किताब | कारोबारे तमन्ना

  • 5:01 pm
  • 14 October 2026

बेशुमार किताबों की भीड़ में भी उस किताब का वजूद सबसे अलग मालूम होता था. चार रंगों वाली भीत के सामने एक बदन का ख़ाका. गहरे भूरे रंग के फीते वाली चुटिया. ऐन ऊपर राही मासूम रज़ा और नीचे की तरफ़ लिखा किताब का नाम—कारोबारे तमन्ना. हैरान हुआ कि राही की इस किताब का नाम पहले कभी क्यों नहीं सुना-पढ़ा. किताब पढ़ लेने के बाद थोड़ी मशक़्क़त से इस सवाल का जवाब भी मिल गया. हालाँकि यह कोई पोशीदा बात नहीं थी, पढ़ने-लिखने की दुनिया इससे बख़ूबी वाक़िफ़ है, अपनी बे-इल्मी के सबब मुझे ही मालूम नहीं था.

तो किताब के बारे में बात करने से पहले यह क़िस्सा…आप अगर इब्ने सफ़ी को जानते हैं, तो जासूसी दुनिया को जानते ही होंगे. इलाहाबाद में अब्बास हुसैनी के निकहत पब्लिकेशन से हर महीने ‘जासूसी दुनिया’ ही नहीं छपता था, एक और महीना-वार रिसाला ‘रूमानी दुनिया’ भी छपता था. हर महीने एक उपन्यास. ‘जासूसी दुनिया’ उर्दू में, और हिंदी में भी छपता था. कह नहीं सकता कि ‘रूमानी दुनिया’ भी हिंदी में छपता था या नहीं, क्योंकि बाबूजी की अलमारी से ‘जासूसी दुनिया’ के अंक ही पढ़ने को मिले थे. ये रिसाले अदब के तौर पर भले ही मक़बूल नहीं थे, मगर इनकी अवामी शोहरत ख़ूब थी. इतनी कि इलाहाबाद के साथ ही कराची से भी छपा करते थे.

इन रिसालों के लिए लिखने वालों में आफ़ाक़ हैदर और शाहिद अख़्तर के नाम का भी शुमार था. ‘कारोबार-ए-तमन्ना’ दिसम्बर 1959 में ‘रूमानी दुनिया’ के 73वें अंक में छपा, जिसके लेखक शाहिद अख़्तर थे. टाइटल के साथ ही अफ़साने में भी लेखक ने अपना नाम लेकर कुछ बातें कही हैं. शुरुआती सफ़हे पर ही हर शुमारे में छपने वाला यह डिस्क्लेमर भी है—इस उपन्यास (नावेल) में प्रकाशित सभी घटनाएँ और किरदार फ़र्ज़ी हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की समानता महज़ एक इत्तेफ़ाक़ होगा, जिसके लिए लेखक अथवा प्रकाशक पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है.

कितनी मज़ेदार बात है न, कि अफ़साने के किरदारों को फ़र्ज़ी ठहराया गया है, अफ़सानानिगार को नहीं!

हिंदी में यह उपन्यास 2013 में राजकमल प्रकाशन से छपा. इस बरस राजकमल पेपरबैक्स से छपकर आया है. अनुवाद डॉ. एम. फ़िरोज़ ख़ान और डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ ने किया है. इसके नाम ‘कारोबारे तमन्ना’ के साथ ही एक उप-शीर्षक भी है—वेश्याओं के जटिल यथार्थ की अन्तर्कथा. 74 पन्ने के उपन्यास के साथ ही इसमें सात कहानियाँ भी हैं. किताब के परिचय में बताया गया है कि रूमानी उपन्यासों की परम्परा में परिगणित होने के कारण इन्हें कभी चर्चा के लायक़ समझा ही नहीं गया. यह मसला भी कुछ-कुछ लोककलाओं सरीखा है, जिन्हें गैलरी में रखी जाने वाली अभिजात कला के समकक्ष मानने से हमेशा गुरेज़ किया जाता है.

