अमरकांत | अच्छी रचना ज़माने के साथ चलती और विकसित होती है
(कथाकार-आलोचक प्रेम कुमार की एक पहचान उनके साक्षात्कार भी हैं. हिंदी-उर्दू के बेशुमार यशस्वी लेखकों से उनके साक्षात्कार कृतित्व पर ही केंद्रित नहीं रह जाते, बल्कि शख़्सियत का बड़ा ख़ाका भी पेश करते हैं. साक्षात्कारों की इस सूची में उनके समकालीन शामिल हैं और पिछली पीढ़ी के लोग भी. ‘अंतस के आर-पार’ में छपे अमरकांत के इस इंटरव्यू में भी उनके इसी हुनर की छटा है. यह साक्षात्कार आप श्रृंखला के तौर पर पढ़ सकेंगे. पेश है इसकी पहली कड़ी… -सं.)
एल.आई.जी. फ़्लैट का वह छोटा-सा कमरा. छत, दीवारें, फ़र्श, खिड़कियाँ, जंगले, लटका झूल-सा रहा नाममात्र का वह परदा, लकड़ी का सामान्य-सा सोफ़ा, एक बेड—सब कुछ उम्रदराज़, वृद्ध-वृद्ध-सा. इधर-उधर रखी कुछ पत्रिकाएँ और दो-तीन पुस्तकें. साफ़ मालूम हो रहा है कि यह कमरा ज़रूरत के मुताबिक ड्रॉइंग-रूम भी हो जाता है और डायनिंग-रूम भी. अमरकांतजी के लिए तो यह स्टडी-रूम भी है और स्लीपिंग-रूम भी. सब कुछ एकदम सहज-साधारण—आम आदमी के घर जैसा. एक हद तक तो आम आदमी के आम घर से भी साधारण-सा. नीले चौख़ानेवाला तहमद, कुरता और सामने से खुली एक ऊनी जर्सी पहने सोफ़े की कुरसी पर बैठे अमरकांतजी. चेहरे पर उत्साहित-सी चमक, स्फूर्ति भरी दमक. आवाज़ में तेज़-तेज़ एक ख़ास तरह की धमक, ठनक भी. बात लेखन के शुरुआती दिनों के ज़िक्र से शुरू हुई है. प्रश्न के बाद कुछ पल की चुप्पी और फिर सोचने, पुराना कुछ याद करने की सी मुद्रा. रुकते-अटकते-से ऐसे बोलना जैसे शुरू-शुरू में शब्दों के वज़न को सँभाल पाने में कुछ दिक़्क़त हो रही हो. अधिक दिनों तक बहुत गहरे में दबे-दबे यादों का वज़न भी शायद बढ़ जाता है. शब्दों के कंधों पर बैठकर भी शायद वे इसीलिए तेज़-तेज़ नहीं दौड़ पाती. तब वे अपनी यादों में आगरा वाली उम्र को याद कर रहे थे—’मेरे लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई. तब ऐसा था कि पत्रकार बनना है, हिंदी के लिए कुछ करना है.’ ‘सैनिक’ आगरा से निकलता था, उसमें गया मैं. एक साल ट्रेनी के रूप में रहा, फिर वहाँ कन्फ़र्म हुआ. आगरा में तीन साल रहना हुआ. वहाँ जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए, वे तो हुए ही, पर मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत वहाँ से हुई. वहीं सुअवसर मिला प्रगतिशील लेखक संघ के तब के वहाँ के कुछ लोगों के संपर्क-सामीप्य में आने का….नहीं, हमारा कोई पूर्व संपर्क नहीं था वहाँ. हमारे एक मित्र थे—विश्वनाथ भटेले, वही ले गए थे हमें प्रगतिशील लेख संघ में. हमारे परिचय में उन्होंने वहाँ कहा—ग़ज़ल गाते हैं ये. तब वहाँ रामविलास शर्मा थे, धीरेंद्र अस्थाना, राजेंद्र यादव, राजेंद्र रघुवंशी आदि कुछ लोग कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर भी थे. बैठकों में कभी पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, रावीजी भी आते थे.
रांगेय राघव उन बैठकों में नहीं आते थे. बहुत सुंदर—आर्यन ब्यूटी जिसे कहते हैं—उस तरह के थे रांगेय राघव. रामविलासजी से तब उनका मतभेद चल रहा था. उनके पास भी हमें विश्वनाथ भटेले ही ले गए थे. दयाल बाग़ की तरफ़ घूमने निकल जाते थे हम लोग उनके साथ. बर्कले सिगरेट पीते थे, हमें भी पिलाते थे. खड़े होकर लिखते थे. जब हम उनसे मिले थे, एक साथ छह उपन्यास लिख रहे थे वे. एक-एक वाक्य, पैराग्राफ़ प्लान कर लेते थे सबका एक साथ.
