पुस्तक अंश | गांधी का सैंतालीस
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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा. वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है. मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है. राजकमल प्रकाशन से छपी पुष्यमित्र की किताब का एक अंश,
30 जनवरी की सुबह उठते ही गांधी जी ने मनुबेन से आग्रह किया कि वे उन्हें ‘थाके न थाके छताय हो…’ वाला भजन सुनाए. इस भजन का अर्थ था : ‘हे इनसान, तुम थककर मत बैठना कभी.’ मनुबेन लिखती हैं :
आज पहली बार गांधी जी ने इस भजन को सुनाने का आग्रह किया था. सुबह से बापू का मन कुछ अलग जैसा दिख रहा है. कहीं वे फिर से अनशन की तैयारी तो नहीं कर रहे?
यह लिखते वक़्त मनुबेन को इस बात का बिलकुल अहसास नहीं था कि आगे क्या होने वाला है, क्योंकि 30 जनवरी के तीसरे पहर 4:00 बजे उन्होंने यह डायरी लिखी थी, बाद का हिस्सा उन्होंने बाद में लिखा—गांधी जी की शहादत के बाद.
भजन सुनने के बाद उन्होंने कांग्रेस वाला मसौदा देखने के लिए प्यारेलाल नैयर को दिया. 30 जनवरी को भी उन्होंने बंगला लिखने का अभ्यास किया, जैसा वे नोआखली के दिनों से करते आ रहे थे.
रात उन्हें खाँसी हो रही थी, खाँसी शान्त करने के लिए वे पिसे हुए लौंग और ताड़ के गुड़ की गोलियों का इस्तेमाल करते थे. वे ख़त्म हो गई थीं. सुबह टहलने जाते वक़्त जब मनुबेन ने कहा : ‘आप जाएँ, मैं गोलियाँ तैयार कर लेती हूँ’, तो अनायस ही उनके मुँह से निकल गया : “कौन जानता है, रात के पहले क्या होगा? अगर मैं ज़िन्दा रह गया तो तुम गोलियाँ तैयार कर लेना.”
लगभग 10 बजे के क़रीब नोआखली के मसले पर उन्होंने प्यारेलाल नैयर से लम्बी बातचीत की. दरअसल बातचीत की शुरुआत एक हिन्दू महासभाई कार्यकर्ता के मसले पर हुई. वह कार्यकर्ता एक जगह अपने भाषण में कुछ कांग्रेसी नेताओं की हत्या के लिए लोगों को उकसा रहा था. इस मसले पर बात करने के लिए गांधी जी ने प्यारेलाल नैयर को हिन्दू महासभा के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पास भेजा था, जो उस वक़्त भारत सरकार में मंत्री थे. गांधी जी का कहना था कि डॉ. मुखर्जी को ऐसे भाषणों पर रोक लगाना चाहिए. मगर प्यारेलाल के मुताबिक़, डॉ. मुखर्जी का जवाब असन्तोषजनक था. वे इसकी गम्भीरता को समझ नहीं पा रहे थे. यह सुनकर गांधी जी के माथे पर बल पड़ गए.
इसके बाद प्यारेलाल ने नोआखली का हाल गांधी जी को सुनाया, जो उन्होंने डॉ. मुखर्जी से सुना था. पाकिस्तान (अभी बांग्लादेश) का हिस्सा बन जाने के बावजूद नोआखली में आबादी की अदला-बदली नहीं के बराबर हुई थी, इसमें गांधी जी के शान्ति-मिशन और उनके साथियों की बड़ी भूमिका थी. अभी भी उनके साथी नोआखली में डटे थे, प्यारेलाल भी उनमें से एक थे मगर नई सरकार उन्हें तरह-तरह से परेशान कर रही थी. ऐसे में प्यारेलाल ने गांधी जी से पूछा : “क्या वहाँ के हिन्दुओं को समय रहते भारतीय इलाक़े में आ जाने की सलाह दी जाए?”
इस पर गांधी जी ने कहा : “जब तक तुम आज़ाद हो, तब तक लोगों को अपनी रक्षा ख़ुद करना सिखाते रहो. अगर अहिंसा का मिशन पूरा करते-करते तुम्हारी मृत्यु आ जाए, तो उसका आलिंगन करना. अगर वे लोग तुम्हें जेल में डाल दें, तो आमरण-अनशन करना. जिनमें यह क्षमता हो, वे नोआखली में डटे रहें और स्त्रियों के साथ होनेवाले किसी भी व्यवहार से विचलित न होकर मौत का सामना करे. कायरों की तरह पीठ तो हरगिज नहीं दिखानी चाहिए.”
