नीला भागवत को सहमत की ओर से श्रद्धांजलि
सहमत की पुरानी साथी विदुषी नीला भागवत का लंबी बीमारी के बाद कल 14 अप्रैल 2026 को इंतकाल हो गया. वह ग्वालियर घराने की एक मशहूर कलाकार थीं. उन्हें न सिर्फ़ अपनी परंपरा से गहरा लगाव था, बल्कि वह उसमें नए प्रयोग करने की महारत भी रखती थीं. नीला जी अपने आस-पास की दुनिया और समाज से बहुत क़रीब से जुड़ी हुई थीं. उनकी इस सोच की झलक उनकी गायकी में भी दिखती थी, ख़ासकर जब उन्होंने ठुमरी की बंदिशों को महिलाओं की आवाज़ और उनके जज़्बात के रूप में पेश किया. नारीवादी दृष्टिकोण से ठुमरी की रचना और प्रस्तुति के लिए पहचानी जाने वाली, उनके योगदान में कबीर और मीरा के भजनों की रचनाएँ भी शामिल हैं.
1942 में जन्मी नीला जी ने ईशान शर्मा के साथ बातचीत में, कुछ मज़ाकिया और कुछ संजीदा अंदाज़ में याद करते हुए बताया कि उनके जन्म से भी पहले, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उनके माता-पिता ‘अगस्त क्रांति मैदान’ की ओर निकल पड़े थे; लेकिन उन्हें वापस लौटने के लिए मना लिया गया, क्योंकि उनकी माँ गर्भवती थीं. उन्होंने कहा, “कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं तो पहले से ही इस क्रांतिकारी आंदोलन में दिलचस्पी रखती थी.” यह बात उन्होंने पूरी तरह मज़ाक में नहीं कही थी.
जवानी में मार्क्सवाद से उनका परिचय एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. उन्होंने इस बात का ज़िक्र करते हुए कि मार्क्सवाद का उन पर क्या असर हुआ, कहा, “एक बार जब आप इसे पढ़ लेते हैं, तो आप इसे कभी नहीं भूलते. एक बार जब आप इसे पढ़ लेते हैं, तो आपकी ज़िंदगी बदल जाती है… आप इससे कभी आज़ाद नहीं हो पाते.” इसने उनके नज़रिए को पूरी तरह बदल दिया कि वे वर्ग, जाति और समाज को गढ़ने वाले रोज़मर्रा के भेदभावों को कैसे समझती थीं. नीला जी के लिए, मार्क्सवाद कभी भी कोई कोरी थ्योरी नहीं थी, बल्कि यह जीने का एक तरीक़ा था. वे वामपंथी सांस्कृतिक और राजनीतिक हलकों से गहराई से जुड़ी हुई थीं—जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) से जुड़े मंच भी शामिल थे—और वे उस पीढ़ी का हिस्सा थीं, जिसके लिए कला और राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं थे.
समाज में हो रहे बदलावों और समकालीन मुद्दों से गहरा जुड़ाव होने के कारण ही सफ़दर हाशमी की शहादत के बाद उन्होंने कई बड़े कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर कई प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. सफ़दर की तीसरी बरसी पर ‘सहमत’ द्वारा जारी किए गए ‘सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ कलाकार’ (Artists Against Communalism) के बयान पर दस्तख़त करने वालों में वह भी शामिल थीं. इस बयान में देश में बढ़ती असहिष्णुता पर कड़ा एतराज जताया गया था और कहा गया था कि, “भारत का कलाकार समुदाय देश में बढ़ती सांप्रदायिकता से बेहद चिंतित है. उन्हें लगता है कि इससे हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता और मिली-जुली तहजीब को खतरा है, जिसे कलाकारों ने हमेशा अपनी कला के जरिए संजोया है.”
14 मार्च 1993 को मुंबई के शिवाजी पार्क में आयोजित ‘आर्टिस्ट्स अगेंस्ट कम्युनलिज़्म’ के रात भर चले जलसे में नीला भागवत ने कई अन्य कलाकारों के साथ अपनी प्रस्तुति दी थी. वह पिछले तीन दशकों से भी ज्यादा समय से लगातार ‘सहमत’ के साथ जुड़ी रहीं.
‘सहमत’ नीला भागवत जी की यादों को सलाम करता है. हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने और उसे आगे बढ़ाने में उनका जो योगदान रहा है, वह उनके शिष्यों के जरिए हमेशा जिंदा रहेगा. उनका काम और हमारी मिली-जुली संस्कृति को बचाने का उनका उम्र भर का जज्बा आने वाली पीढ़ियों को हमेशा हौसला देता रहेगा.

फ़ोटोः सहमत आर्काइव
संक्षिप्त परिचय | विदुषी नीला भागवत (30 नवंबर 1942 – 14 अप्रैल 2026) ग्वालियर घराने की हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका और एक शिक्षक थीं. उन्होंने ग्वालियर के पं. शरदचंद्र आरोलकर और पं. जल बालापोरिया के सान्निध्य में गायन संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया. लच्छू महाराज से नृत्य की शिक्षा भी ग्रहण की थी. उन्होंने 1979 से भारत भर में गायन की प्रस्तुतियाँ दीं, साथ ही ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, फ़िजी, अमेरिका समेत कई देशों का दौरा किया. कुमार शाहनी की फ़िल्म “ख्याल गाथा” और थियरी नॉफ़ की फ़िल्म “वाइल्ड ब्लू” सहित कई फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी. भागवत ने “कबीर” नामक एक प्रस्तुति दी, जिसमें उन्होंने महान सूफ़ी संत कबीर के पदों का गायन किया. मराठी और संस्कृत में एम.ए. के साथ ही उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में भी एम.ए. किया था. एक अकादमिक विद्वान के रूप में, भागवत ने एसएनडीटी विश्वविद्यालय में ‘संगीत का समाजशास्त्र’ और मुंबई विश्वविद्यालय में ‘संगीत का इतिहास’ पढ़ाया. मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी में कई शोधपरक और साहित्यिक किताबें लिखीं, जिनमें “कबीर गाथा” भी शामिल है, जो कबीर की वाणी की अनुभव आधारित व्याख्या है. भागवत को भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से फ़ेलोशिप प्रदान की गई थी, और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें एसएनडीटी विश्वविद्यालय तथा वाईडब्ल्यूसीए मुंबई की ओर से भी सम्मानित किया गया था.
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