पुस्तक अंश | दास्तान-ए-गुरुदत्त
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इस दास्तान में गुरुदत्त नाम की उस विकट पहेली की ज़िन्दगी के दृश्य भी हैं, उसकी जो फ़िल्में आज क्लासिक कही जाती हैं, उनके बनने की कहानी भी है, उसकी शादीशुदा ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव, इश्क़, उसके शौक़ और उसकी ख़ुदकुश रचनात्मकता के क़िस्से भी, साथ ही हिन्दी सिनेमा के उस निर्णायक दौर की दिलचस्प जानकारी भी. और यह दास्तान कही दास्तानगोई के उस्ताद महमूद फ़ारूक़ी ने. राजकमल प्रकाशन से छपी दास्तान-ए-गुरुदत्त का अंश,
साल था 1947…मुल्क आज़ाद हो रहा था…फ़िल्मी दुनिया भी बदल रही थी. दिलीप कुमार एस्टैब्लिश हो रहे थे. राज कपूर और देव आनन्द बतौर हीरो पर्दे पर आ चुके थे. मधुबाला, नरगिस और मीना कुमारी भी कामयाब हो रही थीं. प्लेबैक सिंगिंग का ज़माना आ गया था, लिहाज़ा अब एक्टर और स्टार के लिए गायक होना शर्त नहीं रह गया था. शमशाद बेगम, अमीरबाई कर्नाटकी, सुरैया का उरूज हो रहा था.
मगर गुरु बेकार था. घर में परेशानियाँ ही परेशानियाँ थीं. पूरे एक साल तक गुरु धक्के खाता रहा—उसको कहीं काम नहीं मिला…न असिस्टेंट का, न फ़िल्म बनाने का. घर में तंगी और तनाव…बॉम्बे से जी घबरा रहा था मगर कोलकाता जा नहीं सकता था क्योंकि वहाँ बहुत भीषण दंगा-फ़साद चल रहा था. कहानियाँ लिख-लिखकर इधर-उधर भेजता था, ख़ासकर ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ में, मगर सिर्फ़ रिजेक्शन लेटर्स ही हाथ लगते थे. आत्माराम के साथ मिलकर उसने माटुंगा में किताब की दुकान तक खोलने का क़स्द किया मगर उसके लिए भी सरमाया चाहिए था, जो नापैद था.
सबसे बड़ा भाई, सबकी उम्मीदों का सहारा, सबकी आँखों का तारा—मगर बेबस, बेकार, आवारा, तनहा. क्या करेगा हुनर का और सलाहियत का जब कोई मान-सम्मान देने वाला ही नहीं. वह कामयाब होना चाहता था, दुनिया के सामने अपने जलवे बिखेरना चाहता था, दिखा देना चाहता था कि उसके अन्दर क्या क्षमता है, वह किस मिट्टी का बना है, सितारों से आगे निकल सकता है—मगर मौक़ा तो मिले.
‘नया थिएटर’ भी उस वक़्त तक बैठ चुका था और बिमल रॉय, केदार शर्मा और नितिन बोस बम्बई आ चुके थे.
वो साल बहुत तल्ख़ था और उसी साल उसने एक कहानी लिखी—‘कशमकश’. इसका पहला पन्ना एक फ़िल्म प्रोडक्शन कम्पनी के लेटरहेड पर लिखा गया था—‘प्रमुख फ़िल्म्स’ के. वो पहला ड्राफ़्ट उसके बेटे अरुण दत्त के पास मौजूद था. इसमें अपना सारा ज़ाती कर्ब1 और अज़ीयत गुरु ने उड़ेलकर रख दिया था—हुनर और सलाहियत होते हुए भी कैसे क़दम-क़दम पर उसको ठुकराया जा रहा था और नाक़द्री मिल रही थी, यही उस फ़िल्म की भी कहानी थी. उसने ख़ुद से वादा किया कि एक दिन वह ये फ़िल्म बनाएगा ज़रूर—मगर फ़िलहाल तो नौकरी चाहिए थी, काम चाहिए था.
