अमरकांत | समय के साथ लेखन और नज़रिया बदलता ही है
(कथाकार-आलोचक प्रेम कुमार की एक पहचान उनके साक्षात्कार भी हैं. हिंदी-उर्दू के बेशुमार यशस्वी लेखकों से उनके साक्षात्कार कृतित्व पर ही केंद्रित नहीं रह जाते, बल्कि शख़्सियत का बड़ा ख़ाका भी पेश करते हैं. साक्षात्कारों की इस सूची में उनके समकालीन शामिल हैं और पिछली पीढ़ी के लोग भी. ‘अंतस के आर-पार’ में छपे अमरकांत के इस इंटरव्यू में भी उनके इसी हुनर की छटा है. यह साक्षात्कार आप श्रृंखला के तौर पर पढ़ सकेंगे. पेश है इसकी दूसरी कड़ी… -सं.)
ग्रैंड आदमी था जोशी. आप देखिए कि भैरवजी को दिल्ली से जल्द ही वापस आना पड़ा. और यह देखिए कि शेखर मुझसे कुछ कहने नहीं आए. उनका वह घर जिसमें मैं था, सस्ता था, पर उन्होंने एक दूसरा महंगा मकान ढूंढ लिया वहीं लूकरगंज में. मुझसे कुछ नहीं कहा, ताकि मुझे दिक्कत न हो. मैं यहाँ मित्रों के ही सहारे रहा हूँ. ’60 के अंत में आया था और ’80 तक रहा वहाँ करेला बाग कॉलोनी में. ’65 तक स्वतंत्र लेखन की स्थिति रही. अप्रैल ’65 में माया प्रेस जॉइन किया. माया प्रेस से पहले हमने अश्कजी का काम किया था. बच्चों के लिए काफ़ी कुछ लिखवाया था उन्होंने तब हमसे.’
कुछ ऐसा याद आया है कि देर तक हँसे हैं. हँसी के साथ ‘सर्वसेवा संघ’ में काम करने के दिनों की बात शुरू हो गई है—’सर्वोदयी नेता सिद्धराज ढड्ढा से पहले दो-एक बार मुलाक़ात हो चुकी थी. उनका कार्यालय बनारस में था. वे अपने प्रकाशन पेपर बैक में लाना चाहते थे. सबकुछ की तैयारी मेरे ज़िम्मे थी. तनख़्वाह ढाई सौ रुपए. नीचे ज़मीन पर बैठते थे सब. पूजा-पाठवाली चौकी जैसी मेज़—लंबाई में बैठे हैं सब, पीठ पीछे मसनद, दीवार का सहारा. दो-तीन दिन काम किया. शाम को वहाँ चाय का इंटरवल होता था. सारे कर्मचारी एक कमरे में होते. इतने स्कैंडल्स-भ्रष्टाचार, सेक्सा की इतनी बातें. उफ़, सर्वोदयी लोगों का उस तरह स्कैंडल्स में रस लेना. दो-तीन दिन मैं बैठा. अजीब, विचित्र हालत—घड़ी की सुई घुमाई जाती, कोई समय से नहीं आता था. दस बजे वहाँ पहुँचने वाला केवल मैं होता था. आख़िर होली पर ही मैं इलाहाबाद आ गया. मार्कंडेय ने कहा कि मित्र प्रकाशन में जगह ख़ाली है, जाकर मिलो. भैरवजी ने फिर लिखा कि कैसे लोगों के बीच पड़े हो, यहाँ आ जाओ. ’65 से ’95 तक—तीस साल रहा हूँ मित्र प्रेस में. जब जॉइन किया था तो कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा था. चेक्स डिसओन हो रहे थे.’ चेहरे पर तृप्ति भरा गर्वीला-सा एक उल्लास है—’और बाद में इतना डेवलपमेंट…कि क्या कहें…सब देखा.
…प्रगतिशील लेखक संघ में तब डिवीज़न हो गया था. वह उतना सक्रिय नहीं था, जनवादी लेखक संघ बन गया था. पर मैंने ओरिजिनल संस्था में रहना उचित समझा. कारण? यही कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी में टूट हुई है तो उसके लिए साहित्यिक संगठन क्योंच टूटे. तब हमारे दिन-रात के साथी—मामूली साथी नहीं रहे थे वे—छोड़कर दूसरी ओर चले गए. देखते-देखते सब क्या कुछ हुआ.’ लंबी-गहरी साँस ली है.
