गांधी नहीं हो सकता लेकिन कम से कम इतना तो जान ही सकता हूँ कि किसी भी मनुष्य की तरह मेरे भीतर सतत उपस्थितियाँ हैं-एक गांधी की एक गोडसे की.
सतत चुनौती है सही चुनाव की. सही जगह खड़े होने की. गांधीजी के शब्दों में सत्य का आग्रह करने की और गांधीजी ने सत्याग्रह को परिभाषित किया था-सत्याग्रह का मतलब ही है कि अपने घोर विपक्षी के सत्य में भी, उसकी सम्भावना में भी आस्था रखना. इस बात में आस्था कि किन्हीं कारणों से कितना भी पतित क्यों न हो गया हो, अन्ततः घोर पतित, घोर पापी, घोर हिंसक मनुष्य भी मनुष्य है और जब तक उसकी मनुष्यता है तब तक सम्भावना है.
गांधीजी के लिए सत्य केवल सत्य ही नहीं था. मित्रो! गांधीजी के लिए सत्य एक नैतिक सम्भावना था और इसीलिए गांधीजी के लिए सत्य और अहिंसा एक दूसरे के बिना असम्भव है. गांधीजी इस बात को भली-भाँति जानते थे, महसूस करते थे कहीं न कहीं कि उनके प्रयोगों का क्या महत्व है. बहुत विनम्र व्यक्ति थे साथ ही जैसा कुछ निकट से जानने वाले लोगों ने लिखा है और बताया है कि गहरे अर्थ में अहंकार की सीमा तक पहुँचा हुआ आत्मविश्वास भी था उनमें…इसलिए वे जानते थे कि उनके प्रयोगों का बल क्या है, महत्व क्या है वो जानते थे कि उनकी पूजा करने के लिए लोग उतावले हो जाएँगे. उन्होंने अपने रहते ऐसा प्रयत्न किया कि ऐसी पूजा की कोई सम्भावना न बने. सन् 1968 में हिन्दी के यशस्वी विचारक और कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने अपने निबन्धों और संस्मरणों का एक संकलन प्रकाशित किया था- ‘अकाल पुरुष गांधी’. खासकर नौजवानों से कहना चाहूँगा कि और कुछ नहीं तो सुन्दर और विचारवान गद्य पढ़ने के लिए उस पुस्तक को पढ़ें. आजकल बहुत सारे पत्रकारों द्वारा किये जाने वाली ये शिकायत शायद दूर हो जाए कि हिन्दी में गम्भीर विचार की सामर्थ्य नहीं है. खैर ! जैनेन्द्र कुमार ने उस एक अद्भुत घटना का जिक्र किया है. गांधीजी के दाँत का ऑपरेशन हुआ. दाँत खराब हो गया था. निकाला गया. जब डॉक्टर ने दाँत निकाला तो जैनेन्द्र ने कहा कि लाइए मैं साफ कर देता हूँ. लिया दाँत और एक लिफाफे में रखा और लिफाफा जेब में रख लिया. रखे रहे और लोगों से थोड़ा-थोड़ा इतराकर बताते भी रहे कि गांधीजी का दाँत मेरे पास है. गांधीजी तक ये खबर पहुँच गई कि मेरा दाँत जैनेन्द्र के पास है. उन्होंने जैनेन्द्र को बुलाया. और जैनेन्द्र के लाख टालने के बावजूद दाँत लेकर ही माने. दाँत लिया, अपने एक साथी को कहा कि जाओ इसे कुएँ में फेंक देना. और जैनेन्द्र लिखते हैं कि न केवल उस दिन बल्कि अगले 15-20 दिनों तक उस साथी से गांधीजी गाहेबिगाहे पूछते रहे तूने रखा तो नहीं जैनेन्द्र की तरह! फेंक दिया था न कुएँ में. क्योंकि गांधीजी जानते थे जैसा कि जैनेन्द्र ने लिखा है, जैनेन्द्र के अपने शब्दों में “गांधी ऐतिहासिक थे दाँत भी ऐतिहासिक होता.” गांधीजी जानते थे कि अगर ये दाँत बच गया तो इस पर निश्चित रूप में स्तूप खड़ा हो जाएगा. आखिरकार साँची के स्तूप में महात्मा बुद्ध का दाँत ही तो है! गांधीजी कहीं-न-कहीं इन बातों के प्रति सचेत लखा है थे, अवगत थे. इसीलिए उस निपट मानव को, जैनेन्द्र के शब्दों में उस ‘निपट मानव’ को अपने भीतर खोजना, उस मजबूती को जिसका एक नाम गांधी है वो मजबूती जो हमें इस बात की लगातार याद दिलाती है. हम उस याद को सुन पाएँ या न सुन पाएँ गांधीवादी मुहावरे में कहें तो परमात्मा की आवाज जो मेरे, आपके, सबके मन में कहीं न कहीं कौंधती है- बिना संयम और करुणा के मैं मनुष्य नहीं हो सकता- वो आवाज जो हम सबके मन में कौंधती है और हमें प्रेरित करती है, विवश करती है कि हम सही वक्त पर सही फैसला करें. हम कर नहीं पाते वो एक अलग मसला है लेकिन वो सम्भावना सदा बनी रहती है-वह सम्भावना जिसका एक नाम मजबूती है और दूसरा नाम महात्मा गांधी.
किताब: मज़बूती का नाम महात्मा गांधी (विचार, इतिहास)
लेखक: पुरुषोत्तम अग्रवाल
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष: 2026
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