किताब | दर्रा दर्रा हिमालय

  • 10:11 pm
  • 12 October 2026

दुनिया में
आठ सुर थे
तुम चुप्पियाँ
सुनना भूल गए!
—सुजाता नारायण

‘दर्रा दर्रा हिमालय’ पढ़कर ख़त्म करने के तुरंत बाद ‘रुके हुए पानी की धुन’ शीर्षक वाली यह कविता फ़ोन के स्क्रीन पर चमकी तो लगा कि जैसे किताब का सार पा लिया हो. दरअसल यह किताब हिमालय की चुप्पियों का स्वर ही तो है, कितनी ही बर्फ़ीली चोटियों, ग्लेशियरों, नदियों-झरनों-तालाबों, खाइयों-खंदकों और दुर्गम रास्तों से होकर गुज़रते हुए सुना-महसूस किया हुआ संगीत. इंसानी दख़ल और जैव विविधता में बदलावों के दंश ख़ामोशी से बर्दाश्त करके पल-छिन रूप बदलती प्रकृति की ख़ामोशी का आठवाँ सुर. कालिन्दी खाल और ऑडेन कॉल अभियान की यह गाथा डॉ.अजय सोडानी के इष्ट-मित्रों के उस सवाल का जवाब भी है कि ऐसी दिशाहीन, लक्ष्यविहीन यात्राओं से आख़िरकार उन्हें हासिल कुछ नहीं हुआ, और न ही आगे कुछ हासिल होगा. ब-क़लम-ए-ख़ुद, डॉ.सोडानी को हिमालय की लत है, मगर उनकी इस लत का फ़ैज़ तो उन्हें भी पहुँचता है, जो उनकी तरह का जोख़िम उठाकर हिमालय के बीहड़ों में भटकने का माद्दा नहीं रखते मगर पहाड़ों से, क़ुदरत से मोहब्बत करते हैं, पहाड़ों के नज़ारे जिनके लिए प्रकृति को समझने-बूझने-महसूस करने का ज़रिया हैं और जो विकास के नाम पर विनाश के सरंजाम जुटाने की कोशिशों को लेकर फ़िक्रमंद रहते हैं.

किताब के कवर पर ऑडेन कॉल की तस्वीर देखते हुए भी ऐसा ही भाव जागता है. दोस्तों की राय अपनी जगह, पर दुनिया ने डॉ.सोडानी की यायावरी की धुन को विरला मानते हुए उसे सलाम किया, और समुचित मान भी दिया. सोडानी परिवार यानी अजय, अपर्णा और अद्वैत का मई-जून 2005 में पूरा हुआ कालिन्दी खाल अभियान, यह दर्रा पार करने वाले पहले परिवार के तौर पर लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स (2006) में दर्ज हुआ, और जून-जुलाई 2009 में ऑडिन कॉल दर्रे को पार करने वाली पहली महिला के तौर पर अपर्णा सोडानी का नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स (2011) में शामिल किया गया. यों ख़ुद लेखक के लिए ये यात्राएं किसी रिकॉर्ड के मक़सद से नहीं थीं, उनका उत्स तो पौराणिक कथाओं की सच्चाई जाँच लेने की बेचैनी थी, अपना सौंदर्य खोते जा रहे हिमालय को भर-नज़र देखने-दर्ज करने का इरादा था और जो धीरे-धीरे ख़ुद अपने आप की तलाश में तब्दील होती चली गईं.

इन यात्रा-गाथाओं की ख़ूबी डॉ.अजय सोडानी का क़िस्सा कहने का सलीक़ा भी है, जो इन्हें रोंगटे खड़े कर देने वाले प्रसंगों, रूक्ष आँकड़ों और तमाम जगहों के नाम वाले ब्योरों का दस्तावेज़ बनने से बचाए रखता है. क़ुदरती नज़ारों के कविता सरीखे रागात्मक बयान और अनूठी उपमाओं से सजे अपने इस गद्य में आसन्न संकटों, इम्तिहान लेने वाले जोखिम भरे रास्तों और ज़िंदगी दाँव पर लगी होने के वाक़यों को भी वह इतने दिलचस्प फ़लसफ़े के तौर पर पेश करते हैं कि पढ़ने वाला काँपकर ठहर जाने के बजाय मौक़े की नज़ाकत महसूस करते हुए आगे बढ़ता जाता है. जैसे कि ख़ुद उन्होंने और उनके साथियों ने रास्ते में मिले बेशुमार क्रेवास पार किए होंगे. पढ़ने वालों के लिए उनकी कहन ही सीढ़ी, रस्सी और हौसले का काम करती है. यात्राओं के अपने हमसफ़र गाइड और कुक से लेकर कुलियों तक के किरदार वह इतने पुख़्ता तरीक़े से गढ़ते हैं कि याद रह जाते हैं.

