इंटरव्यू | अली मुहम्मद मुअज़्ज़नी

4 फ़रवरी, 2010. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का न्यू गेस्ट हाउस. पर्शियन रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा मसनवी पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे सत्र के बाद का समय. डाइनिंग हॉल में भारत के सुदूर इलाक़ों से एवं ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तज़ाकिस्तान, बांग्लादेश से बड़ी संख्या में आए प्रतिभागी. सब तरफ चर्चाएं, खिलखिलाहटें, बातें ही बातें. बड़ी मुश्किल और कोशिश के बाद जैसे-तैसे हम लोग काफ़ी देर में दरवाज़े से सोफ़े तक पहुंच पाए थे. भागते से उन क्षणों ने जैसे उस सोफ़े पर अजीब-सी एक हड़बड़ाहट ला फैलाई थी—ला बिछाई थी. उस तरफ प्रो.अली मुहम्मद मुअज़्ज़नी, इस तरफ़ मैं—और बीच में कई भाषाओं को बेहद अधिकार और ख़ूबसूरती के साथ पढ़-बोल-समझ सकने में समर्थ प्रो.अज़ारमी दुख़्त सफ़वी. बेहिसाब व्यस्तता और हड़बड़ी के बीच भी खुली, खिली, चहकती-महकती-सी. पल-पल दिए जाते आदेश-निर्देश. जैसे सारे उस हॉल की रोशनी का स्रोत वो थीं, हर हलचल का केंद्र वो थीं. दो देशों, दो भाषाओं को एक-दूसरे से जोड़ने-मिलाने-परिचित कराने के इरादे के साथ प्रस्तुत-तत्पर प्रो.सफ़वी. उस तरफ़ बैठे मुअज़्ज़नी साहब की ओर निगाह बढ़ी तो उसकी चाल धीमी और सहमी-सी हो गई—नीला सूट, नीली लाइनों वाली शर्ट. नेवी कट. अधिक सफ़ेद और कम काले सिर और मूंछ के छोटे-छोटे बाल. अपरिचित देखेगा तो छूटते ही कहेगा कि पूरे हिंदुस्तानी—बिलकुल हिंदुस्तानी.

मैं उनके अंदर के ईरान और अदीब से मिलना-परिचित होना चाह रहा था. मेरे प्रश्न को प्रो. सफ़वी से होकर उन तक पहुंचना था इसलिए कुछ देर लगी. प्रश्न का रूप-रंग, अंदाज़-लहज़ा इतना बदल-सा गया था कि अपने उस प्रश्न को ख़ुद मैं भी पहचान नहीं पा रहा था. प्रश्न सुनते प्रो.मुअज़्ज़नी को देखा तो दिखा कि उनके होंठों के साथ उनकी कलाइयों, कंधों, आंखों, मस्तक की रेखाओं और गर्दन में हलचल, कह-कह की बदाबदी-सी लग गई है. पवित्र-सा हर्ष, उत्साह, जोश! भिन्न से उस उच्चारण के कारण ज़रा देर में समझ आया वह हंसी-लिपटा वाक्य—’हां जी, हां जी क्यों नहीं…हम बोल सकता है…हम समझ सकता है हिंदी….’ सुना तो रोमांचित हो उठा. हिंदी के प्रति एक ईरानी का ऐसा यह जज़्बा, ऐसा यह भाव. और दूसरी तरफ़ हम हिंदुस्तानी—हमारे कर्णधार और कुछ भाषाओं के कुछ स्वयंभू रक्षक ठेकेदार!

ठीक सामने दीवार पर लगे जे.एन. मेडिकल कॉलेज अलीगढ़ के चित्र पर दृष्टि जा पहुंची. जिज्ञासावश पीछे की दीवार पर निगाह घुमाई—ठीक ऊपर स्ट्रेची हॉल की तस्वीर थी. तब मैंने भारत और उसके साहित्य व संस्कृति के बारे में मुअज़्ज़नी साहब की राय जाननी चाही थी. थिरकती गुनगुन करती-सी प्रो.सफ़वी की आवाज़ ने उनके कहे को मुझ तक पहुंचाने का सिलसिला शुरू किया था—’हिंदुस्तान ईरानियों के लिए बड़ा अहम और यादगारी मुल्क है. ईरानी तसव्वुफ़ और भक्ति को भारत ने बहुत मुतास्सिर किया है. दोनों मुल्कों की ज़बानों में बहुत क़रीबी ताल्लुक है. पुराने दस्तावेज़ों-किताबों का ईरान में खूब तर्जुमा हुआ है. पंचतंत्र का ‘कलीला-व-दमना’ नाम से तर्जुमा हुआ. पंचतंत्र का फ़ारसी में जो तर्जुमा हुआ उसने ईरान की बेशतर अख़लाक़ी और सूफ़ियानी नज़्मों व अदब पर अपना असर छोडा. महाभारत का असर भी वहां के अदब पर साफ़ देख सकते हैं आप. हां, जैसे मौलाना रूमी की मसनवी पर. फिरदौसी ने अपना जो मशहूर इपिक ‘शाहनामा’ लिखा, उस पर प्राचीन भारत में लिखी जाने वाली जंगी दास्तानों—ख़ास तौर से ‘महाभारत’ की जंग का बहुत असर दिखाई देता है. शाहनामे में बहुत सारे ऐसे नाम इस्तेमाल हुए, जो महाभारत और हिंदुस्तान की प्राचीन जंगी कहानियों से लिए गए हैं. पुराने ज़माने से लेकर…जी, प्री-हिस्टॉरिक पीरिएड से—दोनों मुल्कों के बीच जो संबंध थे—सासानी ख़ानदान और उसके बाद आने वाले ख़ानदानों के साथ वो ताल्लुक़ और बढ़ते गए. ख़िलजी पीरिएड, सल्तनत पीरिएड, गुलाम ख़ानदान और मुग़लों के दौर में ये ताल्लुलक़ात बहुत नज़दीक होते गए—बढ़ते गए. ये ताल्लुक़ात इतने गहरे और ज़्यादा थे कि कई सौ सालों तक फ़ारसी यहां भी सरकारी, इल्मी और अदबी ज़बान बनी रही.

जंगों से आपके देश का कुछ ख़ास-सा और ज़्यादा ही वास्ता-साबक़ा रहा है. आज भी आपके चारों तरफ जंगें ही जंगें हैं. ऐसे माहौल में वहां के लेखक की मानसिकता पर क्यार और कैसे प्रभाव पड़ते देखते हैं आप?
हमारे ज़्यादातर लिखने वाले सुलह, अमन और भाईचारे की ख़्वाहिश रखते हैं. यही चाहते हैं कि जैसे एक ज़माने में हम मिल-जुलकर रहते थे वैसे ही रहें. ईरान के मशहूर सूफ़ी ने अपनी मसनवी में कहा है कि मुहब्बत और एक दूसरे में भाईचारा—ये चीज़ सबसे बेहतर है. और दुनिया की अच्छाई और दुनिया की ज़िंदगी इसी में है. मशहूर लेखक सादी ने हज़रत मुहम्मद की हदीस को अपनी नज़्म में बयान किया…और कहा कि तमाम इनसान एक बदन के मुख़्तलिफ़ हिस्सों के मानिंद हैं. एक हिस्से की तकलीफ़ से बाक़ी सब मुतास्सिर होते हैं. जिसे दूसरों के ग़म से ग़म नहीं होता, उनके दर्द से चिंता नहीं होती, वह आदमी कहलाने का अधिकारी नहीं है.

ईरान में महिलाओं की स्थिति और उनके लेखन की बात चली तो सुनाई दिया—वहां की औरतों की तहरीरों में उनके अपने मसाइल का बयान है. जी, उनमें औरत को आज़ादी दिए जाने की हिमायत है. हां-हां, क्योंत नहीं—और मर्द लिखने वाले भी इस बारे में उनके साथ हैं.

आज़ादी? किस तरह की आज़ादी?
ये तो आज़ादी के अपने मानी पर निर्भर है. कुछ की नज़र में आज़ादी के मानी कुछ हैं और औरों की नज़र में कुछ और. बहरहाल जो भी है—ईरान की औरत बावजूद इसके कि वो परदे में है, हिजाब में है—अपने व्यक्तित्व को पहचानती है, पहचनवाती है.
-अगर आज़ादी की मांग है तो इसका यह संकेत है कि कुछ बंदिशें-ज़जीरें तो ऐसी हैं ही…? देखिए, जो भी चीज़ हो वो दिल से होनी चाहिए, किसी के प्रेशर से नहीं होनी चाहिए. मेरा मानना तो यही है….
-यहां-वहां की औरत की ज़िंदगी में साफ़ दिखता-सा क्या, अंतर पाते हैं आप?
जी, फ़र्क तो है. जो फ़र्क है जो कल्चर की वजह से है. ये कल्चर सदियों के बाद पैदा होती है— बनता है. वह औरत हो या मर्द—अपनी उसी कल्चर के साथ परवरिश पाते हैं और उसी के नुमाइंदा होते हैं. तो जो फ़र्क यहां-वहां की कल्चर में है, वही यहां-वहां की औरत में दिखता है.

जैसे?
जैसे…लिबास अलग, सोशल प्रॉब्लम्स मुख़्तलिफ़. मसलन—ईरानी औरत स्कूटर नहीं चलाएगी. पीछे बैठ जाएगी. गाड़ी ख़ुद चलाती है, पर स्कूटर नहीं. स्कूटर चलाना इनके कल्चर में नहीं….चूंकि ज़्यादातर औरतों के पास गाड़ियां हैं—ये पसंद नहीं किया जाता कि वो स्कूटर चलाएं—वो ख़तरनाक है. वैसे भी ईरानी औरत कभी कोई बहुत फ़िज़ीकल लेबर नहीं करती.

फिर ये उनकी आज़ादी की मांग?
बताया तो आपको! ये आज़ादी पर्सन टु पर्सन मुख़्तलिफ़ मानी रखती है. कुछ वो एक्सपेक्टेशंस बहुत ज़्यादा हैं. जी, हर तरह की आज़ादी है. उच्च शिक्षा पा रही हैं, हर तरह के जॉब कर सकती हैं, बिजनेस कर सकती हैं, पार्लियामेंट की मेंबर, वज़ीर भी हैं. आम तौर पर आज़ादी उपलब्ध है. कुछ लोग हैं जो चाहते हैं कि जैसा चाहें वैसा लिबास पहनें—जैसे चाहें रहें-जिएं…उनकी बात अलग है. पर हां, जो क़ानूनी दायरा है उसके अंदर उनको पूरी आज़ादी है.

और अभिव्यक्ति और लेखन की आज्ञादी?
कुछ देर अबोले जैसे कुछ सोचा था उन्होंने. फिर ज़रा संभलते से धीमे-धीमे कहा गया था— इस्लामिक गणतंत्र का जो क़ानून है मुल्क का, उसके दायरे में रहकर लिखने की आज़ादी-उस तरह की आज़ादी!

हिंदुस्तान की तरह? आलोचना या विरोध कर सकने की आज़ादी? ( पूछने के बाद उनके चेहरे की ओर देखा तो लगा कि जैसे वे वहां नहीं हैं और उनकी आंखें कहीं दूर-बहुत दूर जाकर देखने में लग गई हैं. मैंने उनका ध्यान अपनी ओर खींचना चाहा)-हिंदुस्तान की तुलना में…?
हिलते-डुलते हाथ, घूमती कलाइयां, उठते-गिरते कंधे, तेज़ी से खुलती-बंद होती आंखें और रक्ताभ-भावुक-सा हो चला उनका चेहरा—ये आज़ादी इसलिए भी यहां ज़्यादा है कि यहां बेशुमार मज़हबों, भाषाओं, कल्चरों के लोग रहते हैं. इसलिए ये आज़ादी ज़रूरी भी थी यहां. यहां देखते हैं कि एक मज़हब का आदमी दूसरे मज़हबों के त्योहारों की छुट्टियां मनाता है—ख़ुशियां मनाता है. इसलिए भी यहां ज़्यादा महसूस होती है.

लोग खाना खा-खाकर हमारे सोफ़े के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे थे. उनकी निगाहें बता रही थीं कि वे प्रो.सफ़वी और मुअज़्ज़नी साहब को अपने बीच, अपने साथ देखना चाहते थे. खाने के पहले किए जा चुके कई आग्रहों के बाद अब दो-तीन लोग उन्हें अपने साथ खाने की मेज़ तक ले चलने के लिए बिलकुल हमारे पास ही आ जमे थे. हड़बड़ाया-सा मैं सुन रहा था—’बस, बस! एक सवाल केवल!’

वहां के आज के लेखक के सामने क्याे-क्या मुख्य समस्याएं—या विषय हैं लिखने के लिए?
मसाइल—जी, इक़्तिसाद के—आर्थिक…इराक़-ईरान की जंग के बाद की दरबदरी के मसाइल…तलाक़ के मसाइल…नहीं-नहीं, ये मसाइल हमेशा से ज़्यादा रहे हैं वहां…जी, हां—और बच्चों की तालीम के मसाइल…! ओ.के. …हो गया…अच्छा अब लास्ट सवाल…!

ग़रीब-अमीर की स्थिति, इनके बीच की दूरी?
पिछले दिनों हमारे यहां ऐसा हुआ कि जो पूलदार—पैसे वाले थे, उनकी तनख़्वाह में ज़्यादा इज़ाफ़ा नहीं किया गया. नीचे तबक़े को ऊपर उठाया—तनख़्वाह बढ़ाई, सुविधाएं बढ़ाईं. बिजली, पानी, तेल में नीचे वाले तबक़े के लोगों को सब्सिडी दी जा रही है. पूलदारों से टैक्स लिया जा रहा है—जबकि नीचे वाले तबक़े से नहीं.

उनके खड़े होने-जाने की आतुरी को अनदेखा कर मैंने एक और सवाल उस तरफ़ रवाना कर ही दिया—’आपके यहां किस विधा में लेखन अधिक हो रहा है—और लेखकों को पढ़े जाने की स्थिति क्या है?

उन्होंने ख़ुद को खड़े होने से रोक लिया—नज़्म…प्रोज़. शार्ट स्टोरीज़ रोमांस. जी, रोमांस-मींस नॉविल. जी, सम कंटेपरेरी पोयट्स—जैसे शहरयार…जी, ये ईरानी पोयट हैं…क़ैसर अमीन पूर, शफ़ई कदहनी, सैयद हसन हुसैनी, इब्तहाज़, फात्मा राकेई, मश्फ़िक काज़मी वगैरह बहुत पापुलर हैं. जी-आम आदमी में…स्टूडेंट्स में, टीचर्स में. स्टूडेंट्स…वो, वो, हां-हिब्ज़ करते हैं उन्हें!

उनके मुंह से ‘हिब्ज़’ शब्द सुना तो तत्काल दो आवाज़दार ठहाके सुनाई दिए. वे खड़े हो चुके थे और बार-बार सबको सुनाते से हंसते-हंसते बोले जा रहे थे—’हिब्ज़ करना, हिब्ज़ करना.’ चलते चलते तुतलाकर बोलने वाले बच्चे जैसे अंदाज़ और उत्साह में कहां गया—’ क्यों नहीं-देखो न-हिंदी बोल सकता हूं…! उस्मानिया यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहा हूं….’

कसक कि अधूरी-सी रह गई थी यह मुलाक़ात. ज्यों-त्यों अगले दिन उसी समय फिर मिलना तय हुआ. और फिर अगला दिन-नई दिक़्क़तें-नई दुश्वारियां. अजीब-असहज-सा माहौल! कल तक सेमिनार में हवा-पानी, बादल-बिजली की भूमिका निभाती प्रो.सफ़वी की थकान आज जैसे उनकी हंसी, उनके जोश पर भारी पड़ रही थी. वो अपने को मध्यस्थ की भूमिका में लाने की तैयारी कर ही रही थीं कि उनके सहयोगियों की किसी बहुत ज़रूरी पुकार ने उन्हें यहां से जाने के लिए विवश कर दिया. बेहद असहज, तनावपूर्ण हो चले थे वे कुछ क्षण! जैसे-तैसे डॉ. सरफ़राज़ अहमद को सहयोग के लिए राज़ी किया. उनके आने तक जितना बना हम दोनों ने अपने बीच आ खड़ी हुई भाषा की उस दीवार को दरकाने-ढहाने की पुरज़ोर कोशिशें कीं. हिचकते-अटकते हिंदी अंग्रेज़ी की बोली गई वह शब्दावली जैसे हमारी बैसाखी बन चली थी. मैंने साहित्य की भूमिका को लेकर एक सवाल किया था—’वी एप्रीशिण्ट लैंगुएज़ एंड लिट्रेचर फ्रॉम लॉन्ग टाइम—एंशियंट पीरियड. वी रीड एंड राइट ऑल द वर्क इन पर्शियन. इट इज़ वेरी इंपोटेंट ऑफ़ अस…देयरफ़ोर वी फ़ॉलोड अवर लिट्रेचर. सम एक्टीविटीज़ आफ़ सोसायटी…यस—एज पॉपुलेशन…एपीअर्स इन द लिट्रेचर. वी कैन नॉट सैप्रेट फ्रॉम अवर लिट्रेचर. लिट्रेचर इज अवर हेरीटेज. वी शुड कीप देम…एंड कंटेपरेरी…रिच देम! बिकॉज़ अवर कल्चर इज़ पीस, कम्युनिकेशन बिटवीन अदर पीपुल, अदर कंट्री—एंड विश दु रीच….’

डॉ. सरफ़राज़ अहमद ने आकर कमान संभाली तो बड़ी राहत मिली, चैन मिला—’ अदब इनसान को हर तरह से मुतास्सिर करता है. इसकी भूमिका फेमिली में, सोसायटी के डिफरेंट आस्पेक्ट्स में—सब जगह दिखाई देती है. किसी भी क़ौम का लिट्रेचर उसकी सोसायटी का मिरर होता है. लिखने वालों की कोशिश होती है कि उनके लिखने की वजह से लोग बेहतर ज़िंदगी गुज़ार सकें.’

ऐसा कुछ ख़ास जो वहां के साहित्य को यहां से अलग दिखाता हो?
वहां—रोमांस-हां, नॉविल्स…हुशंग मुरादी किरमानी…बच्चों की किताबें उनकी… मजीद का क़िस्सा…. शायरी ख़ास. शॉर्ट स्टोरी ज़िंदगी के क़रीब है…सोसायटी के क़रीब है. फ़ालतू-फ़हाश बातें नहीं मिलेंगी उसमें. लड़ाई के ख़िलाफ़…लोगों से दोस्ती की बातें….

ईरानियों की अपनी कुछ ख़ास विशेषताएं?
गर्दन तनी. चेहरा खिला. उंगलियां मचलीं. हथेलियां घूमीं. होंठों के साथ आंखें भी बोल रही थीं—हमारे यहां लोग मेहमाननवाज़ हैं. प्यार करने वाले हैं. चाहते हैं कि अपने मुल्क को ऊपर उठाएं. हम चाहते हैं कि दुनिया के लोग मेल-मुहब्बत से रहें. दुनिया से हेट करना हम नहीं सिखाते!

क्या. आपको लगता है कि आपके यहां धार्मिकता बढ़ी है इन दिनों?
देखिए, हमारा देश इस्लामिक डेमोक्रेटिक कंट्री है. मज़हब और राजनीति मिले हैं वहां—दोनों अलग-अलग नहीं हैं. जी, शरीयत का लॉ है.

ऑर्थोडॉक्सी—धार्मिक कट्टरता की स्थिति?

नो, नो! ऑर्थोडॉक्स नहीं—ईरान के ज़्यादातर लोग रिलीजियस हैं. इस्लाम… शरीयत के क़ानून के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना चाहते हैं. कुरान-हदीस की बातों पर अमल करते हैं. इसे आप धार्मिक कट्टरता न समझिए! जी, हां—लेकिन उनकी पॉलिसी अमेरिका के ख़िलाफ़ है. अमेरिका हस्तक्षेप करता है, सब हड़पना चाहता है…एंड फ़ोर्स टु ईरान…एंड वी डोंट वांट…ईरानियन पीपुल नॉट वांट! लेकिन अगर एक-दूसरे के बीच रेस्पेक्ट देखते हैं—दूसरे की तरफ से दोस्ती, समानता का हाथ बढ़ता है—तो हम भी हाथ बढ़ाए हुए हैं….

कवर | शाहनामा का एक वरक़

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