एनएच 44 | एक सड़क अपना नाम भूल गई है
गाड़ी तेज़ी से भाग रही थी. सामने दूर तक फैली हुई डामर की चमकती हुई पट्टी, किनारों पर भागते पेड़, और बीच-बीच में नीले बोर्ड जिन पर लिखा था-एनएच 44, यानि नेशनल हाइवे 44.
गुड़गांव से चंडीगढ़ की ओर जाते हुए एक पल ऐसा आया जब सड़क ने मुझे रोककर एक पुरानी बात याद दिला दी.
हमारी गाड़ी के टायरों से रौंदी जा रही सड़क मुझे कुछ कह रही थी. उसकी सिसकियों के बीच दबी फुसफुसाहट मुझे झुंझला रही थी. तभी मन में एक हल्की-सी चुभन उठी. क्या यह वही रास्ता है, जिसे कभी ग्रांड ट्रंक रोड कहा जाता था? क्या यह वही सड़क है जिस पर अपने कॉलेज के दिनों में मैं दर्ज़नों बार मोटरसाइकिल से शिमला और मनाली तक गया था? क्या यह वो ही सड़क है, जिस पर सरपट जावा मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए एक रात हमारा भयानक एक्सीडेंट भी हुआ था? वो दिन, वो मस्ती, वो प्यार सब याद आ गया पर इन सबसे जुड़ा एक नाम था जो कहीं दिखा नहीं.
वो नाम जैसे कहीं पीछे छूट गया था. रास्ता वही था, सड़क वही थी, मगर उसका परिचय बदल गया था.
कभी इसी रास्ते से बादशाहों की सवारियाँ गुज़री थीं, फ़ौजों की क़दमताल की आवाज़ें गूँजी थीं, व्यापारियों के क़ाफ़िले निकले थे. धूल उड़ाते हुए ऊँटों और हाथियों की लंबी क़तारें, थके हुए मुसाफ़िर, दरवेश, फ़कीर—सब इसी राह के साथी थे.
आज वही रास्ता बस एक नंबर है, महज़ एक संख्या में बदल गया है एनएच 44. संख्याएँ शायद व्यवस्था के लिए होती हैं. मगर नाम यादों के लिए होते हैं.
समय से भी लंबा सफ़र: कहते हैं यह रास्ता बहुत पुराना है. इतना पुराना कि उसके आरम्भ की कहानी धुँधली पड़ जाती है. दो हज़ार साल पहले, मौर्य साम्राज्य के समय भी गंगा के मैदानों को उत्तर-पश्चिम से जोड़ने वाला एक बड़ा शाहराह यहाँ से गुज़रता था. वक़्त के साथ साम्राज्य बदलते रहे, मगर वो रास्ता बना रहा—जैसे धरती की कोई पुरानी नस हो जिसमें सदियों का सफ़र बहता रहता है.
फिर सोलहवीं सदी में एक दिन एक सुल्तान आया, सुल्तान आदिल, जिसका नाम था शेर शाह सूरी. उसने इस पुराने रास्ते को सँवारा, चौड़ा और पक्का किया, इसके किनारों पर पेड़ लगवाए, सरायें बनवाईं, कुएँ खुदवाए, कहीं-कहीं तो अपने सिपाही और घुड़सवार भी रखे.
और साथ-साथ हर कोस पर एक मीनार खड़ी करा दी—कोस मीनार. ये मीनारें रास्ते की भाषा थीं. मुसाफ़िर इन्हें देखकर समझ जाते थे कि सफ़र कितना बीत चुका है और मंज़िल अभी कितनी दूर है. एक कोस तक़रीबन तीन किलोमीटर का रास्ता बताया जाता है.
बंगाल से लाहौर तक, और आगे पहाड़ों की तरफ़ जाती हुई यह सड़क धीरे-धीरे एक कहानी बनती चली गई. मुग़लों के दौर में तो जैसे यह सड़क एक जीवित नदी बन गई—जिसमें शहरों, भाषाओं और संस्कृतियों का पानी एक साथ बहता था.
रास्ते के पहरेदार: आज भी कभी-कभी यह सड़क अचानक उस अतीत का दरवाज़ा खोल देती है. तेज़ रफ़्तार गाड़ियों के बीच अचानक मिट्टी और चूने से पुती ईंटों की एक पुरानी मीनार दिखाई दे जाती है. समय से थोड़ी झुकी हुई, मगर अब भी खड़ी.
यही कोस मीनार हैं. वक़्त की घड़ी का वो हाथ जो आज भी उस बीते समय की याद दिलाता है. आप चाहे उस बारे में न जानते हों पर वो को आप को सोचने पर मजबूर ज़रूर करता है कि क्या है ये, क्यूँ खड़ा है इस चमकती हुई हाइवे पर, क्या काम है इसका यहाँ ?
दिल्ली से अंबाला के बीच इसी राजमार्ग के आसपास आज भी कई ऐसी मीनारें कहीं-न-कहीं मौजूद हैं. कुछ को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने सँभालने की कोशिश की है, मगर कई अब भी मायूस चुपचाप खड़ी हैं—जैसे बीते हुए दिनों की और उनसे हुई नाइंसाफ़ी की गवाही दे रही हों.
पानीपत के पास खंडरा गाँव में मैंने भी ऐसी ही एक मीनार देखी. उसके आसपास ट्रकों का शोर था, गाड़ियों की रफ़्तार थी, मगर वह मीनार बिल्कुल शांत थी. जैसे किसी पुराने ज़माने का पहरेदार, जो आज भी अपनी जगह पर खड़ा है. कभी इन्हीं मीनारों के सहारे शाही दूत, व्यापारी और तीर्थयात्री इस लंबे रास्ते पर चलते रहे होंगे.
जहाँ कथा और इतिहास एक हो जाते हैं: करनाल के आसपास की धरती पर पहुँचते ही लगता है कि समय की परतें और भी गहरी हो जाती हैं.
यहीं कहीं वह भूमि है जिसे कुरुक्षेत्र कहा जाता है—वही जगह जहाँ महाभारत के अनुसार पांडवों और कौरवों का भीषण युद्ध हुआ था.
शायद वो समय, वो लोग, वो युद्ध सिर्फ़ कथा हो. शायद स्मृति हो. शायद इतिहास की कोई बहुत पुरानी छाया. मगर यह सोचकर अजीब लगता है कि जिन मैदानों से आज कारें गुज़रती हैं, कभी वहाँ रथों के पहिए घूमे होंगे, घोड़े दौड़े होंगे जहां अर्जुन जैसे तीरंदाज़ कौरव योद्धाओं से भिड़े होंगे.
पर किसी दौर, किसी समय का कोई हिस्सा कभी कोस मीनार पे अटक मिलता हैं तो कभी मैदानी रास्तों पर ठहर मिल जाता है.
एक नाम की खामोशी: नए भारत ने अपने राजमार्गों को नई संख्याओं में बाँट दिया. इस तरह सदियों पुराना ग्रैंड ट्रंक रोड भी एक संख्या में समा गया—एनएच-44 राष्ट्रीय राजमार्ग 44.
यादें वहीं हैं, सड़क वही रही, मगर उसका नाम कहीं पीछे छूट गया. ऐसे में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का शेर अचानक याद आता है—
निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले.
कोस मीनार में सामने खड़ा, तस्वीरें उतारता जब मैं फ़ैज़ का ये शेर गुनगुनाता हूँ तो मीनार पर किसी ट्रक की परछाईं आ पड़ती है – शिकायत करती मीनार सुबकने लगती है. मीनार के चारों तरफ़ जंगले लगे हैं, मैं उसे छू कर तसल्ली भी नहीं दे पाता. सड़क के किनारे खड़े लोग मुझ बावरे को देख सोच रहे हैं ये क्या कर रहा है कोई मीनार की तरफ़ एक नज़र भी नहीं डालता – मानो लोग गुज़रते तो हैं, मगर उस मीनार, उस रास्ते की तरफ़ देखना भूल गए हैं.
रास्ते याद रखते हैं: तारीख़ बताती है दुनिया की बहुत-सी ऐतिहासिक सड़कें अब केवल यादगार बन कर रह गई हैं—रोम की विया अपिया, एशिया की सिल्क रोड, ईरान/ फ़ारस की रॉयल रोड, और इंका सभ्यता की क़हापाक नान सड़कें (कोलंबिया से चिली/अर्जेंटीना तक एंडीज़ पर्वतमाला को पार करने वाली 30,000 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का जाल).
ये ऐतिहासिक सड़कें अब सिर्फ़ नाम के लिए हैं जिनके बचे छोटे टुकड़ों को देखने दुनिया भर के टूरिस्ट लोग जाते हैं – बस देखने भर को – मगर दुनिया वालों ग्रैंड ट्रंक रोड अब भी ज़िंदा है. इसी ग्रैंड ट्रंक रोड से हर दिन लाखों लोग गुज़रते हैं—बिना जाने कि वे दो हज़ार साल पुराने एक सफ़र को दोहरा रहे हैं.
ठंडी आह ले कर मैं सोचता हूँ कि शायद किसी दिन फिर इस सड़क के किनारे उसका पुराना नाम लिखा जाए. क्योंकि कई बार किसी सभ्यता को उसके स्मारकों से नहीं, बल्कि उन रास्तों से पहचाना जाता है जिन पर चलते हुए उसके लोग सदियों तक एक-दूसरे से मिलते रहे हों.
और फ़िर रास्ते… रास्ते कभी अपना अतीत नहीं भूलते.

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