अरावली: धूल, ख़ामोशी और ख़तरे की दस्तक
एक दरवाज़ा, जो एक कहानी की ओर खुलता है
मेरे घर का दरवाज़ा जब खुलता है, तो सामने कोई आम मंज़र नहीं होता—होता है एक ख़ामोश क़िस्सा, जो हर सुबह मेरी तरफ़ एकटक देखता है.
मेरा दरवाज़ा अरावली पहाड़ों की उन ढलानों पर खुलता है, जहाँ पत्थर भी जैसे अपनी उम्र का बोझ उठाए खड़े हैं. बस दो सौ मीटर की दूरी पर 40 से 70 मीटर ऊँची वे पहाड़ियाँ हैं, जिन पर चलते हुए आदमी गुरुग्राम से दिल्ली पहुँच सकता है—बिना किसी नक़्शे, बिना किसी गाड़ी, धुएं या शोर के. और अगर आप एक किलोमीटर दक्षिण की ओर बढ़ जाएँ, तो वही रास्ता धीरे-धीरे हरियाणा से निकलकर राजस्थान और फिर गुजरात की ओर मुड़ जाता है—जैसे कोई पुरानी दास्तान अपनी ही लय में आगे बढ़ रही हो.
कभी इस रास्ते पर चलते हुए हवा में पेड़ों की सरसराहट होती थी, कहीं दूर से किसी परिंदे की आवाज़ आती थी, यहाँ झीलों और तालाबों के किनारे बसे छोटे-छोटे गाँव अपने ही सुकून में सांस लेते थे. इनके आसपास जनजातीय क़बीलों के जीवन की धीमी, मगर बराबर धड़कन सुनाई देती थी. आज उसी रास्ते पर धूल है और ऐसी ख़ामोशी, जिसमें बीते हुए वक़्त की आहटें भी दब गई हैं. ऐसी धूल, जो अब सिर्फ़ ज़मीन से नहीं, ज़मीर से उड़ रही है.
पिछले पचास से सत्तर वर्षों में अरावली के एक बड़े हिस्से को तोड़कर समतल कर दिया गया है. हमारे गुरुग्राम आने से पहले यहाँ दर्जनों पत्थर की गिट्टी और बजरी बनाने वाले स्टोन क्रशर देखे जा सकते थे. उन्हीं ज़मीनों पर अब “विकास” के नाम पर शहर खड़े हैं—कंक्रीट के ऐसे जंगल, जो गर्मियों में भट्ठी बन जाते हैं और सर्दियों में पत्थर की तरह ठंडे. लेकिन इन इमारतों की नींव में सिर्फ़ पत्थर नहीं, बल्कि बीते हुए कल का विनाश दबा हुआ है—जंगल, तालाब, झील, पेड़, झाड़ियाँ, पक्षी, वन्यजीव और वो समुदाय, जिनकी ज़िंदगियाँ इन पहाड़ियों से गहरे जुड़ी थीं.
कभी लगता है जैसे ज़मीन अपना सब्र खो रही हो, और शहर अपने ही बोझ तले धीरे-धीरे बदल रहा हो.
एक पुरानी रूह, जिसे हमने बेच दिया
अरावली कोई साधारण पहाड़ नहीं है—ये धरती की बहुत पुरानी याद है. लगभग दो अरब वर्ष पुरानी यह श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा से होती हुई दिल्ली तक फैली है. कहते हैं, यह उस समय की साक्षी है जब इंसान ने चलना भी शुरू नहीं किया था, उस वक़्त भी ये पहाड़ अपनी जगह खड़े थे—ख़ामोश, मगर ज़िंदा. पर पिछले पचास-सत्तर बरसों में हमने इस ख़ामोशी को समझने के बजाय, उसे तोड़ने का हुनर सीख लिया.
हमने इनसे सिर्फ़ पत्थर नहीं लिए—हमने उनसे उनका जंगल छीन लिया, उनकी छाँव में पलने वाले जानवरों को बेघर कर दिया, उन झीलों को सुखा दिया जो कभी आसमान का अक्स समेटे रहती थीं, और उन लोगों को भी हटा दिया, जिनकी ज़िंदगियाँ इन पहाड़ियों के साथ साँस लेती थीं. पिछले कुछ दशकों में हमने उससे उनका जंगल, उनका पानी, उनके जानवर, उनकी ज़ुबानें, उनके लोग, और आख़िर में—उनका अस्तित्व छीन लिया.
पूर्वी गुरुग्राम की अरावली पहाड़ियों के बीच ग्वाल पहाड़ी इलाक़ा जिस पर कभी हजारों गाय चरा करती थीं अब बिल्डरों द्वारा अपने ‘शांत, हरे-भरे वातावरण के लिए’ बेचा जाता है. गाड़िया लोहारों के पहिए अब इन रास्तों पर नहीं चलते… गुर्जर चरवाहों की बांसुरी अब इन ढलानों पर नहीं बजती… और पहाड़—अब आइनों की तरह नहीं, घावों की तरह दिखते हैं. अरावली ऐसी पुरानी पर्वतमाला है जिसकी याद मिटाई जा रही है. यक़ीन मानिए पहाड़… गंजे हो गए.

“100 मीटर” — एक फ़ैसला, या एक फ़रमान?
क़ानून की ज़ुबान अक्सर सीधी होती है, मगर उसके मायने… बहुत दूर तक जाते हैं. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने जब यह कहा कि केवल वही पहाड़ियाँ अरावली मानी जाएँगी, जो अपने आसपास के भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची हों—तो शायद ये एक तकनीकी परिभाषा थी. मगर ज़मीन पर, ये एक इजाज़त-नामा बन गई, ज़मीनी सच्चाई में ऐसे फ़रमान बिल्डरों और माफ़िया के लिए दरवाज़ा खोल देते हैं.. कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई इस परिभाषा ने संकट को और गहरा कर दिया है. दरअसल ये एक खुला न्योता है—उन्हें तोड़ो, समतल करो, बेचो …और उस पर “विकास” लिख दो.
सोचिए—एक ऐसी ऊँचाई, जो पच्चीस मंज़िला इमारत के बराबर हो, अगर वह भी “पर्वत” की श्रेणी से बाहर कर दी जाए—तो फिर क्या बचेगा? ये परिभाषा नहीं, एक दरार है—जिससे होकर पूरा का पूरा पहाड़ गिर सकता है. यह परिभाषा विकास के नाम ऐसी बर्बादी है जहाँ से वापसी का रास्ता शायद न बचे. इसके परिणाम बेहद गंभीर हैं. इसके मानी ये हैं कि इस सीमा से नीचे की असंख्य पहाड़ियाँ—जो इस शृंखला की रीढ़ हैं—अब “पहाड़” नहीं कहलाएंगे और उनके खनन या समतलीकरण का रास्ता खुल जाएगा.
ये पहाड़ क्यों ज़रूरी हैं?
ये पहाड़ सिर्फ़ ज़मीन से उठे हुए पत्थर नहीं—ये हमारे वजूद की हिफ़ाज़त हैं. ये थार के रेगिस्तान को हरियाणा और दिल्ली में फ़ैलने से रोकते हैं—जैसे कोई बूढ़ा दरबान दरवाज़े पर खड़ा हो. ये बारिश के पानी को अपने सीने में उतारते हैं—जैसे माँ अपने बच्चे को थाम ले. ये हवा को साफ़ करते हैं—बिना किसी शोर, बिना किसी दावे के. पर जब ये टूटता है, तो सिर्फ़ एक पहाड़ नहीं गिरता—प्रकृति का संतुलन बिखर जाता है. पर्यावरण नहीं, ये अस्तित्व का सवाल है.
अरावली सिर्फ़ पत्थरों का ढेर नहीं है; यह उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है. यह बारिश के पानी को ज़मीन में उतारकर भू-जल को दुबारा से भर देती है, और दिल्ली-एनसीआर जैसे प्रदूषित क्षेत्रों के लिए प्राकृतिक हवा साफ करने वाले तंत्र का काम करती है. इसके बिना यह पूरा क्षेत्र धीरे-धीरे अधिक गर्म, अधिक शुष्क और अधिक अस्थिर हो जाएगा.
इसके कटाव के प्रभाव अभी से दिखाई देने लगे हैं—भूजल स्तर में गिरावट, सूखती झीलें, बढ़ता वायु प्रदूषण, और मौसम के पैटर्न में असामान्य बदलाव. गुरुग्राम और फ़रीदाबाद जैसे शहरों में हर मानसून में होने वाली बाढ़ और जलभराव भी इसी असंतुलन की ओर इशारा करते हैं. वर्ष 2000 में जब हमने अपने घर पर बोरवेल खुदवाया था तब यहाँ 60 फुट पर साफ़ मीठा पानी था, आज 25 साल बाद पानी 300 फुट पर भी मुश्किल से मिलता है. आज बोरवेल खोदना ग़ैरक़ानूनी है.
खनन, पानी का बेतहाशा दोहन, पेड़ों का सफ़ाया…ये सब मिलकर इस इलाके को रेगिस्तान की तरफ धकेल रहे हैं. ये मसला सिर्फ “विकास” बनाम “पर्यावरण” का मामला नहीं है, बल्कि पानी के भविष्य का भी है – अरावली बारिश को रोककर ज़मीन में उतारती है; दिल्ली की हवा का भी है – यही पहाड़ियाँ राजस्थान की रेत को रोकती हैं; मौसम और तापमान का भी है–हरियाली ख़त्म तो शहर भट्ठी बनता है. यहाँ मामला सिर्फ पेड़ों का नहीं— एक पूरे इकोसिस्टम की हत्या का है. जब ख़ुद पहाड़ियाँ बोल रही हों ‘हमे बचा लो’ तो इंसान… बस देखते रह जाते हैं.

धूल, जो अब फेफड़ों तक पहुँच गई है
आज इन पहाड़ियों के बीच खड़े हो जाइए—हर पाँच मिनट में एक ट्रक गुज़रता है, पीछे छोड़ जाता है धूल का एक बादल. वो धूल अब सिर्फ़ रास्तों पर नहीं रहती—वो घरों में दाख़िल होती है, खाने में घुलती है, और धीरे-धीरे फेफड़ों पर एक अदृश्य परत बनाती जाती है.
इन पहाड़ियों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह संकट कोई सैद्धांतिक बहस नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा की हक़ीक़त है. हर कुछ मिनट में पत्थरों से लदे ट्रकों का गुज़रना, धूल के गुबार, और मशीनों की लगातार आवाज़—यह सब अब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है. बुज़ुर्ग बताते हैं कि कैसे कभी ये पहाड़ हरे-भरे जंगलों से ढके थे, जहाँ हज़ारों जीव-जंतु पाए जाते थे. आज वही इलाक़ा बंजर होता जा रहा है.
इंसाफ़ की एक अधूरी कहानी
और यह सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी सवाल है. जिन समुदायों ने सदियों तक इन पहाड़ियों के साथ जीवन बिताया, रहना सीखा, इनको सँजोया वे आज विस्थापित हो रहे हैं—और कई बार उन्हें उन्हीं खदानों में मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ता है, जो उनके घरों को निगल रही हैं. ज़मीन से उठती आवाज़ें बताते हुए एक बुज़ुर्ग ने मुझसे कहा—“पहले यहाँ हवा चलती थी… अब बस धूल चलती है.” उस एक जुमले में पूरी त्रासदी छिपी है. ये सब अब रोज़ का मंज़र है. 70 साल के क़ासिम खान कहते हैं—“पहाड़ हिल रहे हैं… और हम कुछ नहीं कर पा रहे.”
अरशद जैसे लोग, जिनके बाप-दादा इन पहाड़ियों के साथ जीते आए, आज उन्हीं पहाड़ों से बेदख़ल कर दिए गए हैं. अब वही अरशद पत्थर काटता है—उस पहाड़ को, जो कभी उसका घर था. ये सिर्फ़ पर्यावरण की कहानी नहीं है, हुज़ूर—ये इंसाफ़ की भी एक अधूरी दास्तान है.
आने वाला वक़्त — एक सख़्त आइना
सिलसिला अगर यूँ ही चला तो आने वाले सालों में हम इसके गंभीर परिणाम देखेंगे . सूखते हुए कुएँ…गर्म होती ज़मीन…बढ़ती हुई बाढ़…और एक ऐसी हवा, जिसे साँस में लेना भी एक जोखिम बन जाएगा, इंसान और जानवर का आपसी टकराव. ये कोई दूर का ख़तरा नहीं—ये दरवाज़े पर खड़ी दस्तक है.
अब क्या किया जाए?
इस स्थिति से निपटने के लिए ठोस और एकजुट हो कर कदम उठाने की आवश्यकता है. अरावली क्षेत्र का व्यापक वैज्ञानिक मानचित्रण, अवैध खनन पर सख़्त नियंत्रण, खनन पर आँख रखने वाली फोर्स, जल पुनर्भरण क्षेत्रों की रक्षा, पुराने तालाबों और झीलों को विकसित करना, और शहरी विस्तार पर स्पष्ट नियमन—ये सब ज़रूरी हैं. इसके साथ ही, स्थानीय समुदायों को संरक्षण के प्रयासों में भागीदार बनाना और उन्हें टिकाऊ आजीविका के विकल्प देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अब भी वक़्त है— अरावली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए, खनन पर सख़्त रोक लगे, और इन पहाड़ों को मुनाफ़े नहीं, मोहब्बत की निगाह से देखा जाए.
आख़िरी बात—एक सीधी, मगर कड़वी सच्चाई
अरावली ज़मीन का कोई छोटा टुकड़ा नहीं है, जिसे नक़्शों में बाँटकर, काग़ज़ों में बेच दिया जाए या जिसे मुनाफ़े के लिए काटकर बेचा जा सके. ये एक ज़िंदा दीवार है—जो हमें रेगिस्तान से बचा रही है. और दीवारें जब गिरती हैं न, तो सिर्फ़ ईंटें नहीं टूटतीं उनके अंदर के घर भी उजड़ जाते हैं.
सच बहुत सरल है, और उतना ही कठोर—अगर अरावली बची रही, तो हम बचेंगे. अगर ये ख़ामोश हो गई… तो हमारी आवाज़ भी ज़्यादा देर तक नहीं बचेगी.
(अरावली से एक गवाह, एक बाशिंदा, और एक बेचैन आवाज़)
तस्वीरेंः राजिंदर अरोड़ा

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