इस पर प्यारेलाल ने कहा : “नज़रबन्द छावनी में हम तो सुरक्षित रहेंगे मगर औरतों को भाग्य भरोसे कैसे छोड़ दें?”
गांधी जी ने मज़बूती से इसका उत्तर दिया, “मौत से तो बचा नहीं जा सकता. जैसे कार्यकर्ताओं को करने या मरने के लिए तैयार होना पड़ता है, वैसे ही उन्हें सामान्य लोगों और औरतों को भी तैयार करना होगा. दोनों ख़तरे से नहीं भाग सकते. क्या सशस्त्र युद्ध में कभी-कभी पूरे के पूरे बटालियन का सफाया नहीं हो जाता?”
फिर उन्होंने प्यारेलाल को निर्देश दिया : “मेरे वर्धा जाने के बाद तुम नोआखली चले जाओ और वहाँ की ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर वापस लौट आओ, ताकि मेरे साथ पाकिस्तान चल सको.”
दोपहर 12:00 बजे के बाद मौलाना रहमान उनसे मिलने आए. उनका आग्रह था कि गांधी जी वर्धा से 14 तक लौट ही आएँ. गांधी जी ने कहा : “चौदह को तो मैं यहाँ रहूँगा ही, वैसे यह सब ख़ुदा के हाथ में है. वह तो आसमानी सुल्तानी बात है.”
फिर महादेव देसाई की जीवनी और डायरी के सम्पादन के मसले पर शान्तिकुमार से उनकी बातचीत हुई. श्रीलंका से डॉ. डी-सिल्वा और उनकी बेटी आई, जिन्हें उन्होंने अपना ऑटोग्राफ़ दिया. यह गांधी जी का अन्तिम ऑटोग्राफ़ माना जाता है. उसके बाद एक फ्रांसीसी फ़ोटोग्राफ़र और ‘लाइफ़’ पत्रिका की मार्गरेट बर्क व्हाइट से उनकी मुलाक़ात हुई.
आख़िरी मुलाक़ात सरदार पटेल से हुई जो शाम 4:00 बजे शुरू हुई. सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन के साथ आए थे. इसी बीच कठियावाड़ से रसिक भाई पारीख और ढेवर भाई उनसे मिलने आ गए. उन्हें गांधी जी ने कहला भेजा : “यदि ज़िन्दा रहा तो प्रार्थना के बाद शाम को टहलते वक़्त बातचीत हो जाएगी.”
सरदार पटेल से मुलाक़ात उस कमरे में हुई, जहाँ वे सूत कात रहे थे. मुलाक़ात एक घंटे से भी अधिक समय तक चली. मसला सरदार पटेल और नेहरू के कामकाजी रिश्ते, विवाद और उनके इस्तीफ़े को लेकर था, ज़ाहिर है, काफ़ी महत्त्वपूर्ण मसला था.
बातचीत क्या हुई, इसका ज़िक्र मनुबेन की डायरी में तो नहीं मिलता मगर प्यारेलाल के मुताबिक़ गांधी जी ने कहा : “पहले मैंने यह विचार ज़ाहिर किया था कि आप दोनों यानी जवाहरलाल और आपमें से एक मंित्रमंडल से हट जाए. लेकिन अब मैं निश्चित रूप से इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि दोनों का वहाँ रहना अपरिहार्य है. आप दोनों की ज़रा सी फूट इस स्थिति में विनाशकारी साबित होगी. मैं इस विषय में आज की प्रार्थना-सभा में बोलूँगा. पंडित नेहरू से भी प्रार्थना के बाद कहूँगा, जब वे मुझसे मिलेंगे. ज़रूरत हुई तो सेवाग्राम जाना स्थगित कर दूँगा. तब तक दिल्ली नहीं छोड़ूँगा जब तक आप दोनों के बीच की दरार अन्तिम रूप से मिट नहीं जाएगी.
प्यारेलाल आगे लिखते हैं :
सरदार पटेल के लिए यह गांधी जी का अन्तिम आदेश बन गया. पंडित नेहरू से उनका वैचारिक मतभेद आगे भी जारी रहा मगर दोनों को मिलकर रहने की गांधी की वफ़ादारी वाला बन्धन अटूट हो गया. देश के कल्याण के लिए दोनों की सम्पूर्ण निस्स्वार्थ निष्ठा ने व्यावहारिक तौर पर दोनों की कार्यपद्धति को एक जैसा बना दिया.
अपनी मृत्यु से तीन महीने पहले गांधी जयंती के आयोजन के मौक़े पर 1950 में इंदौर में एक भाषण में सरदार पटेल ने कहा था :
हमारे नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं. बापू ने अपने जीवनकाल में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था. इसलिए बापू के तमाम सिपाहियों का धर्म है कि वे बापू के आदेश का पालन करें. जो उस आदेश का हृदय से पालन नहीं करेगा, पापी सिद्ध होगा. मैं बेवफ़ा सिपाही नहीं हूँ. मैं इतना जानता हूँ कि बापू ने मुझे जहाँ रखा था, वहीं आज भी हूँ.
उस रोज़ सरदार से बातचीत में गांधी जी को समय का ख़याल नहीं रहा. आभा गांधी ने शाम का खाना 4:30 बजे उन्हें दिया, बात करते-करते ही उन्होंने खाना खाया. बातचीत चलती रही और शाम की प्रार्थना में 10 मिनट की देरी हो गई. न आभा, न मनुबेन—किसी की हिम्मत उन्हें टोकने की नहीं हुई. आभा ने ज़रूर घड़ी उनके सामने रखी ताकि उन्हें समय का ध्यान हो मगर उस पर भी उनका ध्यान नहीं गया. आख़िरकार मणिबेन ने उन्हें टोका. प्रार्थना-स्थल की तरफ़ जाते वक़्त उल्टे इस बात का उलाहना गांधी जी ने मनु और आभा, दोनों को दिया.
इस तरह शाम 5 बजकर 10 मिनट तक गांधी जी ने 30 जनवरी के अपने दैनंदिन के सारे काम निपटा लिये. जाने से पहले नेहरू और पटेल का झगड़ा भी निपटाने की भरपूर कोशिश की और फिर वह निकल पड़े साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अपनी अन्तिम आहुति देने. नफ़रत की तीन गोलियाँ, जिनमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिन्दुओं का तमाम ग़ुस्सा समा गया था, उन्हें अपने खुले सीने में किसी मैडल की तरफ़ हमेशा के लिए टाँक लेने. गांधी जी की इस शहादत की तुलना लोगों ने ईसा मसीह के क्रूसीफिकेशन से की मगर पता नहीं क्यों अमृत मंथन के बाद निकले ज़हर को, जिसे देव असुरों के खाते में डालना चाह रहे थे, उसे अपने गले में जगह देने वाले शिव से उनकी तुलना नहीं हुई? क्या सिर्फ़ इसलिए कि ज़हर पीकर शिव जीिवत रह गए और गांधी की जान चली गई?
क्या शिव ने ज़हर सिर्फ़ असुरों के हित के लिए पिया था? क्या उनके ज़हर पी लेने से देवों का अपराध कुछ कम नहीं हो गया? क्या गांधी बँटवारे के बाद सिर्फ़ मुसलमानों के लिए लड़ते रहे, या फिर उनकी लड़ाई उन हिन्दुओं के लिए भी थी, जिनकी आत्मा इस बँटवारे के बाद बदले की आग में भ्रष्ट हो गई थी और वे हत्या, बलात्कार, औरतों को अगवा करने, बच्चों की जान लेने, मस्जिदों पर क़ब्ज़ा कर उसे भ्रष्ट करने और अपने कोमल हृदय में नफ़रत को जगह देने की वजह से इनसान होने की सामान्य प्रतिष्ठा से भी वंचित होते चले जा रहे थे? क्या वे उस मानवोचित सम्मान के लिए नहीं लड़ रहे थे, जिससे उनके देश की बड़ी आबादी ऐन आज़ादी के वक़्त च्युत होती नज़र आ रही थी? क्या वे उस भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, जिसने अपनी आज़ादी ख़ून की एक बूँद गिराए बग़ैर हासिल कर ली मगर आज़ादी जब मिली तो उसकी एक-एक इंच ज़मीन के लिए इतना ख़ून बहा लिया कि पिछले तीन दशकों की प्रतिष्ठा उसमें डूबकर कलंकित होने लगी?
