फीफा डायरी | सेमीफ़ाइनल एक

फीफा विश्व कप के पहले सेमीफ़ाइनल की बात करने से पहले समय को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं और स्मृति बन चुके दो मैचों को एक बार फिर याद कर लेते हैं.

एक, बात 5 जून 2025 के यूएफा नेशंस लीग की है. इसका दूसरा सेमीफ़ाइनल फ्रांस और स्पेन के बीच खेला गया था. इस बहुत ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण मुक़ाबले में कुल नौ गोल हुए. ये मैच स्पेन ने 5-4 से जीता.

दो, समय को थोड़ा और पीछे लिए चलते हैं. तारीख़ आती है 9 जुलाई 2024. स्थान एलियांज स्टेडियम म्यूनिख. एक और सेमीफ़ाइनल. इस बार यूएफा यूरो 2024 प्रतियोगिता का. प्रतिद्वंद्वी वही स्पेन और फ्रांस. नतीजा भी वही. एक बहुत ही संघर्षपूर्ण व रोचक मुक़ाबले में स्पेन ने फ्रांस को 2-1 से हरा दिया.

इतिहास अपने को दोहराता है. एक बार नहीं बार-बार.

इस बार स्थान अमेरिका का डलास. एक बार फिर सेमीफ़ाइनल. इस बार फीफा विश्व कप 2026 का. प्रतिद्वंद्वी वही फ्रांस और स्पेन. नतीजा भी वही. स्पेन ने फ्रांस को 2-0 से हरा दिया.

इतिहास की घटनाओं से कुछ निष्कर्ष निकाले जाते हैं. कुछ सबक सीखे जाते हैं. कुछ प्रेरणाएं ले जाती हैं. लोगों ने और विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि ये इस विश्व कप का सबसे शानदार मैच होने जा रहा है. एक ऐसा मैच जो आगे के समय में उद्धृत किया जाता रहेगा. एक फ़ाइनल जो फ़ाइनल से पहले होने जा रहा है. एक ऐसा मैच जिसका हाइप क्रिएट हो गया था. लेकिन निष्कर्ष ग़लत भी साबित होते हैं. इस बार वहीं हुआ.

ये स्पेन की एकतरफ़ा जीत थी. कई बार आंकड़े घटनाओं की सही तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाते. इस मैच की स्कोरलाइन भी नहीं कर रही है. स्पेन ने फ्रांस को कहीं टिकने नहीं दिया. याद कीजिए 8 जुलाई 2014 को बेलो होराइजेंटो के मिनईराको स्टेडियम में फीफा विश्व कप के पहले सेमीफ़ाइनल को. जर्मनी ने मेजबान ब्राजील को 7-1 से हराकर जिस तरह ह्यूमिलेट किया था, ये उससे कम ना था.

नहीं पता स्पेन ने फ्रांस पर पहली दो जीत से सबक सीखे थे या नहीं. या फिर उससे कुछ सीखने की जरूरत थी भी या नहीं, क्योंकि वे विजेता थे. और विजेता की दृष्टि धुंधली हो जाती है. लेकिन वे उन जीतों से एक चीज अवश्य लेकर आए थे. वो था उनका आत्मविश्वास.

मैच से पहले स्पेन के स्टार खिलाड़ी लामिन यामाल से फ्रांस से होने वाले मुक़ाबले के बारे में पूछा गया. ये सवाल बनता था. फ्रांस की टीम लगातार तीसरे विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में थी और लगातार तीसरे फ़ाइनल तथा एक और विश्व कप जीतने का सपना देख रही थी. ऐसा सपना देखना गैर वाजिब नहीं था. उन्होंने 2018 का विश्व कप जीता था. 2022 के विश्वकप फ़ाइनल में पेनाल्टीशूट आउट में अर्जेंटीना से हारे थे. यानी तीन विश्व कप में वे रेगुलर समय में अजेय थे. और यहाँ अमेरिका में वे तो विपक्षी दल में भय उत्पन्न कर देने की हद तक शानदार खेल दिखा रहे थे. वे सभी मैच बहुत आसानी से और बहुत ही कन्विंसिंग अंतर के साथ जीतकर यहाँ तक पहुंचे थे.

लेकिन स्पेन की टीम और उसके खिलाड़ी इस सब से निश्चिंत थे. लामिन यामाल ने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा था कि ‘हम फ्रांस से नहीं डरते. हमने निकट अतीत में उन्हें कई बार हराया है.’ ये यामाल का दंभ या अहंकार नहीं था. ये जमीनी हकीकत थी. वे निकट अतीत में फ्रांस को दो बार हरा चुके थे. ये निकट अतीत की जीत से अपने साथ यहाँ विश्व कप में लाया गया आत्मविश्वास बोल रहा था. अपनी योग्यता, अपनी काबिलियत पर उन्हें भरोसा था. इसी भरोसे वे इस सेमीफ़ाइनल में फ्रांस के मुक़ाबिल थे. निडर. निशंक. दृढ़ प्रतिज्ञ. स्थितप्रज्ञ.