उनके ज़ाँस्कर अभियान (एक था ज़ाँस्कर) के बारे में पढ़ते हुए हम उन्हें जिस कमल को बड़ी आत्मीयता से याद करते हुए पाते हैं, वह उनके यमुनोत्री पास अभियान दल के अगुवा थे. इस सफ़र में आगे बढ़ने की उन लोगों की हड़बड़ी पर विराम लगाने और परिंदों को देखने के लिए रोककर बैठा लेने वाले कमल के बारे में उन्होंने इस किताब में एक क़िस्सा बयान किया है कि क़रीब एक घंटे बाद कमल उठा और हमसे बोला—“अब चलिए, आगे चलते हैं, लेकिन कोई जल्दी नहीं. अरे आप जीवन की दौड़ से भागकर यहाँ हिमालय पर आए हैं—कुछ देर ठहरकर देखें तो सही. गुज़रते क्षण और आते क्षण के मध्य में जो एक छुपा हुआ स्पन्दनहीन अन्तराल है, आती और जाती साँस के मध्य जो एक निष्कम्प ठहराव है. उसको महसूस करने की चेष्टा करें. गति से अभिभूत हम लोग उस ठहराव की आदतन उपेक्षा करते हैं, जबकि मुझे लगता है कि जिस आनन्द की खोज में हम सब भाग रहे हैं वह तो उसी ठहराव में छुपा हमारा इन्तज़ार कर रहा होता है.” यह किताबों से हासिल इल्म नहीं, अनुभवों का निचोड़ है और एक बार इसे पढ़ लेने के बाद कमल किसी को भी याद रह जाने वाली शख़्सियत बन जाता है, भले ही आगे के अभियानों में डॉ.सोडानी का साथ देने से पहले वह दुनिया से रुख़सत हो गया.

19500 फ़ीट से थोड़ा ज़्यादा ही ऊँचे कालिन्दी पास को दुनिया का सबसे ऊँचा ट्रेकेबल पास समझा जाता है. दुर्गम रास्ते, ख़राब मौसम, जानलेवा हादसे का ख़ौफ़ दिखाकर और मैडम और बच्चे की हिफ़ाज़त का हवाला देने के बाद भी गाइड सोनी जब हिमालय के एकलव्य डॉ.अजय का इरादा बदलने में नाकाम रहे तो उन्होंने रास्ते में प्रेत-बाधा और भूतों के शिकार पर्वतारोहियों की नज़ीर भी पेश की. पर दाल नहीं गलनी थी तो नहीं गली. सफ़र में साथ चल रहे, और मनोबल ध्वस्त में माहिर, डी.एन. ने भी उनको बताया कि कालिन्दी पर चढ़ते-चढ़ते तमाम लोग बहक जाते हैं, बड़बड़ाते हैं, कई तो दौड़ लगा देते हैं और कुछ क्रेवास में कूद भी जाते हैं, कि दर्रे के दोनों तरफ़ हर साल मरने वाले लोग भूत बनकर पर्वतारोहियों की राह में अडंगा डालते हैं.

और बदक़िस्मती यह कि उसकी बात सच हो गई. दर्रे की ऊँचाई पर पहुँचने से थोड़ा पहले अपर्णा जी को भूत लग ही लिया. नेपाली ज़बान में मंत्र पढ़कर फूँक मारते हुए डी.एन. चीख़ा—“जा भाग-डाइन-भाग.” उसे धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में जवाब मिला—“यू फूल, यू रन अवे, आई एम नॉट डाकन, यू आर डाकन, आई विल सिट हियर, आई एम लविंग इट.” और डी.एन. की घबराहट के बीच तंत्रिका-तंत्र के प्रोफ़ेसर डॉ.अजय सोडानी ने भाँप लिया कि यह ‘हाई एल्टीट्यूड सिकनेस’ यानी बेहिसाब ऊँचाई पर प्राणवायु की कमी की वजह से सन्निपात की अवस्था है, जिससे पार पाने के लिए अपर्णा जी को ऑक्सीज़न दिए जाने की ज़रूरत थी और चूँकि वे लोग ऑक्सीज़न सिलिंडर साथ नहीं लाए थे सो दूसरा तरीक़ा फ़ौरन कम ऊँचाई की तरफ़ जाना ही था.

