मुम्बई में राजकमल का किताब उत्सव शुरू
मुम्बई | प्रभादेवी स्थित पु. ल. देशपांडे महाराष्ट्र कला अकादमी में राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से आयोजित पाँच दिवसीय किताब उत्सव का उद्घाटन शुक्रवार को हुआ. यह आयोजन 10 फ़रवरी तक चलेगा.
उद्घाटन सत्र में गुलज़ार, जावेद अख़्तर, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल और सुनील कुमार लवटे से अतुल तिवारी ने ‘भारत : निरन्तर विचार परम्पराएँ’ विषय पर संवाद किया. परंपरा पर बात करते हुए गुलज़ार ने कहा, असली परंपरा कहानी और कविता की है, जो हमें दादी–नानी, माँ–पिता और घर–परिवार से क़िस्सों और लोरियों के रूप में मिली है. इस मौक़े पर उन्होंने अपनी कुछ नज़्में भी सुनाईं.
जावेद अख़्तर ने कहा कि कई बार संस्कृति को धर्म का हिस्सा मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में धर्म संस्कृति का एक छोटा-सा अंश है. संस्कृति कहीं अधिक व्यापक, निर्णायक और समावेशी होती है.
सुनील कुमार लवटे ने कहा कि वे स्वयं को ऐसी परंपरा से जोड़ते हैं जो मुख्यधारा की कथित परंपरा से अलग है—जिसकी जड़ें उन लोगों और विचारों में हैं जो परंपरा की जड़ता से लगातार संघर्ष करते रहे हैं और उसे बदलने का प्रयास करते रहे हैं, जहाँ सब कुछ केवल जाति या धर्म से निर्धारित नहीं होता.
प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कबीर, रहीम, जायसी और नज़ीर के हवाले से अपनी बात रखते हुए कहा कि हम इन्हीं की परंपरा से आते हैं. परंपरा हमें जीवन की तरह मिलती है. यदि हमें सही परंपरा तक पहुँचना है तो हमें उन देशी भाषाओं और बोलियों के पास जाना होगा जिनमें जन-साधारण के श्रम और संस्कृति से निर्मित ज्ञान समाहित है. भक्ति कविता में लोक और शास्त्र के बीच का संवाद और प्रतिरोध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
सत्र का संचालन करते हुए अतुल तिवारी ने कहा कि यह एक विशेष अवसर है, जहाँ ऐसे रचनाकार एक मंच पर हैं जिनका काम अतुलनीय है और जो परंपरा को अपने-अपने ढंग से न केवल परिभाषित करते हैं, बल्कि उसे नया अर्थ भी देते हैं.
अगले सत्र में जावेद अख़्तर की किताब ‘सीपियाँ’ के संदर्भ में दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने उनसे संवाद किया. जावेद अख़्तर ने कबीर और रहीम के कई दोहों की सारगर्भित व्याख्या करते हुए कहा कि शब्द और कथन की अपनी एक तहज़ीब होती है. उनके सही अर्थ तक पहुँचने के लिए न केवल उपयुक्त शब्दों की समझ आवश्यक है, बल्कि उन सांस्कृतिक अवधारणाओं से संवाद भी ज़रूरी है जो अर्थ की निरंतरता को आगे बढ़ाती हैं.
श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि दोहों की दुनिया में प्रगतिशील संस्कार और नीतिशास्त्र की एक विशाल और समृद्ध परंपरा छुपी हुई है. ‘सीपियाँ’ के माध्यम से उन्होंने इसी दुनिया से संवाद करने और उसे समझने–समझाने का प्रयास किया है.
प्रख्यात मराठी लेखक मलिका अमरशेख की आत्मकथा के हिन्दी अनुवाद ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ के लोकार्पण के मौक़े पर आत्मकथा की हिन्दी अनुवादक सुनीता डागा और लेखक-संस्कृति कर्मी विभा रानी मंच पर मौजूद रहीं. मल्लिका अमरशेख का एक ऑडियो संदेश भी सुना गया.
विभा रानी से बातचीत करते हुए सुनीता डागा ने कहा कि मल्लिका अमरशेख एक ऐसे परिवार से आई थीं जहाँ साहित्य और प्रतिरोधी सांस्कृतिक कर्म की एक जीवंत परंपरा थी. उन्होंने यह सब बचपन से देखा, इसलिए नामदेव ढसाल जैसे विद्रोही कवि में उन्हें अपना साथी दिखाई देना स्वाभाविक था. लेकिन उन्होंने यह भी महसूस किया कि जो नामदेव दलित अस्मिता को विद्रोही आग की तरह संभव कर रहे थे, वही स्त्री अस्मिता और एक मनुष्य के रूप में उसकी बराबरी को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे.
जाति के प्रश्न के साथ-साथ स्त्री मुक्ति और बराबरी की माँग ने एक ऐसे टकराव को जन्म दिया, जिसने उन्हें अलगाव की ओर धकेला. निजी और सार्वजनिक जीवन के बीच की यही भयावह दूरी उस रचनात्मक ज़िद में बदली, जहाँ से यह आत्मकथा संभव हो सकी. इसी कारण यह कृति इतनी विश्वसनीय और आवश्यक बन पड़ी है कि भारतीय भाषाओं में आत्मकथा पर होने वाली किसी भी चर्चा को इसके बिना अधूरा माना जाएगा.
पहले दिन के कार्यक्रम का समापन ‘काव्यराग’ की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ, जिसमें चिन्मयी त्रिपाठी और जोएल मुखर्जी ने चर्चित हिन्दी कविताओं का संगीतमय और भावपूर्ण गायन कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया.
इससे पहले, कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए ममता सिंह ने कहा कि यह किताब उत्सव एक प्रकार से आत्मीयता का राग है और यह मुम्बई के लोगों के लिए ख़ुराक जैसा है जो उनको व्यस्त जीवन में कुछ पल के लिए सुकून देता है.
अपने स्वागत वक्तव्य में राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने कहा कि किताब उत्सव शृंखला में यह 14वाँ और मुम्बई में दूसरा आयोजन है. यहाँ के साहित्यप्रेमियों ने जिस उत्साह से इसका स्वागत किया है, उसने हमारा हौसला और बढ़ाया है.
उन्होंने कहा कि हिन्दी में व्यापक स्तर पर साहित्य रचा जा रहा है और नए-नए विषयों व विमर्शों पर उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आ रही हैं. उन्होंने सिनेमा जगत से अनुरोध किया कि वे इन कहानियों को बड़े पर्दे के माध्यम से व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाएँ, ताकि हिन्दी लेखन को भी नया विस्तार मिल सके.
बताया कि राजकमल प्रकाशन समूह भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है. मराठी भाषा की अनेक कृतियाँ भी हिन्दी में अनूदित कर प्रकाशित की गई हैं और यह प्रक्रिया लगातार जारी है. इससे भाषाओं के बीच संवाद और समृद्ध होगा.
(विज्ञप्ति)
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