जश्न-ए-सहर | एक किताब यादों की
‘सहर’ — यानी भोर, उजाले की पहली आहट. ज़रा इस मंज़र की कल्पना कीजिए. आप एक किताब के लोकार्पण समारोह में बैठे हैं. किताब, हिंदुस्तान के बीसवीं सदी के बड़े शायर की उर्दू जीवनी का अंग्रेज़ी अनुवाद है. हॉल में उनकी लिखी फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी ग़ज़लें धीमे-धीमे तैर रही हैं. बड़े से मंच के दोनों ओर लगी बड़ी एलईडी स्क्रीन पर एक संजीदा चेहरा बार-बार उभरता है. एक ऐसा चेहरा जिसमें एक साथ कई पहचानें बसी हैं—उर्दू का शायर, एक सिख, ऊँचे ओहदे का अफ़सर, और दो दुश्मन मुल्कों के बीच मोहब्बत का पुल बन जाने वाला विरला इंसान.
रंग-बिरंगी पगड़ी में सजा वह मुस्कुराता चेहरा अपनी गहरी आँखों से जैसे पूरे हॉल को टटोल रहा था. लगता था मानो हर आने-जाने वाले को पहचान लेना चाहता हो. हॉल के कोनों में रखे बड़े पंखों से ख़ुशबूदार फुहारें हवा में घुल रही थीं. दरवाज़े पर खड़ी एक ख़ूबसूरत महिला मेहमानों का स्वागत चमेली के छोटे-छोटे गजरों से कर रही थीं, जिन्हें लोग अपनी कलाई पर लपेट रहे थे. मैं दरवाज़े की ओर देखता बैठा था, हर आने वाले चेहरे को ग़ौर से निहारते हुए. तभी एक ग़ज़ल ने मेरी तंद्रा तोड़ी—
ख़ुदा ही जाने, यार आए न आए
मेरे दिल को क़रार आए न आए
चारों तरफ़ पगड़ियों का समंदर था. तभी अचानक मंच से हुई एक घोषणा ने जैसे मुझे भीतर तक झकझोर दिया. शायर के पोते ने हाथ में उनके उर्दू कलाम का देवनागरी तर्जुमा उठाए हुए कहा—
“बेदी साहब, मेरे नाना, बाबा गुरु नानक देव जी की सोलहवीं पीढ़ी के सीधे वंशज थे.”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा, लेकिन मैं जैसे अपनी कुर्सी पर जम गया. जी चाहा उठकर उस आदमी को सज्दा करूँ, जिसे मैंने कोई पैंतीस बरस पहले आख़िरी बार देखा था. इतने सालों तक मुझे यह मालूम ही नहीं था—और न ही उन्होंने कभी जताया— कि वे पहले सिख गुरु के वंशज थे. एक पल को जैसे दिल की धड़कन रुक-सी गई.
मुझे कनॉट प्लेस की वो आख़िरी मुलाक़ात याद आ गई.
छह फ़ुट चार इंच का वह लंबा क़द, रंगीन पगड़ी,और अपनी फ़िएट कार के पास थोड़ा झुककर पेट थामे खड़े कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’. अस्सी बरस की उम्र पार कर लेने के बाद भी वह शख़्स बिना किसी हिचक के आसफ़ अली रोड से ग्रेटर कैलाश तक ख़ुद गाड़ी चलाकर चला जाता था.
मैंने उनके दुबले होते जिस्म को देखकर बीमारी के बारे में पूछा. हमेशा की तरह हँसते हुए पंजाबी में बोले—“कुछ ख़ास नहीं पुत्तर… उम्र हो गई है. अब नाश्ते में दस अंडों वाला ऑमलेट हज़म नहीं होता.”