एकदम चुप, गंभीर हो गए हैं. पहली बार हम लोगों के बीच ख़ामोशी का इतना लंबा ठहराव हुआ है. भावुक-सा कुछ जैसे उफनकर बाहर आना चाह रहा हो और उसके ढके रखने की कोशिश में होंठ हैं कि ढक्कन की तरह उठ-गिर रहे हैं. आहिस्ता-आहिस्ता. ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ मिलने से जुड़े कुछ संदर्भ-क्षण याद आना शुरू हो गए हैं—‘मैं प्रगतिशील था, पर कम्युनिस्ट नहीं था.’ फिर भी मुझे 1984 में पुरस्कार मिला. नामवर के कारण मिला. अनएक्सपेक्टिडली मिला. अचानक सुबह-सुबह लंबा-सा एक तार घर आया पुरस्कार मिलने का. और देखिए कि एक घंटे मालूम हुआ कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई…चारों तरफ़ तहलका—31 अक्टूबर 1984—बड़ा शॉक लगा. बेहद दुःखद घटना थी वह. किसी को नहीं बताई हमने पुरस्कार मिलने की बात. घर पर कह दिया कि किसी को मत बताना. दफ़्तर के मित्रों को भी तब बताया जब स्टेट मोर्निंग ख़त्म हो गई थी. रूस अगल साल जुलाई ’85 में गया…15 दिन वहाँ रहा.
अचानक अमरकांत जी की बीमारी के एक ख़ास दौर की यादें दौड़ी चली आई हैं—‘सोवियत लैंड से आकर 1986-87 में हम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए. बेहद दर्द रहता था. रीढ़ की टी.बी. बताई थी. ये छोटे वाले पुत्र थे साथ.हाँ, दूसरे पुत्र अरुण वर्द्धन—‘नवभारत’ में हैं. उनकी पत्नी कुमुद शर्मा यूनीवर्सिटी में पढ़ाती हैं. साहित्यकारों में तब जो किया सो किया ही, पर दफ़्तर, पत्रकारों और सरकार ने भी सपोर्ट किया. पत्रकारों के सहयोग का ही परिणाम था कि तब के मुख्यमंत्री घर देखने आए और पचास हज़ार का अनुदान घोषित किया. डॉक्टर हर सप्ताह आते थे, पर एक पैसा फ़ीस का नहीं लिया. बाद में प्रेस मालिक ने भी किया. क़रीब डेढ़ साल तक मैं माया प्रेस नहीं गया, पर तनख़्वाह तो मिलती ही रही. इंक्रीमेंट भी देते रहे और हेल्प भी.’ वाणी में ख़ूब-ख़ूब कृतज्ञ-भाव आ मिला है—‘मैं एक तरह से तब सारे समाज से कटा हुआ था, पर बहुत मदद मिली. इससे आपको मॉरल ताक़त मिलती है. और फिर ’88 के अंत में मैंने रीजॉइन किया अपनी ड्यूटी पर. यस, एज़ जॉइंट एडीटर…’ बातों के बीच अंग्रेज़ी के शब्द तो पहले से ही आ रहे थे, पर जिस ख़ास अंदाज़ में यह हिस्सा बोला गया, उसने साफ़ कर दिया कि अमरकांतजी इस तरह उस प्रेस और पद के महत्व व गौरव को रेखांकित करना चाह रहे हैं.
चाय पीते-पीते बताया जा रहा था—‘चाय बस सवेरे और शाम को. सुबह दो कप, शाम को एक. कोई आ जाए तो बीच में पी लेते हैं, वैसे नहीं. अब देखिए, आपके साथ हम पी ही रहे हैं. नहीं, टहलने नहीं जा पाते. पैर में तकलीफ़ है…ट्रैफ़िक सेंस नहीं है लोगों में…कमरे में टहल लेते हैं बस. इसी बीच एक बिल्ली ने वहाँ आकर कुछ कहना चाहा है. दोनों की दृष्टि उसी पर है. मैंने बिल्ली के बारे में कुछ पूछा है. उत्तर देने से पहले मुझसे प्रश्न किया गया है—’आप कोई जानवर पाले हैं?’ फिर—’ नहीं, यह हम लोगों की तो नहीं है. पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं. वे अमेरिका चले गए हैं. यहाँ सौंप गए हैं. यहाँ लग गई तो आती ही रहती है अब.’
चाय के बाद सिलसिला फिर से शुरू करने के लिए मैंने पूछा था—कुछ अन्य रचनाओं और रचनाकारों ने भी तो आपके लेखन को प्रभावित किया होगा? बिना एक पल की देर लगाए वे कहने लगे, ‘प्रभाव तो पड़ता है. प्रेमचंद को तो बाद में पढ़ा. शरत को पढ़ा, उनका प्रभाव रहा. करुणा-दया ने प्रभावित किया. उनकी कई रचनाएँ बहुत पढ़ीं. रवींद्रनाथ टैगोर की छोटी-छोटी कहानियाँ बहुत पसंद आईं. जैसे—’ वापसी’, ‘काबुलीवाला’. ‘वापसी’ बहुत अच्छी कहानी है. ‘कफ़न’, ‘पूस की रात’ और अन्य बहुत-सी मारवेलस कहानियाँ हैं प्रेमचंद की. जैनेंद्र का ‘त्यागपत्र’ जब पढ़ा तो बहुत अच्छा प्रभाव हुआ. यंगमेंस का जो प्रभाव होता है, वह ‘इफ़ एंड बट्स’ में नहीं होता. ‘शेखर एक जीवनी ‘ का अच्छा असर पड़ा. ‘संन्यासी’ को पढ़ा. एक हसरत होती थी कि हम भी ऐसा लिखें. यह भावना आती कि मैं भी ऐसा लिख सकता. सोचता था कि मैं स्थूल नहीं, सूक्ष्म लिखूँगा. यशपालजी की भी कुछ कहानियाँ थीं, लेकिन उनमें से कुछ शॉक भी करती हैं. ‘ज्ञानदान’ है जैसे. वैचारिक है वो, पर… ये सब शुरुआती है. फिर अचानक बाहर की कहानियाँ पढ़ने को मिलीं. गोर्की, टॉल्सटॉय, दोस्तोवस्की आदि को पढ़ा. ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पढ़ा. अच्छा लगा—जीवन को समझने की समझ मिली. चेख़व की कहानियाँ थोड़ा बाद में मिलीं. बलिया में था, तब जो मिल गया सो ठीक. ‘सैनिक’ में जाने के बाद कुछ मिला, कुछ ख़रीदा; पर वो शुरुआती दौर था. उम्र के अनुसार चीज़ें बदलती जाती हैं. जिस पीरियड में यह सब पढ़ा, हम आंदोलन में बिजी थे. फ़ुरसत नहीं मिलती थी, घूमते-दौड़ते पढ़ते थे. उस समय के इंप्रेशेंस अलग तरह के हैं—ताज़गी भरे. अपने को उसी तरह का होरो समझने की भावना…हर पीरियड का अलग इंप्रेशन. आज मैं जो पढ़ता हूँ; उसी तरह की चीज़ें चाहिए…’
अब चर्चा के केंद्र में नई कहानी, उसको लेकर गाँव-शहर को केंद्र में रखकर चली-चलाई गई बहसें और उस दौर की कहानियों का प्रदेय जैसे कुछ विषय आते जा रहे थे—’उस दौर में गाँव-शहर की कहानियों का विवाद चला था. उसी दौर में मार्केंडेय, रेणु, शिवप्रसाद सिंह, केशव प्रसाद वर्मा, भैरवप्रसाद गुप्त आदि गाँव के कहानीकार थे. ये सब गाँव के लोग थे. मेरी समझ से यह बहस वर्चस्व की थी. यह तो है ही कि गाँव एक व्यापक चीज़ है, हिंदुस्तान का रिप्रेजेंटेटिव है. अधिसंख्य जनता गाँव में रहती है. इसलिए उस पर लिखना क्रेडिट की बात तो है ही. आप शहर की बात करें तो वहाँ ऊपर का चिकनापन है, भीतर छल है. आज तो और भी ज़्यादा है. तो गाँव पर अच्छा लिखना—जैसा प्रेमचंद, रेणु ने लिखा, क्रेडिट की बात तो है ही. शहर की नई संवेदना, नई चीज़ों और वहाँ के नए मूल्यों को केंद्र बनाकर राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव आदि ने लिखा. ‘मैला आँचल’ के साथ आंचलिकता की भी बात चली. मटियानीजी भी अंचल की बात करने लगे. तब इन सब में यह चला कि नया कौन है? नवीनता कहाँ है? गाँव को नया नहीं माना गया, जबकि शहर का यथार्थ, संवेदना, शिल्प—सबकुछ नया माना गया. राकेश आदि अपनी बातों को इसी तरह प्रस्तुत करते थे. ख़ूब बहसें चलीं. यहाँ इलाहाबाद में भी—’परिमल’ में नहीं, पर लेखकों