आख़िरकार काम मिल गया. अमिय चक्रवर्ती, जो बॉम्बे टॉकीज़ में देविका रानी के साथ काम कर चुके थे मगर फिर फ़िल्मिस्तान के साथ जुड़ गए थे, एक फ़िल्म बना रहे थे ‘गर्ल्स स्कूल’. गुरु उसमें उनका चीफ़ असिस्टेंट बन गया. उस फ़िल्म की हीरोइन थीं गीता बाली, जिनके लिए कहते हैं कि केदार शर्मा ने अपनी आक़बत1 ख़राब कर ली थी. इसी फ़िल्म से गीता बाली और गुरु की दोस्ती शुरू हुई.
उसके बाद काम मिला ज्ञान मुखर्जी के साथ—जिनकी पिक्चर ‘क़िस्मत’ उस वक़्त तक हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म थी. एक तरह से देखा जाए तो ‘क़िस्मत’ से ही हिन्दुस्तान में फ़ॉर्मूला फ़िल्मों का दौर शुरू हुआ. सब कुछ तो था उसमें—अशोक कुमार का डबल रोल, मिलना और बिछड़ना, क़िस्मत, धोखा, जुर्म की दुनिया में फँसा हुआ नेक हीरो…और देशभक्ति—‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है’—एक ऐसे अहद में जब हिन्दुस्तान अभी अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था. क्यों न चलती फ़िल्म…चली और चलती ही रही—चार-पाँच सालों तक.
ज्ञान मुखर्जी बहुत तालीमयाफ़्ता आदमी थे—इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से फ़ारिग़ थे, साइंटिस्ट थे, और इंडियन साइंस इंस्टीट्यूट, कलकत्ता में प्रोफ़ेसर थे. मगर शशधर मुखर्जी उन्हें फ़िल्मों में ले आए और वह बॉम्बे टॉकीज़ के राइटर बन गए. उनके पास हज़ारों किताबें थीं और उन्होंने बहुत प्यार से गुरु को अपने साथ रखा…
उस ज़माने तक गुरु अपना नाम लिखता था पादुकोण गुरुदत्त. फिर इंडस्ट्री के प्रेशर में उसने अपना नाम रखा गुरुदत्त पादुकोण…मगर बाक़ी हर तरह से—मिज़ाज से, आदतों से, पसन्द-नापसन्द से—वो बंगाली ही था. ज्ञान मुखर्जी ने कहा कि तुम पादुकोण नाम हटा दो, यह तुम्हारी बंगाली आत्मा के साथ नहीं जँचता. तो इस तरह गुरु सिर्फ़ गुरुदत्त रह गया.
इस्मत चुग़ताई के शौहर शाहिद लतीफ़ ने देव के साथ ‘ज़िद्दी’ बनाई, जो बहुत चली. देव के बड़े भाई चेतन आनन्द ने नवकेतन फ़िल्म्स के नाम से प्रोडक्शन हाउस खोला और 1949 में गोगोल की कहानी ‘इंस्पेक्टर जनरल’ पर फ़िल्म बनाई ‘अफ़सर’, देव आनन्द को लेकर, जो काफ़ी चली. इस फ़िल्म में इप्टा के बहुत से लोग शामिल थे…और उदय शंकर के ग्रुप के लोग भी.
तब तक गुरु को असिस्टेंटगीरी करते हुए तीन साल हो गए थे. मगर आख़िर उसके अन्दर के हीरे का नसीब जागा. देव आनन्द ने एक दिन बुलाया—बिलकुल ग़ैर-मुतवक्क़े तौर पर और पुराने वादे की ईफ़ा की. गुरुदत्त से कहा कि नवकेतन की अगली फ़िल्म वो डायरेक्ट करेगा. देव, गुरु पर बाज़ी लगाने को तैयार था और गुरु, देव पर. और हुस्न-ए-इत्तेफ़ाक़देखिए कि फ़िल्म का नाम था ‘बाज़ी’. इस फ़िल्म पे कई लोगों ने सचमुच बाज़ी लगाई.