यह कहकर मुस्कुराए, कार में बैठे और चले गए. लगभग एक महीने बाद पता चला कि उन्हें लिम्फोमा है और अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
यह थे कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’— जिनके बारे में ख़ुशवंत सिंह ने “भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच सबसे मज़बूत पुल” कहा था. और सचमुच, वे सिर्फ़ दो देशों के बीच पुल नहीं थे; वे दो ज़बानों, दो तहज़ीबों, दो सिनेमाओं और बँटवारे के बाद बिखर गई लाखों कहानियों के बीच भी एक रिश्ता थे. बेदी साहब ख़ुद को उर्दू ज़बान का “ख़ादिम” कहा करते थे.
लोगों के दिलों में उनके लिए कैसी मोहब्बत थी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हिन्दी सिनेमा के महान अभिनेता दिलीप कुमार ने उनके इंतिक़ाल पर कहा था—“वह मेरे लिए सिर्फ़ दोस्त नहीं थे. कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी मेरे भाई जैसे थे. उनकी सादगी और ख़ुलूस ऐसा था कि बिना कुछ कहे भी उनकी एक नज़र दिल से किया गया सलाम लगती थी. उनका वजूद ऐसा असर छोड़ जाता था, जिसे अल्फ़ाज़ में बयान नहीं किया जा सकता.”
अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी ज़िले—जो अब पाकिस्तान का साहीवाल इलाक़ा है— के चक बेदी गाँव के बड़े ज़मींदार परिवार में जन्मे बेदी साहब का ख़ानदान पच्चीस हज़ार एकड़ से अधिक ज़मीन का मालिक था. उस पूरे इलाक़े में बेदी परिवार का बेहद सम्मान और प्रभाव था, यहाँ तक कि गाँव का नाम भी उन्हीं के नाम पर पड़ा था.
मज़बूत जिस्म वाले कुँवर साहब को बचपन से कुश्ती, तीरंदाज़ी और निशानेबाज़ी का शौक़ था. लेकिन उनके भीतर सबसे गहरी मोहब्बत उर्दू शायरी के लिए थी, जो उन्हें अपने घराने और उस्तादों—दोनों से विरासत में मिली. पंजाब सिविल सर्विस में चयन के बाद उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी के रूप में ट्रेनिंग ली. बँटवारे के वक़्त वो धर्मशाला, कांगड़ा के असिस्टेंट कमिश्नर थे.
परिवार के बुज़ुर्ग बताते हैं कि जब दिल्ली दंगों की आग में जल रही थी, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ख़ुद उन्हें बुलाकर पुरानी दिल्ली का सिटी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया, ताकि वो हालात संभाल सकें और क़त्लो-ग़ारत पर उतारू भीड़ को रोक सकें.
समारोह में मौजूद एक वक्ता ने बताया कि सिटी मजिस्ट्रेट का कार्यभार संभालते वक़्त बेदी साहब ने इलाक़े के एक इमाम को गवाह बनाकर क़सम खाई थी कि उनके इलाक़े में, उनकी मौजूदगी में, किसी मुसलमान की हत्या नहीं होने देंगे. वह केवल धर्मनिरपेक्षता, साझी संस्कृति और इंसानी बराबरी की बातें नहीं करते थे—वह उन्हें जीते थे.
उनके लिए शायरी, इंसानियत से मोहब्बत की बुनियाद थी. शेर कहना उनके लिए साँस लेने जितना सहज था. एक मज़हबी सिख का नात लिखना सिर्फ़ अदब नहीं, इबादत भी था—
इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ़ मुस्लिम का मुहम्मद पे इजारा तो नहीं
दंगे थमे, बँटवारे का धुआँ कुछ हल्का पड़ा, तो बेदी साहब ने शायरी में सुकून ढूँढा. उन्होंने दोनों नए मुल्कों के लोगों को क़रीब लाने की कोशिश शुरू की और आम लोगों के मेल-जोल के कार्यक्रम आयोजित करने लगे. एक मशहूर शायर होने के नाते उनकी पहली कोशिश यही थी कि सरहद के दोनों ओर के शायरों को एक मंच पर लाया जाए. इसी सोच से पैदा हुए इंडो-पाक मुशायरे.