फिर इलाहाबाद का जीवन. ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ समूह का एक अख़बार था—’अमृत पत्रिका’. उसमें अपॉइंटमेंट मिल गया तो मैं इलाहाबाद आ गया. इलाहाबाद राजनीति, शिक्षा एवं साहित्य का केंद्र था तब. इलाहाबाद में कुछ लिखा तो नहीं मैंने, पर दबाव बहुत झेले. जिस अख़बार में काम करता था, वहाँ वेतन को लेकर मालिकों से संघर्ष हो गया. हड़ताल का नोटिस दे दिया गया था. उन सारी एक्टीविटीज़ में भाग लेना होता. तब पत्रकारों में यूनिटी थी. हिंदी भाषा के प्रति प्रतिबद्ध, थोड़े वेतन में गुज़ारा. पेपर कैसे लोकप्रिय हो, प्रसार संख्या कैसे बढ़े—यह सबकी चिंता होती थी. आंदोलन शुरू होते ही वातावरण तनावपूर्ण हो गया. उत्पीड़न शुरू हुआ, लोग निकाले जाने लगे. साहित्य के मोरचे पर प्रगतिशील लेखक संघ तथा ‘परिमल’ नाम की साहित्यिक संस्थाएँ थीं. इनमें विचार की टकराहटें होती रहती थीं. प्रलेस में प्रकाशचंद्र गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, शमशेर, अमृतराय, दुष्यंत, कमलेश्वर भाई आदि थे और परिमल में धर्मवीर भारती, विजय देव नारायण साही, केशव प्रसाद मिश्र, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि थे. वर्ष 1954 में मैं बीमार पड़ गया. बी.पी. की शिकायत हुई, फिर हर्ट ट्रबल. शाम की ड्यूटी में अचानक पेन. साँस लेने में तकलीफ़. मित्र ने घर पहुँचाया. उस समय इन बीमारियों के बारे में इतनी जागरूकता नहीं थी. नौकरी छोड़नी पड़ी. लखनऊ मेडिकल कॉलेज में रहा तो स्वस्थ हुआ.
अमरकांतजी से मैंने उनके नाम परिवर्तन के बारे में जानना चाहा है. शांत-सी एक हँसी धीमी चाल चलकर उनके होंठों तक आई और धाईं छूने जितनी जल्दी के साथ वापस लौट गई—’मैं तब श्रीराम वर्मा था. अमरकांत मेरा पेन-नेम है. 1953 में बदला. मेरी पहली साहित्यिक कहानी ‘इंटरव्यू’ 1953 में ‘कल्पना’ में छपी थी. तभी पेन-नेम ‘अमरकांत’ कर लिया.’
पहली रचना के छपने की उस ख़ुशी के अहसास का अब कितना कुछ याद रहा है आपको?
पहली रचना के छपने की ख़ुशी? देखिए, रचनाओं के छपने की ख़ुशी तो होती है, पर हम उछल जाएँ, ऐसा तो नहीं है. मैं जब लिखता हूँ तो संदेह में रहता हूँ कि कैसी बनी? जब दूसरे लोग बताते हैं तो लगता है कि ठीक बनी. अब तो आदत कुछ ऐसी बन गई है कि ख़ुशी हमारे अंदर अधिक देर तक नहीं रह पाती. बीमारी की वजह से हम बहुत इंडल्ज करना एवॉइड करते हैं. बहुत सी रचनाओं को मैं फिर लिखना चाहता था. जैसे ‘ज़िंदगी और जोंक’ को दोबारा लिखना चाहता था. असंतोष था. उसी समय अचानक राजेंद्र यादव घर पहुँचे. कहानी हाथ से छीन ली. बहुत फटकारा—’ये क्या कर रहे हो? दूसरी कहानी लिखो.’ लेखक अपनी रचनाओं के बारे में कभी संतुष्ट नहीं होता. तारीफ़ों से ख़ुश होता है, पर विश्वास नहीं होता कि क्या बनी. क्योंकि रचना से अलगाव हो जाता है. हाँ, तो रचना छप जाए, ख़ुशी तब भी होती है, पर उसका असली मज़ा तब है जब दूसरे तारीफ़ करें, उसे स्वीकार करें. मेरे साथ यही होता है. शायद औरों के साथ भी ऐसा होता होगा. लेकिन तारीफ़ से भी क्या? अच्छी रचना ज़माने के साथ चलती और विकसित होती है. नए-नए आलोचक नए-नए दृष्टिकोणों से उसकी व्याख्या करते हैं.
