जाने ये कैसा ताना-बाना है

  • 10:05 am
  • 5 June 2020

अगर वह होते तो देख पाते कि हमने उनकी बानी और उनका दर्शन किस क़दर आत्मसात किए हैं, कितना अमल करते हैं उनके कहे पर. लुकाठी हाथ लेकर बाज़ार में खड़े होने के उनके आह्वान से इतना मुतासिर हुए कि हमने अपने आसपास का सब कुछ बाज़ार में तब्दील कर डाला है– धर्म-कर्म, पढ़ाई-लिखाई, खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना और यहां तक कि आपस के रिश्ते भी.

जीवन की हर गतिविधि पर स्वीकृति की मुहर बाज़ार लगाता है. मां-बाप, भाई-बहन, यार-दोस्तों से नेह के रिश्तों की गहराई, उनकी प्रगाढ़ता का पैमाना बाज़ार के पास है. लुकाठी में चूंकि आग होती है और अपना घर फूंकना न तो अकलमंदी का काम है और न ही व्यावहारिकता के लिहाज़ से मुनासिब है, सो बाज़ार ने ‘फायर फाइटिंग’ के तमाम नए तरीक़े ईजाद कर डाले हैं. वैसे भी इतना कहा तो हम घर के बड़े-बूढ़ों का भी नहीं मानते और बब्बा को तो कहकर गए पांच सदियां गुज़र गईं.

देख पाते कि हम उन्हें कहां-कहां किस-किस बहाने याद करते रहते हैं. हमने मंहगे पत्थरों से उनकी ख़ूबसूरत मूर्तियां गढ़ी हैं, धूप-अगर से सुवासित चौरे और मठ बनाए हैं, ईश्वरीय तेज और आभामंडल बिखेरती तस्वीरें उकेरी हैं, डाक टिकट और पोथियां छापी हैं, उनकी सादी कहन को आर्केस्ट्रा वाले संगीत के साथ लयबद्ध करके कैसेट-सीडी बनाई हैं, फ़िल्में और टीवी सीरियल बनाए हैं, ढेर के ढेर शोध प्रबंध लिखे हैं और शोध संस्थान भी बना डाले हैं. उनके नाम पर बस्तियां-कॉलोनियां बसाई हैं. स्कूल-कॉलेजों का नामकरण किया है. देश-विदेश के शिक्षण संस्थानों में ख़ास पीठ बनाई हैं. मेले-उत्सवों की परंपरा बनाई है. गद्दियां बनाई हैं और बनाए हैं उनके मुखिया-मठाधीश.

देख पाते कि पोथियां पढ़कर मुअने के बजाय ढाई आखर पढ़ने में जीवन की सार्थकता के बखान के बजाय, ज्ञान के बोझ से झुकने के बजाय ये मठाधीश इसके गौरव से किस क़दर तने हुए घूमते हैं. दोउ हाथ उलीचने के बजाय इन संतन की अंजुरी जाने कैसे इतनी तंग हो चली है कि ये तो सिर्फ़ बटोरने में जुटे लगते हैं. कहीं सम्पत्तियों के लिए लड़ाइयां लड़ते पाए जाते हैं तो कहीं मुकदमे में उलझे हुए और कुछ जेल में भी. भक्तों के बीच सिंहासनों पर विराजमान मगर हाकिमों-हुक्कामों के दरबार में रसाई के लिए कैसी उत्कट आकुलता! इन्हें पूरा यक़ीन है कि सांच कहूं तो मारिहैं, झूठे जग पतियाइ, इन्हीं के लिए कहा गया होगा.

काश कि वह देख पाते कि पांच सदी के बाद धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर और बंट चुके समाज में ‘सेक्युलर’ विचारधारा वाले उन्हें कितनी इज्जत की नज़र से देखते हैं. उनके कहे का कितने प्रभावशाली तरीके से इस्तेमाल करते हैं. ‘प्रेम-प्रीति का चोलना, पहिरी कबीरा नाच’ की तर्ज पर खद्दर के चोले में नाच ये भी रहे हैं. बोलते तो ये ख़ूब हैं और लगातार बोलते ही रहते हैं मगर ‘तन-मन तापर वारहूं, जो कोइ बोलै सांच’ की तलाश अभी बाक़ी है. देश-विदेश के संस्थानों ने फंड लाकर जोगी कपड़ा रंगाकर जाने कहां-कहां भटकते हैं ताकि यह तलाश पूरी हो.

देख पाते कि उनकी जयंती पर मेले और उत्सवों में लोग कैसे उनके नाम की क़समें खाते नहीं थकते. कितने अक़ीदे से उनके नाम पर चढ़ी चादर को आंखों-होठों से लगाते हैं, खड़ाऊं, माला, कंठी और उनकी फ़ोटो को कितने श्रद्धाभाव, कितनी हसरत से ताकते हैं, मनोकामना पूरी हो इसलिए समाधि की परिक्रमा करते हैं, कैसे प्रसाद पाते हैं. ‘जस की तस धर दीनी चदरिया’ का बखान करते नहीं थकने वाले वापस लौटकर अपनी ज़िंदगी के जाने कितने गोरखधंधों में उलझे मिलते हैं.


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