डॉ.सोडानी के यात्रा-वृतांत की एक और ख़ूबी जैव-विविधता की अहमियत और पर्यटन-विकास की होड़ में बर्बाद हो रहे पर्यावरण की बाबत उनकी फ़िक्र और सरोकार हैं. वह हिमालय के किसी हिस्से में हों, किसी दर्रे या बमक पर चल रहे हों, किसी स्थान विशेष से हासिल अपने अनुभव साझा कर रहे हों पर यह सरोकार उनकी बातों, उनकी निगाहों में जज़्ब रहता है, अंतर्निहित धारा की तरह बहता रहता है. और फिर जहाँ मौक़ा मिलता है, पढ़ने वालों की निगाहों के सामने आ खड़ा होता है. अफ़सोस और मलाल के वसन में लिपटा मासूम तंज़. नन्दनवन से वासुकी ताल के उनके सफ़रनामे का यह आख़िरी हिस्सा देखिए और फिर राजपड़ाव से बद्रीविशाल पहुँचने के बाद का उनका तजुर्बा, आप ख़ुद ही समझ जाएंगे.

नन्दनवन से वासुकी तालः शहरों की तुलना में पहाड़ पर ‘नाइट लाइफ़’ जल्दी शुरू हो जाती है—सूरज के ढलते ही. यहाँ का ‘नाइट क्लब’ खुलता है नभ में तथा शहरों की तुलना में यहाँ शोर-शराबा भी क़तई कम नहीं रहता. चाँद और तारों को अगर आप शान्त समझते हैं तो यहाँ इनकी भागमभाग देख और उससे पैदा होता शोरगुल सुन आप विस्मित रह जाएँगे. सत्य तो यह है कि तारों की उत्तरोत्तर बढ़ती संख्या के चलते, यहाँ आकाश में शोरगुल दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है—त्रस्त हो शहरों से पलायन कर चुके तारे इन बीहड़ों में ही तो शरण ले रहे है! ‘नाइट क्लब’ में चाँद अक्सर अपनी अँजुरी में चाँदनी भर कभी इस शिखर पर, कभी उस चोटी पर, कभी इस ताल पर, कभी उस मैदान पर, यहाँ तक कि आप-हम पर भी, छींटते हुए आगे-आगे चलता है, उसके पीछे दौड़ते हैं तारे—सारे तारे. जैसे मोहल्ले का नेता आगे-आगे और उसके चमचे पीछे-पीछे! अक्सर इनमें से कुछ गिर भी जाते हैं, वह भी टुन्न हुए बिना, होता यूँ है कि चाँदनी की ख़ैरात लूटने की तारों में बहुत होड़ रहती है, इतनी कि यदा-कदा तो कुछ तारे अपना सन्तुलन खो आसमान से गिर तक जाते हैं. अगर कोई पानी का ढबरा भरा दिख जाए तो चाँद कुछ देर उसमें अपना मुँह निहारे बिना आगे नहीं बढ़ता, इसी दर्पण में स्वयं को देखने की होड़ में भी तारे लड़खड़ाकर गिर जाते हैं. विरहाग्नि से दग्ध मोनाल की दृष्टि ज्यों ही आकाशगंगा में टूटते तारों पर पड़ती है वह मन्नतें माँगते हुए निकल आता है. औडार से बाहर खुले मैदानों में—घात लगाए बैठी लोमड़ी पर ध्यान दिए बिना. सच है कि चाँद प्रेमियों की जान आफ़त में डाल देता है. चाँद अपने चमचों के मज़े भी बहुत लेता है—कभी तो वह पूरा का पूरा मंच पर आता है और कभी अपने घर की मुँडेर से थोड़ा-सा सिर भर निकाल इन्तज़ार कर रहे तारों को तड़पाता है. हद तो उस रात होती है जब वह वादा करके भी नहीं आता—बेचारे तारे उस रात बहुत दुखी हो जाते हैं.

