तमाशा मेरे आगे | सराय रोहिल्ला, बचपन और गाड़िया लोहार
बचपन का भी वो बहुत पहला और कच्चा-सा हिस्सा था, जब न ‘सराय’ का मतलब पता था, और न ही यह मालूम था कि ‘रोहिल्ला’ होता क्या है. उस वक़्त की यादें भी कैसे बची हैं, ये सोच कर भी मैं हैरान हूँ. दिल्ली के सराय रोहिल्ला स्टेशन से हमारा घर कुल चार सौ मीटर पर था. घर के पास से बहुत-सी रेल लाइन गुज़रती थीं जिन पर से रेलगाड़ी आने और जाने के बाद कोयले के महीन कण हवा के साथ तीसरी मंज़िल तक चले आते थे. चार मंज़िला इमारत में हमारा एक कमरे का छोटा-सा घर था, जिसमें माँ-पिताजी के साथ (तब तक) हम दो भाई और एक बहन ज़िंदगी की शुरुआत कर चुके थे. बचपन में तो ये भी पता नहीं होता कि ज़िंदगी होती क्या है. बस खेल, खाने और माँ के पल्लू का छोर पूरी दुनिया थी. खाने को वक़्त से मिल ही जाता था, खेल और धमाल की कमी नहीं थी, पड़ोसियों और उनके बच्चों की भरमार थी और नींद जम कर आती थी.
सराय रोहिल्ला का इतिहास 17वीं शताब्दी की एक सराय और 19वीं शताब्दी के एक रेलवे स्टेशन से जुड़ा है, जिसका नाम मुगल गवर्नर के बेटे रूहुल्लाह ख़ान के नाम पर रखा गया था. रुहुल्लाह ख़ान औरंगज़ेब की हुकूमत में मुग़ल सरदार और सेनापति थे जो दक्कन में सूबेदार थे. औरंगज़ेब के साथ उन्होंने बीजापुर और गोलकुंडा की घेराबंदी में भाग लिया. रुहुल्लाह ख़ान अपनी माँ की तरफ़ से औरंगज़ेब के रिश्तेदार भी थे.
“रोहिल्ला” शब्द का प्रयोग उत्तर भारत में अफ़गानिस्तान से आने वाले पश्तून क़बीलों और शासकों के लिए भी किया जाता है, जिनका जलवा 18वीं शताब्दी में पूरे ज़ोर पर था. ये वही जाँबाज़ रोहिल्ला पश्तून हैं, जिन्होंने अफ़गानिस्तान से आकर उत्तर भारत के सब पहाड़ी इलाक़ों में सड़कें काटने का काम किया था. गढ़वाल और कुमाऊँ के इतिहासकार बताते हैं कि अँग्रेज़ों ने ऋषिकेश से ऊपर चारों धाम तक जाने वाली सड़कों को पहाड़ काट कर बनाने का ख़तरनाक और मुश्किल काम इन्हीं रोहिल्ला लोगों को दिया था. ख़ैर, सराय रोहिल्ला से इन पश्तूनों का कुछ लेन-देना नहीं है.
दिल्ली सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन की स्थापना 1872 में हुई थी, जब दिल्ली से जयपुर और अजमेर तक मीटर-गेज़ लाइन बनाई जा रही थी. 1857 से दिल्ली शहर अँग्रेज़ों के क़ब्ज़े में था और सत्ता कंपनी साहब से महारानी के हाथ आ चुकी थी, जो मुग़लों के शहर को नई शक्ल देना चाहती थीं. शाहजहाँनाबाद शहर के बाहर (यानी शहर की दीवार से बाहर) स्थित, यह स्टेशन तब हरियाणा में रेवाड़ी, पंजाब, राजस्थान और गुजरात जाने वाली मीटर-गेज़ ट्रेनों के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करता था. दिल्ली जंक्शन (पुरानी दिल्ली) से सराय रोहिल्ला तक की लाइन दोहरी-ट्रैक वाली थी, जबकि सराय रोहिल्ला से रेवाड़ी तक का हिस्सा बहुत सालों तक सिंगल-ट्रैक ही रहा. रेवाड़ी से ये सिंगल-ट्रैक पाँच दिशाओं में अलग-अलग हो गए. आज स्टेशन के दक्षिण-पश्चिम में अहाता ठाकुरदास है और उसके दूसरी ओर एक रेलवे कॉलोनी है. एक छोटा-सा इलाका जिसे आज भी ‘सराय रोहिल्ला’ कहा जा सकता है, वास्तव में स्टेशन से आधा किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है.