लाहौर का एक संजीदा मुसन्निफ़ था—देव के भाई चेतन के साथ गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में पढ़ा था, फिर बीबीसी के साथ लन्दन में रहा था और शान्तिनिकेतन में भी पढ़ चुका था. इप्टा से ख़ास तौर से जुड़ा हुआ था. वह और उसकी बेइन्तिहा ख़ूबसूरत बीवी दमयंती उर्फ़ दम्मो बॉम्बे इप्टा की जान थे. नाम था बलराज साहनी. बहुत से नाटक उसने किये. हबीब तनवीर को एक बार थप्पड़ भी मारा था और कहा था, ‘ये मसल मेमोरी है.’ देव आनन्द भी उन दिनों कभी-कभी इप्टा में काम करते थे. एक बार ‘ज़ुबैदा’ नाम के नाटक को डायरेक्ट करते-करते बलराज साहनी आजिज़ आ गए और कह बैठे, ‘टेक इट फ्रॉम मी यू कैन नेवर बिकम एन एक्टर.’
बहरहाल, बलराज रूसी फ़िल्मों के बड़े दीवाने थे. लन्दन में उन्होंने आइसेंस्टाइन, पुदोवकिन और न जाने कितने उस्तादों की फ़िल्में देखी हुई थीं. वो उन दिनों बॉम्बे के फ़ेमस स्टूडियो में रूसी फ़िल्मों की डबिंग के लिए जाया करते थे. वहीं एक दिन उनकी मुलाक़ात चेतन आनन्द से हुई. चेतन ने कहा, ‘तुम मेरी कम्पनी के लिए अगली फ़िल्म लिख दो…गुरुदत्त नाम के नये लड़के के साथ.’
बस काम शुरू हो गया. जब फ़िल्म का ऐलान हुआ, तो गुरुदत्त ख़ुशी-ख़ुशी ढेर सारे तोहफ़े लिये हुए घर लौटा. उससे पहले तक उसके पास सिर्फ़ दो जोड़ी कपड़े हुआ करते थे.
बलराज उन दिनों एक और फ़िल्म बना रहे थे ‘हलचल’, जिसे के. आसिफ़ प्रोड्यूस कर रहे थे. के. आसिफ़ की प्रोड्यूस की हुई यह फ़िल्म कई मामलों में मील का पत्थर साबित हुई—लाइट और शेड, इंटेंस साइकोलॉजिकल स्टडी, नॉइर, बर्बाद मोहब्बत—बहुत कुछ पहली बार इस तरह दिखाया गया था.
इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान बलराज दो साल जेल में रहे, क्योंकि वह कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर थे और पार्टी ने आज़ाद हिन्दुस्तान के ख़िलाफ़ यह कहकर जंग छेड़ दी थी कि ‘ये आज़ादी झूठी है, देश की जनता भूखी है.’ बलराज साहनी आर्थर रोड जेल में थे. उनकी चक्की में साथ रहते थे मजरूह सुल्तानपुरी. ‘हलचल’ में वह जेलर बने थे, तो जेल से कभी-कभी जेलर की कॉस्ट्यूम पहनकर ही शूटिंग के लिए आ जाते थे.
बहरहाल, ‘बाज़ी’ की स्क्रिप्ट पर काम शुरू हो गया. उसी दो कमरों के माटुंगा वाले फ़्लैट में और कभी नवकेतन के ऑफ़िस में. रात-रात भर काम होता था.
कहानी एक टैक्सी ड्राइवर मदन के बारे में है, जो जराइम की दुनिया में फँस जाता है. मदन एक मस्त नौजवान है—अक्खड़ भी और तमीज़दार भी, फ़क्कड़ भी और पुरलुत्फ़ भी. उसको जुए का शौक़ है और वह ताश का बहुत माहिर खिलाड़ी है. अपनी बहन के इलाज के लिए वह धीरे-धीरे पेशेवर जुआरी बन जाता है. मस्त-मौला है, जुर्म करता है मगर दिल का बुरा नहीं है.
