मुम्बई किताब उत्सव का दूसरा दिन

  • 11:04 pm
  • 7 February 2026

मुम्बई | पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में राजकमल प्रकाशन की ओर से आयोजित पाँच दिन के किताब उत्सव के दूसरे दिन गिरीश कारनाड की आत्मकथा के हिन्दी संस्करण ‘खेल-खेल में बीता जीवन’, दुष्यंत के नए उपन्यास ‘दालचीनी’ और असग़र वजाहत के नए उपन्यास ‘बानुसनामा’ का लोकार्पण हुआ. प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई किताब ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’, सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूँ गुज़री है अब तलक’ और पद्मजा की डायरी ‘मैं कोई और’ पर चर्चा हुई. साथ ही नरेन्द्र दाभोलकर के लेखन और जीवन और लेखन की विधाओं के सन्दर्भ में संवाद सत्र हुए.

दुष्यंत के उपन्यास ‘दालचीनी’ के लोकार्पण के बाद रहमान अब्बास ने उपन्यास की विषयवस्तु पर अपनी बातें रखीं और इला जोशी ने उपन्यास के संदर्भ में लेखक से संवाद किया. पहले सत्र का शीर्षक ‘महानगर में प्रेम और नई स्त्री’ था, जिसमें इला जोशी और दुष्यंत के बीच आत्मीय बातचीत हुई. इला जोशी के सवाल ‘नई स्त्री कौन है?’ के जवाब में दुष्यंत ने कहा कि नई स्त्री वह है जो अपने फ़ैसले ख़ुद लेती है. चर्चा में प्रेम के अर्थ और उसके महत्व पर भी विस्तार से बात हुई. दुष्यंत ने प्रेम को ‘नित नूतन और प्राचीन’ बताया. रहमान अब्बास ने इंसान की सबसे बड़ी लालसा मोहब्बत को माना—उनके अनुसार मोहब्बत एक ऐसी चीज़ है जिसे पूरी तरह समझ पाना मुमकिन नहीं है.

दूसरे सत्र में ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ पर केंद्रित संवाद हुआ, जिसमें सुशांत सिंह ने लेखक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल से इस रोचक शीर्षक के पीछे की सोच पर सवाल किया. प्रो. अग्रवाल ने गांधी जी के हिंसा और अहिंसा से जुड़े विचारों को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके लिए अहिंसा केवल विरोध नहीं, बल्कि करुणा और संयम का मार्ग रहा. उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी को मजबूरी का नहीं, बल्कि दृढ़ता का प्रतीक माना जाना चाहिए, और इसी भाव से इस किताब का शीर्षक रखा गया है. आगे ईश्वरवाद और निरीश्वरवाद पर भी गहन चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने गांधी के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग साझा किए. बाद में श्रोताओं ने भी सवाल किए, जिनमें वर्तमान समय में गांधीवादी विचारों की प्रासंगिकता पर विशेष बातचीत हुई.

गिरीश कारनाड की आत्मकथा ‘खेल-खेल में बीता जीवन’ पर रामगोपाल बजाज और उषारानी राव के बीच संवाद हुआ. दोनों वक्ताओं ने गिरीश कारनाड के जीवन से जुड़े कई रोचक प्रसंग साझा किए. रामगोपाल बजाज ने इस शीर्षक को किसी संगीत की लय के समान बताते हुए कहा कि इसमें गिरीश कारनाड के रचनात्मक जीवन की सहजता और प्रवाह झलकता है. उन्होंने गिरीश कारनाड की संस्कृत, इतिहास और भूगोल जैसे विषयों पर गहरी समझ की सराहना की और पाठकों से आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व को संपूर्णता में समझने के लिए उनकी अन्य कृतियों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए. रामगोपाल बजाज ने आत्मकथा के एक अंश का पाठ भी किया.

सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूँ गुज़री है अब तलक’ पर केंद्रित अजय ब्रह्मात्मज के संवाद में रघुबीर यादव और रूमी ज़ाफ़री भी शऱीक हुए. अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि यह बिना किसी दुराव-छिपाव के लिखी गई एक ईमानदार आत्मकथा है. सीमा कपूर ने अपने जीवन के कई अनछुए प्रसंग श्रोताओं के साथ साझा किए.

उन्होंने कहा कि जीवन के अनुभवों को लिखना अपेक्षाकृत आसान होता है क्योंकि वह एकांत में होता है, लेकिन उन्हीं भावनाओं को सार्वजनिक रूप से कहना कहीं अधिक कठिन होता है. उन्होंने स्वीकार किया कि जो कुछ उन्होंने लिखा है, उसे उसी तरह कह पाना शायद संभव न होता. रूमी ज़ाफ़री और रघुबीर यादव ने अपनी संवेदनशील बातचीत से इस सत्र को एक निजी और अंतरंग अर्थ दिया.

गौरव सोलंकी और हिमांशु वाजपेयी के बीच ‘शहर-यारियाँ : कुछ क़िस्से, कुछ यादें’ विषय पर संवाद हुआ. हिमांशु वाजपेयी ने कहा कि शहर से प्यार करना अपने भीतर की संवेदनाओं को बचाए रखने जैसा है. गौरव सोलंकी ने कहा, किसी शहर से आधा रिश्ता हमारे मन में होता है और आधा शहर में. दोनों वक्ताओं ने शहर और दोस्ती से जुड़े कई अनुभव साझा किए, जिनमें स्मृतियों के कई रंग उभरकर सामने आए. गौरव सोलंकी ने समकालीन लेखन की चुनौतियों पर भी बात करते हुए कहा कि आज नए लेखकों के लिए सबसे कठिन काम अपनी मौलिकता को बचाए रखना है.

नरेंद्र दाभोलकर के लेखन और जीवन के संदर्भ में ‘अंधविश्वास से मुक्ति : विचार और व्यवहार’ विषय पर सुनील कुमार लवटे और मुक्ता दाभोलकर से अविनाश दास ने संवाद किया. चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पाखंड दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है और यह प्रगतिशील तथा विवेकशील समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है. उन्होंने कहा कि अंधविश्वास व्यवहार में भले ही पूर्णविराम हो, लेकिन वैचारिक रूप से वह एक प्रश्नचिह्न की तरह समाज को जकड़े रहता है.

मुक्ता दाभोलकर ने कहा कि नरेंद्र दाभोलकर उनके लिए और आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए सामाजिक पिता थे. उन्होंने कहा, विरोध इस काम का हिस्सा है और विरोध के साथ ही यह आंदोलन आगे बढ़ेगा. अपने निजी अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि विचारों के लिए किसी की हत्या हो सकती है, यह उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था.

पद्मजा की डायरी ‘मैं कोई और’ पर रोहित उपाध्याय ने उनसे बातचीत की. पद्मजा के बचपन की स्मृतियों से कई किस्सों को दर्शकों के सामने रखा. इसके साथ ही स्मृति खोने और बीस सालों से अधिक की उम्र में फिर से नई शुरुआत करने और हर चीज़ को फिर से सीखने के अनुभवों को साझा किया.

अगले सत्र में ‘परस्पर : विधाओं के आर-पार’ विषय पर मकरंद साठे और असग़र वजाहत के साथ अविनाश मिश्र ने संवाद किया. इस अवसर पर असग़र वजाहत के नए उपन्यास ‘बानुसनामा’ का लोकार्पण हुआ. सत्र में साहित्य और रंगमंच की आपसी यात्रा, भाषा, शिल्प और रचनात्मक प्रक्रिया पर गहन चर्चा हुई.

मकरंद साठे ने थिएटर, नाटक और भाषा के रिश्ते पर बात करते हुए कहा कि जब भी वे कोई नाटक लिखते हैं, तो उसके पात्रों से बाहर आने में उन्हें काफी समय लगता है. वहीं असग़र वजाहत ने कहा कि विषय अपना फॉर्म खुद लेकर आता है और जब भाषा को पात्रों के साथ बरता जाता है तो उसमें कई शेड्स पैदा होते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भाषा जब ‘बिगड़ती’ है, तभी वह नई बनती है और जो लोग भाषा को तोड़ते-मरोड़ते हैं, वे दरअसल एक बड़ा रचनात्मक काम कर रहे होते हैं.