में चलीं. उन बहसों में ही यह तथ्य उभरकर आया कि ‘परिंदे’ नई कहानी के दौर की पहली कहानी है. इसे लेकर ख़ूब विवाद चला. राकेश ने कहा कि ‘परिंदे’ भावुकता से भरी कहानी है. नहीं, इन बहसों में हम कभी नहीं पड़े, न कभी लिखा. बाद में लिखा. ‘तद्भव’ के लेख को आप पढ़ें. मैं तो पहले से भी और अब भी कहता हूँ कि निर्मल बहुत महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं—पर यह कहना कि वह पहली कहानी है अथवा कोई और या वो—तो ये कोई ख़ास चीज़ नहीं है. गाँव के तो और भी लेखक थे, पर शहरवाले ये तीन—राकेश, कमलेश्वर, यादव. भारती भी कुछ दिनों को उनके साथ आ गए थे. बाद में उन्होंने कुछ अच्छी कहानियाँ लिखी, पर वे बहस में नहीं थे. और यहाँ इस प्र.ले. संघ में तो आलोचना ही होती थी उनकी… ‘मैला आँचल’… हाँ, वो संस्करण जो रेणु ने छापा था, ’57-58 में पढ़ा होगा. पता नहीं किसने दिया, कैसे मिला—बलिया में पढ़ा था. पढ़कर अभिभूत हो गया था तब.
क्यों नहीं? उस दौर में परिवर्तन हुए—नवलेखन में तो हुए ही. आज़ादी के बाद के लेखन में चीज़ें पहले की तरह तो नहीं ही रहीं. वह जो बौद्धिकता थी—चाहे वह क्रांतिकारी बौद्धिकता हो या कलावादी अथवा फ़्रॉयडीयन—वे लोग अपनी चीज़ों को जीवन से साबित नहीं कर पाए, इसलिए दार्शनिकता से करते थे. हाँ, जैसे ‘दादा कामरेड’ या ‘सुनीता’ है—ये सब जीवन का टुकड़ा मालूम नहीं होता, बस, थोपा जैसा कुछ अनुभव होता है. प्रगतिशील क्रांतिकारिता भी बौद्धिक अधिक थी. तब मध्य वर्गीय बौद्धकता थी. जीवन को क़रीब से छूना, स्पर्श करना, विश्लेषण करना नहीं था. ये नहीं कि पहली सारी चीज़ें लुप्त हो गईं, पर उस रूप में नहीं रहीं. आज़ादी से पहले के जो साहित्यकार थे, वे राष्ट्रीय महत्त्व या प्राचीन गौरव का बयान करते थे. उसमें भावुकता-बौद्धिकता का होना ज़रूरी था. यह चेतना छायावाद से आई. साहित्य के विकास का एक पीरियड होता है. ‘दुलाईवाली’ कब लिखी गई? जब लिखी गई तब कच्ची थी. फिर धीरे-धीरे वह पकती गई. ग़ुलामी के काल में जो भावुकता थी, प्रेमचंद ने—शुरू में नहीं, बाद में—उसे बचाया. लेखक और समय भी प्रगति तो करता ही है. तो तब जो नवलेखन था, वह बदला हुआ था. राकेश ने अगर ‘मलबे का मालिक’ लिखी तो वह पहले नहीं, आज़ादी के बाद ही लिखी जा सकती थी. घटनाएँ आपको परिपक्व करती हैं. उस स्थिति में आप घटना पर परिपक्व ढंग से सोचते हैं. तब एक तो यह हुआ कि आप ग़ुलामी से मुक्त हुए. दूसरा यह कि जिन्हें हम हीरो समझते थे, वे वैसे सिद्ध नहीं हुए. यहाँ भी आप परिपक्व होते हैं. ऐसे में दो ही चीज़ें हैं—या तो हम उनके पीछे चलें या फिर ठीक सोचें तो उन्हें चेक करें. साहित्यकार संवेदनात्मक रूप से चीज़ों को पेश करता है, वह राजनीतिक परिवर्तन तो नहीं करता—कर नहीं सकता. वैसे भी रचना पहुँचती ही कहाँ है जनता तक! कुछ ख़ास लोग ही पढ़ते हैं उन्हें. परिवर्तन तो राजनीति से होता है. रचनाएँ तो चलती रहती हैं, संवेदनाओं का निर्माण-परिष्कार करती रहती हैं. काल बीत जाता है, समय बीत जाता है, लोग रचनाओं से विचार—आधुनिक विचार भी—प्राप्त करते रहते हैं. बिलकुल—जैसे कालिदास, तुलसी, शेक्सपियर की रचनाएँ चल रही हैं आज तक.
तो—तब परिवर्तन तो हुआ. भाषा, शिल्प में ढीलापन और भावुकता गायब हुई. जीवन को देखने की दृष्टि भी बदली. नहीं, नई कहानी नाम से कोई कहानी शुरू नहीं हुई. तब शहर, क़स्बे या गाँव की जो भी कहानी हुई, उसे नई कहानी नाम दे दिया गया. जैसे नई कविता की शुरुआत प्रयोगवाद से हुईं, वैसा कुछ कहानी के साथ नहीं था. कविता, कला के जो पश्चिमी आंदोलन थे, उनका अधिकतर प्रभाव कविता पर पड़ा. कहानी पर वैसा प्रभाव नहीं था. बाद में बहसें ज़रूर हुईं. पहले की अपेक्षा रचनाओं में जो ताज़गी, नयापन, नया परिवर्तन आप देखते हैं, उस आधार पर आप यह नाम दे भी सकते हैं. तब हुए नवलेखन की कुछ चीज़ों को लेकर आप यह कह सकते हैं. पर तब बहस इस दिशा में चल पड़ी कि कौन पहली? तो वह ग़लत दिशा में चली गई. उसके बाद ’60 की पीढ़ी—और फिर पता नहीं किस-किस नाम से साहित्य में यह सब चलता रहता है.
नहीं, मुझे ऐसा तो कुछ नहीं लगता था तब, लगने का कोई सवाल नहीं. हमारे भी विचार हैं और आपके भी हैं. क्या होता है इससे कि हमें नया या कोई अन्य प्रकार का कहानीकार कह दिया? हम उसमें भी ख़ुश. रचनाकार को हम ऐसे किसी खंभे से बाँधकर नहीं रख सकते—और न ही इस तरह बाँध देना चाहिए उसे. मैंने न कभी क्लेम किया, न कहा कि मैं नया कहानीकार हूँ. रचना या रचनाकार को ऐसे किसी एक पीरियड में सीमित कर देना उचित नहीं. ऐसा किया तो अंत तक उसके बारे में आप वही कहते रहेंगे.’ स्वर में आवेश-युक्त उत्तेजना आ मिली है—’ऐतिहासिक रूप से ठीक था यह कहना कि नई कहानी का यह काल और ये लेखक थे…पर… महीप सिंह क्या अंत तक सचेतनवाले ही थे या फिर समांतर…? आदमी एक पीरियड में रहता है, पर विकास भी करता है. किसी एक परंपरा का है तो विकास भी करता है. प्रेमचंद की परंपरा का होने का मतलब प्रेमचंद का पिछलगुआ होना नहीं है. जैनेंद्र प्रेमचंद के उत्तराधिकारी हैं—यह कहे जाने का आख़िर क्या अर्थ निकालते हैं आप? आप बताएँ, रामविलासजी प्रयोगवादी तार सप्तक के कवि थे—तो उन्हें नई कविता का कवि नहीं मान सकते? एक ज़माने में कुँवर नारायण बीटनिक आंदोलन से बहुत प्रभावित थे, बाद में उन्होंने कहा कि मैं कबीर से प्रभावित हूँ. आप बताइए कि किस कुँवर नारायण को मानें? सर्वेश्वर दिल्ली जाने के बाद कितने परिवर्तित हुए? और रघुवीर सहाय का सोचें—किसे मानें हम? मैंने एक कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ लिखी और एक ‘हत्यारे’—दोनों का फ़र्क देखें. लेखक