दो औरतें उसको प्यार करती हैं—एक बार-डांसर है और दूसरी एक डॉक्टर, जो अशरफ़िया तबक़े से ताल्लुक़ रखती है. धीरे-धीरे उसे हाई सोसायटी के अन्दर छुपी हुई गन्दगी और उसकी काली कमाई का अन्दाज़ा होता है. आख़िर में वह सुधर जाता है.

अब इत्तेफ़ाक़ देखिए—राज कपूर की ‘आवारा’ भी उसी साल रिलीज़ हुई. उस फ़िल्म के राजू की तरह मदन भी शहर की गलियों से निकला है—अकेला है, मनमौजी है, न घर-बार, न परिवार. वह भी क़ानून से पंगा लेने को तैयार है. राजू के शहर की गलियाँ बहुत मेहरबान हैं—अच्छे मददगार लोगों से भरी हुईं…मगर ‘बाज़ी’ की गलियाँ ज़्यादा सफ़्फ़ाक हैं. मदन के अन्दर वो ग़ुस्सा, वो शर्म, वो ख़िफ़्फ़त नहीं है जो राजू में है. राजू की तरह वो अपनी महबूबा को थप्पड़ नहीं मारता. वो शहर की सफ़्फ़ाकी और उसके ज़ुल्म से भरे तरीक़ों से बख़ूबी वाक़िफ़ है—वो देख रहा है कि कसीनो का मालिक हज़ारों रुपये एक डांसर पर उड़ा सकता है, मगर कोई ग़रीब नौकर फ़र्श से एक नोट उठा ले तो उसको डंडे ही डंडे पड़ेंगे. मदन को इस पर कोई हैरत नहीं है. दुनिया ऐसी ही है. वो सेंटिमेंटल नहीं है, वो किसी कुत्ते के गले में बाँहें डालकर नहीं रोता. ‘बाज़ी’ में दुनिया की अलमनाकी और नाइंसाफ़ी पर आँसू नहीं बहाए जाते.
‘बाज़ी’ में पहली बार बम्बई का कामगार-मज़दूर, मेहनतकश तबक़ा दिखाई देता है—टपोरी, जो बम्बइया ज़बान बोलता है. उसमें अकड़ है. उसको अन्दाज़ा है कि ये अमीर सफ़ेदपोश लोग दरअसल कितने गिरे हुए हैं, कितने बदमाश हैं. फ़िल्म में बम्बई का अंडरक्लास—उसके तौर-तरीक़े, उसकी बोली, उसके ठिकानों को पेश किया गया. उन्हीं की तरह की बेफ़िक्री और लापरवाही पहली बार दिखी, इसीलिए पब्लिक ने फ़िल्म को हाथों-हाथ लिया. मिसाल के तौर पर, हीरो से आख़िरी ख़्वाहिश पूछी जाती है तो कहता है—‘एक स्पेशल चाय’—ख़ास बम्बइया चीज़ और ख़ास बम्बइया एटिट्यूड. जब हीरोइन का बाप उसको ठुकरा देता है तो वो शराब की बोतल नहीं ढूँढ़ता, मस्ती से गधे पर बैठकर गाना गाता है और दूसरी लड़की से इश्क़ लड़ाने लगता है.
फ़िल्म में एक और नई बात थी—अमीरों की कोठियाँ और बम्बई की सड़कों के अलावा जो तीसरी जगह पहली बार इस तरह दिखाई गई, वो थे डांस बार, कैबरे और क्लब…गैम्बलिंग गैजेट्स, डांसिंग गर्ल्स, शेडी कैरेक्टर्स…जो पहले सिर्फ़ हॉलीवुड की फ़िल्मों में दिखाई देते थे.