बीस-पच्चीस मकानों वाला सन् 1960 का सराय रोहिल्ला आज बेतरतीब फैलती बस्ती है, जहां किसी भी जगह से नई रोहतक रोड वाली सड़क पार करने में ही पंद्रह से बीस मिनट लग जाते हैं. इस बार जब मैं उस तरफ़ गया तो बचपन के अपने घर और आस-पास की गंदगी को देख मेरा मन बहुत दुखी था. यहाँ रहने वाले जिस शख़्स से भी मैंने बात की उनमें कोई भी ख़ुश नज़र नहीं आया. 62 साल की चंद्रावती देवी ने यहाँ आए बदलावों पर अफ़सोस जताते हुए कहा, “जब मैं शादी के बाद यहाँ आई थी, तब यहाँ केवल 50-60 घर थे.” आज, सराय रोहिल्ला एक घनी बस्ती है, जहाँ एक तरफ़ झुग्गियों की क़तारें नीची छतों वाले पक्के घरों में बदल गई हैं और दूसरी तरफ़ बेतरतीब आड़ी-तिरछी बनी इमारतों में छोटी-छोटी दुकानें और कारख़ाने चल रहे हैं.
सराय रोहिल्ला में जहां हम रहते थे वो बहुत बड़ी और ऊंची चौकोर इमारत थी, जिसके अंदर चारों ओर कमरे ही कमरे थे, एक के बाद एक – लाइन वार . इन सब कमरों के सामने एक बरामदा खुलता था, जो उस मंज़िल के सभी कमरों को जोड़ता था. बरामदा क़रीब चार या पाँच फ़ुट चौड़ा रहा होगा जिसकी दीवार भी तीन फ़ुट से ऊंची थी, हम बच्चे उस दीवार तक पहुँच नहीं पाते थे, न ही देख पाते थे कि उसके बाद क्या है. इमारत के बीचों-बीच कुछ नहीं था – गहरा ख़ालीपन, वो ख़ालीपन जो नीचे तक उतरता था, जहाँ बहुत बड़े चौकनुमा आँगन में एक कुआं था. वैसे तो हमारे कमरे और गुसल तक पानी की लाइन आती थी फिर भी कभी-कभार जब पानी नहीं आता था तो बरामदे में खड़े हो कर हर घर वाला अपने लिए इसी कुएं का पानी ऊपर खींच लेता था. ऐसे दिन हम बच्चों के लिए बहुत रोमांचक होते थे. कोई न कोई बड़ा हम बच्चों को कंधों पर या गोदी में उठाकर पानी खींचने का नज़ारा दिखा देता था और फिर खींची गई बाल्टी से पानी टब या दूसरी बाल्टी में पलटते हुए कुछ पानी गिर कर बिखर जाता था. भीगे हुए बरामदे में हम बच्चे उस रोज़ खूब स्केटिंग करते थे.
हमारी बिल्डिंग की छत से लाइनें और स्टेशन दोनों साफ़ दिखते थे. इस बिल्डिंग के उत्तर की तरफ कुल 100 मीटर पर ही रेल लाइनों का जाल था. एक-दूसरे से उलझती, एक-दूसरे का रास्ता काटती, कहीं सीधी, कहीं घूमती और आपस में चिपकी काले लोहे की इन रेल पटरियों को हम बच्चे बड़ी हैरानी और असमंजस से ताकते थे. इतनी सारी लाइनों को अपने अंदर समटे दो तरफ़ गिरने और उठने वाला फाटक भी अपने आप में अजूबा था. ये फाटक हाथ से चक्का चला कर उठाए और गिराए जाते थे. पूर्वी और पश्चिमी फाटक एक-दूसरे से बहुत दूर थे, जिनके कोने में टीन की छोटी झुग्गी में उन फाटकों को चलाने वाले रहते थे जिनको मैंने सिवाय कच्छे और बनियान के कभी किसी और कपड़े में नहीं देखा था. हमारी तरफ़ वाला फाटक चलाने वाला कोयले-सा काला इंसान अपने हाथ में दो झंडे पकड़े रहता था – एक लाल और एक हरा, वो हमेशा खाँसता मिलता था.
