युद्ध से बुद्ध तक: ऐसे माहौल में एक मौन प्रार्थना

(आजकल दिल्ली के क़िला राय पिथोरा परिसर में एक अभूतपूर्व प्रदर्शनी ‘द लाइट एंड द लोटस’ चल रही है. यह लेख उन 127 साल पुराने पिपरहवा में मिले बुद्ध के अवशेषों और रत्नों की घर-वापसी की कहानी है, जिन्हें नीलामी की दहलीज़ से बचाकर भारत वापस लाया गया. लेखक इस प्रदर्शनी के माध्यम से बुद्ध की कलात्मक विरासत और आज के अशांत दौर में उनके शांति के संदेश के मानी समझने की कोशिश करते हैं.)

लाडो सराय दिल्ली स्थित ‘क़िला राय पिथोरा’ सांस्कृतिक परिसर में कदम रखते ही एक आध्यात्मिक शांति का अहसास होता है, जहाँ आजकल पिपरहवा में मिले बुद्ध के अवशेषों और कुछ रत्नों की प्रदर्शनी लगी है. बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए इन अवशेषों का बहुत महत्व है क्योंकि इन्हें ‘शरीर’ कहा गया है—यानी गौतम बुद्ध के शारीरिक अवशेष. ये अवशेष उनके अस्तित्व से हमारा सीधा और जीवंत नाता जोड़ते हैं. लाखों श्रद्धालुओं के लिए ये केवल ‘पुरातात्विक अवशेष’ नहीं हैं, बल्कि बुद्ध के ‘धम्म’ का जीता-जागता रूप हैं. वो कहते हैं कि इन अवशेषों के मात्र दर्शन करना किसी तीर्थ यात्रा करना है, या जैसे साक्षात बुद्ध के दर्शन कर लिए हों.

इस साल 3 जनवरी को शुरू हुई प्रदर्शनी—’द लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ़ द अवेकन्ड वन’—बुद्ध के अनुयायियों, इतिहासकारों और संस्कृति-संबंधी शोध करने वालों के लिए महत्वपूर्ण प्रदर्शनी है. 1898 में इन अवशेषों की खोज के बाद यह पहला मौक़ा है, जब इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा रहा है. इस प्रदर्शनी में पिपरहवा में मिले सारे रत्न और अवशेष हैं जिन्हें हाल ही में वापस लाया गया है.

उत्तर प्रदेश के पिपरहवा में अंग्रेज़ इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेपे द्वारा खोजे गए इन अवशेषों के बारे में माना जाता है कि ये भगवान बुद्ध के शरीर के ही हैं. ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आसपास उनके अनुयायियों द्वारा संजोए गए ये अवशेष भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक हैं. पुरातत्वविदों का मानना है कि इनका सीधा संबंध शाक्य वंश और प्राचीन कपिलवस्तु शहर से है, जहाँ सिद्धार्थ गौतम ने अपना प्रारंभिक जीवन बिताया था. बुद्ध के अब तक ज्ञात ये सबसे प्राचीन अवशेष हैं.

भारतीय धरोहर संस्थान की डॉ. सविता कुमारी और राष्ट्रीय संग्रहालय की डॉ. अबीरा भट्टाचार्य द्वारा तैयार की गई इस प्रदर्शनी में दक्षिण एशियाई कला इतिहास के अलग-अलग समय की बौद्ध वस्तुएं शामिल हैं. इनमें सबसे मुख्य पिपरहवा के स्तूप से खुदाई में मिले वे रत्न और अवशेष हैं जो ख़ास आकर्षण का केंद्र हैं. इन पुरावशेषों को भारत के गोदरेज ग्रुप ने सरकार के साथ मिलकर एक ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ के ज़रिए भारत के लिए सुरक्षित किया है.

एक तरफ जहाँ यह प्रदर्शनी उन 127 साल पुराने अवशेषों की सफल वापसी का जश्न मनाती है, जिन्हें 2025 में हांगकांग के सोथबी में नीलाम किया जाने वाला था; वहीं दूसरी तरफ यह भारत सरकार के लिए अपनी पीठ थपथपाने का एक मौक़ा भी बन गया है. जबकि हक़ीक़त यह है कि हमारी हज़ारों अन्य महत्वपूर्ण कलाकृतियाँ आज भी दुनिया भर के संग्रहालयों में भरी पड़ी हैं या तस्करी के ज़रिए निजी संग्रहों का हिस्सा बन चुकी हैं.

प्रदर्शनी के बाहरी हिस्से पर सांची जैसा एक ‘तोरण’ द्वार बनाया गया है, जिसकी नक्काशी ईसा पूर्व पहली शताब्दी की मूल बलुआ पत्थर की संरचना जैसी है. प्रदर्शनी के हॉल में प्रवेश करते ही बौद्ध मंत्रों की मद्धिम आवाज़ आने वाले का स्वागत करती है. ‘ओम मणि पद्मे हुम’ का मंत्र आपको ध्यान की स्थिति में ले जाता है. हल्की ठंडी हवा के बीच धीमे-धीमे झूलते बैनर ध्यान अपनी तरफ़ खींचते हैं, जिन पर बुद्ध के जीवन से जुड़ी सूक्तियाँ और उनके उपदेश हैं. फ़िर कानों में पड़ता ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’, ‘धम्मं शरणं गच्छामि’ और ‘संघं शरणं गच्छामि’ का जाप जो बुद्ध की शिक्षाओं की शरण में आने का निमंत्रण देता है.

अंदर जाते ही आप कुषाण काल (दूसरी शताब्दी ईस्वी) की ‘बोध्यंग मुद्रा में बैठे बुद्ध’ की प्रतिमा से रूबरू होते हैं, जो गांधार के लोरियां तंगई में मिली थी. ऊपर से छतरीनुमा मेहराब से ढकी ये प्रतिमा ऊंचे चबूतरे पर रखी गई है. मूर्ति को पीले रेशमी तोरण और बौद्ध चिन्हों से सजे स्क्रॉल से सजाया गया है. लोरियां तंगई पाकिस्तान के गांधार क्षेत्र का वो इलाक़ा है जहाँ बुद्ध की कई प्राचीन मूर्तियाँ मिली थीं.

शुरुआत में ही लगा एक पैनल बताता है कि यह प्रदर्शनी प्रधानमंत्री के ‘विकास भी, विरासत भी’ के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है. इसमें बताया गया है कि कैसे यह प्रदर्शनी उन पवित्र रत्नों और अवशेषों को फिर से एक साथ लाई है, जो अंग्रेज़ी राज के दौरान हिंदुस्तान से बाहर ले जाए गए थे. इन अवशेषों को वापस हासिल कर हमारी प्राचीन विरासत का एक हिस्सा घर वापस आ गया है . इन रत्नों की वापसी से न केवल भारत के सांस्कृतिक संबंध मज़बूत हुए हैं, बल्कि दुनिया को बुद्ध के शांति और करुणा के संदेश से फिर से जोड़ा गया है.

प्रदर्शनी को गोलाकार रूप में डिज़ाइन किया गया है, जिसके बीचो-बीच गुंबद जैसा ‘स्तूप’ है, जो बुद्ध की मौजूदगी का प्रतीक है. हर स्तूप की तरह इसमें भी ‘हर्मिका’, ‘छत्र’ और ऊपर की ओर ‘मेधी’ (गोलाकार चबूतरा) बनाई गई है. इसके चारों ओर ‘प्रदक्षिणा पथ’ और नक्काशीदार चार तोरण द्वार बनाए गए हैं.

स्तूप के अंदर द्वार नुमा बड़े आले बनाए गए हैं, जहाँ जगमगाती रोशनी के बीच इन रत्नों और अवशेषों को रखा गया है. म्यूज़ियम जैसे माहौल को और रोचक बनाने के लिए फ़िल्मों, चलती तस्वीरों, डिज़िटल ग्राफ़िक, कॉमेंट्री और थ्री-डी तकनीक का सहारा लिया गया है ताकि इन अवशेषों की खोज और इनकी यात्रा की कहानी को विस्तार से बताया जा सके.

सात हिस्सों में बँटी यह प्रदर्शनी एक ‘परिचय’ से शुरू होती है, जहाँ पिपरहवा खुदाई स्थल का एक मॉडल और ऑडियो-विजुअल जानकारी दी गई है. इसके बाक़ी हिस्से हैं: 1. सांस्कृतिक कलाकृतियों की वापसी: एक निरंतर प्रयास; 2. बुद्ध के जीवन की झलकियाँ; 3. महापरिनिर्वाण और अवशेषों का वितरण; 4. वैश्विक ताना-बाना: सीमाओं के पार बौद्ध कला और विचारों का विस्तार; 5. दृश्य में अदृश्य: बौद्ध शिक्षाओं की कलात्मक भाषा.

रत्नों और अवशेषों के अलावा, इस प्रदर्शनी में मेरी असली खोज एलिजाबेथ ब्रूनर की ‘वॉकिंग बुद्धा’ (चटाई पर बना तैल चित्र) थी. यह पेंटिंग बुद्ध के चरणों “बुद्ध-पद” की धीमी पर सजीव चाल में जान डाल देती है. इसके साथ ही बंगाल के महान कलाकार नंदलाल बोस द्वारा बनाई गई बुद्ध की पेंटिंग भी मंत्रमुग्ध कर देने वाली है.

कुल मिलाकर, इस प्रदर्शनी में 80 से अधिक कृतियाँ शामिल हैं, जो ईसा पूर्व छठी शताब्दी से लेकर वर्तमान समय तक की हैं. इन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारतीय संग्रहालय कोलकाता, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय दिल्ली, और राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली जैसे विभिन्न संस्थानों से यहाँ लाया गया है.

हांगकांग से वापस लाए गए रत्नों में कार्नेलियन, लैपिस लाजुली और नीलम जैसे शानदार रत्नों की भरमार है, जिनमें से कुछ तराशे गए हैं और कुछ अपने मूल रूप में ही हैं. कांच के केस में रखे रत्न मौर्य काल से हैं जो पिपरहवा में मिले थे. प्रदर्शनी में 1,500 किलो का एक विशाल बलुआ पत्थर का संदूक भी रखा गया है, जिसमें ये अवशेष और आभूषण सुरक्षित रखे हुए थे.

यहाँ पत्थर की एक मंजूषा या कलश भी है जिस पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि का लेख खुदा है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि ये बुद्ध के ही अवशेष हैं. छोटी-छोटी बत्तियों की सुनहरी रोशनी में चमकती कुछ पत्थर की नक्काशीदार आकृतियां वाकई शानदार हैं. इनमें कुषाण काल की ‘महापरिनिर्वाण’ की आकृति, जिसमें बुद्ध के अंतिम समय को दिखाया गया है, और ‘स्तूप पूजा’ की एक दुर्लभ कलाकृति विशेष रूप से ध्यान खींचती है. इनके अलावा प्राचीन पांडुलिपियाँ, थांका, कपड़े पर बनी पेंटिंग, और पूजा-पाठ से जुड़ी वस्तुएं भी यहाँ मौजूद हैं.

बेशक, आकर्षण का मुख्य केंद्र वह लेख से खुद हुआ वो कलश है, जो ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का है और जिसमें बुद्ध की अस्थियाँ हैं.

कला, संस्कृति, डिज़ाइन और विरासत जैसे विषयों को अपने गहन शोध और बेहतरीन लेखन के साथ प्रकाशित करने वाली भारत की मशहूर पत्रिका ‘मार्ग’ का दिसम्बर 2025 अंक हांगकांग से वापिस लाए गए इन्हीं पिपरहवा रत्नों और अवशेषों पर है. पत्रिका ने बुद्ध के पैतृक कुल—शाक्यों—द्वारा इन अवशेषों के दान करते अवशेष-पात्र के अभिलेख का अनुवाद किया है जो कहता है “धन्य बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का यह निक्षेप, शाक्य-कुल के सुकीति बंधुओं—तथा उनकी बहनों, पुत्रों और पत्नियों—का उपहार है.”

पिपरहवा से मिले बुद्ध के अवशेषों के साथ रत्न, लघुमूर्ति, सिक्के, मंजूषा की तरह के कलश आदि की उम्दा तस्वीरों के साथ इस पत्रिका में छापे नमन आहूजा के लेख ने एक उचित सवाल उठाया है. “क्या अवशेषों को विधि-विधान से दफ़नाया जाना चाहिए या प्रदर्शित किया जाना चाहिए?” 21वीं सदी में जब दुनिया भर में लोग पुरातात्विक स्थलों की खुदाई करके अपने अतीत के बारे में जानना चाहता हैं तो मेरा मानना ये है कि उनका अध्ययन करने के बाद और इनके बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा कर इन्हें उसी पवित्र स्थल पर ही लौटा कर किसी बौद्ध संग्रहालय में रख देना चाहिए.

इस प्रदर्शनी में कुछ ऐसी अद्भुत चीज़ें भी थीं जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था – जैसे 15वीं शताब्दी की जापान की एक मूर्ति, जिसमें ‘अमिताभ बुद्ध’ को एक नक्काशीदार दोहरे कमल आसन पर उपदेश देते हुए दिखाया गया है. ये मूर्ति राष्ट्रीय संग्रहालय से लाई गई है.

एक और सुंदर कलाकृति ‘अप्सरा’ बलुआ पत्थर की बनी मूर्ति है, जो 11वीं शताब्दी के चंदेल काल की है. इसे 2023 में न्यूयॉर्क के ‘मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट’ ने भारत को वापस किया था. इसके अलावा उपेंद्र महारथी की बनाई पेंटिंग ‘भिक्षु धर्मरक्ष’ भी कमाल की है. यह पेंटिंग चौथी शताब्दी के उस बौद्ध भिक्षु की है, जिन्होंने चीन में बौद्ध धर्म फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.

बड़े और आंखों में चुभने वाले बैनरों को अगर छोड़ दें, तो ‘द लाइट एंड द लोटस’ प्रदर्शनी देखने लायक़ रही. हालांकि, आयोजकों को कृतियों की लाइटिंग पर थोड़ा और ध्यान देना चाहिए, ख़ासकर उन चीजों पर जो कांच के केस में रखी हैं, क्योंकि उन पर सामने पड़ी कृतियों की परछाई पड़ती है. एक बात और – क्या गैलरी गाइड के लिए एक बेहतर मेगाफ़ोन नहीं ख़रीदा जा सकता? साथ में उस सज्जन को थोड़ा धीमा बोलने के लिए कहा जाना चाहिए, अब ये कोई शादी का हॉल तो नहीं है!

अंत में, जिस चीज़ की यहाँ सबसे ज़्यादा कमी खली, वह थी ध्यान लगाने के लिए एक शांत कोना या कमरा. मेरे हिसाब से यह पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी, क्योंकि हर कोई यहाँ भगवान बुद्ध के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस करने के लिए आ रहा था.

सभी तस्वीरें | राजिंदर अरोरा

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