ऋत्विक घटक की सिने-कला पर बहुआयामी संवाद
ऋत्विक घटक पर केन्द्रित किताब ‘ऋत्विक घटकः नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ भारतीय सिनेमा और सिने-विमर्श के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है. यह किताब केवल एक महान फ़िल्मकार के जीवन और कृतित्व का विवरण भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे सिने-चिन्तक, सांस्कृतिक हस्ताक्षर और वैचारिक कलाकार की समग्र छवि निर्मित करती है, जिसने भारतीय सिनेमा को न केवल शिल्प की दृष्टि से बल्कि विचार की दृष्टि से भी गहराई दी. इस कृति का मूल्य इसी तथ्य में निहित है कि यह ऋत्विक घटक को किसी एक विधा, किसी एक विचारधारा या किसी एक ऐतिहासिक क्षण में सीमित नहीं करती, बल्कि उन्हें एक सतत सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझने का जतन करती है.
इस किताब की ख़ूबी इसकी समृद्ध सामग्री है. इसमें ऋत्विक घटक के सिनेमा, उनके वैचारिक संघर्ष, उनके नाट्य-संस्कार, उनके मार्क्सवादी दृष्टिकोण, विभाजन-पीड़ा से उपजे मानवीय संकट और कलात्मक प्रतिरोध को बहुआयामी रूप में प्रस्तुत किया गया है. घटक को केवल ‘विभाजन का फ़िल्मकार’ या ‘त्रासदी का निर्देशक’ कह देना उनके सिनेमा का सरलीकरण करना होगा. किताब के विभिन्न आलेख इस सरलीकरण को तोड़ते हैं और बताते हैं कि घटक का सिनेमा वस्तुतः इतिहास, मिथक, लोक, राजनीति और निजी पीड़ा के बीच चलने वाला एक जटिल सम्वाद है. यह सम्वाद कभी करुणा में बदलता है, कभी आक्रोश में, और कभी एक गहरी, लगभग दार्शनिक चुप्पी में.
किताब का सम्यक संयोजन इसे और विश्वसनीय तथा उपयोगी बनाता है. उनके समकालीनों और प्रशंसकों और अध्येयताओं द्वारा की गई टिप्पणियों, लेखों और साक्षात्कारों को हिन्दी में अनूदित करके प्रस्तुत करना स्पष्टतः इसे अधिक प्रासंगिक एवं प्रामाणिक रूप देता है. सम्पादकद्वय ज़ाहिद खान और जयनारायण प्रसाद ने सामग्री को केवल संकलित ही नहीं किया है, बल्कि उसे एक वैचारिक अनुशासन के भीतर रखा है. यह स्पष्ट दिखता है कि चयन, क्रम और प्रस्तुति में किसी तरह की आकस्मिकता नहीं है. आलेखों का क्रम ऐसा है कि पाठक ऋत्विक घटक के सिनेमा से धीरे-धीरे परिचित होता है, फिर उसके भीतर प्रवेश करता है और अंततः उसकी जटिलताओं से जूझता है. यह संयोजन पाठक को न तो थकाता है और न ही भ्रमित करता है; बल्कि उसे एक वैचारिक यात्रा पर ले जाता है, जहाँ प्रत्येक पड़ाव पिछले से जुड़ा हुआ है.
इस किताब की एक और ख़ासियत इसकी विविधतापूर्ण दृष्टि है. यहाँ घटक को देखने के एकाधिक कोण मौजूद हैं—सिने आलोचक, रंगकर्मी, शोधार्थी, सामाजिक-राजनीतिक चिन्तक और सिने विद्यार्थी सभी अपनी-अपनी दृष्टि से घटक को समझने का प्रयास करते हैं. यह विविधता किताब को किसी एक मत या एक सिद्धांत का प्रचारक बनने से बचाती है. नतीजे में पाठक के सामने घटक का एक बहुरंगी, बहुस्तरीय और बहुवाचक व्यक्तित्व उभरता है. यह विविधता ही इस किताब की बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण है, क्योंकि किसी भी बड़े रचनाकार को एक दृष्टि से पकड़ना न तो सम्भव है और न ही उचित. सम्पादकीय टिप्पणियों के बाद घटक का अपना लेखन, दृष्टिकोण, उनके परिजनों यथा सुरमा घटक, प्रतीति देवी और महाश्वेता देवी के संस्मरण उनके व्यक्तित्व को व्यक्ति और परिवार के सम्बन्ध में उद्घाटित करते हैं. वहीं सत्यजित राय, मृणाल सेन, सलिल चौधरी, उत्पल दत्त आदि समानधर्मा के रूप में अपने अनुभव और विचार अभिव्यक्त करते हैं. ये वे प्रामाणिक दस्तावेज हैं, जो इस किताब को अधिक उपादेय बना देते हैं.
संवाद और साक्षात्कार का खंड भी महत्वपूर्ण है, जहाँ हम उनके कला और सिनेमा के बारे में विचार स्पष्टतः जान पाते हैं. प्रवीर सेन और नेत्रसिंह रावत ने पर्याप्त धैर्य और गहराई से यह कार्य सम्पन्न किया है. मूल्यांकन के अन्तर्गत अनेक समकालीन कलाविदों और रचनाकारों ने अपनी बातें कही हैं. विचारों के आईने में ऋत्विक घटक की सम्पूर्ण दृष्टि और सोच परिलक्षित होती है. उनकी फिल्मों, नाटकों और पुस्तकों की सन्दर्भ सूची भी शोधार्थियों के लिए सहायक होगी.
ऋत्विक घटक के सिनेमा का मूल स्वर करुणा और विद्रोह का संयुक्त स्वर है. यह किताब इस तथ्य को बार-बार रेखांकित करती है कि घटक की करुणा भावुकता नहीं है, और उनका विद्रोह नारा नहीं. उनके यहाँ पीड़ा एक ऐतिहासिक तथ्य है और प्रतिरोध एक नैतिक आवश्यकता. किताब में शामिल आलेख इस जटिलता को समझने में मदद करते हैं कि घटक का यथार्थवाद इतालवी नव यथार्थवाद की नकल नहीं है, बल्कि भारतीय सामाजिक यथार्थ की अपनी शर्तों से उपजा हुआ एक विशिष्ट रूप है. इसमें लोकधुनें हैं, मिथकीय संरचनाएँ हैं, नाटकीयता है और साथ ही एक तीव्र राजनीतिक चेतना भी है. सम्पादकद्वय का श्रम इस बात में भी झलकता है कि किताब में घटक के सिनेमा को केवल प्रशंसा की दृष्टि से नहीं देखा गया है. जहाँ आवश्यक है, वहाँ आलोचनात्मक प्रश्न भी उठाए गए हैं—उनकी अतिनाटकीयता, उनकी शैलीगत तीव्रता, उनके सिनेमा की कथित ‘कठिनता’ पर भी विचार किया गया है. यह आलोचनात्मक संतुलन किताब को एक श्रद्धांजलि-ग्रंथ बनने से बचाता है और उसे एक गम्भीर अध्ययन-ग्रंथ का स्वरूप प्रदान करता है. यही संतुलन इस किताब की अकादमिक और वैचारिक विश्वसनीयता को पुष्ट करता है.
यह किताब केवल सिनेमा प्रेमियों के लिए ही नहीं है. निस्संदेह, जो पाठक ऋत्विक घटक के सिनेमा से परिचित हैं या सिनेमा का गम्भीर अध्ययन करते हैं, उनके लिए यह एक अनिवार्य सन्दर्भ-ग्रंथ है. लेकिन इसके साथ-साथ यह किताब कला प्रेमियों, बुद्धिजीवियों और उन पाठकों के लिए भी उपयोगी है जो भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास को कला के माध्यम से समझना चाहते हैं. घटक का सिनेमा साहित्य, रंगमंच और लोक-संस्कृति से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है; इसलिए इस किताब के पाठ से साहित्यिक पाठक भी स्वयं को अछूता नहीं पाएँगे. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक जागरूक सामान्य पाठक भी, यदि वह सम्वेदनशील है और प्रश्न पूछने की आदत रखता है, तो इस किताब से बहुत कुछ पा सकता है. ‘गार्गी प्रकाशन’ की भूमिका भी इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है. प्रकाशन की सुरुचिपूर्ण प्रस्तुति, साफ़-सुथरी छपाई और गम्भीर विषय के अनुरूप सादा, लेकिन गरिमामय रूप-सज्जा किताब का महत्व और बढ़ाती है.
समग्र रूप से देखा जाए तो ‘ऋत्विक घटकः नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ एक ऐसी किताब है, जो भारतीय सिने-विमर्श में एक ठोस और स्थायी योगदान करती है. यह न तो ऋत्विक घटक को मिथकीय ऊँचाइयों पर बैठाती है, और न ही उन्हें किसी एक खाँचे में बंद करती है. यह किताब घटक को उनकी समस्त जटिलताओं, विरोधाभासों और सृजनात्मक संघर्षों के साथ प्रस्तुत करती है. यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है. संपादकद्वय ज़ाहिद खान और जयनारायण प्रसाद इस किताब के माध्यम से न केवल ऋत्विक घटक को, बल्कि उस सिने परम्परा को भी पुनः सामने लाते हैं, जो आज के तेज़, सतही और बाज़ार-केन्द्रित सिनेमा में लगभग हाशिये पर चली गई है. उनका यह श्रम एक प्रकार से सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखने का प्रयास भी है. इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं. अंततः यह किताब हमें यह याद दिलाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि वह समय, समाज और मनुष्य की आत्मा से सम्वाद करने वाला एक गम्भीर कला-माध्यम भी है. ऋत्विक घटक उस सम्वाद के सबसे तीव्र और ईमानदार स्वरों में से एक थे, और यह किताब उस स्वर को समझने, सुनने और आगे ले जाने का एक सशक्त माध्यम बनती है. इस दृष्टि से यह कृति निस्संदेह महत्त्वपूर्ण, उपादेय और संग्रहणीय है.
किताब : ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक
सम्पादक : ज़ाहिद ख़ान और जयनारायण प्रसाद
प्रकाशक : गार्गी प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 400 रुपये.
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