एकाधिकारीवादी सत्ताएँ भाषा को मार रही हैः प्रो. जीएन देवी
बरेली | प्रख्यात समाज विज्ञानी और भाषाविद् प्रो.जी.एन. देवी ने कहा कि एकाधिकारवादी सत्ताएँ और कृत्रिम स्मृति भाषा को मार रही हैं. भाषा से इंसानी समाज बना. भाषा के टूटने से समाज टूट रहा है, जिसे बचाने की चिंता हमें करनी होगी. युवा आंदोलन ने हमें नई भाषा दी है. नए सवालों से नई भाषा बनती है, सवाल जो जंतर-मंतर पर उठाए गए. इस घटना ने हमें बताया कि हम इंसान हैं और हम बोलना नहीं भूले है. हम समाज को ज़िंदा रख सकते हैं और सत्ता से सवाल पूछते रहेंगे.
प्रो.जी.एन. देवी आज बरेली के सिविल लाइंस स्थित विंडरमेयर सभागार में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित वीरेन डंगवाल स्मृति आयोजन में ‘तहज़ीब, ज़ुबान और दुनिया का भविष्य’ पर व्याख्यान कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि एक कवि अपने शहर में इतना जाना नहीं जाता, जितना कि बहुत दूर तक उसे जाना जाता है. ऐसा देखा जाता है कि अच्छे कवियों को अपने समय के बहुत बाद जाना और समझा जाता है. कवि अपनी कविताओं से एक नया ज़माना बनाता है और दुनिया को एक उजाला दे जाता है. वीरेन डंगवाल अपनी कविताओं में लगातार लोकतंत्र में जनता की खोज करते रहे.
अपने व्याख्यान की शुरुआत उन्होंने प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता एम.एन. राय की बरेली में 40 के दशक में दो बार में चार वर्ष की गिरफ़्तारी से करते हुए कहा कि जेल में रहते हुए उन्होंने एक डायरी लिखी थी, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं. यह उसी तरह हैं, जैसे कि ग्रामशी ने जेल में रहते हुए ‘ प्रिज़न नोट बुक’ लिखी थी. जब वामपंथ का इतिहास याद किया जाएगा तो बरेली और एम.एन. राय की गिरफ़्तारी का ज़िक्र ज़रूर होगा.
उन्होंने कहा कि फासीवाद जब आता है तो वह लोगों के सामने आर्थिक सवाल खड़े कर उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति छीन लेता है. ‘डोंट बी पॉलिटिकल’ उनकी राजनीति का सबसे अहम हिस्सा होता है.
प्रो. देवी ने कहा कि भाषा शब्दों से परे बनती है. भाषा का इतिहास 70 हज़ार साल पुराना है.
उन्होंने डच फ़िल्म ‘क्वेश्चन ऑफ़ साइलेंस’ का ज़िक्र करते हुए कहा कि आज भाषा को तीन तरह से मारा जा रहा है. पूरी दुनिया एकाधिकारवादी और हुकुमशाही होती जा रही है. दुनिया के 90 फ़ीसदी देशों में एकाधिकारवादी सत्ताएँ चल रही है. तानाशाही बोलने पर पाबंदी लगाती है. मीडिया हर रोज़ सच्चाई को मार रहा है. वे जनता की आवाज़ हुकूमत तक नहीं पहुँचा रहे हैं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ हुकूमत की बात हम तक पहुँचाने को वह अपनी ज़िम्मेदारी मान बैठा है. वे शब्दों की तमाम मंज़िलें काटकर हमारे सामने पेश करते हैं.

उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी भाषा को मारने वाली दूसरी ताक़त है. इंसानी भाषा के सामने कृत्रिम स्मृति चुनौती बन रही है. हम अपनी स्मृति खोते जा रहे हैं और इस तरह भाषा को भी भूलते जा रहे हैं. आने वाले दो दशकों में दुनिया की चार हज़ार भाषाएँ ख़त्म हो जाने वाली हैं. भाषा से ही समाज बना. भाषा ही वह माध्यम बनी, जिससे एक दिमाग़ ने दूसरे दिमाग़ के बारे में सोचने की शुरुआत की. समाज का बनना इंसानी उपलब्धि है. समाज इंसानी निर्मिति है, जो भाषा से बना. आज तकनीक इसे तोड़ रही है. हम आज समाज के नहीं, नेटवर्क के मेंबर है. भाषा जब टूटती है तो समाज टूट जाता है. हम फ़िज़िकल स्पेस से मल्टी वर्स में जा रहे हैं, जहाँ भूत, वर्तमान और भविष्य कुछ है ही नहीं.
उन्होंने युवा आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि जंतर-मंतर ने नई भाषा दी है. नए शब्द से नई भाषा नहीं बनती. नए सवालों से नई भाषा बनती है जो जंतर-मंतर पर खड़ा किया गया. इस घटना ने हमें बताया कि हम इंसान हैं और हम बोलना नहीं भूले है. हम समाज को ज़िंदा रख सकते हैं. हम जनता हैं और सत्ता से सवाल पूछ सकते हैं.
प्रो. जी.एन.देवी ने श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए जनगणना में भाषाओं की गणना में, क्लासिकल भाषाओं, मातृ भाषाओं, संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्गीकृत करने के तरीक़े को अवैज्ञानिक बताते हुए कहा कि भाषायी विविधता को दबाने की कोशिश की जा रही है. भाषिक विविधता हमारे लिए लज्जा नहीं, गर्व का विषय होना चाहिए.
व्याख्यान सत्र की शुरुआत में अंकुर ने वीरेन डंगवाल की कविता सुनाई. स्वागत वक्तव्य रीता डंगवाल ने किया. अख़बारनवीस प्रभात सिंह ने वीरेन डंगवाल की यादें साझा कीं, कहा कि उनकी शख़्सियत इंसानियत के जज़्बे, फक्कड़ी और फ़राख़दिली से बनी थी, दोस्ती का अहद उनसे सीखा जा सकता है. सत्र का संचालन युवा आलोचक प्रेमशंकर ने किया. जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने मेहमानों के प्रति आभार ज्ञापित किया.
दूसरा सत्र कविता पाठा का था जिसमें वरिष्ठ कवि राजेश सकलानी, पंकज चतुर्वेदी, मदन चमोली, नईम सरमद, प्रतिभा कटियार, आशु मिश्र, संदीप तिवारी, ज़ुबैर सैफ़ी, शिवांगी गोयल, केतन यादव, पूजा, मृत्युंजय, शिव त्रिपाठी, दानिश अहमद ख़ान और अजय चौहान ने कविता पाठ किया. इस सत्र की अध्यक्षता जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी और शायर ज़हूर आलम ने की. संचालन कवयित्री अनुपम सिंह ने किया.
(विज्ञप्ति)
अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.
अपना मुल्क
-
हालात की कोख से जन्मी समझ से ही मज़बूत होगा अवामः कैफ़ी आज़मी
-
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
-
सहारनपुर शराब कांडः कुछ गिनतियां, कुछ चेहरे
-
अलीगढ़ः जाने किसकी लगी नज़र
-
वास्तु जौनपुरी के बहाने शर्की इमारतों की याद
-
हुक़्क़ाः शाही ईजाद मगर मिज़ाज फ़क़ीराना
-
बारह बरस बाद बेगुनाह मगर जो खोया उसकी भरपाई कहां
-
जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं