नीला परचम | एक मंज़ूम तक़रीर

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि आज ज़ुल्मात-ए-जंग में आबे-ज़िन्दगी मिल नहीं रहा है
और अमन ही ख़िज़्र-ए-ज़िंदगी है

हयात बेकैफ़ हो रही है
कि टैंक की घनघनाहटों में हमारा संगीत खो गया है

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि तीसरी जंग फिर न दुनिया को अपनी टापों से रौंद डाले
हमारी तहज़ीब मर न जाये
ये नशा सर से उतर न जाये
ये नशा वह है जिसके बूते पे हम ज़माने को हैं संभाले

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि नौ-ए-इंसाँ की शहरगों में वह ज़हर पैवस्त हो न जाये
जो साजिशों का बने सहारा
हमारे होंटों पे है ये नारा
ये नारा-ए-हुर्रियत सिमट कर गरज में तोपों की खो न जाये

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि आज आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफ़ीना रुके न पल भर
भंवर में फंस कर न डूब जाये
ये नीला परचम न झुकने पाये
कि आलमी अमन ही में कौमें निखार सकती हैं अपने जौहर

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि जो हैं हर यांकी को हासिल वही हों हक़ पॉल रोबसन को
रहे न बाक़ी निज़ामे-दहशत
यही है पैग़ामे-आदमीयत
कि ज़िंदगी यूँ सजायी जाय सजाते हैं जिस तरह दुल्हन को

हम इसलिए अमन चाहते हैं
कि एशिया से सफ़ेद क़ौमें उठा लें अपना स्याह डेरा
रहेंगी कब तक नजिस फ़िज़ाएँ
हम आज मिल कर क़सम ये खायें
कि हिन्द को हम न बनने देंगे कभी भी इस जंग का अखाड़ा
मगर हम उस वक़्त क्या करेंगे
पड़ोस में आग जब लगेगी
तो शोले उठ कर ज़रूर लपकेंगे अपने प्यारे वतन की जानिब
ख़िज़ाँ बढ़ेगी चमन की जानिब
तुम्हें अभी कुछ पता नहीं है
यहाँ कभी बम गिरा नहीं है

अगर न ये जंग रुक सकी तो
न जाने कितने सुहाग भट्टी में बेवगी की सुलग उठेंगे
न जाने कितने दिलों के अरमाँ दिलों के अन्दर ही जल बुझेंगे
न जाने कितने हुमकते आगोश ख़ून में तरबतर मिलेंगे
करोड़ों मासूम ममता की तलाश में दर-ब-दर फिरेंगे
कोई सहारा न होगा जिनका
बिलकते बच्चों का एक लश्कर
सड़ी हुई लाशों का समंदर
उबल पड़ेंगी वबा की नदियाँ नहीं किनारा मिलेगा जिनका
ये जन्नत-ए-अर्ज़ी भी न ऐटम की ज़द से बच कर निकल सकेगी
झुलस के रह जाएगी हर एक शै
पिघल के रह जायेगी ये मिट्टी

वो हिरोशिमा वो नागासाकी का क़ातिल अब तक मरा नहीं है
हमारी मस्जिद के ऊँचे-ऊँचे मीनारों का सर झिंझोड़ देगा
हमारे मन्दिर के जगमगाते कलस को गहना के तोड़ देगा
हमारे गंगो-जमन की सीमी कलाइयों को मरोड़ देगा
हमारे ये ताज और अजन्ता
जमाले मरमर जलाले अस्वद
हमारी तहज़ीब के अमर कारनामे जिनके नुक़ूश-औ-गुम्बद

हमारी तख़्लीक़ के ख़ज़ीने
हमारे पिन्दार के सफ़ीने
जवान ही जो हुए थे पैदा
जवान जो आज तक रहे हैं
जवान ताज़िन्दगी रहेंगे
मगर उस ऐटम के ज़लज़ले में शबाब न इनका टिक सकेगा
कोई न इनको बचा सकेगा
हमारी तहज़ीब जिसके नग़मों में इश्क की रूह पल रही है
हमारी तहज़ीब जिसके रक़्सों में नौजवानी मचल रही है
मुसव्वरी वो कि जिसकी आँखों में फ़िक्र की शमा जल रही है
वो बुतगिरी जिसके साअदोक़द में हुस्न की आँच ढल रही है
अगर न ये जंग रुक सकी तो
ये सारे नग़मे
ये सारी शम्एं
तमाम हुस्नो नज़र के जलवे
हमारी बज़्मे-ख़याल-ओ-अहसास में कभी फिर न आ सकेंगे
निशाँ हम उनके न पा सकेंगे

हमारी तहज़ीब जिसके मेमार तुलसी और कालिदास जैसे
बरहना इन्सानियत के तन पर पहनाया जाये लिबास जैसे
हमारी तहज़ीब के ग़ज़लख़्वाँ टैगोर-ओ-रसखान-ओ-मीर जैसे
हमारी तहज़ीब के निगहबाँ हरिश्चन्द्र और नज़ीर जैसे
हयाते-जावेद पा चुके हैं
मगर ये डर है कि मर न जायें
ये सच्चे मोती बिखर न जायें
कथाकली का वो पैरहन तुमसे अमन की भीक माँगता है
मनीपुरी का कुंआरपन तुमसे अमन की भीक माँगता है
कथक अदाओं का बांकपन तुमसे अमन की भीक माँगता है

ये परचम अमन ही के साये में रह के परवान चढ़ सकेंगे
फ़ुनून मशात-ए-जहाँ हैं मुहाफ़िज़त उनकी हम करेंगे
अगर न ये जंग रुक सकी तो
ये सनअतें जिनको सीने से हम लगा कर रक्खे हुए हैं अब तक
हमारे गुमनाम दस्तकारों के साथ-ही-साथ चल बसेंगी
बनारसी पोत और सारी जमीं पे जिनके बने न साये
वो अंकबूताना सहरकारी के रूहे-मानी सुरूर पाये
वो लखनऊ के खिलौने जिनके क़दम पे आज़र जबीं झुकाये
चिकन की नाज़ुक मिज़ाजियाँ जिनसे चश्मे शहला नज़र चुराये
ज़री वह देहली की कहकशाँ जिसकी झिलमिलाहट को सर चढ़ाये
श्रीनगर का वह नर्म पश्मीना लम्स का दिल जो गुदगुदाये
वो हैदराबाद का बिदर जिस पे शाखे तूबा को वज्द आये
ये और कितने हमारे दावे
तबाहियों का शिकार होंगे
हुदूद इमकाँ के पार होंगे

शऊर-ए-फ़्युचिक तहे-कफ़न कब से मौत पर वार कर रहा है
पिकासो का वह अज़ीम फ़न हर क़लम को बेदार कर रहा है
वह नग़्मा-ए-पॉल रोबसन हर क़दम पे हुशियार कर रहा है
शऊर बेदार करके उट्ठो
नज़र को हुशियार करके उट्ठो
कि मुन्तज़िर है निगाहे-रहज़न
क़सम है उस जुर्रते-जवाँ की जो तोड़ कर रख दे तौके-आहन
क़सम है उस फ़िक्र की जो सहरा के आँचलों पर उगाये गुलशन
क़सम है उस जोशे कामराँ की जो रूख़ को सैलाब के बदल दे
क़सम है उस ज़र्र-ए-गराँ की जबल को जो चुटकी से मसल दे
क़सम है उस जुस्तजू की जो ज़ख़्मे-दिल हर फाँस ढूँढ़ती है
क़सम है उस अहदे-नौ की जिसको हमारी हर साँस ढूँढती है
क़सम है उस बेनवाँ किसान और हर ग़रीब मज़दूर के यक़ीं की
जो अपनी मेहनत की ज़िंदगी में
शरीके-जाँ की बिरहनगी में
कसीफ़ बच्चों की मन्दगी में
अँधेरी-सी अपनी झोंपड़ी में
ख़याले फ़रदा की रोशनी में
हयाते-नौ की उम्मीद ले कर तलाश में वक़्त की लगे हैं
क़सम उन बेशुमार क़ौमों की आज जो यक-ज़बान हो कर

ये एक ऐलान कर रही हैं
कि जंग अब हम न होने देंगे
जो ऐटमी बम बने हुए हैं बहा दो उनको समन्दरों में
कि जंग दुश्मन है ज़िन्दगी की
रूख़े-सहर के नक़ाब उठा दो
हमें ज़रूरत है रौशनी की
अगर न ये जंग रुक सकी तो
हमारी तारीख़े-इर्तका की सुनहरी जिल्दें रूपहली सतरें
लहद में निसियाँ की दफ़्न होंगी
हमारी हव्वा हमारी मरियम हमारी सीता हमारी राधा
हमारी जोन हमारी ज़ोया
उरूसे-हरदिल उरूसे-दुनिया
हमारे दिल में न रह सकेंगी
हमारी दुनिया को छोड़ देंगी
हमारी अज़रा हमारा शेली हमें कभी न फिर मिल सकेंगे
हमारी शीरीं जो आप अपनी शरारतों से है घर की रौनक़
न घर रहेगा न घर की रौनक़
न जाने ये जंग क्या करेगी
बस एक सन्नाटा एक वहशत
मुहीब चीख़ें क़दम-क़दम पर
हवा में गोली की सनसनाहट
वो मौत की चाप ख़ौफ़ से जिसके दिल अभी से दहल रहा है
अकाल और बेस्वागिरी का शग़ाल करवट बदल रहा है
हमारे खेतों की छातियों को न जाने कब तक ये टैंक रौंदें
न जाने कब तक ये आग बरसाने वाले राकेट फ़िज़ा में कौंधें
अगर हम उन से भी बच गये तो वबाई कीड़ों के बम गिरेंगे
अगर हम उन से भी बच गये तो नेपाम बम से न बच सकेंगे
बदन पे उभरेंगे कोढ़ के दाग़
बदल के रह जायगी शबाहत
ज़मीं पर एड़ियाँ रगड़ कर हमें तमन्ना-ए-मौत होगी
मगर न हम जल्द मर सकेंगे
कोई न होगा किसी का हमदम
वो जंग होगी कि हश्र होगा.

[मंज़ूम-छंद में पिरोया हुआ| ख़िज़्रे-ज़िंदगी-जीवन का पैंग़बर| बेकैफ़-बेमज़ा| नौ-ए-इँसा-मनुष्य जाति| शहरगों-देह की नसें |पैवस्त-धंसना | सफ़ीना-कश्ती,बेड़ा |नीला परचम-विश्व शांति |यांकी-अमेरिका |नजिस-नापाक |बेवगी-वैधव्य |वबा-महामारी |जन्नत-ए-अर्ज़ी-धरती पर स्वर्ग |सीमी-ख़ूबसूरत |जमाले मरमर जलाले अस्वद-सफ़ेद और काले पत्थरों का हुस्न |नुक़ूश-बेल-बूटे |तख़्लीक़-स़ृजन,तामीर | ख़ज़ीने-ख़जाना,गोदान|पिन्दार-अभिमान,ख़ुद्दारी |रक़्स-नृत्य |मुसव्वरी-चित्रकला,पेंटिंग |बुतगिरी-शिल्पकला |हयाते-ए-जावेद-अमरत्व |फ़ुनून-कलाएं |मशात-ए-जहाँ-दुनिया संवारने का |सनाअत-पेशा, दस्तकारी |आज़र-ख्यात शिल्पी का नाम जो हज़रत इब्राहीम के चाचा थे |कहकशाँ-आकाशगंगा |लम्स-स्पर्श,भाव |बिदर-धातु पर नक़्क़ाशी का काम |कामराँ-सफल, सिद्ध |जबल-पहाड़ |बिरहनगी-बेपर्दगी |कसीफ़-मैला-कुचैला |ख़याले फ़र्दा-आने वाले कल का ख़्याल |हयाते नौ-नई दुनिया]

सूखे हुए बेले

तुम ने सूखे हुए बेले भी कभी सूँघे हैं
इन को मसला न करो
कितनी आज़ुर्दा मगर भीनी महक देते हैं
इन को फेंका न करो
गर्द-आलूद बुझे चेहरों को समझा भी करो
सिर्फ़ देखा न करो
हाथ के छालों का गट्ठों का मुदावा भी करो
सिर्फ़ छेड़ा न करो

[आर्ज़ुदा- मलिन,उदास | गर्द-आलूद-धूल में अंटे | मुदावा-इलाज]

(आज जब तीसरी आलमी जंग का ख़तरा सिर पर है, वामिक़ जौनपुरी की यह मंज़ूम तक़रीर याद कर सकते हैं.)

कवर | mohamed_hassan/ pixabay

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