कोई एक सईदा | भारतीय जो सामने है, नज़रअन्दाज़ है!
नेहा दीक्षित की पहली किताब ‘द मेनी लाइव्ज़ ऑफ़ सईदा X: द स्टोरी ऑफ़ ऐन अननोन इंडियन’ 2024 के आख़िर में छपकर आई थी. इस किताब का मर्म और महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि अब तक इसके हिंदी, तमिल और मलयालम अनुवाद भी छप चुके हैं. राजकमल प्रकाशन ने ‘कोई एक सईदा’ नाम से इसका हिंदी अनुवाद छापा है. इसका एक उप-शीर्षक भी है – भारतीय जो सामने है, नज़रअन्दाज़ है! इस किताब पर हो रही अलग-अलग चर्चाओं के बीच यहाँ प्रभात सिंह के अनुभव और उनकी टिप्पणी, जिन्होंने इसका हिंदी अनुवाद किया है. -सं
‘द मेनी लाइव्ज़ ऑफ़ सईदा X’ का एक अंश मैंने पिछले साल किसी अंग्रेज़ी अख़बार में पढ़ा तो जिस पहली चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा, वह बनारस के बुनकर थे. उस अंश में बुनकरों की ज़िंदगी और बनारस की कुछ जगहों का ज़िक्र ही आया था. अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ के किरदार ज़ेहन में कौंध गए. फिर जब सईदा की ज़िंदगी की दास्तान पढ़ी तो मालूम हुआ कि इसका फ़लक कहीं ज़्यादा बड़ा और अलग है. यह दास्तान पढ़ते समय कितनी ही स्मृतियों और अनुभूतियों से गुज़रना हुआ. तब इस किताब को पढ़ने केदौरान एक बात जो बार-बार महसूस होती रही, वो यह कि इसका हिंदी अनुवाद होना चाहिए, हिंदी के पाठकों को भी यह किताब ज़रूर मयस्सर होनी चाहिए.
यह कहानी या उपन्यास नहीं, सच्चे लोगों की ज़िंदगी की, जीने के लिए उनके संघर्षों की, बार-बार उजड़ने और फिर बसने की उनकी कोशिशों की सच्ची कहानी है, और इसकी कहन इतनी खरी और असरदार है कि यह अनाम हिंदुस्तानी सईदा को हमारे आसपास का, हमारी पहचान का कोई किरदार बना देती है. उनके हालात, उनके परिवार और दोस्तों और इस कहानी में शामिल तमाम पात्रों के बारे में पढ़ते हुए आप व्यथित, द्रवित या भावुक हो सकते हैं, हैरान हो सकते हैं, चौंक सकते हैं, हमदर्दी, उदासी, जिज्ञासा, करुणा या क्षोभ की भावना में डूब सकते हैं, फिर भी इस कहानी में देश के आम आदमी की प्रतिनिधि की हैसियत से हालात से जूझने और उनसे पार पाने के सईदा के जज़्बे, उनकी हिम्मत और हौसले को सलाम करने का जी चाहेगा.
हालाँकि, मैं तो बार-बार उनके पति अकमल की छटपटाहट में बारे में भी सोचता और उनके मन-मस्तिष्क की हलचलों का अंदाज़ लगाने की कोशिश करता रहा हूँ, जो कभी आला दर्जे के बुनकर थे, अपने कुनबे के बेहतरीन-कल्पनाशील शिल्पी और हालात ने ज़िंदगी की गाड़ी खींचने के लिए करघे पर करिश्मा दिखाने वाले हाथों को रिक्शा-ठेले के हैंडिल तक पहुँचा दिया था. ठेला खींचने से शुरू करके इस फ़ैक्ट्री से उस फ़ैक्ट्री तक मज़दूरी करने की मज़बूरी. क़ुदरती नज़ारों से प्रेम करने वाला, चंदौली के जंगलों में जानवरों को निहारने, चंद्रप्रभा नदी के झरनों का सौंदर्य बखानने वाला, लोहता में रहने तक फ़िल्मों का शौक़ीन वह बाज़ीगर, रेडियो का रसिया और बढ़िया ख़ानसामा भी था. फिर दिल्ली की ज़िंदगी में यह सब कभी मयस्सर न हुआ.
यह किताब हमारे देश के मेहनतकशों का, तेज़ी से बदल रही दुनिया और हमारे समाजी माहौल के साथ ही हुक्मरानों के तोताचश्मी रवैये और नए नैरेटिव के बीच उनकी जद्दोजहद का आख्यान है. आप इसे ऐसा रिपोर्ट कार्ड भी मान सकते हैं, जिसमें अवाम की नाकामी दर्ज है, ग्रेस मार्क की कोई गुंजाइश इसलिए शून्य है कि वे हर विषय में फेल हो गए हैं. मामूली ख़्वाहिशों को पूरा करने के ख़्वाब और अपनी सारी नेक मंशा, मेहनत, लगन और ईमानदारी के बावजूद हर बार फेल होते जाते हैं, शाज़ेब की तरह. सभापुर या करावलनगर के कारख़ानों के अँधेरे में अपनी ज़िंदगी ग़र्क़ करते जाने वाले मज़दूरों के बहाने यह देश के किसी भी हिस्से में जी रहे ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्हें मामूली समझने वाले दरअसल उनकी ज़िंदगी के बारे में कुछ नहीं जानते.
सईदा की इस कहानी को पहले पढ़ लेने के बाद इसका हिंदी अनुवाद करते हुए भी मैं फिर उन्हीं अनुभवों से गुज़रा, जिनका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है. पढ़ने और अनुवाद के बीच के अंतराल में सईदा की कहानी को मैं कुछ इस तरह जज़्ब कर चुका था कि काम के लिए सड़क पर निकली मज़दूर महिलाओं के चेहरे में उस सईदा की छवि दिख जाती जो अनाम हैं, मॉल में वर्दी पहनकर घूमने वाली युवतियों में या सफ़र के दौरान आनंद विहार बस अड्डे पर मिल गई किसी युवती में रेशमा की झलक पा जाता या फिर दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा-ठेला खींचते लोगों में अकमल का अक्स तलाशने लगता. अपने शहर के गैराज वाले इलाक़ों से गुज़रते हुए शाज़ेब या ग़ज़ाली या सलमान की उम्र के लड़कों को देख लेने पर उनकी तुलना करने लगता. लब्बोलुआब यह कि पहली बार जाना कि किसी किरदार को महसूस करने का यह दबाव कितना गहरा और कई बार कितना तकलीफ़देह भी होता है.
यों इस कहानी के बहुतेरे प्रसंग बहुत चीन्हे हुए हैं, कि मेंहदावल और बनारस की बुनकर बिरादरी को थोड़ा क़रीब जाकर देखा-जाना है, नेहा दीक्षित के न्यूज़रूम में एक रोज़ अचानक दाख़िल हुए बैंगलोर वाले उस नौजवान टेकी को भी पहचानता हूँ, उसके बिरादरों से देहरादून, आगरा और मेरठ में एक बड़े अख़बार के टेबलॉयड के न्यूज़रूम में ख़ुद कई बार मिल चुका हूँ, और सच्चाई सुनने के उस टेकी के परहेज़ से हमेशा ही चिढ़ता आया हूँ, यमुना पुश्ते की सड़कों और वहाँ के घरों में चलने वाले कारख़ानों को देखा है और वहाँ के बाशिंदों की जीने की जद्दोजहद भी, बाक़ी दौर-ए-हालिया तो हमारा-आपका देखा हुआ ही है, पर एक दूसरी तरह की मुश्किल से भी अक्सर रूबरू होना पड़ा और वो यह कि इस कहानी के किरदार फ़िल्मों के बड़े शौक़ीन हैं और जिस दौर का सिनेमा वे देखते हैं और जिनके गानों को जीते हैं, उनसे मेरी थोड़ी-बहुत भी वाक़फ़ियत नहीं रही है. सो कई बार ऐसी दुविधा में फँसा हूँ कि की-बोर्ड पर चलती उँगलियाँ काफ़ी देर के लिए ठहरी रह जाती थीं. कुछ ग़ैर-प्रचलित रसायनों के नाम को लेकर भी ऐसी स्थिति बनी, मसलन गजक का वज़न बढ़ाने के लिए उसमें सेलम पाउडर की मिलावट का प्रसंग. अपने काम और यात्राओं में मसरूफ़ियत के बावजूद नेहा दीक्षित जब-तब मुझे ऐसी दुविधाओं से उबारती रहीं. कई जगह कुछ संज्ञाओं को लेकर, ख़ास तौर पर, हमें मशविरा करने की ज़रूरत पड़ी. उनकी भाषा की रवानी और अंदाज़-ए-बयाँ मुत’आसिर करता है, अलबत्ता पत्रकारिता के उसूलों के मुताबिक़ ज़रूरी तटस्थता बरतने के बावजूद करुणा और व्यंग्य की एक अंतर्धारा जगह-जगह महसूस होती है.
यह किताब नेहा दीक्षित के नौ सालों के शोध और क़रीब नौ सौ लोगों से हुई बातचीत के हवाले से बुना गया ताना-बाना है, जो हमारे दौर के ऐसे बेशुमार वाक़यों को दर्ज करती है, जिनकी अहमियत टीवी या अख़बारों में छपी ख़बरों से कहीं ज़्यादा थी. यह किताब मज़बूती से यह भी रेखांकित करती है कि किसी घटना के चश्मदीद अख़बारनवीस की ज़िम्मेदारी उसके बारे में रिपोर्ट लिख भर देने से ख़त्म नहीं हो जाती, जैसा कि अमूमन हम मानते हैं, बल्कि तमाम महत्वपूर्ण घटनाएं या फ़ैसले अवाम को, आम आदमी को किस तरह और किस हद तक प्रभावित करते हैं, दुनिया को उसे बताने का काम भी अख़बारनवीसों के ज़िम्मे ही है. हमारी दुनिया में हाशिए पर रहने वालों की बहुत बड़ी आबादी का एक मामूली और बहुत छोटा-सा हिस्सा होने के बावजूद यह किताब उनकी नुमांइदगी करती है और ऐसा मानवीय दस्तावेज़ बन जाती है, जिसको दर्ज किया जाना निहायत ज़रूरी था.
किताब के शुरुआती पन्नों की एक बानगीः
‘तो बनारस क्या हिंदू शहर है?’ राशिद ने अब्बाजी से पूछा.
अब्बाजी ने जवाब दिया, ‘तभी से जब से अंग्रेज़ों ने इसे हिंदू शहर कहना शुरू किया. वरना बनारस तो मसालदान है.’
कहते हैं कि बनारस दुनिया का सबसे पुराना शहर है. इसकी तमाम पहचानें हैं, थोड़ी जटिल पहचान.
अब्बाजी ने राशिद को बताया कि बनारस हिंदुओं का शहर है, जो यह मानते हैं कि यहाँ मरने से मोक्ष मिलता है. यह मुसलमानों का भी शहर है, जो यहाँ की एक-चौथाई आबादी हैं. यह कबीर जैसे सूफ़ी संतों का शहर है, जो ख़ुद एक बुनकर थे और लोगों की एकता और मेल-जोल के हामी थे, और संत रविदास का भी, जिन्होंने ज़ुल्मी हिंदू वर्ण व्यवस्था को चुनौती दी थी. यह सिखों का शहर है, जिनके पवित्र धर्मग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर और रविदास दोनों की वाणी शामिल हैं—जो उनके पहले गुरु, गुरु नानक ने इकट्ठा की थीं, और 1506 में जो बनारस आए भी थे. यह बौद्धों का शहर है, ज्ञान पाने के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं दिया था, यह जैनियों का है क्योंकि उनके प्रमुख तीर्थंकरों में से एक भगवान पार्श्वनाथ यहीं जन्मे और शिक्षा पाई. यह शहर तो सभी का है.
‘ऐसे लोगों के लिए, जिन्होंने इंसानी चमड़ी का सिर्फ़ एक रंग देखा है, एक मज़हब और एक ही मौसम जाना हो, यह समझना बहुत मुश्किल है कि थाली की एक रकाबी में कितनी तरह के मसालों का मेल होता है, और कैसे हर मसाला खाने की लज़्ज़त में इज़ाफ़ा करता है,’ अब्बाजी ने कहा.
किताबः कोई एक सईदा
लेखकः नेहा दीक्षित
अनुवादः प्रभात सिंह
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
क़ीमतः 499 रुपये
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