दलित साहित्य में अब आक्रामकता नहीं, सार्थक संवाद की ज़रूरत : लिम्बाले
मुम्बई | राजकमल प्रकाशन की ओर से महाराष्ट्र कला अकादमी में आयोजित किताब उत्सव का तीसरा दिन नई किताबों के लोकार्पण, गंभीर चर्चाओं और रोचक प्रस्तुतियों से भरा रहा. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ की पटकथा और छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर केंद्रित विश्वास पाटील की उपन्यास शृंखला ‘महासम्राट शिवाजी’ के दूसरे खंड का लोकार्पण हुआ. ‘दलित लेखन : नए दौर के नए सवाल’ विषय पर चर्चा और ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री-वर्ष’ पर केंद्रित सत्र आयोजित हुए. ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में राणा प्रताप सेंगर और आशीष रावत ने रोचक प्रस्तुति दी. दिन का समापन आर. एस. विकल के निर्देशन में धूमिल की बहुचर्चित कविता ‘पटकथा’ की राजेन्द्र गुप्ता द्वारा एकल प्रस्तुति के साथ हुआ.
‘दलित लेखन : नए दौर के नए सवाल’ विषय पर अनिमेष मुखर्जी ने लक्ष्मण गायकवाड़, शरण कुमार लिम्बाले, सुलभा कोरे और पराग पावन से बातचीत की. चर्चा की शुरुआत करते हुए अनिमेष मुखर्जी ने दलित साहित्य की पृष्ठभूमि और इसके बदलते स्वरूप पर प्रश्न किए. लक्ष्मण गायकवाड़ ने कहा कि आज का साहित्य केवल नाम का ‘दलित साहित्य’ है, जबकि वास्तव में यह एक ‘क्रांतिकारी साहित्य’ है. पराग पावन ने कहा कि वर्तमान दलित साहित्य अब केवल कुछ विषयों तक सीमित न रहकर जीवन की समस्त समस्याओं पर मुखरता से बात करता है. वहीं शरण कुमार लिम्बाले ने कहा कि दलित साहित्य में अब आक्रामकता के बजाय सार्थक संवाद की अधिक आवश्यकता है. सुलभा कोरे ने कहा कि समय के साथ परिवर्तन अनिवार्य है, अन्यथा समय हमें पीछे छोड़ देता है. उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि आज का दलित साहित्य सकारात्मक दिशा में बदल रहा है.
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अनिमेष मुखर्जी ने भविष्य के संभावित विषयों पर प्रश्न किया, जिस पर सुलभा कोरे ने विशेष रूप से दलित स्त्रियों की पीड़ा और उनके शोषण के मुद्दों पर बात की. उन्होंने स्पष्ट किया कि दलितों की यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था से है. शरण कुमार लिम्बाले ने टिप्पणी की कि दलित साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि समाज को आश्वस्त करना है.

‘मोहल्ला अस्सी’ की पटकथा के लोकार्पण के बाद किताब के संपादक अजय ब्रह्मात्मज और चंद्रप्रकाश द्विवेदी के बीच कथा और पटकथा लेखन की प्रक्रिया, उसकी चुनौतियों और बदलते रुझानों पर विस्तार से चर्चा हुई. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि पटकथा लेखन ऐसी विधा है, जिसे व्यक्ति निरंतर सीखता रहता है. उन्होंने वर्तमान समय की कला-संस्कृति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि आज कला से अधिक ‘कलाबाज़ी’ दिखाई देती है. अपनी फ़िल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ के संदर्भ में उन्होंने निर्माण के दौरान आई बाधाओं और उससे जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि लोगों तक फ़िल्म की कहानी बाद में पहुँची, जबकि विवाद पहले पहुँच गए. दर्शकों के साथ प्रश्न-उत्तर के दौरान समाज में प्रचलित गालियों की संस्कृति, राष्ट्रवाद और समकालीन सामाजिक विमर्श जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा हुई.

‘महासम्राट शिवाजी’ के दूसरे खंड के विमोचन के बाद लेखक विश्वास पाटील, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, अतुल तिवारी, अनुवादक रवि बुले और ओम प्रकाश तिवारी के बीच किताब पर चर्चा हुई. रवि बुले ने विश्वास पाटील की लेखन शैली, शोध-प्रक्रिया और पुस्तक की सहज भाषा की सराहना की. विश्वास पाटील ने छत्रपति शिवाजी महाराज के विराट व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्हें एक राजा के साथ-साथ एक सैन्य कमांडर के रूप में भी देखा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि लेखक को अपने नायक के सभी पक्षों को ईमानदारी से प्रस्तुत करना चाहिए. अतुल तिवारी ने विश्वास पाटील की शोध क्षमता को अद्वितीय बताया.
अगला सत्र राजकमल प्रकाशन की ओर से मनाए जा रहे ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री-वर्ष’ पर केंद्रित रहा. स्त्री-वर्ष के नौ प्रमुख हिन्दी कथाकारों के एक साथ छपे उपन्यासों ने साहित्य जगत का व्यापक ध्यान आकर्षित किया है. इस सत्र में सविता भार्गव ने वक्तव्य दिया, सुशील गजवानी, विभा रानी और इला जोशी ने उपन्यासों से भावपूर्ण अंशपाठ किया.
असगर वजाहत ने महमूद फ़ारूक़ी द्वारा तैयार किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का लोकार्पण किया. राणा प्रताप सेंगर और आशीष रावत ने दास्तान के संक्षिप्त रूप की प्रभावशाली प्रस्तुति दी.

दिन का समापन आर. एस. विकल द्वारा निर्देशित धूमिल की कविता ‘पटकथा’ की एकल प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसमें राजेन्द्र गुप्ता ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.
किताब उत्सव में 9 फ़रवरी को पंडित अमरनाथ के काव्य-संग्रह ‘हंसा के बैन’ का लोकार्पण होगा. रेखा भारद्वाज और गजरा कोट्टरी से संजीव चिम्मलगी बातचीत करेंगे. इसके बाद गुलज़ार के गीत-संग्रह ‘गुनगुनाइए’ के संदर्भ में यूनुस ख़ान उनसे बातचीत करेंगे. निदा फ़ाज़ली के कविता-संग्रह ‘मोरनाच’ के पुनर्नव संस्करण का लोकार्पण अगले सत्र में होगा, जिसमें मालती जोशी से हरि मृदुल बातचीत करेंगे और अभिषेक शुक्ला कविताओं का पाठ करेंगे. इसके बाद ‘युगसारथी धर्मवीर भारती’ का लोकार्पण होगा, जिसमें सूर्यबाला, चित्रा देसाई और गंगाशरण सिंह भाग लेंगे. कविता पाठ का सत्र होगा, जिसमें पुनीत शर्मा, पराग पावन, अभिषेक शुक्ला और प्रदीप अवस्थी शामिल होंगे. ‘हिंदुत्व का गणराज्य’ किताब के संदर्भ में लेखक बद्रीनारायण से डॉ. बालाजी चिरडे बातचीत करेंगे. ‘काव्य-संध्या’ में आभा बोधिसत्व, कमलेश पाठक, चित्रा देसाई, मालवी मल्होत्रा, मोनिका सिंह, शैलजा पाठक और संवेदना रावत काव्यपाठ करेंगे. समापन शैलेश श्रीवास्तव और डॉ. अलका अग्रवाल सिगतिया की संगीत प्रस्तुति के साथ होगा.
(विज्ञप्ति)
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