जैसा कि इसके उप-शीर्षक की मुनादी है, ‘कारोबारे तमन्ना’ आरज़ू नाम की एक कोठे वाली और उसके कोठे के सामने दुकान पर बैठने वाले परहेज़गार पनवाड़ी कल्लू, आरज़ू के आर्ज़ू-मंद और गाँठ के पूरे असामियों, सफ़ेदपोशों, कल्लू के घर और मुहल्ले वालों के हवाले से यह उपन्यास निचले तबक़े के मुसलमानों के समाजी हालात की पड़ताल करता है, और इस बहाने उन हालात पर भी रौशनी डालता है जो वेश्यावृति के मूल में हैं. मूल उपन्यास का रस्म-उल-ख़त भले उर्दू रहा मगर इशरतगंज में आबाद उपन्यास के किरदारों की ज़बान भोजपुरी है—खांटी, बेलौस, अनगढ़, सहल और ज़बरदस्त रवानी वाली ज़बान. जो पढ़ने वाले की चेतना पर साहिल से टकराती समन्दर की लहरों के माफ़िक़ असर करती है. जैसी ज़बान वैसे ही मुहावरे और उपमाएं. मुख़्तसर कहन में गाथा का विस्तार भर नहीं, झकझोर देने वाली टिप्पणियाँ, वक्रोक्तियाँ, तंज़, उदासियाँ और मलाल भी गुँथे मिलते हैं. अगर आपने राही मासूम रज़ा को पढ़ रखा है तो शाहिद अख़्तर के क़िस्सा कहने के इस ख़ास अंदाज़ पर राही बार-बार याद आते रहेंगे, उनकी छाप बराबर दिखाई देगी. एक बानगीः

    महीने की पहली तारीख़ को कलेक्टर साहब ने इशरतगंज को रेडलाइट एरिया क़रार दे दिया. उसी दिन रंडियों की कई दुकानों पर एक बोर्ड लग गया, ‘यहाँ सिर्फ़ गाने-बजाने का काम होता है.’ जैसे अक्सर हलवाइयों की दुकानों पर बोर्ड होते हैं कि ‘यहाँ सिर्फ़ देसी घी की मिठाइयाँ बनती हैं.’ एक बजते-बजते पुलिस ने छापे मारने शुरू किए, चालीस आदमी गिरफ़्तार हुए. ‘शोर्फ़ाए शहर’ तो पान पत्ता खिलाकर छूट गए, कमीने लोग हवालात में बंद कर दिए गए.


रूहानी दुनिया के 73वें अंक का कवर. रेख़्ता के सौजन्य से.

एन्टी प्रॉस्टीट्यूशन एक्ट की बाबत चायख़ाने में बहस का एक और प्रसंग,

    “तो आपका मतलब है, रंडियों को बाज़ार में रहने दिया जाए ताकि बाहरी मुमालिक के सय्याह आएँ और देखें कि यहाँ जिस्म की तिजारत होती है.”
    शौक़ साहब हँस दिए. “जिस्म की तिजारत कहाँ नहीं होती?”
    “यह मुल्क ग़रीब है. यहाँ जिस्म नहीं बिकेंगे तो और क्या होगा?”
    “अमेरिका तो ग़रीब मुल्क नहीं है भाई! यह सवाल ग़रीब का नहीं है. समाजी ढाँचे का सवाल है. जब यहाँ रिक्शा चलना शुरू हुआ तो मैं बरसों रिक्शे पर नहीं बैठा. अजीब लगता था. आदमी-आदमी को खींच रहा है. लेकिन अगर सारे लोग मेरी ही तरह सोचने लगे, तो रिक्शेवाले भूखों मर जाते. और अब तो मैं भी बैठता हूँ रिक्शे पर और एक बार भी यह ख़याल नहीं आता कि आदमी-आदमी को खींच रहा है. और अब देखो बाज़ार में एक्का नज़र नहीं आता. कचहरी के वक्त देहात से एक्के आ जाते हैं तो घोड़ों के घुँघरू की आवाज़ अजीब मालूम होती है.
    “यानी आप इसके हक़ में है कि रंडियाँ बाज़ार में रहें.”
    “लाहौल वला कुव्वत, मैं कैसे कह सकता हूँ. मैं ही क्यों , कोई यह नहीं कह सकता. मैं सिर्फ़ यह सोचता हूँ कि यह यहाँ से उठेंगी तो कहाँ जाएँगी और फिर इन मकानों का क्या. होगा. कौन रहेगा? इन मकानों में अपनी बहनों और बेटियों को लेकर? इस बाज़ार का खोल टूटेगा तो यह ज़हर हमारी समाजी और घरेलू ज़िन्दगी में समा जाएगा.”