चर्चा में यह भी सामने आया कि लिखे हुए शब्द और देखे हुए दृश्य में मूलभूत अंतर होता है, तथा हमारे समाज में वास्तविक संवाद की कमी है. अविनाश मिश्र ने वक्ताओं से लेखन को प्रेरित करने वाले कारकों, भाषा से जुड़ी चुनौतियों और पाठकों की प्रतिक्रियाओं पर भी सवाल किए, जिन पर दोनों लेखकों ने अपने अनुभव साझा किए.

इसके बाद ‘कथा-पटकथा : कितने दूर कितने पास’ विषय पर समकालीन कथाकारों के बीच संवाद हुआ. इस सत्र में अनिमेष मुखर्जी, मनोज कुमार पांडेय, रामकुमार सिंह, राहुल श्रीवास्तव, विमलचंद्र पांडेय, सत्य व्यास और शिवेन्द्र बतौर वक्ता उपस्थित रहे. चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि कहानी और पटकथा की दुनिया मूल रूप से अलग है. कहानी पढ़े जाने के लिए लिखी जाती है, जबकि फिल्म देखने के लिए. इसी अंतर से दोनों की रचनात्मक जरूरतों और कहानी कहने की संरचना में फर्क पैदा होता है. उन्होंने कहा कि जब इन दोनों के बीच संतुलन बनता है, तभी एक सशक्त और प्रभावशाली रचना सामने आती है. साथ ही यह भी कहा गया कि जब कोई कहानी पटकथा में बदलती है तो उसमें कई रचनात्मक बदलाव स्वाभाविक रूप से होते हैं, और यहीं से कथा व पटकथा के बीच टकराव की स्थितियां भी जन्म लेती हैं.

अंतिम सत्र ‘पाठसुख’ में दिनेश शाकुल हरिशंकर परसाई के व्यंग्य और विजय देव नारायण साही की कविताओं का पाठ किया. वहीं हिमानी शिवपुरी ने नेहा नरुका के कविता संग्रह ‘फटी हथेलियाँ’ से एक लंबी कविता ‘तीन लड़कियाँ’ का पाठ किया. साथ ही उन्होंने पलायन पर आधारित अपनी कविता ‘पहाड़’ और छोटे शहरों के जन-जीवन पर केंद्रित कविता ‘छोटा शहर’ पढ़ी.

किताब उत्सव में 8 फ़रवरी रविवार को कार्यक्रम की शुरुआत चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ की पटकथा के लोकार्पण और इस पर बातचीत के साथ होगी. इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर केंद्रित विश्वास पाटील की उपन्यास शृंखला ‘महासम्राट शिवाजी’ के दूसरे खंड का लोकार्पण होगा. अगले सत्र में ‘दलित लेखन : नये दौर के नये सवाल’ विषय पर लक्ष्मण गायकवाड़, शरण कुमार लिम्बाले, सुलभा कोरे और पराग पावन से अविनाश दास की बातचीत होगी. अगला सत्र राजकमल प्रकाशन द्वारा मनाए जा रहे ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री-वर्ष’ पर केंद्रित होगा. इसके बाद ‘जो मैं पढ़ता हूँ’ विषय पर इला अरुण, कृष्ण कुमार रैना और धीरेंद्र अस्थाना से ममता सिंह की बातचीत होगी. अगले सत्र में ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ पर दास्तानगोई बैठक होगी जिसमें राणा प्रताप सेंगर और आशीष रावत अपनी प्रस्तुति देंगे. दिन का समापन धूमिल की बहुचर्चित कविता ‘पटकथा’ की एकल प्रस्तुति के साथ होगा जिसके निर्देशक आर.एस. विकल हैं और प्रस्तुति राजेन्द्र गुप्ता देंगे.

(विज्ञप्ति)


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