आईएचसी समन्वय: प्रकृति, संस्कृति और साझा ज़िम्मेदारी पर विमर्श
नई दिल्ली | इंडिया हैबिटैट सेंटर में आईएचसी समन्वय-2026 के साथ ही तीन दिन के महोत्सव की शुरुआत हुई. यह उत्सव आठ फ़रवरी तक चलेगा. उद्घाटन कार्यक्रम ने इस वर्ष के संस्करण की वैचारिक दिशा तय की, जिसका केंद्र भारत के प्राकृतिक परिदृश्यों और उसकी सांस्कृतिक व साहित्यिक परंपराओं के बीच के गहरे और सतत संबंधों पर है. पर्वत, वन, नदियाँ, मरुस्थल और समुद्र यहाँ केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि स्मृतियों, आस्थाओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के जीवंत भंडार हैं. सदियों से साहित्य, लोककथाएँ, संगीत और मौखिक परंपराएँ उस पारिस्थितिक चेतना को आगे बढ़ाती आई हैं, जो प्रत्यक्ष जीवन अनुभवों से उपजी हैं.
ख्यात पर्यावरण विचारक और लेखका सुनीता नारायण ने ‘वाकिंग लाइटली ऑन द प्लेनेट : लर्निंग फ्रॉम इकोलॉजिकल ट्रेडिशन टू बिल्ड अ सस्टेनएबल फ्यूचर’ विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया. भारत की पारंपरिक पारिस्थितिक परंपराओं का संदर्भ लेते हुए उन्होंने संयम, प्रकृति के प्रति सम्मान और विकास के साथ जुड़ी नैतिक ज़िम्मेदारियों पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें विरासत में मिले अपने ज्ञान तंत्रों से दोबारा जुड़ने की तत्काल आवश्यकता है.

सुश्री नारायण ने कहा, ‘भारत की जल संरक्षण परंपराओं को समझने के लिए सबसे पहले उस भाषा को समझना ज़रूरी है, जिसके माध्यम से यह ज्ञान गढ़ा गया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा. भारत की पारिस्थितिक समझ शब्दों, व्यवहारों और सामूहिक स्मृति में निहित है, और बढ़ते जल संकट के इस दौर में इन परंपराओं की पुनःसमीक्षा अत्यंत आवश्यक हो गई है.’
इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश ने उद्घाटन के मौक़े पर अपने संबोधन में कहा, ‘समन्वय केवल साहित्य उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस गहरे संबंध की याद दिलाता है जो भूमि और भाषा के बीच विद्यमान है. हमारी संस्कृति उसी मिट्टी से उपजती है जिसमें हम जीवन जीते हैं, और हमारा सामूहिक भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम इस साझा विरासत को कितनी समझदारी, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व के साथ अगली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं.’
इंडिया हैबिटैट सेंटर की ओर से क्रिएटिव हेड–प्रोग्राम्स विद्युं सिंह ने कहा, ‘2011 में शुरू हुआ ‘आईएचसी समन्वय : भारतीय भाषाओं का जलसा’ एक विशिष्ट राष्ट्रीय मंच है, जो विभिन्न भाषायी परंपराओं से जुड़े लेखकों, विद्वानों, अनुवादकों, संगीतकारों और प्रस्तुति कलाकारों को एक साथ लाता है. भाषा की समझ को केवल लिखित और मौखिक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखते हुए, यह महोत्सव दृश्य, संगीतात्मक और परफॉर्मेटिव रूपों को भी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के रूप में सामने लाता रहा है.’

उद्घाटन कार्यक्रम में पूर्व रंग भी प्रस्तुत किया गया, जो अजीत सिंह पलावत और इप्शिता चक्रवर्ती की एक सशक्त प्रस्तुति थी. इसके पश्चात पुलिकली का मंचन हुआ—केरल की पारंपरिक लोक प्रस्तुति—जो प्रकृति से गहराई से जुड़े सामुदायिक जीवन से अपनी ऊर्जा और जीवंतता ग्रहण करती है.
तीन दिनों तक चलने वाले आईएचसी समन्वय 2026 के दौरान साहित्य, पारिस्थितिकी, सार्वजनिक नीति और परफॉर्मिंग आर्ट्स के क्षेत्र की अग्रणी आवाज़ों को विभिन्न सत्र होंगे. प्रतिभागियों में भारत के प्रमुख वन्यजीव संरक्षणकर्ताओं में से एक विवेक मेनन, लेखिक और साहित्यिक क्यूरेटर नमिता गोखले, लेखक एवं पूर्व राजनयिक नवतेज सरना, इतिहासकार और लेखक विलियम डैलरिम्पल, स्वदेशी ज्ञान परंपराओं से प्रेरित रचनाओं के लिए जानी जाने वाली कवयित्री और उपन्यासकार मामंग दाई, हिमालय पर अपने लेखन के लिए प्रसिद्ध स्टीफन ऑल्टर, तथा मलयालम लेखक और सहायक वन संरक्षक जोशिल शामिल हैं.
इनके साथ ही कई विद्वान और विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, जिनमें भारतीय खाद्य संस्कृति के अध्येता प्रो. पुष्पेश पंत, जल शासन और जलवायु नीति की विशेषज्ञ मेधा बिष्ट, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक एवं शोधकर्ता हेमलता एन. पोट्टी, वन-आधारित समाजों पर कार्य करने वाली समाजशास्त्री रेखा एम. शांगप्लियांग, तथा पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान के विशेषज्ञ योगेश वी. गोखले प्रमुख हैं.
महोत्सव को और समृद्ध बनाने के लिए संगीत और नृत्य की विशेष प्रस्तुतियाँ भी शामिल हैं. इनमें संगीत और कविता के सेतु के रूप में पहचाने जाने वाले गायक-विद्वान मदन गोपाल सिंह, मोहिनीअट्टम की अग्रणी कलाकार जया प्रभा मेनन, डॉ. भूपेन हज़ारिका की विरासत को आगे बढ़ाने वाले गायक-गीतकार मयुख हज़ारिका, मंगणियार लोकसंगीत के संवाहक बारमेर बॉयज़, तथा केरल की दो सौ वर्ष पुरानी अनुष्ठान परंपरा के संरक्षक पुलिकली कलाकार समूह की प्रस्तुतियाँ महोत्सव को और अधिक जीवंत बनाती हैं.
यह संस्करण पुरस्कार-विजेता पर्यावरण फ़िल्मकार माइक पांडे की असाधारण रचनात्मक यात्रा के 50 वर्षों का उत्सव है. भारत में संरक्षण फ़िल्म निर्माण के अग्रदूत के रूप में, उनकी सशक्त दृश्य कथाओं ने पर्यावरणीय चेतना को गहराई दी है और वैश्विक स्तर पर वन्यजीव संरक्षण आंदोलनों को प्रेरित किया है.इस संस्करण का समापन माइक पांडे के साथ एक विशेष संवाद से होगा, जिसके पश्चात उनकी अग्रणी और प्रेरणादायी यात्रा को समर्पित एक विशिष्ट ऑडियो-विज़ुअल प्रस्तुति प्रस्तुत की जाएगी. आगामी दिनों में संवादों और प्रस्तुतियों की श्रृंखला के माध्यम से, आईएचसी समन्वय 2026 संस्कृति, पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति हमारी साझा ज़िम्मेदारी पर प्रकाश डालेगा.
(विज्ञप्ति)
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