मक़बूल: ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव की उम्दा नज़ीर

  • 9:32 pm
  • 18 January 2026

‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव’ एक अहम तकनीक है, जिसका मक़सद कहानी की गहरी, असरदार और दिलचस्प प्रस्तुति है, जो पढ़ने या देखने वालों के दिमाग़ को झकझोरती है, चौंकाती है, लुभाती है, कहानी के तमाम तत्वों की तलाश को प्रेरित करती है और कहानी को नई ऊंचाइयों तक ले जाती है. विलियम शेक्सपियर के लेखन में इसी ख़ास ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव तकनीक’ के सहज इस्तेमाल से कैसे ‘मैकबेथ’ नाटक असरदार बना और कैसे असहज इस्तेमाल के चलते ‘हैमलेट’ फूहड़, कमज़ोर और बेअसर. ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव तकनीक’ के चलते लेखक व निर्देशक को आज़ादी हासिल होती है, जिससे वे किरदारों के भीतर उमड़ रहे जज़्बात को अप्रत्यक्ष रूप से व सहजता के साथ दर्शकों के दिलोदिमाग़ तक पहुंचा पाते हैं, उनका संदेश साफ़ हो जाता है और लोगों का दिमाग़ भी इन जज़्बात को थोड़ी जद्दोजहद के बाद क़ुबूल कर लेता है.

2019 से अगर हम हिन्दी सिनेमा में हिंसक दृश्यों के फ़िल्मांकन को लेकर हुई तब्दीलियों पर ग़ौर करें तो पाएंगे कि ‘कबीर सिंह’, ‘ऐनीमल’ और हालिया रिलीज़ ‘धुरंधर’ में हिंसा को ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो दी गई है, प्रत्यक्ष रूप से ख़ून-ख़राबा पर्दे पर दिखाई देता है. यही वजह है कि फ़िल्मों के बहुतेरे हिस्सों में फूहड़ता नज़र आती है और दर्शक असहज महसूस करते हैं, ऐसे में ‘मक़बूल’ जैसी शाइस्ता फ़िल्म का ज़िक्र करना ज़रूरी हो जाता है कि विशाल भारद्वाज ने बिना ख़ून-ख़राबे के मुंबई के अपराध जगत में रची बसी फ़िल्म ‘मक़बूल’ में किस तरह आतंक और ख़ौफ़ का माहौल रचा था, दर्शक कैसे बिना विचलित हुए पर्दे पर चल रही हलचल में खुद को शामिल कर पाते हैं.

‘मक़बूल (2003)’ विलियम शेक्सपियर द्वारा लिखित ‘मैकबेथ (1606)’ का एक हिन्दी अडैप्टेशन है. मैकबेथ को शेक्सपियर के साहित्य में ख़ास माना जाता है, जिसके कई वजहें हैं, मसलन- मैकबेथ आम जनमानस के काफ़ी नज़दीक है क्यूंकि इस नाटक के किरदार, उनके जज़्बात व विचार उनके क़रीब हैं. शेक्सपियर का ‘हैमलेट (1602)’ ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव के नज़रिये से एक नाकामयाब कोशिश है वहीं मैकबेथ सफ़ल कोशिश. हैमलेट की सबसे बड़ी कमज़ोरी थी कि मुख्य किरदार हैमलेट अपने जज़्बात ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए गाकर सबको प्रत्यक्ष रूप से बयान करता था, वह अपना दर्द सीधे ही सबके सामने रखता था, वहीं मैकबेथ में ऐसा नहीं है, वहाँ सहजता के साथ छोटा व बड़ा जज़्बा सामने आता है, मसलन मैक को बादशाह डंकन की हत्या से ठीक पहले एक ख़ंजर नज़र आता है जो केवल मैक का वहम भर है, मगर अप्रत्यक्ष रूप से यह ख़ंज़र मैक के भीतर चल रहे सही और ग़लत के बीच का अंतरद्वन्द्व ज़ाहिर करता है, ख़ंज़र की नोक बादशाह डंकन के कक्ष की ओर इशारा करती है और बताती है कि तुम्हारी हर महत्वकांक्षा सिर्फ़ इस एक क़त्ल से पूरी हो सकती है, तुम्हें बस वफ़ादारी की सीमा लाँघनी है, इसके बाद पूर्व में हुई भविष्यवाणी के मुताबिक़ तुम स्कॉटलैण्ड के अगले बादशाह बन जाओगे, सर्वशक्तिमान बन जाओगे और तुम्हारी जय-जयकार होगी.

विशाल ने जब मैकबेथ को हिन्दी सिनेमा दर्शकों के लिए अडैप्ट किया तो इसका नाम मक़बूल (मशहूर) रखा और मुख्य भूमिका में इरफ़ान ख़ान को लिया. उन्होंने बहुत ख़ूबसूरती के साथ ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव तकनीक’ का प्रयोग किया है. एक बेहद अहम दृश्य में पंकज कपूर जो अब्बा जी (बादशाह डंकन) की भूमिका में हैं, उन्होंने बेईमानी व ग़द्दारी की हद पार कर चुके अपने साले को सामने ज़मीन पर बैठा रखा है, बीच में एक छोटी-सी मेज़ के ऊपर बिछे सफ़ेद मेज़पोश पर एक पिस्तौल रखी है, ख़ुद पंकज पलंग के ऊपर किनारे पर बैठे हुए हैं. पुरानी एल्बम में लगी तस्वीरों से जुड़ी यादों को ताज़ा करते हैं और अपने साले को उसके मूल फराइज़ से वाक़िफ़ कराने की कोशिश करते हुए कहते हैं कि तुम्हारी इस ग़द्दारी का इल्म होने के बाद अब हम दोनों में से कोई एक ही ज़िंदा रहेगा, इसलिए बीच में जो पिस्तौल रखी है, उसे उठाओ और गोली चलाकर मेरा क़त्ल कर दो, अब्बा जी के साले की आँखों में आंसू हैं और ज़बान पर माफ़ी है.