उन्होंने इन तमाम चीज़ों की लड़ाई लड़ी. अपने तरीक़े से लड़ी और इस लड़ाई में कोई बनावटीपन नहीं था. उन्होंने अपनी जान को दाँव पर लगाया और इसे सच साबित करके दिखाया.
इन ब्योरों का कोई मतलब नहीं कि उन पर गोली चलाने वाला नथूराम गोडसे कौन था, कहाँ से आया था, उसे किसने भेजा था, उसकी साज़िश का हिस्सा कौन-कौन थे? मगर मोटा-मोटी यह बात सच थी कि वह बँटवारे की वजह से हिन्दुओं और सिखों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ फैली नफ़रत का सबसे बड़ा प्रतीक था. वह जब पिस्तौल और गोलियों को लेकर 30 जनवरी की प्रार्थना-सभा में पहुँचा तो वह सिर्फ़ नथूराम नहीं था, उसमें वे शरणार्थी बुज़ुर्ग भी शामिल थे, जो गांधी जी को हिमालय पर चले जाने के लिए कह रहे थे. वे लोग भी थे जो बिड़ला हाउस के आगे नारे लगाने पहुँच गए थे कि ‘गांधी मरता है, तो मर जाने दो’. वे लोग भी थे जो उनकी प्रार्थना-सभा में क़ुरान की आयतों का विरोध करने खड़े हो जाते थे. वह मदनलाल पाहवा तो था ही जो मस्जिद से निकाले जाने के कारण नाराज़ था और बम लेकर 20 जनवरी को प्रार्थना-सभा में पहुँच गया था.
उस रोज़ नथूराम गोडसे के वजूद में सिर्फ़ यही गिने-चुने लोग शामिल नहीं थे, ऐसे हज़ारों, लाखों हिन्दू रहे होंगे, जिन्होंने यह मान लिया होगा कि जब पाकिस्तान बन ही गया है तो मुसलमानों को वहीं भेज दिया जाना चाहिए. ऐसे लोग भी होंगे जिन्हें पाकिस्तान को 55 लाख रुपये दिया जाना बुरा लगा होगा. मुसलमानपरस्ती लगी होगी. वे लोग भी होंगे जिन्हें मस्जिदों को शरणार्थियों से ख़ाली कराना खल गया होगा. गांधी जी का 27 जनवरी को बख़्तियार काकी की दरगाह पर जाना बुरा लगा होगा. ऐसे तमाम लोग होंगे जिन्होंने मान लिया होगा और आज भी मानते हैं कि जब पाकिस्तान मुसलमानों का देश बन गया है तो हिन्दुस्तान को भी हिन्दू राष्ट्र बन जाना चाहिए.
यही सब बातें तो नथूराम गोडसे ने अपने अदालती बयान में बहुत मज़बूत तर्क के साथ रखी और बाद में उनके भाई गोपाल गोडसे ने अपनी किताब ‘गांधी-वध क्यों’ में लिखा, जिससे आज भी बड़ी संख्या में लोग प्रभावित होते हैं. ऐसे तमाम लोग जो बँटवारे के वक़्त इन विचारों के कट्टर समर्थक थे, उनकी सामूहिक नफ़रत को ख़ुद में समेटे शाम 5 बजकर 17 मिनट पर नथूराम गोडसे ने तीन गोलियाँ गांधी जी के खुले सीने में उतार दी थीं.
वह गांधी, जो 78 साल का बूढ़ा था. पिछले उपवास की वजह से इतना कमज़ोर हो चुका था कि ठीक से चल नहीं पाता था. पिछले दिनों उसे अपने दम पर चलता देख उसकी पोती मनुबेन की आँखें भर आई थीं. फिर भी वह दो लोगों का सहारा लेकर ही प्रार्थना-सभा में आता था. उसे जब गोली मारी गई तो उसके हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हुए थे और गोलियाँ लगने के बाद भी वह छाती खोले चल ही रहा था. क्या उसने अपने देशवासियों की तमाम नफ़रत भरी सोच को अपने सीने में जगह नहीं दे दी? क्या उसके इस पूरे अभियान का अन्त उसी तरह नहीं हुआ, जैसा उसने चाहा था?
किताब : गांधी का सैंतालीस (इतिहास)
लेखक : पुष्यमित्र
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष : 2026
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