लापता लेडीज़ | चेहरे पर मुस्कान और आँखें नम

गाँव-देस में कहे-सुने जाने वाले पुराने क़िस्सों की तरह के ट्विस्ट और उनमें जगह-जगह बुना हुआ रोमांच महसूस करने जैसी अनुभूति जगाती है-‘लापता लेडीज़’. फ़र्क बस इतना है कि इसकी कहानी और किरदार हमारे दौर के हैं – उनकी ज़िंदगी और हालात, उनकी ख़्वाहिशें और मुश्किलें, समाजी रवायतों के दबाव और असली ज़िंदगी के यथार्थ. ये किरदार हमारे देखे हुए भले न हों मगर सुने हुए ज़रूर लगते हैं, कहन में वही पुराने क़िस्सों जैसी सादगी और सहजता है.

निर्देशक के तौर पर किरण राव की यह फ़िल्म एक दशक से ज्यादा समय के बाद आई है. उनकी पिछली फ़िल्म ‘धोबी घाट’ 2011 में आई थी, जिसके केंद्र में मुंबई की ज़िंदगी थी. ‘लापता लेडीज़’ की बुनियाद हिंदुस्तान के गाँवों की कहानी है, पितृसत्तात्मक समाज में गंवई महिलाओं के हालात और उनकी बेबसी को केंद्र में रखकर बनी यह फ़िल्म सूरते-हाल को चुनौती देती है, साथ ही महिलाओं के हुक़ूक और ख़ुदमुख़्तारी, उनके सरोकार और उन्हें तालीम की वकालत करती है. और बेहद दिलचस्प तरीक़े से करती है.

कहानी और कहन इस फ़िल्म की ताक़त हैं – इतनी सहज और स्वाभाविक कि फ़्रेम दर फ़्रेम दर्शक कहानी की गहराई मे डूबते जाते हैं. कहानी गुदगुदाती है, रुलाती है और यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि बदलते वक़्त के साथ हमारे सामाजिक ताने-बाने में तब्दीलियाँ क्यों ज़रूरी हैं. नारीवाद, नारी सशक्तिकरण और महिलाओं की आज़ादी और बराबरी के नारों के बर-अक्स यह फ़िल्म ऐसा आइना है, जिसमें अपने वजूद और छोटी-छोटी ख़्वाहिशों के साथ समझौता कर चुके चेहरे भी दिखाई देते हैं. उपदेशों या शोरशराबे के बग़ैर फ़िल्म पुरज़ोर ढंग से बताती है कि औरतों को अपने अस्तित्व की अहमियत समझते हुए अपने हक़ के लिए बुलंद आवाज़ के साथ आगे आने की ज़रूरत है.

कहानी नई सदी के पहले साल की है. ब्याह के बाद अपनी नई-नवेली पत्नी को लेकर दीपक ट्रेन के जिस डिब्बे में सवार हुआ, उसमें एक और दुल्हन भी है. लाल जोड़े में दोनों दुल्हनें लंबा घूंघट काढ़े बैठी हैं. बाद में दीपक के साथ घर पहुँची बहू की अगवानी के लिए घूंघट हटाने पर शोर होता है – चाची बदल गई. यह घूंघट ही वह मेटाफ़र है, जिसे किरण राव ने बेहद असरदार तरीक़े से इस्तेमाल किया है. इसी के हवाले से फ़िल्म की कहानी और इसी के बहाने से समाजी हक़ीकतें परत दर परत खुलती हैं. यही है जो फ़िल्म में मनोरंजन, कटाक्ष, परिहास और वक्रोक्तियों का सृजन भी करता रहता है. कुनबा साथ बैठकर देख-हँस सके, ऐसा मनोरंजन.

फ़िल्म की सुलझी हुई स्क्रिप्ट में ताज़गी है और ढेर सारे चौंकाने वाले लम्हे भी हैं. संवाद बेहद सादे मगर संजीदा और असरदार हैं. रवि किशन के किरदार और उनके अभिनय के ज़िक्र के बग़ैर बात पूरी होगी. रिश्वतखोर इंस्पेक्टर के किरदार को वो अपनी खनकदार आवाज़ और गहरी आँखों से जादुई बना देते हैं. नितांशी गोयल और प्रतिभा रांटा ने अपने किरदारों को दिल छू लेने वाले अंदाज़ में पेश किया है. स्पर्श श्रीवास्तव भी कमाल हैं, “देख रहा है बिनोद” फ़ेम वाले दुर्गेश कुमार भी अपने वन लाइनर्स से रवि किशन का ख़ूब साथ निभाते हैं. अर्से बाद दिल छू लेने वाला क्लाइमेक्स देखने को मिलता है इस फ़िल्म में. दर्शक जब कुर्सियों से उठते हैं तो मंद-मंद मुस्कान के साथ नम आखें और उम्मीद के साथ बाहर आते हैं.
इस बार महिला दिवस पर महिलाओं के लिए नायाब तोहफ़ा है- ‘लापता लेडीज़’.

कहानीः बिप्लब गोस्वामी | संवाद: दिव्यानिधि शर्मा | सिनेमैटोग्राफ़ी: विकास नौलखा | संपादन: जबीन मर्चेंट | संगीत: राम संपत
निर्माता: आमीर ख़ान, किरण राव


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