मगर अब्बा जी लगातार जब गोली चलाने का दबाव अपने साले पर डालते हैं तो वह पिस्तौल उठाकर उन पर तान देता हैं और गोली चला देता है, मगर गोली नहीं चलती है क्योंकि पिस्तौल ख़ाली थी. दरअसल, अब्बा जी अपने साले की आँखों से बह रहे आंसुओं व ज़बान से निकल रहे मुआफ़ी के शब्दों का इम्तिहान ले रहे थे कि क्या वाक़ई में यह सब दिल से हैं या दिखावा भर है और जब उनका साला उस ख़ाली पिस्तौल को उनके माथे पर तान देता है तो अब्बा जी समझ जाते हैं कि ये इंसान अब अपनी ग़द्दारी की चरम सीमा पर पहुंच चुका है, जहाँ सही-ग़लत, ईमान-बेईमान और अच्छे-बुरे का कोई मोल नहीं बचा है, चूंकि ये केवल एक इम्तिहान भर था, इसलिए पिस्तौल ख़ाली थी. अब्बा जी अपने पशेमानी भरे आक्रोश को अपने साले की इस ग़द्दारी, धोखेबाज़ी व ताक़त के प्रति लालच को अपनी आँखों से बयां करते हैं और बिना एक लफ़्ज़ बोले, वह सब कुछ दर्शकों तक पहुंचा देते हैं जो उनके दिमाग़ में चल रहा था. फ़िल्म का पार्श्व संगीत की भी इसमें ख़ास भूमिका निबाहता है.

दूसरी तरफ़, इरफ़ान ख़ान ‘मक़बूल’ में एक पेशेवर अपराधी के किरदार में हैं, जिसे सही और ग़लत के बीच के भेद से कोई सरोकार नहीं है, वो पंकज यानि अब्बा जी का वफ़ादार रहा है लेकिन अपनी महत्वकांक्षा के चलते व तब्बू के अपने ऊपर मज़बूत प्रभाव के कारण वो पिता समान अब्बा जी का क़त्ल करने में झिझकता नहीं है. वो क़त्ल कर देता है और अब्बा जी की जगह भी ले लेता है. क़त्ल के चालीस दिन बाद मक़बूल ने घर पर शाम को अब्बा जी के चालीसवें की फ़ातेहा का इंतज़ाम किया था.

विशाल ने दिन में मक़बूल यानि इरफ़ान ख़ान को नमाज़ अदा करते हुए दिखाया है, इससे पहले मक़बूल को कहीं भी नमाज़ पढ़ते हुए नहीं दिखाया गया है, दरअसल विशाल ने इसके ज़रिये यह जताना चाहा है कि मक़बूल अब मज़हबी हो गया है और उसकी ढीली रस्सी कसे जाने का वक़्त आ रहा है. शाम को उसे बैंको (पियूष मिश्रा) की लाश ज़िंदा होती हुई दिखती है जो उसका दिमागी संतुलन बिगड़ने के आगाज़ का संदेश है.

विलियम शेक्सपियर ने लेडी मैकबेथ का चरित्र चित्रण ख़ूब किया है, लेडी मैक के किरदार में लालच, महत्वकांक्षा, उकसाने की क़ुव्वत और अपराधबोध हैं – ये सारे तत्व ही लेडी मैक के किरदार को असरदार बनाते हैं. अपने अंदर बढ़ रहे अपराधबोध के कारण ही लेडी मैक अप्रत्यक्ष रूप से कहती है कि “अरब का सारा इत्र भी मेरे हाथों से निकल रही दुर्गध को ख़ुशबू में नहीं बदल सकता है”, दरअसल यह महज़ एक वक्तव्य नहीं है, अपराधबोध से धीमे-धीमे सड़ रही लेडी मैक की आत्मा की त्रासदी और उसका हश्र बताता है. यह भूमिका तब्बू ने की है.

फ़िल्म के दूसरे हिस्से में जहाँ तब्बू दरवाज़े से झाँकती हुई दिखती हैं, उनका पूरा शरीर नहीं दिखाई देता है, फ़ोकस केवल उनकी आँखों व खुले बालों पर है, तब्बू अपनी आँखों के चारों तरफ़ बढ़ रहे काले घेरों से, सूख चुकी नज़रों से और पेट में पल और बढ़ रहे बच्चे से अपने भीतर चल रहे अपराध बोध को बिना एक भी लफ़्ज़ बोले दर्शकों के दिलों दिमाग़ तक अपने दर्द, अपनी बेचैनी और अपनी मंद-मंद मौत की आरज़ू का बड़ी सदाक़त के साथ परिचय कराती हैं.

विशाल ने बेहद सदाक़त के साथ मैकबेथ को हिन्दी के मक़बूल का रूप दिया है, और हिन्दी सिनेमा की ख़ास उल ख़ास फ़िल्मों में से एक बनाया है.


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