एक पीरियड में रहता भी है और उसका अतिक्रमण भी करता है. पीरियड की एक सीमा भी होती है और लेखक उसे तोड़ता भी है. तो संवेदनाओं में चेंज होता रहता है—सब में होता है. जागरूक है तो चेंज होगा ही. समय बहुत महत्त्वपूर्ण चीज़ है. वह चीज़ों को, व्यक्तियों को—सबको बदल देता है. बड़े-बड़े तानाशाहों, शासकों, लेखकों सबको धूल में मिला देता है. उनका कृतित्व ही रह जाता है. आपको पता है—तब यह ख़ूब कहा गया कि कहानी मर गई, विश्व भर में इसकी संभावनाएँ समाप्त. उस तरह की संभावना में नई कहानी के आंदोलन ने वह ज़मीन तोड़ी, हिंदी साहित्य को आगे बढाया. कोई आज गुलेरीजी, अज्ञेयजी या नवीनजी का ही छाता लगाकर चलें तो क्या यह ठीक है? ठीक है, वे सब अपने समय के महत्त्वपूर्ण लोग थे, पर आज तो स्थितियाँ बदल गई हैं न. लोग बदलते हैं, वेशभूषा मंग बदलाव आते हैं, आविष्कार होते हैं. हर युग में चीज़ें बदलती रहती हैं.’
कुछ क्षण को आए उस आवेश ने उनके चेहरे की रंगत में थोड़ा-सा बदलाव ला दिया था. उस आवेश से मुक्ति पाने में भी उन्हें ज़्यादा देर नहीं लगी थी. एक जगह चाचाजी का ज़िक्र करते-करते यकायक रुके—जैसे कोई उल्लसित कर देने वाली बात याद आई है. लंबी-सी एक हँसी के साथ बोले, ‘पता नहीं, तब आप पैदा भी हुए थे या नहीं—हम अलीगढ़ गए थे. हाँ, नौकरी के लिए. वहाँ एक मिल थी कपड़े की. वहाँ के ताँगे, सुबह आठ से शाम छह बजे तक की वह शिफ़्ट, एक-एक महीने बाद शिफ़्ट के परिवर्तन की वह सूचना. अच्छा-सा एक मेस था उसमें. खाना भी अच्छा मिलता था वहाँ—पर मन नहीं लगा, तीन दिन में चले आए.’
खाना मेज़ पर लग चुका है. उनके नाती ने गिलास-प्लेट्स आदि लाने में ख़ूब भाग-दौड़ के साथ अपनी मम्मी का सहयोग किया है. बिल्ली ने अपनी भूख का गीत गाना शुरू कर दिया है. पुत्र और पुत्रवधू के आतिथ्यभाव, आग्रह और ख़ुशी मिली ज़िद के बीच हम लोगों ने खाना शुरू कर दिया है. अब भी वे अनथके, अनवरत कुछ-न-कुछ बताते-सुनाते जा रहे हैं. अमरकांतजी बाएँ हाथ में खाने की प्लेट थामे खाना खाते-खाते बता रहे हैं—’ हाँ, हम खाना यूँ ही हाथ में प्लेट लेकर खाते हैं. तभी से, जब से रीढ़ की हड्डी की ये प्रॉब्लम हुई.’ मेरे खाने का पूरा ध्यान है उन्हें—’ देखो बेटे, मेरा अनुमान सही निकला…चावल उतने चाव से नहीं खाएँगे ये. …नहीं, आप और कुछ लीजिए…संकोच मत कीजिए…. नहीं, हम दोपहर को नहीं सोते, शाम को ही लेटते हैं. दोपहर में कभी-कभी ही लेटते हैं.’