‘बाज़ी’ फ़िल्म से पहली बार एक और एक्टर परदे पर आया जिसका नाम था बदरुद्दीन जमालुद्दीन क़ाज़ी. इंदौर से था, और बम्बई की बेस्ट बस सेवा में कंडक्टर था मगर अपनी बातों और नक़ल से सबको हँसाया करता था. ‘हलचल’ में एक्स्ट्रा का काम किया. लंच में अपनी हरकतों से सबको हँसाता—कभी शराबी बनकर, कभी कुछ और. बलराज साहनी ने देखा तो बहुत महज़ूज़ हुए. उन्होंने उससे कहा कि एक दिन जब वो सब लोग नवकेतन के ऑफ़िस में ‘बाज़ी’ की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हों, तो वो घुस जाए और शराबी का नाटक करे. उसने ऐसा ही किया—बेधड़क घुस गया और धुत्त शराबी की एक्टिंग करने लगा. फिर एकदम से अपनी एक्टिंग रोकी और बिलकुल सोबर बनकर खड़ा हो गया. गुरु बहुत मुतअस्सिर हुआ…फिर तो वो गुरु की हर फ़िल्म का अभिन्न अंग हो गया. और इतना चला, इतना चला कि उसके नाम पर फ़िल्में चलने लगीं. गुरु ने बाद में कहा कि “बदरुद्दीन क़ाज़ी अटपटा लगता है…तुम शराबी की एक्टिंग करते हो और मुझे जॉनी वॉकर बहुत पसन्द है, तो तुम अपना नाम रखो जॉनी वॉकर.” तो साहब जॉनी वॉकर भी जुड़ गए.
उसी ज़माने में एक और हमउम्र नौजवान था—देव आनन्द का गवर्नमेंट कॉलेज का साथी, जिसको गाने का बड़ा शौक़ था. देव ने उससे कहा कि मेरा एक दोस्त है गुरुदत्त, एक फ़िल्म बना रहा है, तुम उसको असिस्ट करो. अगले दिन राज खोसला वहाँ पहुँच गए. गुरु ने पूछा कि एडी का कोई तज़ुर्बा है? इन्होंने झूठ बोला—हाँ. फिर उसने पूछा कि हिन्दी जानते हो? इन्होंने फिर झूठ बोला—हाँ. वो लाहौर के थे और सिर्फ़ उर्दू जानते थे. तो गुरु ने कहा, ठीक है, आ जाओ काम पे. अगले रोज़ राज ने हिन्दी की वर्णमाला की किताब ख़रीदी और हिन्दी सीखने लगे. छह-सात दिन बाद गुरु ने कुछ डायलॉग लिखने को कहा—ये टूटा-फूटा लिखने लगे. गुरु देख के मुस्कुराया और पूछा, ‘तुमने हिन्दी कब सीखी?’ राज ने कहा, ‘उसी दिन, जिस रोज़ आपने पूछा था कि हिन्दी आती है क्या.” गुरु ख़ूब हँसा और बोला, ‘कोई बात नहीं, दूसरे असिस्टेंट कुलदीप को दे दो लिखने के लिए.’ फिर तो राज खोसला गुरु के असिस्टेंट हो गए और अगली चार फ़िल्मों तक रहे. उसके बाद अलग होकर बहुत मशहूर और कामयाब डायरेक्टर बने.
‘बाज़ी’ फ़िल्म का संगीत दे रहे थे—एस.डी. बर्मन जो उस वक़्त तक काफ़ी मशहूर हो चुके थे. सचिन देव बर्मन का ताल्लुक़ त्रिपुरा के शाही ख़ानदान से था. गुरु के साथ-साथ उन्होंने बिमल रॉय की मशहूर फ़िल्में ‘देवदास’, ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ कीं. कहते थे, ‘ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई त्रिपुरा में पैदा हुआ हो और संगीत उसकी रगों में न बहता हो. यहाँ किसान खेती करते वक़्त गाने गाते हैं, मल्लाह नाव चलाते वक़्त गाने गाते हैं, जुलाहे, मज़दूर सब गाना गाते हैं.’ और यही लोकसंगीत उनकी ख़ासियत थी. फ़िल्मों में आने से पहले वो इसी के लिए जाने जाते थे और इसी तर्ज़ ने उनके संगीत को इनफ़िरादियत अता की.
