लखनऊ की मोहल्लेदारी पर विमर्श के साथ किताब उत्सव संपन्न

  • 10:34 pm
  • 16 January 2024

लखनऊ | अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में चल रहे किताब उत्सव का मंगलवार को समापन हुआ. आख़िरी दिन के पहले सत्र में उत्कर्ष शुक्ल की किताब ‘रहमान खेड़ा का बाघ’ का लोकार्पण हुआ. मोहम्मद एहसान ने किताब से कुछ अंशों का पाठ किया. इसके बाद किताब पर अदिति शर्मा ने अपनी बात रखी. कहा कि इस किताब को पढ़ते हुए दृश्य इस तरह से आंखों के सामने उपस्थित हो जाते हैं, जैसे सब कुछ हम घटता हुआ देख रहे हों. आर.के. सिंह ने कहा कि इस किताब में घटनाएं ही नहीं बल्कि प्रकृति के ब्योरे भी इतने ख़ूबसूरत रूप में आए हैं कि उन्हें पढ़ना ख़ुद को समृद्ध करने वाला अनुभव है.

देवेंद्र सिंह से बातचीत में किताब के लेखक उत्कर्ष शुक्ल ने कहा कि रहमानखेड़ा का बाघ लिखने के पहले इसे वह कितनी ही बार इसे लोगों को सुना चुके थे. इसलिए यह लगातार उनकी स्मृति में ताज़ी बनी रही. यही बात इस किताब की दूसरी कहानियों पर लागू होती है. अपनी कहानियों के एक किरदार कमाल के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो जंगल को किताब की तरह पढ़ता है. किताब लिखते हुए उनकी कोशिश यही रही कि जंगल को जंगल की तरह ही पढ़ और समझ सकें. या कि मनुष्यों के नज़रिए की इस दुनिया में वन्य जीवों की दुनिया को वन्य जीवों के नजरिए से भी समझ पाएं. कहा कि मुश्किल यह है कि हम वन्य जीवों के साथ जीने का सलीक़ा भूल गए हैं. लगता है कि यह सामंजस्य कहीं खो गया है और इसे दोबारा अर्जित करने की ज़रूरत है.

अगले सत्र में रविकांत द्वारा संपादित ओम प्रकाश वाल्मीकि की ‘संपूर्ण कविताएं’ और ‘प्रतिनिधि कविताएं’ तथा प्रमोद रंजन द्वारा संपादित ‘बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी’ का लोकार्पण प्रो.रमेश दीक्षित तथा वीरेंद्र यादव ने किया. संचालन युवा कवि सीमा सिंह ने किया. ओम प्रकाश वाल्मीकि की दोनों किताबों के संपादक प्रो.रविकांत ने कहा कि ओम प्रकाश वाल्मीकि अपनी कविताओं में बहुत सारे कुहासों को चीरकर समता और स्वतंत्रता का संदेश देते हैं. वे बार-बार कहते रहे कि हिंदी की कथित मुख्य धारा की कविता में दलितों के जीवन के अपमान, अभाव, दुख और विसंगतियों का भयावह अभाव है. उन्होंने आजीवन अपनी कविता में दलित जीवन के इन सभी पहलुओं पर लिखा. उनकी कविताएं लगातार मुठभेड़ की मुद्रा में हैं. इसीलिए उनकी ज़रूरत लगातार बनी हुई है.

बहुजन साहित्य की सैद्धांतिकी के संपादक प्रमोद रंजन ने कहा कि बहुजन साहित्य की प्रेरणा बुद्ध से मिलती है और यह जाति से मुक्ति की एक यात्रा है. आधुनिक काल में बहुजन साहित्य के प्रेरणा स्रोत लखनऊ के ही बोधानंद थे. इसके बाद उनके प्रतिभाशाली शिष्य चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने बहुजन प्रकाशन शुरू किया. उनके यहां भी जाति के बजाय जाति को देखने का दृष्टिकोण ही प्रमुखता पाता है. वे भी जाति को ख़त्म करने पर ज़ोर देते हैं. बहुजन साहित्य वैज्ञानिकता को, तर्कशीलता को अपने भीतर जगह देता है. बहुजन साहित्य की अवधारणा बहुमत की अवधारणा न होकर बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय की अवधारणा है.

श्रीलाल शुक्ल पर केंद्रित सत्र की शुरुआत में युवा कवि नूर आलम ने श्रीलाल शुक्ल की चर्चित कहानी ‘एक चोर की कहानी’ का पाठ किया. श्रीलाल शुक्ल के पौत्र उत्कर्ष शुक्ल ने श्रीलाल जी के निजी जीवन की बहुत सारी यादें और किस्से साझा किए. वरिष्ठ कथाकार और ‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश ने श्रीलाल शुक्ल के कृतित्व पर बोलते हुए कहा कि अपने उपन्यास राग दरबारी में वह गांव को लेकर एक मोहक और रूमानी दृष्टिकोण को पूरी तरह से उलट देते हैं. अपने लिखने के तरीक़े को वे सतत रूप से तोड़ते रहते थे. अपने हर उपन्यास में उन्होंने एक नई भाषा और यथार्थ अर्जित किया. वे लिखने को लेखक की मुक्ति की तरह देखते थे. उनका कहना था कि अपनी भाषा या यथार्थ को दोहराव लेखक को बंधन में बांध देती है. व्यंग्य को भी वे विधा की बजाय शैली मानते थे, जिसे किसी भी विधा में शामिल किया जा सकता था. नेहरू युग के रोमान को, विकास के उस मॉडल की दरारों की बेहद तीखी मीमांसा उन्होंने राग दरबारी में प्रस्तुत की. उनके व्यक्तित्व में परंपरा और आधुनिकता का एक अद्भुत सहमेल था. एक तरफ़ वे दुनिया भर के नए से नए साहित्य से परिचित रहते थे तो दूसरी तरह उन्हें कालिदास का लगभग समूचा साहित्य कंठस्थ था.

वीरेंद्र यादव और रमेश दीक्षित ने राजकमल प्रकाशन के प्रति और इन किताबों के संपादकों के प्रति आभार व्यक्त किया कि वे इस बेहद ज़रूरी काम को पूरी ज़िम्मेदारी से कर रहे हैं.

अगले सत्र में ‘लखनऊ की मोहल्लेदारी’ विषय पर युवा दास्तानगो हिमांशु वाजपेई से आलोक पराड़कर ने बातचीत की. हिमांशु ने कहा कि लखनऊ एक विचार का नाम है. लखनवी वो नहीं होता है, जो लखनऊ में रहता है बल्कि लखनवी वो है, जिसके अंदर लखनऊ रहता है. आज जिसे हम पुराना लखनऊ कहते हैं, वो मोहल्लों का ही लखनऊ था. इन मोहल्लों के अंदर मुहब्बत और तहज़ीब बसती थी. यहीं से इन मोहल्लों की तमाम ख़ूबियां आती थीं. और यह सब कोई एक दिन में नहीं हुआ था.

लखनवी तहज़ीब का हिस्सा होने के बावजूद हर मुहल्ले की अपनी अलग पहचान रही. लोग ज़बान सुनकर, पान लगाने का हुनर या तरीक़ा देखकर, या दास्तान सुनते हुए जान जाते थे कि सामने वाला लखनऊ के किस मुहल्ले से है. बक़ौल हिमांशु, पुराने लखनऊ या पुरानी तहजीब की बात करने का ये मतलब नहीं है कि हम नयेपन के विरोधी हैं. लेकिन ये जो ख़ूबियां हैं उन्हें बनाने में न जाने कितने लोगों ने अपनी ज़िंदगियां क़ुर्बान की हैं तब जाकर ये असर पैदा हुआ है.

(विज्ञप्ति)


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