स्टीम इंजिन से चलने वाली रेलगाड़ी की लंबी-सी पटरी से आता टका-टक का शोर और दूर तक फैलता सलेटी धुआँ हमे बचपन में परेशान नहीं करता था. हमारे कमरे के ऊपर भी एक और मंज़िल थी जिसकी वजह से हम लोग रेल को सिर्फ़ सुन और महसूस कर पाते थे, देख नहीं पाते थे. देखने को मिलते थे इंजिन के हवा में दागे कोयल के बारीक कण. कोयले का बूरा, बारीक कंकड़, धूल और काली राख हमेशा विराजमान रहती थी. रेलवे स्टेशन के साथ-साथ सराय रोहिल्ला पर कोयला और लोहे के सरिये आदि उतारने की साइडिंग भी थी. इसके साथ-साथ था रेलवे का अपना कबाड़घर. प्लेटफ़ॉर्म के आगे कोयले और लोहा लँगड़ के बेशुमार ढेर बिखरे पड़े रहते जहां से ट्रक और बैलगाड़ियां इन्हे ले कर जाती थीं.
हमारे कमरे के बाहर वाले बरामदे में दिन भर झाड़ू लगा कर सफ़ाई करनी पड़ती थी. हम भाई-बहन इस सब में माहिर हो चले थे, झाड़ू बाहर ही रहता था, डालड़ा घी का एक पुराना ख़ाली डिब्बा भी. काली धूल बीन कर उसे हम पास पड़ी अंगीठी में डाल देते. अंगीठी भी दिन भर जलती थी, उसके पास रखा होता था किरोसीन का स्टोव जो सिर्फ़ भगौने टिकाने के काम आता था. स्टोव बेचारे की क़िस्मत ही कुछ ऐसी थी. हमारी तरह वो भी महीने के दो हफ़्ते मायूस ही पड़ा रहता था. पिता की तनख़्वाह ख़त्म, किरोसीन ख़त्म, जोश ख़त्म. बेचारे के पेट में ही कुछ नहीं जाता था तो वो क्या काम करता. अंगीठी पे शायद अभिशाप था – दिन-रात जलते रहने का.
ख़ैर, वापिस सराय रोहिल्ला पर.
सराय रोहिल्ला वाले कमरे में अपने माँ-पिता के साथ हमने शायद पाँच साल बिताए. ये चार मंज़िला बिल्डिंग न्यू रोहतक रोड पर दक्षिण को उतरती ढलान पर बनी थी, जिसके दाहिने यानी पूरब की तरफ़ रेल लाइन थी जिसके फाटक बंद होने पर बाहर दोनों तरफ़ ठहरे हुए ताँगों, रिक्शों, बैलगाड़ियों और टेम्पो आदि का ख़ासा जमघट लगा रहता था. पश्चिम को आनंद पर्वत का फ़ैक्टरी या छोटे कारख़ानों का ऊबड़-खाबड़ इलाक़ा – उत्तर को ढलान लेती सड़क नजफ़गढ़ रोड और जख़ीरा पुल की तरफ़ जाती थी और दक्षिण में तिब्बिया कॉलेज से गुज़रती ईदगाह, सदर बाज़ार की ओर से पहाड़गंज और कनॉट प्लेस की तरफ़. उन दिनों सड़क पर न के बराबर ट्रैफ़िक रहता था . इक्का-दुक्का कार या रोडवेज़ की बस – बाक़ी सब साइकिल, तांगे, हाथ-रिक्शा, बैलगाड़ी या पैदल. इन सब के चलने की स्पीड भी तक़रीबन एक जैसी थी. तब सड़क पर घोड़े, खच्चर, ऊंट दौड़ाते लोग भी मिल जाते थे. कभी-कभार शाम ढले पालकी ढोते सवार भी दिख जाते थे. दोपहर में भेड़ों का रेला रोज़ ही मिल जाता था.