एस.डी. बर्मन के साथ दो और लोग शामिल हुए, जो उन्हें पसन्द थे. एक का नाम था अब्दुल हई—लुधियाने के ज़मींदार घराने से थे, मगर बाप से नाराज़ होकर जायदाद को लात मार दी और लाहौर चले गए. वहाँ एक अदबी रिसाला ‘अदब-ए-लतीफ़’ निकालते थे. उस ज़माने में उनकी नज़्मों का मजमूआ छपा ‘तल्ख़ियाँ’ नाम से—जो बहुत मशहूर हुआ और धूम मचा गया लुधियाना के इस नौजवान शायर की, जिसका तख़ल्लुस था ‘साहिर’.
एस.डी. बर्मन से उन्हें उनके एक मद्दाह ने उन्हीं दिनों मिलवाया. बर्मन दा उन दिनों नवकेतन की फ़िल्म ‘नौजवान’ का म्यूज़िक तैयार कर रहे थे. बर्मन दा ने उन्हें धुन सुनाई. कहाँ साहिर—अपने ख़यालों और कैफ़ियत से आगे किसी की न सुनने वाले, मगर पता नहीं क्या बात हुई कि उन्होंने बर्मन दा से दोबारा धुन बजाने के लिए कहा और फिर फ़िलबदीह ये तीन मिसरे लिख डाले—
ठंडी हवाएँ, लहरा के आएँ,
रुत है जवाँ, तुम को यहाँ,
कैसे बुलाएँ.
सचिन दा ख़ुशी से उछल पड़े…लता का गाया ये गाना ज़बरदस्त हिट हुआ…बस वहीं से उनकी और साहिर की हिट जोड़ी शुरू हुई…मगर अफ़सोस ज़्यादा नहीं चली…
उस ज़माने में एक बहुत मशहूर सिंगर थी—बहुत कमसिन, बहुत मुनफ़रिद—जिसका पहला हिट गाना सचिन दा ने ही दिया था. उसका ख़ानदान 1942 की रस्ताख़ेज़ी2 में ईस्ट बंगाल से बम्बई आ गया था…वो माटुंगा के पास ही रहती थी…अच्छा गाती थी…फिर वो सचिन दा की नज़र में आई…सचिन दा ने उससे ‘दो भाई’ के लिए एक गाना गवाया—‘मेरा सुन्दर सपना बीत गया’.
गीता रॉय…वो सिर्फ़ 15 साल की थी मगर गाना सुपरहिट हुआ. फिर तो गीता इतनी कामयाब हुई कि पूछिए मत. साल 1948 में उसने 12 फ़िल्मों के लिए गाने गाए और 1949 में 25 फ़िल्मों के लिए. वो उस वक़्त सारे नामवर म्यूज़िक डायरेक्टर्स—अनिल बिस्वास, रामचन्द्र, नौशाद, ग़ुलाम मोहम्मद और सचिन दा, सबके लिए गा रही थी…बड़ी स्टार थी.
तो क़िस्सा यूँ है कि ‘बाज़ी’ के गाने की रिकॉर्डिंग करने गीता रॉय फ़ेमस स्टूडियो पहुँची अपने पिता के साथ. गाड़ी में बैठी थी कि एक नौजवान आया और कहा, ‘आइए, मैं आपको रिहर्सल पे ले चलता हूँ.’ वहाँ पहुँची…उसने चुपके से सचिन दा से पूछा कि ये नौजवान कौन है…सचिन दा हँसे और बोले, ‘यही तो है डायरेक्टर गुरुदत्त.’
तो इस तरह एक स्ट्रगलिंग डायरेक्टर और एक स्टार सिंगर की पहली मुलाक़ात हुई.
गाना भी बहुत कमाल का था. साहिर की एक ग़ज़ल थी. सचिन दा ने उसको लेकर उस पर एक गाना बना दिया…वो भी ऐसा-वैसा नहीं—कैबरे. गाना रिकॉर्ड हुआ—
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तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले,
अपने पे भरोसा है तो इक दाँव लगा ले.
डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों,
इंसाफ़ तेरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले.
क्या ख़ाक वो जीना है जो अपने ही लिए हो,
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जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं