पुस्तक मेला | छठे दिन की हलचलें
नई दिल्ली | विश्व पुस्तक मेले के छठे दिन साहित्य प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली. गुरुवार को राजकमल के स्टॉल पर आयोजित कार्यक्रम में उज़्मा कलाम के कहानी-संग्रह ‘काली बिल्लियों के साए में चटोरी चुड़ैल’, आशा प्रभात के नए उपन्यास ‘मांडवी’, मृणाल पाण्डे की किताब ‘उड़ती स्त्री’, हायाशि क्योको के अनूदित उपन्यास ‘नागासाकी की विध्वंस कथा’ और आलोकेश्वर चबडाल के कविता-संग्रह ‘नीला फूल’ का लोकार्पण हुआ. साथ ही, ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में हिमांशु बाजपेयी के ‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउआ’, पराग पावन के कविता संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’, नेहा नरूका के कविता-संग्रह ‘फटी हथेलियाँ’ सुरेन्द्र नारायण यादव की किताब ‘हिन्दी का मानक व्याकरण’ पर चर्चा हुई.
पहले सत्र में उज़्मा कलाम के कहानी-संग्रह ‘काली बिल्लियों के साए में चटोरी चुड़ैल’ का लोकार्पण हुआ. इस संग्रह में संकलित कहानियाँ क्रूर यथार्थ और कोमल संवेदनाओं, अभाव और स्मृतियों, तथा जीवन की बन्दिशों और मुक्त कल्पनाओं के बीच फैले तीखे द्वंद्व को एक साथ रचती है. किताब पर बातचीत के क्रम में उज़्मा कलाम ने कहा, समाज का एक वर्ग बहुत अधिक खर्च कर रहा है और दूसरे को सिर्फ़ दाल-रोटी भी मुश्किल से मिलती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह दुःखी है, उसके जीवन में हास्य नहीं है. इसी तरह अगर कोई स्त्री जीवन में संघर्ष कर रही है, लड़ भी रही हैं तो इसका मतलब है कि उनकी ज़िंदगी नीरस है. मेरा मानना है कि कोई भी इंसान हर वक़्त दुःखी नहीं रह सकता है, उसमें कुछ न कुछ रस तो होता ही है और जीवन बहुत ज़्यादा नीरस है ऐसा मैं लिख भी नहीं पाती हूँ.
दूसरे सत्र में आलोकेश्वर चबडाल के कविता-संग्रह ‘नीला फूल’ का लोकार्पण हुआ. यह किताब गीतों का ऐसा संग्रह है जिसमें पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर देश, ईश्वर-भक्ति, तीज-त्योहार और मनुष्य की भिन्न-भिन्न मनस्थितियों को लेकर लिखे गए भावप्रवण गीत संकलित हैं. इस पुस्तक में शामिल गीतों में सरल और प्रवहमान शब्दावली में अत्यन्त अर्थपूर्ण ढंग से ऐसे विषयों को भी गीत में ढाल दिया गया है जो सामान्यत: गीतों में स्थान नहीं पाते हैं. लोकार्पण के दौरान आलोकेश्वर चबडाल ने कुछ चुनिंदा गीतों का गायन भी किया.
तीसरे सत्र में सुरेन्द्र नारायण यादव की किताब ‘हिन्दी का मानक व्याकरण’ पर चर्चा हुई. यह किताब हिन्दी की समस्त व्याकरणिक समस्याओं पर समग्रता के साथ विचार करती है. बातचीत के दौरान लेखक ने कहा, इस किताब में मैंने हिन्दी की भाषा, लिपि आदि व्याकरणिक ज्ञान को अधिकाधिक तार्किक, वैज्ञानिक और तथ्यपूर्ण तरीके से प्रमाणित किया है. वहीं डॉ. वरुण कुमार तिवारी ने कहा, इस किताब में लेखक ने सिर्फ़ मानकीकरण की समस्या ही नहीं उठाई है बल्कि सहज, सरल व समुचित रास्ते से उसके समाधान भी प्रस्तुत किए हैं.
चौथे सत्र में हायाशि क्योको के अनूदित उपन्यास ‘नागासाकी की विध्वंस कथा’ का लोकार्पण हुआ. इस उपन्यास का अनुवाद हरेंद्र चौधरी और मिकि यूइचिरो ने किया है. इस उपन्यास में परमाणु-विस्फोट की भुक्तभोगी लेखक हायाशि क्योको ने नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम के फौरी तथा बाद के समय में सामने आए प्रभावों-अनुभवों का यथार्थ विवरण प्रस्तुत किया है. आवश्यकता के अनुसार सर्वेक्षण रिपोर्टों और अन्य दस्तावेजों का प्रयोग भी इसमें किया गया है. परिचर्चा के दौरान अनुवादक हरेंद्र चौधरी ने कहा इस उपन्यास की लेखक पंद्रह साल की उम्र में किसी कारखाने में श्रमदान कर रही थी और वहाँ से डेढ़ किलोमीटर दूर बम गिरा. एटम बम गिरने के स्थान से डेढ़ किलोमीटर दूर होना कोई सुरक्षित स्थान नहीं है लेकिन वे उससे बच जाती हैं और छियासी साल का जीवन जीती हैं. उपन्यास में बम गिरने के बाद के दो महीने का घटनाक्रम दिखाया गया है. हायाशि क्योको बताती हैं कि अगर वे एटम बम की शिकार नहीं हुई होती तो शायद लेखक भी नहीं बन पाती. इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे लगा कि हिन्दी में इस तरह की चीज़ें नहीं हैं इसलिए हिन्दी में भी इस तरह की किताब आनी चाहिए.
पाँचवे सत्र में नेहा नरूका के कविता-संग्रह ‘फटी हथेलियाँ’ का पर चर्चा हुई. इस दौरान नेहा नरूका ने कहा कि गद्य कविता लिखना मुझे पसंद है क्योंकि यहां मुझे मेरे विचार लिखने की आज़ादी होती है. आज के समय में नारीवाद शब्द को भी घृणा से देखा जाता है क्योंकि इसका प्रसार ग़लत तरीके से हुआ है. अपनी कविताओं के माध्यम से मैं कहना चाहती हूँ कि हम लिंग से ऊपर उठकर हम मनुष्य बनने की ओर जाएँ.
अगले सत्र में आशा प्रभात के नए उपन्यास ‘मांडवी’ का लोकार्पण हुआ. यह उपन्यास रामकथा की महत्वपूर्ण स्त्री-चरित्र ‘मांडवी’ को केंद्र में रखता है. मांडवी भरत की पत्नी थीं जिनके विषय में न तो रामकथा में बहुत विस्तार से कुछ आता है, न ही बाद के विद्वानों-साहित्यकारों ने उन पर कुछ ख़ास ध्यान दिया, जबकि राम-वनवास के दौरान उन्होंने सम्भवतः लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के ही समान या उससे भी ज्यादा पीड़ा का वहन किया होगा. चर्चा के दौरान आशा प्रभात ने कहा कि मांडवी का ज़िक्र इतिहास में कम मिलता है, इसलिए यह उपन्यास लिखना बेहद कठिन काम रहा. सीता पर आधारित ‘जनकनंदिनी’ उपन्यास लिखने से पहले मैं सामाजिक उपन्यास लिखती थी, पौराणिक पात्रों पर लिखना बेहद कठिन है. इससे लोगों की भावनाएँ जुड़ी होती हैं. चूँकि सीता जन्मभूमि ही मेरा निवास स्थान है इसलिए यह उनके प्रति मेरा समर्पण है. हम देख सकते हैं कि सीता का वनवास उनकी बहनों की तुलना में कहीं अधिक कठिन है फिर भी उर्मिला और मांडवी जैसे पात्रों की चर्चा नहीं होती है. दशरथ भवन में भी इन बहनों ने ही कठिनाई के समय में परिवार को संभाला था. मैं मानती हूँ कि आज की स्त्रियों को इनके बारे में पढ़ना चाहिए.
इसके बाद मृणाल पाण्डे की किताब ‘उड़ती स्त्री’ का लोकार्पण हुआ. यह किताब थेरियों के प्रतिसमय से लेकर हमारे वर्तमान तक फैले स्त्री विरोध की परतों को टटोलती है. इन रचनाओं के माध्यम से उनकी कामना, स्त्रियों के भौतिक संसार व धर्म-जाति सम्बन्धी प्रतिबन्धों और थेरियों के स्त्रीवाद की संभावनाओं की समझ भी विकसित होती है. चर्चा के दौरान मृणाल पाण्डे ने कहा कि, हजारों साल पहले के बौद्ध धर्म को आधार बनाकर मैंने यह किताब लिखी है. थेरीगाथा का नारीवाद ठीक वही नारीवाद नहीं है, जिसे पश्चिम की देखादेखी हमने स्वीकार कर लिया. थेरियों ने अपने समय में एक प्रतिसमय रचा था, जिसे पूरी तरह स्वीकारने में स्वयं बुद्ध को भी समय लगा. यह रचनाएँ हमारे समय में उड़कर प्रवेश करती जाएँगी, थेरीगाथा की रचनाओं का लक्ष्य केवल सामाजिक प्रतिबंधों से ही नहीं सांसारिकता से भी मुक्ति है और केवल मुक्ति ही नहीं एक नई स्त्री के रूप में नए प्रस्थान की नींव डालना भी है.
अगले सत्र में पराग पावन के कविता संग्रह ‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’ पर चर्चा हुई. इस दौरान अदनान क़फ़ील दरवेश, विहाग वैभव, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका की उपस्थिति रही. चर्चा के दौरान कवि पराग पावन ने कुछ कविताओं का पाठ भी किया. इसी शृंखला में कवि अदनान कफील दरवेश ने कहा कि, पराग पावन की कविताएँ इस समय की बड़ी ज़रूरत हैं. मुझे पराग की कविताओं से बेहद लगाव है, ये इस समय की जिन सच्चाइयों को अपनी कविता में स्थान देते हैं उसके लिए बहुत साहस की ज़रूरत होती है. मुझे लगता है कि इनके इस साहस को पाठकों का समर्थन मिलना चाहिए.
अंतिम सत्र में हिमांशु बाजपेयी की किताब ‘क़िस्सा क़िस्सा लखनउआ’ पर चर्चा हुई. इस किताब में लखनऊ की तहज़ीब और वहाँ के आवामी क़िस्सों को जमा किया गया है. यह किताब लोकजीवन और लोकवाणी के रास्ते से लखनऊ को नवाबों और कबाबों से आगे की दुनिया से परिचय कराती है. चर्चा के दौरान लेखक ने कहा, यह लखनऊ के आम लोगों के क़िस्से हैं. अभी तक नवाबों के क़िस्से सुनाए जाते थे, इस किताब में आम लोगों के क़िस्सों को लिखा गया है. शहर के आम इंसानों, आम जगहों और आवाम के क़िस्से जानना अपने समय को समझने के लिए बेहद ज़रूरी है. इस दौरान उन्होंने किताब से कुछ रोचक क़िस्से और कुछ नए क़िस्से भी सुनाए.
(विज्ञप्ति)
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