दरअसल फ्रांस और स्पेन के बीच का ये सेमीफ़ाइनल दो टीमों के फ़ाइनल में पहुंचने और अपने विश्व कप को जीत लेने के सपने को वास्तविकता के और करीब ले आने का रास्ता भर नहीं था,बल्कि यूरोपियन फ़ुटबॉल में श्रेष्ठता स्थापित करने की लड़ाई भी थी. ये अपराजित रक्षण और अजेय आक्रमण के बीच का द्वंद्व था. ये वैयक्तिक हीरोइज़्म और सामूहिक सामंजस्य के मध्य की होड़ थी. ये दो टीमों के खिलाड़ियों के बीच का द्वंद्व भर नहीं था,बल्कि दो दिग्गज प्रशिक्षकों के बीच का,उनके विचारों का, उनकी रणनीतियों का, उनकी काबिलियत की परीक्षा भी थी. ये दिदियेर डेसचैम्प्स और लुइस दे ला फुएंते के बीच संघर्ष था. ये लेस ब्लेस और ला रोजा के बीच मुकाबला था. यहाँ लाल रंग नीले रंग से मुकाबिल था.

फ्रांस ने 4-2-1-3 के और स्पेन 4-1-2-3 के फॉर्मेशन से खेल शुरू किया. दोनों टीमों के इरादे साफ़ थे. दोनों अटैकिंग खेलना चाहते थे. लेकिन अलग-अलग संभावनाओं के साथ.

इस पूरे विश्व कप में फ्रांस ने शानदार अटैकिंग खेल दिखाया था. उनके पास अनस्टॉपेबल फ़ॉरवर्ड की चौकड़ी थी – एम्बाप्पे, डेम्बेले, ओलिसे और बारकोला. उन्होंने अर्जेंटीना के बाद सबसे ज्यादा 16 गोल बनाये थे. उनको अपनी आक्रमण पंक्ति पर पूरा भरोसा था. उस आक्रमण पंक्ति पर जिसे रोक पाना किसी भी डिफेंस के लिए अब तक तो नामुमकिन रहा था. लेकिन जितनी चर्चा उनके अटैक की थी, उतनी ही डिफेंस की थी. डिफेंस उनका कमजोर माना जा रहा था. उनकी सोच रही होगी कि भले ही एकाध गोल हो जाएं पर अटैक इतना पावरफुल है कि विपक्षी पर ज्याद गोल मार देंगे. वे अपनी स्ट्रेंथ पर खेल रहे थे.

दूसरी तरफ स्पेन की सोच उलट थी. इस प्रतियोगिता में उनका डिफेंस लगभग अजेय रहा है. चट्टान की तरह. जिसे भेद पाना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन था. उन्होंने केवल एक गोल खाया था. पूरी प्रतियोगिता की दौरान उनके डिफेंस की चर्चा रही थी.जबकि आक्रमण उनका शांत सा रहा था. लामिन यामाल ने केवल एक गोल किया था. केवल मिकेल ओयारज़ाबल ने चार गोल किए थे. और कोई भी खिलाड़ी गोल्डन बूट की दौड़ में शामिल नहीं था. वे अटैकिंग इसलिए ही खेल रहे थे कि शुरुआत में ही एक बार बढ़त बना लें, तो फिर वे अपना किला विपक्षी को नहीं ही भेदने देंगे. वे अपनी कमज़ोरी पर खेल रहे थे. उसे एड्रेस कर रहे थे. अजेय आक्रमण के सामने अभेद्य रक्षण खड़ा था.

स्पेन की टीम मैदान में उतरते ही बॉल पर ऐसे कब्जा जमाती है मानो बॉल केवल उसकी मिल्कियत हो. वो ज़्यादा से ज्यादा बॉल पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती है. इसके लिए उसकी छोटे-छोटे पासों वाली ‘टिकी-टाका’ खेल शैली सबसे मुफीद बैठती है. इस मैच में भी ऐसा ही हुआ. स्पेन ने शुरू से ही गेंद पर अपना दबदबा बनाए रखा. डेडलॉक को तोड़ने में स्पेन को केवल 22 मिनट लगे, जब फ्रांस के पेनल्टी क्षेत्र में लुकास डिग्ने ने लामिन यामाल पर फाउल किया और ओयारजाबल ने पेनल्टी से गोल बनाया.