राजपड़ाव से बद्रीविशालः शाम होते-होते बद्रीविशाल पहुँच गए. पर वहाँ तो मानो मेला लगा था—सैंकड़ों लोग, हज़ारों वाहन, अकूत कोलाहल. गंगोत्तरी से भी बदतर हालात थे यहाँ के. अतिक्रमण इतना कि गुमटियों के बीच गुम हो चुके मंदिर की रहा पूछे बिना ढूँढ़ पाना मुश्किल था. गिरते-पड़ते मन्दिर पहुँचे तथा दर्शन पूर्व नहाने हेतु तप्त कुंड तलाशने लगे. मालूम पड़ा कि सरकार ने जगह-जगह नहाने के स्थल बना दिए हैं, जहाँ पाइप द्वारा तप्त कुंड का जल प्रदान किया जाता है. अब उस कुंड तक जाने की अनुमति नहीं है. मन्दिर के इर्द-गिर्द लिपटी सर्पनुमा लाइन को भुगतकर ज्यों ही उसके दूसरे सिरे पर पहुँचे कि वसूली कर रहे पंडों और व्यवस्था के नाम पर लोगों को खदेड़ रहे सरकारी नुमाइंदों ने हमें भी हड़काकर दर्शन द्वार से परे धकेल दिया. ठीक भी है, बढ़ती महँगाई के साथ भगवान का ‘मेंटेनेंस’ ख़र्च भी ज़्यादा हो गया होगा. ऐसे में हम सरीखे ख़ाली हाथ आए, बेढब, काले-कलूटे दर्शनार्थियों की तुलना में हज़ारों रुपये दे विशेष दर्शन करने वालों को अधिक तवज्जोह मिलना ग़ैरवाजिब नहीं मानना चाहिए.

मन्दिर परिसर से अपनी आबरू समेटकर हम सब पुन: देवस्थल के इर्द-गिर्द, मकड़ी के जाले जैसी गलियों में धँस गए. सारा का सारा इलाक़ा विकास के चपेट में आकर अपना ऐतिहासिक रूप खो चुका था. पंजाबी ढाबों, पिज़्ज़ा और बर्गर की दुकानों, आइसक्रीम पार्लर, बैंक, धर्मशालाओं, होटलों तथा धनलोलुप लोगों के बीच अपने पुराने प्रारूप में कुछ था तो सिर्फ़ बद्रीविशाल मन्दिर का शिखर. दूर से शिखर दर्शन करके ही हमने हमारी इस यात्रा की इतिश्री कर ली.

इस किताब में यात्रा से परे कुछ कथाएं हैं, जो बहुतेरी मान्यताओं को बेहतर समझने के सूत्र देती हैं. हालात के मुताबिक बेचैन मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए लिखी हुई कविताएं हैं. दर्रे, बर्फ़ीली चोटियों, बमक, घाटी, फूल, प्रपात और पशुओं की कई ख़ूबसूरत तस्वीरें भी हैं. ऑडेन कॉल अभियान, लेखक ने जिस कुछ क़दम पांडवों के पदचिह्नों पर कहा है, की गाथा में किसी बुग्याल के बकरी वाले कैम्प की तस्वीर ऐसी है, जो हेनरी मूर के भव्य शिल्प ‘शीप पीस’ की याद दिलाती है. एक और तस्वीर है, जो पढ़ने वालों को अपनी कल्पना से बनाने की ज़रूरत पड़ती है—पर्वत शिखरों और दर्रों के ऊपर ईश्वर का वास मानते हुए पर्वतारोहियों की पूजा का प्रसंग. डॉ.सोडानी ने उस सादी-सी पूजा का वर्णन इस तरह लिखा है, उसकी तस्वीर देखने और न मिलने पर उसकी कल्पना की कामना ज़रूर जागती है.

किताबः दर्रा दर्रा हिमालय (साहसिक यायावरी की गाथा)
लेखकः अजय सोडानी
प्रकाशनः राजकमल पेपरबैक्स
क़ीमतः 399 रुपये


अपनी राय हमें  इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.