हमारी बिल्डिंग के बाहर उसका नाम लिखा था “यादव भवन” जिसके ग्राउन्ड फ़्लोर पर बाहर की तरफ़ पाँच दुकानें थीं. एक पंसारी, एक ढाबा, एक बजाजा यानी कपड़े वाला, एक नाई और एक जो बिल्डिंग के मालिकों की अपनी दुकान थी उसके अंदर बाहर कपास के बड़े-बड़े गट्ठर और दाल की बोरियाँ रखी रहती थीं. इन दुकानों के बाद बिल्डिंग के अंदर जाने का रास्ता और उसके आगे ऊपर की मंज़िलों तक पहुँचने वाली ऊंची-ऊंची सीढ़ियाँ थीं. ज़ीने पर चढ़ने में हम बच्चों को बहुत मशक्क़त करनी पड़ती थी. सीढ़ी में अंधेरा रहता था, वहाँ बिजली का बल्ब तो लगा था पर कभी जलता नहीं था. हर मंज़िल वाले एक लालटेन जलाकर अपनी मंज़िल की सीढ़ियों के आगे छोड़ देते थे.
तीसरी मंज़िल पर हमारे साथ वाले कमरे में एक कश्मीरी परिवार रहता था, कोई कौल साहब थे जिनकी पत्नी अपने कानों में लंबे-लंबे धागों वाले सोने के गहने पहनती थीं. उनके दो बच्चे थे एक लड़का और एक लड़की. लड़के का नाम तो मुझे याद नहीं पर उस गोरी-चिट्टी, लाल गालों वाली ख़ूबसूरत लड़की का नाम था अड़िमा – बहुत मीठा और धीमा बोलती थी अड़िमा – उसे ठीक सुन पाने के लिए मुझे अक्सर अपना कान उसके मुँह तक ले जाना पड़ता था. उसके मुँह से ग़ज़ब की महक आती थी, जाने क्या चबाती थी. हमारे साथ दूसरी तरफ़ एक नागपाल दंपति रहते थे जिनके कोई बच्चा नहीं था. नागपाल आंटी मुझे बहुत प्यार करती थीं और हर रोज़ कुछ खाने को देती थीं, अकेली वही मेरे जन्मदिन पर तोहफ़ा लाती थीं. नागपाल अंकल के पास वेस्पा स्कूटर था जिस पर बैठा कर उन्होंने मुझे कई बार सैर कराई. बाक़ी किसी और के बारे में न मुझे याद है, न ही शायद हम किसी को जानते थे. हाँ, हमारे पिताजी हर इतवार हमें छत पर ले जा कर ख़ूब तस्वीरें खींचते थे. वो कोडेक बॉक्स कैमरा मुझे आज भी याद है.

दक्षिण से उत्तर को जाती न्यू रोहतक रोड के दाहिनी तरफ़ सराय रोहिल्ला स्टेशन की लंबी दीवार थी जो किसी क़िले की पुराने दीवार-सी लगती थी. हमारे वहाँ रहने के दौरान ही उस दीवार के साथ-साथ राजस्थान से आए ख़ानाबदोश गडुलिया या गाड़िया लोहार क़बीले अपनी ख़ूबसूरत गाड़ियों के साथ आ कर रहने लगे, ऐसा माना जाता है कि गड़िया लोहार महाराणा प्रताप की प्रजा और वंशज हैं. लोहे के औज़ार, हथियार, बर्तन, और घर का सामान बनाने वाले ये गड़िया लोहार राजपूत बताए जाते हैं.
हट्टे-कट्टे, बलिष्ठ और मेहनती गाड़िया लोहार धधकती भट्टी या आग के सामने भारी-भरकम हथौड़ों से लाल लोहे को पीटते और उसको नई शक्ल देते दिख जाते थे. इनकी औरतें भी उतनी जोर से हथौड़ा चलाती थीं जितने इनके मर्द. कई गर्भवती औरतें भी आग के सामने चमड़े की धौंकनी से आग को हवा देती दिख जाती थीं. बाक़ी औरतें बर्तन माँजती, रोटी बनाती और बच्चों को पालती थीं. इन औरतों में से किसी को मैंने शहरी औरतों की तरह दुबला-पतला या मरियल-सा नहीं देखा. गड़िया लोहारों के छोटे बड़े बच्चे दिन के किसी भी वक़्त रेल लाइनों के आस-पास मँडराते दिखाई पड़ते थे. लड़कों के हाथ में बोरियाँ होतीं और लड़कियों के सर पर बांस की टोकरियाँ. रेल कर्मचारियों से नज़र बचाकर ये बच्चे अपनी बोरियों और टोकरियों में कोयला और लोहा-कबाड़ इकट्ठा करते. पकड़े जाने पर कभी-कभी तो इनकी ख़ूब धुनाई होती.