खाने के बाद चर्चा उनके संपादन काल के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों से शुरू हुई थी. उस चर्चा के बीच ही मैंने अमरकांतजी के शांत-चुप रहने के स्वभाव के बारे में एक-दो प्रश्न किए थे. साथ ही साहित्यकारों के बीच चलते रहने वाले आरोप-प्रत्यारोपों, उठा-पटक, खींच-तान आदि के कारणों-परिणामों के बारे में उनको राय जाननी चाही थी. बड़े सरल-निर्मल भाव से वे कह रहे थे, ‘स्वभाव का सवाल नहीं—पर ऐसा भी नहीं कि आप छेड़ेंगे तो हम जवाब नहीं देंगे. वैसे यह देखिए कि लड़ाइयाँ कहाँ होती हैं—दो महात्माओं में, दो औरतों में, दो कुत्तों में, दो विद्वानों में—यानी समानताओं में.’ कहकर देर तक हँसे हैं. फिर गंभीर होकर कहा जा रहा है—’ हम आज के थोड़े ही हैं—सन् 1925 का जन्म है. पुराने हुए हम लोग—ज़बरदस्ती हैं अब यहाँ. इस जीवन में ज़बरदस्ती हैं. हम चाहते हैं कि लेखक बिरादरी में उदारता हो. कभी-कभी लोग चीज़ों को समझने में अन्याय कर देते हैं. हम जानते हैं कि आप क्या हैं, पर हम चाहते हैं कि आप भी तो समझें कि हम क्या हैं. जनतांत्रिकता, संवाद, विचार की जो बात है, वह कम अहम नहीं है. मित्र रोज़ बदलने की चीज़ नहीं हैं. किसी कारण उनके विचार बदल भी गए हैं तो उन्हें बदल नहीं देना है हमें. विचार तो ज़माने के साथ बदल भी जाते हैं, देखने का दृष्टिकोण भी बदल जाता है. फिर भी यह नहीं कि ज़माना बदला तो मित्र भी बदल दें हम. आप मुझे देखिए—मैं मुख्य रूप से राजनीति से होकर आया. राष्ट्रीय आंदोलन से निकले हैं, इसलिए गांधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी., नरेंद्र देव जैसे लोगों का बेहद प्रभाव रहा. अगर कोई मुझे अपनी धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता समझाना चाहे तो मैं नहीं समझूँगा. मैं वह जानता हूँ, मैंने वह सब तब वहाँ देखा है. मैं एंटी हिंदू, मुसलिम या सिख हो जाऊँ, यह नहीं होगा. ऐसा कहने-समझानेवाले को समझना चाहिए. कोई हमें समझाए कि कायस्थ हो तो कायस्थवाद पर चलो, तो यह संभव नहीं है. आप हमसे ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं? हम यदि आपका सम्मान करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह आपके राजनीतिक विचार का सम्मान है. हमारा जुड़ाव इस राष्ट्र से, जनता से है. हम किसी का अपमान नहीं करते, दूसरों के गुणों का सम्मान करते हैं. नहीं, अब नहीं हूँ राजनीति में. तब सक्रिय राजनीति में था. खद्दर पहनता था, आंदोलनों में शामिल रहा. इस पर गर्व नहीं कर रहा हूँ. तीसमारी नहीं है यह, फ़र्ज़ था. उस समय बहुत से नौजवान इस रास्ते पर थे. जो हो सका, बहुत था. हाँ, जब आगरे में था, तब राजनीति से अलग हो गया. हाँ, कारण था उसका… हम साहित्य की राजनीति में कितना, किस तरह, किसलिए जाएँ? पुरस्कार के लिए, पद या सम्मान के लिए? आप हमसे क्या आशा करते हैं? इस उम्र में भी हम यही तमन्ना रखते हैं कि लिखें. यह गर्वोक्ति नहीं है कि हमने धीरे-धीरे ही सही, पर लिखा. ’42 के आंदोलन पर लिखने की पहले भी तमन्ना थी, पर फ़ुरसत नहीं मिली. अब लिखा–देखिए, इतना मोटा. उन दिनों पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं. पैरेलैटिक हो गई थीं. आपने पढ़ा है? नहीं पढ़ा तो कभी छू तो लीजिए उसे…
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अमरकांत | अच्छी रचना ज़माने के साथ चलती और विकसित होती है
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जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं