समय और समाज को समझने के लिए प्रेमचंद और परसाई को पढ़ना ज़रूरी

  • 9:01 am
  • 3 August 2023

इंदौर | प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने कहा कि आज़ादी के पहले के भारत को समझने के लिए प्रेमचंद और आज़ादी के बाद का भारत समझने के लिए परसाई को पढ़ना ज़रूरी है. अंग्रेज़ों और उनसे पहले मुगलों ने भी भारत को समझने के लिए तत्कालीन साहित्य का अध्ययन किया था. प्रेमचंद ने कहा था, ‘हमें हुस्न का मेयार बदलना है.’

प्रलेस की इंदौर इकाई की ओर से प्रेमचंद जयंती और हरिशंकर परसाई जन्म शताब्दी स्मरण समारोह में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की प्रारंभिक कहानियां आदर्शवाद से प्रेरित थीं. वे आर्य समाज, गांधीवाद से होते हुए रूसी क्रांति के मूल्यों तक पहुंचे थे. उनके अधूरे उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ के पात्र बोलशेविज्म से प्रभावित थे. गांधीजी के असर के दौरान ही उनकी कहानियां हृदय परिवर्तन में भरोसा करती थी. जलियांवाला बाग कांड का प्रेमचंद पर ज़बरदस्त असर हुआ. सामाजिक परिवर्तन का यथार्थ उनकी कहानियों में इंगित होता है. प्रेमचंद सौंदर्य की परिभाषा और कसौटी को बदलना चाहते थे. वे पसीने और श्रम में सौंदर्य देखते थे, शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष में सौंदर्य भाव देखते थे. इसीलिए वे हुस्न का मेयार बदलने की बात करते थे.

विनीत तिवारी ने कहा कि व्यंग्य एक भाव है, और वह साहित्य की किसी भी विधा में हो सकता है. हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के लेखन से समाचार पत्रों में व्यंग्य विधा के स्तंभ शुरू हुए. व्यंग्य कठिन मूल्य है, दो धारी तलवार हैं.

प्रलेस की उज्जैन इकाई से आए शशि भूषण ने कहा कि व्यंग्य सदैव सबल और ज़िम्मेदारों पर ही हो सकता है. व्यंग्य लिखना साहस का काम है, जो आज के समय में ख़तरनाक हो गया है. परसाई के लेखन में जनपक्षधरता थी. वर्तमान में धर्म, कला, विज्ञान सभी राजनीति के ग़ुलाम हो गए हैं. परसाई हमारे समय के ज़रूरी लेखक हैं. जब देश में ग़ुलामी का दौर था, तब साहित्य, विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिले. आज़ाद भारत में आज का युवा धार्मिक यात्राओं में ही लीन हैं. प्रेमचंद को पहले ब्राह्मण विरोधी प्रचारित किया गया, अब उन्हें दलित विरोधी बताया जा रहा है.

अर्थशास्त्री जया मेहता ने साहित्य में अतीत के स्मरण के साथ नए लेखन की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया. रंजना पाठक ने कहा कि प्रेमचंदकालीन ज़मींदार, सूदख़ोर, शोषित किसान आज भी मौजूद हैं. कुसंस्कारों के चीथड़ों में लिपटे देश को महान बताया जा रहा है. रामआसरे पांडे ने ‘पंच परमेश्वर’ कहानी का उल्लेख करते हुए कहा कि कहानी में धर्म अप्रासंगिक हो गया. पात्र मानवीय कमज़ोरियों के साथ मौजूद हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या लेखकों ने अपनी क्षमता इतनी विकसित कर ली है कि वे मशाल बन सकें? अभय नेमा के अनुसार परसाई का साहित्य समाज को समझने में नई दृष्टि देता है. वर्तमान में व्यंग्य कमज़ोर के नहीं, ताक़तवर के पक्ष में खड़ा हुआ है.

पत्रकार रवि शंकर तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद के पात्र बदले स्वरूप में समाज में आज भी मौजूद हैं. पत्रकार के रूप में प्रेमचंद ने अपने समय के मुद्दों को उठाया था. फ़ासिज़्म के ख़तरे को उन्होंने उस काल में ही पहचान लिया था. वे भाषा को साध्य नहीं, साधन मानते थे. विनम्र मिश्र ने कहा कि प्रेमचंद ने केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखा. दबे, कुचले ग्रामीणों की पीड़ा उनकी कहानियों में आई है. प्रेमचंद साहित्य सजीव है.

हरिशंकर परसाई के विपुल साहित्य पर दीपाली आर्य ने कहा कि उन्होंने संजीदा विषयों पर सरल भाषा में कटाक्ष किए हैं. वे निडरता से लिखते थे. दिशाहीन भीड़ के बारे में परसाई की भविष्यवाणी आज सही साबित हो रही है. अथर्व शिंत्रे ने कहा कि व्यंग्य समाज की सच्चाइयों को प्रदर्शित करने की कला है. व्यंग्य को अभिव्यक्ति के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. जब तक समाज में विसंगतियां रहेंगी, व्यंग्य की सार्थकता भी बनी रहेगी.

विषय और आयोजन के बारे में हरनाम सिंह ने बताया कि भाषा और संस्कृति के संकट के वर्तमान दौर में हम अपने पुरखों से ही सीख हासिल करते हैं. वर्तमान में अभिव्यक्ति के सभी संसाधनों पर कारपोरेट और सांप्रदायिक ताक़तों का कब्ज़ा है. भावनाएं आहत होने के नाम पर लोगों के मुंह बंद किए जा रहे हैं. प्रेमचंद के 134वें जन्म दिवस और परसाई जन्म शताब्दी के तहत यह आयोजन पठनीयता को बचाए रखने का छोटा-सा प्रयास है.

अध्यक्षीय वक्तव्य इकाई अध्यक्ष डॉ.ज़ाकिर हुसैन ने दिया. संचालन विवेक मेहता ने किया, और अभय नेमा ने धन्यवाद ज्ञापित किया.

(विज्ञप्ति)

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