ख़ैर, बचपन में ये सब मुझे परेशान नहीं करता था तब तो मैं सड़क किनारे चलता हुआ गाड़िया औरतों के काले कपड़े, उनकी बड़ी आँखों में काला काजल, रंगीन डोरियों वाली चोलियों और उनकी चांदी के गहनों से भरे हाथ, पैर और गले देख कर अचंभित-सा एक जगह जम जाता था. मेरी बड़ी बहन राधे बताती हैं कि “कई बार ये औरतें तुझ छोटे कद के गोरे चिट्टे, गोल-मटोल, प्यारे से लड़के को देखकर उठा लेतीं और मैं डर जाती थी.”

उनकी गाड़ियां छोटी-छोटी चीज़ों से सजी होतीं जैसे घुंघरू, घंटियाँ, शीशे की गोल बिंदियाँ, सजावटी धातु की प्लेटें और कपड़े की रंगीन झंडियाँ. इन गाड़ियों को चलाने वाले बैल मुझे कभी दिखाई नहीं दिए. ये गाड़ियाँ बांस की सिरकी से ढकी होती जो शायद उन्हें धूप और बारिश से बचाती थी. याद नहीं उन दिनों मच्छर होते थे कि नहीं. साल के बाक़ी महीनों में जब तेज़ गर्मी या हाड़ जमा देने वाली ठंड पड़ती होगी, तब जाने ये लोग कैसे रहते होंगे.
वैसे तो हमारे वाले घर पर पक्की छत थी और चारों तरफ़ पक्की दीवारें थी फिर भी सर्दी-गर्मी से हम भी परेशान ही रहते थे. गर्मी में दीवारें गरम और सर्दी में ठंडी हो जाने से कभी चैन तो नहीं मिलता था. बारिश में तो उस इलाक़े का हाल तो ख़ासा खराब हो जाता था. चारों तरफ़ पानी जमा हो जाने से हमारी बिल्डिंग एक टापू-सी हो जाती थी अगर कहीं बारिश लगातार दो-तीन रोज़ हो गई तो खाने-पीने का सामान तक मिलना मुश्किल हो जाता. ऐसे वक़्त में गाड़िया लोहारों की तो शामत आ जाती थी. बेचारे पूरे परिवार के साथ अपनी-अपनी गाड़ी में फंस कर रह जाते.
गाड़िया लोहारों की गाड़ियों की बनावट आगे से घोड़ा या बैलगाड़ी सी होती है जिसमें आगे के हिस्से में जानवर बांध र उसे खींच जा सकता है. बरसात के दिनों में इन परिवारों की औरतें इसके सामने वाले जोत पर चूल्हा जला कर बमुश्किल खाना बनातीं. कुल मिलाकर इन ख़ानाबादोशों के लिए ज़िंदगी तब भी बहुत कठिन थी और आज भी है.

आज भी जब मैं महरौली वाली सड़क के किनारे इन्हे बसा देखता हूँ तो मैं हैरान होता है कि 21वीं सदी में भी हमारी सरकारें इन घुमक्कड़ क़बीलों के लिए कुछ सुविधाएं क्यूँ नहीं जुटा पाती? पूरे उत्तरी और पश्चिमी भारत में ये लोग साल भर घूमते हैं हम क्यूँ नहीं इनके लिए नियत स्थान तय कर सकते जहां इनके लिए मूलभूत सुविधाएं हों. एक बड़ा-सा खुला साफ़ मैदान हो, जहां इन्हें साफ़ पानी और टॉयलेट मिले, जहां ये लोग चार-छह महीने रुक कर अपने बनाए माल को बेचकर अपना जीवन चला सकें? किसी सरकार के लिए ये कोई ज्यादा मुश्किल या ख़र्चीला काम तो नहीं है, बिल्कुल इसी तरह की सुविधाएं सरकार ने हथकरघा और दस्तकारों के लिए हर शहर में बनाई हैं, आख़िर गड़िया लोहार भी तो लोहे का सामान बनाने वाले हस्तशिल्पी ही तो हैं. ये भी अपने हाथ और अपनी मेहनत से सामान बनाते हैं.
अब तो ये लोग अपने साथ ढोंर डँगर भी नहीं रखते. अब इनके पहनावे भी काफी हद तक शहरी हो गए हैं, खान-पान और रहन-सहन भी बदल चुका है. कुछ परिवारों ने तो अपनी पहचान यानी “लोहार गाड़ियां” भी त्याग दी है और अब सड़क किनारे टीन की चादर से ढके कच्चे कमरे से बनाकर रह रहे हैं. इनमें से बहुतों ने तो बिजली के कनेक्शन भी ले रखे हैं. तक़रीबन हर झुग्गीनुमा घर में टेलीविज़न देखने वाली सेटेलाइट डिश भी लगी मिल जाती है. इनके युवा भी बाक़ी युवाओं की तरह मोबाईल फ़ोन और इंटरनेट पर चलने वाली फूहड़ फ़िल्मों के आदी हो चुके हैं.
हमारे बचपन के वक़्त से अब में फ़र्क सिर्फ़ इतना हुआ है कि तब हम इनके पड़ावों, इनकी गाड़ियों के पास जाकर इन्हें लोहे का सामान बनाते देख सकते थे, इनकी फ़ौलादी ताक़त और लोहे से कुछ भी बना लेने के इनके हुनर पर नाज़ करते थे और वो सामान फ़ख्र से खरीद सकते थे पर आज ये परिवार वाले अपने छोटे-छोटे बच्चों को चौराहे की लाल बत्ती पर सामान बेचने के लिए भेजने को मजबूर हैं. इनके छोटे बच्चे सारा दिन धूल-मिट्टी और धुएं के बीच अपनी सेहत ख़राब करके अपने घर के लिए चार पैसे जुटा पाते हैं और मोटरों मे बैठे शहरी लोग इनसे मोल भाव कर इनकी मज़बूरी का फायदा उठाते हैं. सिर्फ़ शहरी ही नहीं, चौराहे पर खड़े पुलिस वाले भी इनके साथ बुरा बरताव करते हैं, छेड़खानी करते हैं और इनसे हफ़्ता भी वसूलते हैं. इनके कुछ नौजवान तो ग़लत धंधों में लग कर जीवन बर्बाद कर रहे हैं .
बादशाह अकबर ने तो 1568 में चित्तौड़गढ़ क़िले पर कब्ज़ा करने के बाद मेवाड़ छोड़ ही दिया था. वो समय तो कभी का बीत चुका. क्या गाड़िया लोहार आज भी अपने राजा की शपथ से मुक्त नहीं हुए? कब तक भागेंगे ये लोग? महाराणा प्रताप तो अब लौटेंगे नहीं – अब तो न वो राजा रहे न वो देस, क्या ये कभी अपने वतन नहीं लौटेंगे? और अगर नहीं भी जाना तो ये क़बीला किसी एक जगह का होकर कहीं बस क्यूँ नहीं जाता? बिना बैल की इन गाड़ियों को ले कर कब तक भटकते रहेंगे ये परिवार? क्या इनका अपने बच्चों, अपने परिवारों की तरफ़ कोई फ़र्ज़ नहीं है? इन सब सवालों का जवाब आसान नहीं है, मैं यह जानता हूँ पर क्या एक देश को अपने वासियों के भविष्य के बारे में नहीं सोचना चाहिए? देश की जीडीपी में इनकी मेहनत का शुमार भी होना चाहिए.
21वीं सदी की इस तरक़्क़ी और देश के विकास का हश्र क्या सिर्फ़ यह है कि हमारे जनजातीय क़बीलों को अपनी निजी पहचान शहर के हाथों खोनी पड़ेगी? मेरा मानना है कि अपने आदिवासियों, देशज और मूल निवासियों और अपनी संस्कृति और सभ्यता का इतना बड़ा हिस्सा खोना हमें बहुत महंगा पड़ेगा.

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