मैंने अपनी माँ को एक औरत की नज़र से देखा : अरुंधति राय
नई दिल्ली | इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमला देवी सभागार में सोमवार की शाम को अरुंधति राय अपने पाठकों और प्रशंसकों से रूबरू हुईं. यह मौक़ा उनकी ताज़ा किताब ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ पर बातचीत का था. इस ख़ास मौक़े पर उन्होंने कहा, इस किताब में मैंने अपनी माँ के बारे में लिखा है. लेकिन यह न मेरी आत्मकथा है, न मेरी माँ की कथा. दरअसल यह दो औरतों की कहानी है, जो संयोग से माँ-बेटी थीं और अपने-अपने तरीक़े से जीना चाहती थीं. अरुंधति ने कहा, मेरी माँ दूसरी आम औरतों की तरह नहीं थीं, वे सचमुच गैंगस्टर थीं. उन्होंने स्कूल खोला, सीरियन ईसाई महिलाओं को उत्तराधिकार दिलाने के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ी. वे लड़ती थीं और मैं भी लड़ती हूँ. जब कभी मुझ पर हमले होते हैं तब मैं सोचती हूँ कि मैं आखिरकार मेरी रॉय की बेटी हूँ.
माँ-बेटी की नहीं, दो औरतों की कहानी
अरुंधति राय ने कहा, ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ न मेरी आत्मकथा है, न ही मेरी माँ की जीवनी. यह माँ और बेटी के निजी रिश्ते के बारे में नहीं बल्कि दो औरतों के बारे में है. ये घरेलू औरतें नहीं थी, ये ऐसी औरतें थीं, जो दुनिया में जीती थीं. वास्तव में यह किताब एक सियासी पाठ है. उन्होंने कहा, मैंने अपनी माँ को हमेशा ही एक व्यक्ति के तौर पर देखा. मैंने उन्हें एक औरत की नज़र से हमेशा देखा, जिसकी ख़ुद की एक कहानी थी. मैंने कभी अपनी माँ को समझने की कोशिश नहीं की.
अरुंधति ने कहा, मैंने ख़ुद को बचाने के लिए माँ को इस किताब का किरदार बनाया ताकि इसके ज़रिये उनसे प्यार करती रह पाऊँ. मेरा दिल रोज़ टूटता था पर मैंने कभी उनसे नफ़रत नहीं की. इस किताब के शीर्षक की तरह मेरी माँ सच में गैंगस्टर थी, इसके पन्नों में मैंने वही बयान किया है. मैंने वह लिखा है जो मैं कभी भूल नहीं पाई.
‘तुम अब भी वैसे ही गाली देती हो?’
पिता के साथ रिश्ते के बारे में पूछने पर अरुंधति ने कहा, मेरे पिता चाय बाग़ान में काम करते थे. जब उनका और माँ का तलाक़ हुआ, मैं सिर्फ़ दो साल की थी. सालों बाद जब मैं दिल्ली में उनसे पहली बार मिली तो उन्होंने मुझे पूछा, तुम अब भी वैसे ही गाली देती हो? पिता की नज़र में मैं एक बदज़बान बच्ची थी. दरअसल, उनके यह पूछने के पीछे एक घटना थी. मैं क़रीब दो साल की रही होऊँगी, तब की बात है. एक दिन मैं बहुत रो रही थी. उन्होंने जलती सिगरेट से जलाकर मुझे शांत कराने की कोशिश की. इस पर मैंने उन्हें गाली दी थी.
अरुंधति ने कहा, पिता से यह मुलाक़ात मेरे लिए किसी भी दूसरी मुलाक़ात जैसी ही आम थी. इसमें भावुकता जैसी कोई चीज़ नहीं थी.

भाई को झेलनी पड़ी क्रूरता
भाई से अपने रिश्ते के बारे में उन्होंने बताया कि वह और उनका भाई एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब थे और अब भी हैं. उन्होंने कहा, चाहे पिता से हो या पति से, पुरुषों के साथ अपने रिश्तों की वजह से मेरी माँ ऐसी हो गई थीं कि मेरे भाई को बहुत क्रूरता झेलनी पड़ी. स्कूल के इम्तिहान में मेरे भाई को कुछ कम नंबर मिले थे. उस रात हम सो रहे थे. तभी माँ आईं और मेरे भाई को जगाकर दूसरे कमरे में ले गईं और उसे इतना पीटा कि लकड़ी का पैमाना टूट गया. और अगली सुबह उन्होंने मेरी तारीफ़ की कि मेरा रिज़ल्ट बढ़िया था.
हम अब नहीं पिटेंगे
भाई के प्रति माँ के बर्ताव का ज़िक्र करते हुए अरुंधति ने कहा कि वह घटना उनकी चेतना में इतने गहरे पैवस्त हो गई कि जब भी कोई उनकी तारीफ़ करता है, कोई सम्मान मिलता है तो उस वक़्त सहज ही यह वाक़या उन्हें याद आ जाता है. उन्हें महसूस होता है कि इसी वक़्त दूसरे कमरे में कोई पिट रहा है—कोई गज़ा में, तो कोई बस्तर में, तो कोई नर्मदा के हक़ में आवाज़ उठाने के ऐवज़. हम सब की पिटाई होती रहती है. उन्होंने कहा, लेकिन हमको दिखाना है कि हम अब नहीं पिटेंगे.
प्यार भी, तकरार भी
वार्ताकार उर्मिलेश के एक सवाल का जवाब देते हुए अरुंधति रॉय ने कहा कि एक पेड़ को आप कैसे कह सकते हैं कि वह दूसरे जंगल में चला जाए. तब तो उसके पत्ते झर जाएंगे. उर्मिलेश ने उनसे पूछा था कि अपने देश में इतने विरोध और हमलों के बावजूद उन्होंने भारत और ख़ास कर दिल्ली में रहना ही क्यों चुना? लेखक-अनुवादक अर्जुमंद आरा के यह पूछने पर कि आप अपनी माँ और भारत माता, दोनों के साथ अपने रिश्ते को कैसे देखती हैं, अरुंधति ने कहा, माता और भारत माता दोनों से ही मेरा रिश्ता प्यार और तकरार का रहा है. उन्होंने कहा— ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ मैंने किसी को ख़ुश करने के लिए नहीं, बल्कि एक लेखकीय चुनौती मान कर लिखी है.

अनुवाद की ज़बान हिन्दुस्तानी है: प्रभात
‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ अरुंधति रॉय के संस्मरणों की किताब ‘मदर मेरी कम्स टु मी’ का अनुवाद है. यह अनुवाद लेखक-पत्रकार प्रभात सिंह ने किया है. प्रभात भी इस आयोजन में मंच पर आमंत्रित थे. किताब के अनुवाद को लेकर किए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि यह अनुवाद हिंदी या उर्दू को अलग-अलग ध्यान में रखकर नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी में किया गया है, वह ज़बान जो हमारे घरों में बोली जाती रही है, अब भी बोली जाती है. अपने घर के बड़ों के हवाले से उन्होंने कई आमफ़हम लफ़्ज़ों का उदाहरण देकर कहा कि अरबी या फ़ारसी ज़बान से हमारी बोली में आए ऐसे बेशुमार लफ़्ज़ हैं जो अवामी ज़बान में धड़ल्ले से बरते जाते हैं और कोई उन्हें अलगाकर नहीं देखता. कहा—उनकी परवरिश का इस परिवेश ऐसा ही था, तो विरसे में ऐसी ही ज़बान मिली. और किसी लफ़्ज़ के मायने समझने के लिए अगर शब्दकोश का सहारा लेना ही पड़े तो मैं समझता हूँ इसमें कोई हर्ज नहीं है.
राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में अरुंधति रॉय और अनुवादक प्रभात सिंह से जाने-माने पत्रकार उर्मिलेश और ख्यात उर्दू लेखक-अनुवादक अर्जुमंद आरा ने बातचीत की. लेखक और अनुवादक ने वार्ताकारों के साथ-साथ कार्यक्रम में मौजूद श्रोताओं के सवालों के जवाब भी दिए.
युवा रंगकर्मी-अभिनेत्री अनुप्रिया ने ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ के चुनिन्दा अंश का पाठ प्रस्तुत किया. राजकमल प्रकाशन समूह के सीईओ आमोद महेश्वरी ने मेहमानों का धन्यवाद ज्ञापन किया.
‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. हिंदी में अरुंधति रॉय की किताबें राजकमल प्रकाशन से ही छपती रही हैं. इन किताबों में मामूली चीज़ों का देवता, अपार ख़ुशी का घराना, आज़ादी, कल्पना का अंत यहाँ, आहत देश, भूमकाल : कॉमरेडों के साथ, कठघरे में लोकतंत्र, न्याय का गणित और एक था डॉक्टर एक था संत शामिल हैं.
(विज्ञप्ति)
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मेरी माँ मेरी गैंगस्टर | अरुंधति रॉय के संस्मरण का हिंदी अनुवाद
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