उनमें सबसे अहम था फरवरी 1950 में लाल क़िले में आयोजित “जश्न-ए-जम्हूरियत मुशायरा”. मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर से चली आ रही लाल क़िला मुशायरे की परंपरा को अंजुमन तामीर-ए-उर्दू ने फिर से ज़िंदा किया था. पंडित नेहरू ने उसका उद्घाटन किया, और वह सिलसिला आज तक जारी है.
इसके बाद 1954 में बेदी साहब ने सर शंकर लाल, शंकर प्रसाद आईसीएस, साहिर होशियारपुरी और गुलज़ार देहलवी के साथ मिलकर जिस मुशायरे की नींव रखी, वही आगे चलकर मशहूर “शंकर-शाद मुशायरा” बना.
उनकी भारी मगर असरदार आवाज़ जैसे ही “हाज़रीन!” कहती, पूरा हाल ख़ामोश हो जाता. शायद इसी वजह से वह हर बड़े मुशायरे के स्वाभाविक नाज़िम बन गए थे. बेदी साहब जिस लहजे में मुझे पुत्तर कह कर पुकारते थे उस से मेरे जिस्म पे रोएं खड़े हो जाते थे—ऐसा था उनकी आवाज़ का जादू.
सफ़ेद, कड़क इस्त्री किया हुआ कुर्ता-पजामा, रंगीन पगड़ी, शांत आँखें और एक रईसाना ठहराव—उनका पूरा व्यक्तित्व ध्यान अपनी ओर खींच लेता था. ठीक उनकी शायरी की तरह, उनके लहजे और व्यवहार में भी नरमी बहती थी.
अपनी सरकारी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ बेदी साहब की शायरी भी दूर-दूर तक अपने चाहने वाले बना चुकी थी. हिन्दी फ़िल्म जगत के बड़े कलाकारों, संगीतकारों और गायकों के बीच उनकी ख़ासी इज़्ज़त थी. दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद, मनोज कुमार, सुनील दत्त, धर्मेन्द्र—उस दौर का शायद ही कोई बड़ा नाम हो जो उनसे वाक़िफ़ न रहा हो.
मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, मुकेश और बाद में जगजीत सिंह जैसे गायकों ने उनके कलाम को अपनी आवाज़ दी. रफ़ी साहब तो बहुत बाद में ख़ास तौर पर दिल्ली आए थे ताकि उनके बेटे की शादी में गा सकें. यह केवल दोस्ती नहीं थी; यह वह मोहब्बत और एहतराम था जो बेदी साहब अपने व्यवहार से लोगों के दिलों में पैदा कर देते थे.
उर्दू अदब की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुके इस रिटायर्ड अफ़सर ने बाद में हिन्दी फ़िल्म बनाने की ओर भी क़दम बढ़ाए. सत्तर के दशक में उन्होंने तीन फ़िल्में बनाईं—मन जीते जग जीत (1973), जिसमें उन्होंने एक छोटा-सा किरदार भी निभाया; दुख भंजन तेरा नाम (1974), जिसमें धर्मेन्द्र मेहमान भूमिका में थे; और चरणदास (1977). तीनों फ़िल्मों को दर्शकों ने पसंद किया. श्री बाल कृष्ण भगत, जो मेरे ससुर पिता थे, के साथ मिल कर भी बेदी साहब ने “प्यासी आँखें” फ़िल्म बनाई.
सत्तर के दशक के आख़िरी वर्षों तक ग़ज़ल नई पीढ़ी की धड़कनों में जगह बना चुकी थी. सरहद के उस पार से आने वाले बड़े फ़नकारों को भारत में एक ऐसा श्रोता वर्ग मिल गया था जो उर्दू से मोहब्बत करता था और ऐसी शायरी को हाथों-हाथ लेता था जिसे वह महसूस कर सके. उस दौर में पाकिस्तान से मेहदी हसन, नूरजहाँ, फ़रीदा ख़ानम, आबिदा परवीन, अमानत अली ख़ान, नुसरत फ़तेह अली ख़ान और ग़ुलाम अली ख़ान जैसे फ़नकार आए; जबकि भारत में जगजीत-चित्रा सिंह, तलत अज़ीज़, भूपेन्द्र और अनूप जलोटा ग़ज़ल को नई आवाज़ दे रहे थे.
बेदी साहब के पोते अश्वजीत सिंह ने अपने कॉलेज के दिनों का एक दिलचस्प वाक़या सुनाया. उन्होंने कहा—“मैं श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में स्टूडेंट्स यूनियन का प्रेसिडेंट था. हमने कॉलेज में एक ग़ज़ल संध्या आयोजित करने की योजना बनाई, लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि किसी बड़े गायक को बुला सकें. जब नाना जी को पता चला, उन्होंने फ़ोन उठाया और ग़ुलाम अली साहब को कॉल किया. उस वक़्त वह भारत में ही थे. उन्होंने बस इतना कहा—‘आप मेरे पिता जैसे हैं, आपके हुक्म को मैं मना नहीं कर सकता.’”
ग़ुलाम अली साहब न सिर्फ़ एसआरसीसी आए, बल्कि बिना एक पैसा लिए उन्होंने पूरा कार्यक्रम किया. यह वह इज़्ज़त थी जो बेदी साहब ने सारी उम्र कमाई.
अश्वजीत सिंह बताते हैं कि “इंसानियत, शौक़ और रिश्ते”—यही तीन स्तंभ थे कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ की ज़िंदगी के. वह किसी भी ज़रूरतमंद की मदद कर देते, चाहे उसका सामाजिक या आर्थिक दर्जा कुछ भी हो. उनकी शराफ़त ऐसी थी कि लोग उनसे मिलते ही अपनेपन में बंध जाते.
1983 में बेदी साहब ने अपनी आत्मकथात्मक शायरी का संग्रह “यादों का जश्न” प्रकाशित किया. बाद में 1992 में दुबई में उनके सम्मान में “जश्न-ए-सहर” नाम से एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन भी हुआ. हरियाणा उर्दू अकादमी ने उनके नाम पर “कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी अवार्ड” की घोषणा की.
उनके बेटे बताते हैं कि बेदी साहब के इंतिक़ाल के बाद जगजीत सिंह ख़ुद घर आए और उन्होंने विशेष रूप से अनुमति माँगी कि वह बेदी साहब की ग़ज़लों का एक एलबम रिकॉर्ड करना चाहते हैं. बाद में वही एलबम “फ़ॉरगेट मी नॉट” के नाम से सामने आया, जिसमें बेदी साहब की बेहद नर्म, दिल को छू लेने वाली शायरी को आवाज़ मिली.
समारोह में मौजूद पूर्व उपराज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने भी उनसे जुड़ी एक याद साझा की. उन्होंने बताया कि छात्र जीवन में नैनीताल की माल रोड पर उनकी मुलाक़ात बेदी साहब से हुई थी. बेदी साहब ने न केवल उन्हें बड़े प्यार से बैठाया बल्कि लगभग दो घंटे तक उन नौजवान छात्रों के साथ रहे और शाम की चाय-पकौड़ों की दावत भी दी.
खेलों में बेदी साहब की रुचि किसी से छिपी नहीं थी. युवावस्था में वह पहलवान रहे, उम्दा तीरंदाज़ थे और निशानेबाज़ी में भी माहिर थे. उन्होंने भारत केसरी दंगल आयोजित करवाया और तीरंदाज़ी प्रतियोगिताएँ भी कराईं. वह रेसलिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे.
जानवरों से उनकी मोहब्बत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि बँटवारे के वर्षों बाद वह सिर्फ़ इसलिए लाहौर गए कि लाहौर चिड़ियाघर में “बेनज़ीर” नाम की उस हथिनी को देख सकें, जिसे उन्होंने बँटवारे से पहले जन्म लेते देखा था.
उर्दू अदब के मशहूर वेब पोर्टल “रेख़्ता” ने उनके परिचय में उन्हें “उर्दू शायरी और संस्कृति की एक महत्वपूर्ण शख़्सियत” कहा है. वहाँ उनकी 52 ग़ज़लें, 3 नज़्में और 18 अशआर दर्ज हैं. बेदी साहब की शायरी में मोहब्बत, जुदाई और रूमानी एहसास तो हैं ही, लेकिन साथ ही भारत-पाकिस्तान के बीच अमन, इंसानी रिश्तों और हल्के-फुल्के हास्य की भी एक अलग दुनिया दिखाई देती है. उनका कलाम उसी साझी तहज़ीब की परंपरा में खड़ा नज़र आता है जिसमें इक़बाल, फ़ैज़ और अहमद फ़राज़ जैसे नाम आते हैं.
अश्वजीत सिंह ने कोविड लॉकडाउन के दिनों का एक और दिलचस्प वाक़या सुनाया. उन्होंने कहा— “लॉकडाउन के दौरान कोई अनजान शख़्स मुझे रोज़ाना दादा जी की एक रिकॉर्ड की हुई ग़ज़ल या नज़्म भेजने लगा. शुरू में लगा कोई प्रशंसक होगा, लेकिन जब उर्दू समझने वाले दोस्तों ने उन रिकॉर्डिंग्स को सुना तो कहा कि उनकी पेशकश बेहद आला दर्जे की है. बाद में मेरी मुलाक़ात अब्दुल रहीम साहब से हुई, जो ये रिकॉर्डिंग्स भेज रहे थे. उन्हीं की सलाह पर हमने दादा जी के नाम से एक वेबसाइट बनाई, जहाँ धीरे-धीरे उनकी शायरी, किताबें और जीवन से जुड़ी तमाम चीज़ें जमा की जा रही हैं.”
कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ को पढ़ना दरअसल बीसवीं सदी के भारत की भावनात्मक यात्रा में उतरना है — वह भारत जिसने बँटवारा देखा, लाखों लोगों का उजड़ना देखा, और फिर 1984 के सिख-विरोधी दंगों की आग भी देखी; एक ऐसी आग जिसमें बेदी साहब ख़ुद मुश्किल से बचे. कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए कार की सीट के नीचे छिपकर रात काटी थी.

अंग्रेज़ी जीवनी “Kanwar Mohinder Singh Bedi ‘Sahar’: A Celebration of Memories” की भूमिका में दिल्ली के युवा शायर और सॉलिसिटर सैफ़ महमूद लिखते हैं—“सहर ने उर्दू ग़ज़ल की पारंपरिक बनावट को अपनाया, लेकिन उसमें आधुनिक नैतिक चेतना भर दी. उनकी भाषा बेहद साफ़ और सीधी है; उसमें बनावट या पेचीदगी नहीं. वह बड़ी से बड़ी बात को भी हँसी और शरारत में कह जाते थे.”
और फिर वह उनके ये अशआर बताते हैं —
नित-नित का ये आना-जाना मेरे बस की बात नहीं
दरबानों के नाज़ उठाना मेरे बस की बात नहीं.
इश्क़ो-मुहब्बत क्या होते हैं, क्या समझाऊँ वाइज़ को
भैंस के आगे बीन बजाना मेरे बस की बात नहीं.
और फिर वही मशहूर पंक्तियाँ —
मरना तो लाज़िम है इक दिन, जी भर के अब जी लूँ
मरने से पहले मर जाना मेरे बस की बात नहीं.
इन पंक्तियों में जैसे पूरा बेदी साहब समा जाता है— बेख़ौफ़, दरियादिल, ज़िंदगी से भरपूर.
किताब की भूमिका में अश्वजीत सिंह लिखते हैं कि आज के हिंसा, कट्टरता और नफ़रत से भरे समय में यह किताब शायद पहले से ज़्यादा प्रासंगिक है. ऐसे दौर में, जब मुल्क एक-दूसरे के सामने खड़े हैं और इंसानी ज़िंदगियाँ सियासत की भेंट चढ़ रही हैं, बेदी साहब की आवाज़ साझी इंसानियत की आख़िरी बची हुई रोशनियों में से एक लगती है.
किताब की अनुवादक कामना प्रसाद अपने नोट “A Life, a Vision, a Presence” में लिखती हैं—“कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ मूलतः दिल से एक शायर थे—रूमानी मिज़ाज के, नफ़ासत से भरे हुए. उनकी शायरी दुनियावी मोहब्बत से रूहानी इश्क़ तक बहुत सहजता से सफ़र करती है.” कामना प्रसाद फिर उनका यह शेर साझा करती हैं —
आग से आग न लग जाए कहीं
तुम हसीं हो तो जवाँ हूँ मैं भी.
इस किताब के बारे में एक बात और दिल को छू जाती है. शायद इसकी सबसे बड़ी विडम्बना—और सबसे बड़ी उम्मीद—यही है कि ‘सहर’ को वे लोग भी पढ़ेंगे जो उस साझी संस्कृति और इंसानी बराबरी के ख़िलाफ़ खड़े दिखाई देते हैं, जिसकी वह सारी उम्र हिमायत करते रहे. लेकिन अगर उनके दिल तक बेदी साहब की इंसानियत का थोड़ा-सा उजाला भी पहुँच जाए, तो यही इस किताब की सबसे बड़ी कामयाबी होगी.
कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ मेरे ससुर बी.के. भगत के बेहद क़रीबी दोस्तों में थे. दोनों लगभग हर दूसरे दिन चेल्म्सफ़र्ड क्लब में मिलते, ब्रिज खेलते और देर तक बातें करते. भगत जी को भी शायरी का शौक़ था और बेदी साहब के क़िस्से सुनना उन्हें बहुत पसंद था. दोनों ने साथ मिलकर एक हिन्दी फ़िल्म भी बनाई.
मेरी उनसे जितनी भी मुलाक़ातें हुईं, हर बार उन्होंने मुझे बेटे जैसा अपनापन दिया. मेरा हाल पूछते, नई लिखी हुई ग़ज़लें सुनाते और बड़ी मोहब्बत से पेश आते. धीरे-धीरे वह मेरे लिए भी एक ख़ैरख़्वाह-से बन गए थे.
उस शाम समारोह में मुझे तीन और परिचित चेहरे दिखे, जो किसी न किसी रूप में इस किताब और बेदी साहब से जुड़े थे. अनुवादक कामना प्रसाद पुरानी दोस्त हैं. सैफ़ महमूद— जाने-माने वकील और शायर — मेरे क़रीबी साथी हैं. और किताब का आवरण डिज़ाइन करने वाले नौजवान कलाकार शिराज़ हुसैन भी अपनेपन के दायरे के ही इंसान हैं, जिनका स्टूडियो “ख़्वाब तन्हा” बेहद ख़ूबसूरत कलात्मक काम करता है.
एक पल को लगा—क्या यह महज़ इत्तेफ़ाक़ था, या ज़िंदगी कोई ख़ामोश इशारा कर रही थी?
इस लेख को समाप्त करते हुए मुझे बेदी साहब की दो ग़ज़लें याद आ रही हैं. पहली, जिसे मोहम्मद रफ़ी साहब ने अपनी दर्द भरी आवाज़ दी —
ख़ुदा ही जाने, यार आए न आए
मेरे दिल को क़रार आए न आए…
वो आए भी तो अब शिद्दत-ए-दर्द
ख़ुदा जाने, क़रार आए न आए.
इबादत तो है पीरी में भी मुमकिन
जवानी बार-बार आए न आए.
और दूसरी वह ग़ज़ल, जिसने नब्बे के दशक में जैसे हर महफ़िल को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था — जगजीत और चित्रा सिंह की आवाज़ में —
आए हैं समझाने लोग, हैं कितने दीवाने लोग
वक़्त पे काम नहीं आते हैं, ये जाने-पहचाने लोग…
दैर-ओ-हरम में चैन जो मिलता, क्यों जाते मयख़ाने लोग…

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