ये लुकास डिग्ने की इतने क़रीबी मैच की ऐसी लापरवाही भरी भूल थी, जो अक्षम्य है. डिग्ने का यामाल से कोई क्लोज कॉन्टैक्ट नहीं था. उन्होंने या तो यामाल को नोटिस नहीं किया या फिर उन्हें लगा कि वे पहले ही गेंद क्लियर कर देंगे. ये एक गलती मैच का टर्निंग प्वाइंट था. इस गोल के आते ही स्पेन दोगुनी उत्साहित हुई और आत्मविश्वास आसमान पर था. उसके बाद दूसरे हॉफ के शुरू में 58वें मिनट में ओल्मा के पास पर पोरो ने गोलकर मैच के निर्णय पर अंतिम मुहर लगा दी. ये गोल स्पेन के लंबे मूव का परिणाम था और उसकी ‘टिकी-टाका’ शैली का सबसे शानदार निर्देशन भी.

स्पेन का पूरे मैच पर दबदबा रहा. उन्होंने गेंद पर पूरा नियंत्रण रखा और खेल की गति को अपने अनुसार नियंत्रित किया. स्पेन के दबदबे को इस बात से समझा जा सकता है कि फ्रांस के केवल दो शॉट लक्ष्य पर लगे. उन्होंने फ्रांस की मजबूत अग्रिम पंक्ति को हमला करने का कोई मौका ही नहीं दिया. अब तक की फ्रांस की जीतों में माइकल ओलिसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी. वे शानदार प्लेमेकर थे. लेकिन इस मैच में कुकुरेला ने उन्हें पूरी तरह से मार्क करके रखा. उन्होंने बार-बार गेंद का पजेशन खोया और एक भी ड्रिबल पूरा नहीं कर पाए. औस्मान डेम्बेले को गेंद लेने के लिए बार बार पीछे आना पड़ रहा था. और एम्बाप्पे को गेंद मिल ही नहीं पा रही थी.

इस मैच पर रॉयटर्स की रोचक टिप्पणी थी कि ‘स्पेन ने फ्रांस को अनाकोंडा की तरह जकड़ लिया था.’ एक और रोचक कमेन्ट एक्स पर डॉ.रमाकांत राय का है. उन्होंने लिखा ‘स्पेन ने अपने गोलपोस्ट पर काला जादू कर रखा है.’ हाँ, निसंदेह ये जादू ही है. काला जादू. इसमें क्या शक हो सकता है कि स्पेन पर अब तक केवल एक गोल हुआ है. हाँ ये जरूर है कि ये जादू किसी तंत्र मंत्र से सिद्ध नहीं है,बल्कि उनकी उस अभेद्य रक्षापंक्ति से सिद्ध हुआ है जिसमें कहीं कोई दरार नहीं है. जो चट्टान की माफ़िक है. वो जादू जो कप्तान रोड्री, फेबियन रूइज, ओल्मो के मिडफील्ड तथा कुकुरेला, कुबारसी, लेपोर्टे और पोरो के बैक लाइन से बना है.

ये स्पेन की एक शानदार जीत है जो वैयक्तिक प्रतिभा के ऊपर टीम की सामूहिकता, उनके खिलाड़ियों के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल की जीत है. ये स्पेन की फ्रांस पर बड़ी प्रतियोगिताओं के लगातार तीसरे सेमीफ़ाइनल में जीत थी.

हार के बाद एम्बाप्पे कह रहे थे, “हमने वो प्रदर्शन नहीं किया जो हम चाहते थे, न तो सामरिक दृष्टि से, न तकनीकी दृष्टि से और न ही समग्र स्तर पर. जब आप विश्व कप के सेमीफ़ाइनल में वो करने में विफल रहते हैं जो आपको करना चाहिए, तो आप जीत नहीं सकते. स्पेन अपनी योजना और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा. हमारी प्रेसिंग में संवाद की कमी थी… यहाँ तक कि जब हमने गेंद पर दोबारा क़ब्जा जमाया, तब भी हमारे पहले पास और पहले टच विश्व कप सेमीफ़ाइनल के लायक़ नहीं थे.”

अब फ़ाइनल में उनका मुकाबला इंग्लैंड और अर्जेंटीना के बीच के होने वाले विजेता से होगा. फ़ाइनल मैच की प्रकृति क्या होगी ये इस बात पर निर्भर करेगा कि दूसरे सेमीफ़ाइनल में कौन जीतता है. इंग्लैंड जीतता है तो ये यूरो 24 का रेप्लिका होगा और यूरोप में फ़ुटबॉल की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष बन जाएगा. और अगर अर्जेंटीना जीतती है तो ये दो महाद्वीपों यूरोप और दक्षिण अमेरिका के बीच फ़ुटबॉल की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता, दो फ़ुटबॉल परंपराओं का द्वंद्व होगा.

तो कल का इंतज़ार करिए.

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