और उपन्यास ख़त्म होने के बाद सात कहानियाँ—एक जंग हुई थी कर्बला में, सिकहर पर दही निकाह भया सही, ख़ुश्की का टुकड़ा, एम.एल.ए. साहब, चम्मच भर चीनी, ख़लीक़ अहमद बूआ, सपनों की रोटी और हीरोइन. पहली कहानी को छोड़कर बाकी सारी कहानियाँ हमारे आसपास के आम लोगों की ज़िंदगी के आख्यान हैं, उनकी ज़िंदगी की तरह ही हर कहानी का रंग अलहदा है, हँसी-ख़ुशी के मामूली से मौक़े आते भी हैं और झट हाथ से फिसलकर उदासी के रंगों में समा कर यक-रंग हो जाते हैं. फिर कभी-कभी सपनों में दिखाई दे जाते हैं. सपनों के बाहर ज़िंदगी बदस्तूर चलती-घटती जाती है.

नहीं मालूम कि अदब के उस रवायती अलगाव की रेखा तय कैसे होती है, जिसकी कसौटी के मुताबिक़ इस उपन्यास को अदब की हद से दूर रखा जाना चाहिए. अदब ज़िंदगी से अलग कब होता है! बक़ौल लेखक,

    मगर मैं…शाहिद अख़्तर…सिर्फ़ एक फ़र्द हूँ. इतना कर सकता हूँ कि आवाज़-ए-एहतिजाज (विरोध) बुलन्द करूँ. इसलिए इस वक्त जबकि थकी हुई शरीफ़न बेबसी से छत की तरफ़ देख रही है. मैं आवाज़-ए-एहतिजाज बुलन्द करता हूँ. मगर कारोबार-ए-तमन्ना की भीड़-भाड़ में मेरी आवाज़ कौन सुनेगा, न अपने कन्धे पर सलीब उठाकर बैत-उल-मुकद्दस की गलियों में वक़ार से चलने वाला मछेरा है और न फ़ारान की बुलन्दियों से आवाज़-ए-हक़ बुलन्द करने वाला गड़रिया…मैं किस से कहूँ कि मेरी शरीफ़न पर चढ़े हुए आपा बी के खोल तोड़ दो, उसका दम घुट रहा है और मेरी अँगुलियाँ इतनी मज़बूत नहीं हैं….

यह ठीक है कि उपन्यास पढ़ते हुए ख़ुद मुझे भी कई बार लगा कि इस पर तो बम्बई वाले सिनेमा बना सकते हैं. और हर ख़ास-ओ-आम की ज़िंदगी में सिनेमा की हैसियत भला कौन नहीं जानता! इस उपन्यास का हर सफ़हा, इसका हर लफ़्ज़ जिस क़लम से निकला है, उस क़लम से ही बेशुमार फ़िल्मों के संवाद और उनकी कहानियाँ भी लिखी गईं. यहाँ भले ही वह क़लम शाहिद अख़्तर से नाम से रक़म हुआ हो मगर अब तो हम यह भी जानते हैं कि नाम शाहिद अख़्तर हो, या आफ़ाक़ हैदर, क़लम जिस शख़्स के हाथ में थी, उसका नाम राही मासूम रज़ा ही था. यक़ीनन यह बात ‘आधा गाँव’ (1966) की शोहरत से बहुत पहले की है. कौन जाने कि माली ज़रूरतों के चलते या फिर शायर के तौर पर अपनी अज़्मत सलामत रखने की कोशिश में, उन्हें छद्म नामों से लिखने की ज़रूरत पड़ी होगी. मगर कारोबारे तमन्ना के पीछे भी उसी शख़्स की कल्पनाशीलता और क़िस्सागोई काम रही थी, जिसके लिखे तमाम उपन्यासों को अदब की दुनिया में ख़ासा बड़ा रुतबा और मक़ाम हासिल है.

उर्दू के प्रकाशक की ओर से डिस्क्लेमर—‘इस नावेल के अनुवाद या इसे फ़िल्मी पर्दे पर लाने के लिए लिखित अनुमति ज़रूरी है, वरना क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.’ हिंदी अनुवाद के लिए पाण्डुलिपि तो ख़ैर नैयर राही ने अनुवादकों को मुहैया कराई. आप राही की क़लम-कहन के मद्दाह हैं कि बिला शक यह उपन्यास आपके लिए है. अलबत्ता पाठक की हैसियत से आपको इतना आगाह ज़रूर करना चाहूँगा कि कुछ जगहों पर छापे की ग़लतियों का ध्यान न धरें. यों भी हिंदी का अख़बार पढ़ने वाली जमात अब इसकी अभ्यस्त हो ही चुकी है.

किताबः कारोबारे तमन्ना
लेखकः राही मासूम रज़ा
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
क़ीमतः 250 रुपये

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