और अब वे अपनी कुछ चर्चित कहानियों के रचने के क्षणों, आधारों, प्रेरणाओं को याद कर सुना-समझा रहे हैं—’हमारे छोटे भाई तब इंजीनियर थे आज़मगढ़ में. उन्होंने कहा कि थोड़े दिन हमारे यहाँ रहकर आराम कीजिए. बीमारी के बाद हम सपरिवार उनके यहाँ रहने चले गए. ‘कहानी’ से पत्र आया कि 55 के विशेषांक के लिए कहानी भेजिए. तब मैंने उन्हीं के लिए लिखी थी ‘दोपहर का भोजन’. देर नहीं लगी. असल चीज है फॉर्म. फॉर्म पता है तो तुरंत समझ आ जाता है सब. यदि प्लॉट पता है, पर फॉर्म पता नहीं है तो कई बार लिखकर काटता पड़ता है. फॉर्म कभी पकड़ में आता है, कभी नहीं आता है. समझ नहीं आता कि इस रियलिटी को कैसे प्रेज़ेट करें.हर रियलिटी हर फॉर्म में एक्सप्रेस नहीं हो सकती. तो तुरंत लिख गई थी वह—एक सिटिंग में.’डिप्टी कलेक्टरी’ अपने एक अन्य भाई के जीवन पर लिखी थी. ‘दोपहर का भोजन’ लिखने के बाद आज़मगढ़ से हम बलिया आ गए. वहाँ हमारी माँ थीं, पिताजी थे. पिताजी वकालत करते थे. उम्र भी हो गई थी उनकी. परिवार का बोझा था. किराए का मकान था, वो भी अच्छा नहीं था. नहीं, बलिया के नहीं, हम बलिया के एक गाँव ‘नगरा’ के रहने वाले हैं. नगरा का एक टोला है—भगमलपुर. तो हम बलिया आ गए. धीरे-धीरे स्ट्रेंथ गेन कर रहे थे. पत्रकार की नौकरी छूट ही चुकी थी और कोई एक्टीविटी नहीं थी. रेलवे स्टेशन से ‘कहानी’ पत्रिका मँगवा लेता था. एक अंक में अखिल भारतीय प्रतियोगिता के बारे में छपा था. पहले सोचा कि बेकार है इस बारे में सोचना. फिर योजना बनी तीन कहानी लिखने की. जो सर्वोत्तम निकले, उसे प्रतियोगिता में भेज दिया जाए. पहली कहानी ‘ज़िंदगी और जोंक’ उठाई. सोचा, बहुत मेहनत नहीं करेंगे. थोड़ा-थोड़ा रोज़ लिखेंगे. अधिक स्ट्रेन ले नहीं सकते थे. रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखते. आपने पढ़ी है वो कहानी? रजुआ—वो करेक्टर है उसमें. बलिया में ही देखा था उसे हमने. हमारे वाले मुहल्ले का ही था. क़रीब दस एक दिन लगे होंगे—वह कंप्लीट हो गई. इसके पूरा होते ही दूसरी उठा ली. एक दिन की भी देर नहीं की. ये भी हमारे परिवार की थी. भाई लॉ करके बलिया आ गए थे. बलिया जैसे छोटे शहर में रहकर उनका बिना सुविधा, अपने बूते आई.ए.एस. में बैठना. सिंपिलीसिटी के मास्टर थे वे. जटिल से जटिल चीजों को सिंपिलीफ़ाई कर देते. कुछ विषयों में टॉपर. लिखित में नंबर अच्छे आते, पर इंटरव्यू…. इंटरव्यू का जब कॉल आता था तो जैसे ताज़ी हवा का आना, स्वप्न, आशा का वह उत्साह, पिता की आशाएँ, प्रतीक्षा—आप ‘डिप्टी कलेक्टरी’ में देख सकते हैं. तीसरी भी लिखी, पर वो नियंत्रण के बाहर हो गई, लंबी हो गई. फाड़कर फेंक दी. नहीं, शीर्षक तो अब याद नहीं.
‘डिप्टी कलक्टरी’ कहानी पुरस्कृत भी हो गई. ‘ज़िंदगी और जोंक’ का यह हुआ कि अश्कजी उन दिनों ‘संकेत’ नाम से हिंदी में एक साहित्य संकलन निकाल रहे थे. शुरू में कमलेश्वर और मार्कंडेय उससे सहायक संपादक के रूप में जुड़े थे. बाद में कुछ हुआ कि वे अलग हो गए. तो कमलेश्वर ने कहानी भेजने का पत्र लिखा. मैंने ‘ज़िंदगी और जोंक’ भेज दी. अश्कजी को बहुत पसंद आई. उस संकलन में तब के सभी लेखक छपे थे. मोहन राकेश, शेखर जोशी, राजेंद्र यादव की ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’, नागार्जुन का ‘वरुण के बेटे’, परसाई भी थे, ड्रामा भी था, कविताएँ भी थीं. ‘कहानी’ का वह विशेषांक महत्त्वपूर्ण था. बहुत चर्चा हुई. हिंदी क्षेत्र के चारों ओर के पत्र. कहानी के साथ भैरवजी ने अपनी टिप्पणी में एक लाइन यह भी जोड़ दी थी कि इस रचना का लेखक बेकार है और नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है. आप देखिए, उसे पढ़कर कितने लोगों ने मुझे नौकरी के लिए पत्र लिखे. यह भी देखिए कि तब कितना असर होता था इन चीज़ों का. ’56 के शुरू में ‘कहानी’ का वह अंक और उसके थोड़े बाद ही ‘संकेत’ का अंक. कहानी के पक्ष में एक अभूतपूर्व माहौल. अकल्पनीय. लोग घोषित कर चुके थे कि कहानी की संभावना अब ख़त्म. कविता के युग की घोषणा हो चुकी थी. ठीक है कि कहानी व्यक्तिवाद, दार्शनिकता या प्रगतिशील राजनीतिक भावुकता में खो गई थी—पर उस दौर में कहानी को वातावरण, वह स्थान मिला कि आज उसकी इतनी पूछ है. नए तेवर, नई भाषा, नए शिल्प के साथ जीवन और समाज को केंद्र में रखकर नई संभावनाएं तब उभरकर आई थीं. कई तरह के लोग लिख रहे थे तब.
तो बलिया में दो और आज़मगढ़ में एक यानी तीन कहानियाँ लिखीं हमने उस कठिन दौर में. एक उपन्यास भी लिखा—’सूखा पत्ता’. उनका हाथ मेरे कंधे पर आ टिका है—’नहीं पढ़ा हो तो पढ़ लीजिए. पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र का जो कच्चापन होता है—वय संधि कहिए उसे, उस पर है. तीन छोटे-छोटे खंड हैं. उसमें एक प्रेमकथा भी है. बाद में हम इलाहाबाद आ गए. ‘दैनिक भारत’ निकलता था तब वहाँ से. पुराने पत्र में जाने का सवाल नहीं था. वहाँ वैसे भी ट्रबल चल रहा था. सो ‘दैनिक भारत’ में आ गया. जब से तबीयत ख़राब हुई, रात में लिखना बंद कर दिया था. और अब तब के इलाहाबाद में बीते कुछ दिन उन्हें याद आ गए हैं—’उस ज़माने में साहित्य का केंद्र था इलाहाबाद. वैचारिक कहिए या साहित्यिक—विवाद भी यहाँ ख़ूब थे.’ भारती, साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी और अन्य अनेक लोग थे. ‘परिमल’ थी, उससे जुड़े लोग थे. उनके मार्गदर्शक अज्ञेयजी थे. प्रयोगवाद के रूप में आंदोलन पहले आया, फिर नई कविता चली. इधर से प्रगतिशील लेखन का विरोध होता ही था. वैचारिक स्तर पर उधर से प्रेमचंद पर निशाना साधा जाता था और इधर से व्यक्तिवाद आदि पर. नोक-झोंक चलती रहती, दोनों ओर से गोष्ठियाँ और सम्मेलन होते रहते. सभी उनमें भाग लेते. आज ऐसा नहीं है. ‘परिमल’ में भारती सबसे आगे रहते थे. साही प्रबुद्ध व्यक्ति थे. गहराई से सोचने वाले, चिंतक क़िस्म के थे. तब गतिविधियाँ बहुत होती थीं—परिमल वालों की भी, प्रगतिशीलों की भी.
“नहीं, इंस्पायर होकर नहीं लिखा. बड़ी तकलीफ़ों में लिखा है हमने. आर्थिक समस्याएँ बहुत थीं. कोई ख़ास तनख़्वाह नहीं थी. शादी हो गई थी. दो बच्चे भी थे. उपन्यास लिखने पड़ते थे. ‘काले उजले दिन’, ‘पराई डाल का पंछी’—हाँ, बाद में यह ‘सुखजीवी’ करके छपा. इंस्पायर होकर तो पहला उपन्यास ही लिखा—’सूखा पत्ता’. श्रीपत राय (कहानी) की नौकरी तक कुछ कहानियाँ हमने लिखी थीं. मेरा खयाल है, शायद ’59 में सभी लोग वहाँ से निकाल दिए गए थे पंद्रह-पंद्रह दिन का नोटिस देकर. मैं, संन्यासी, भैरवजी… उसके बाद ‘अमृत पत्रिका’ में हमारे एक पुराने साथी थे कस्तूरचंद, उन्हें मेरी बेकारी का पता चला तो उन्होंने लिखा कि तुम यहाँ आ जाओ. वह एक संस्था थी—मैं वहाँ चला गया. कैंपस में मकान मिला, मज़ा आया वहाँ. पर बदमग़ज़ी कहाँ पैदा हो गई, हम नहीं जानते. संभव है, मैंने थोड़ी आलोचना कर दी होगी. आप जानते हैं कि यदि आप व्यवस्था में रहते है तो हाथ-पैर बचाकर रहिए. पर लेखक का यह है कि वह ऐसे समय में वाचाल हो जाता है. छह महीने बाद नौकरी का रिन्यूअल होना था, पर हमसे कह दिया गया कि खेद है, आपका रिन्यूअल नहीं हो पाएगा. हमारे लिए तो यह मरण हो गया. सब चीज़ें कच्ची थीं. बच्चे छोटे थे. उन्हीं दिनों बाद में ‘पराई डाल का पंछी ‘ लिखा. एडवांस जो मिला, ले लिया. वहाँ से लखनऊ आ गया. नौकरी कोई थी नहीं, कोई फ़िक्स्ड डिपॉज़िट नहीं, इन्कम नहीं. हवा में थे हम. अजीब-सी, ख़ाली-ख़ाली सी एक ख़ास तरह की हँसी.
“तब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी हमारे वाले मुहल्ले राजेंद्र नगर में ही रहते थे. हम लड़ते भी थे, पर एक-दूसरे के काम भी आते थे. वे मेरी बेकारी को लेकर चिंतित थे. आप देखिए कि एक साल तक उन्होंने हर महीने हमें रेडियो के तीन कार्यक्रम दिए. एक कार्यक्रम का पारिश्रमिक तीस रुपए. महीने के नब्बे रुपए हुए. सन् 60 की बात है, तब मकान का किराया था पचास रुपए. कहानी आप रोज़ तो लिख नहीं सकते, सो और भी कुछ लिख-लिखा लिया. ‘ग्राम्या’ के लिए ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखवाया. श्रीकांतजी ‘कृति’ निकालते थे, उसके लिए लिखा. ‘ग्राम्या’ में तब जो लिखा, वह ‘ग्रामसेविका’ उपन्यास में आया. लस्टम-पस्टम चलता रहा सब. ‘मूस’ भी वहं लिखी. वह ‘नई कहानी’ में छपी और चर्चित हुई. सर्वेश्वर से बहसें अकसर प्रेमचंद को लेकर होतीं. वे कहते—प्रेमचंद का साहित्य नखासगंज का साहित्य है. मैं पूछता—तुम्हारा क्या हजरतगंज का है? ख़ूब नोक-झोंक चलती. इलाहाबाद में भारती से हमारा यह सब चलता रहता था. बहसें होती, पर संबंध थे. मैंने वहाँ से एक स्केच टाइप, थोड़ी ह्यूमरस टाइप एक चीज़ भेजी—-वह ‘धर्मयुग’ में छपी. भारती ने लिखा कि हमें एक महीने में इस तरह की तीन रचनाएँ दीजिए. चाहता तो कर सकता था, पर उस ऑफ़र को मैं कर नहीं सका. बड़ी बाध्यताएँ थीं, बहुत संकट थे, मैं कर नहीं पाया, हालाँकि उससे मेरा हित होता.
अब लखनऊ के उस स्वर्णकाल को याद किया जा रहा है—’तब तीन महान उपन्यासकार लखनऊ में रहते थे—नागरजी, भगवतीचरण वर्मा और यशपालजी. इस उपन्यासकारत्रयी पर लखनऊ को गर्व था. श्रीलालजी वहीं पोस्टेड थे, सर्वेश्वर थे, कुँवर नारायण थे. हजरतगंज तब घूमने के लिए एक अच्छी जगह थी. कॉफ़ी हाउस होता था तब वहाँ, बहुत से लोग आते थे, डिस्कस करते थे. यशपालजी आते थे, पर सात बजे वहाँ से उठ लेते थे. उन डिसकशंस का वे कहानियों में उपयोग कर लेते थे. श्रीलालजी अंग्रेज़ी-संस्कृत में कुछ-न-कुछ सूक्ति छोड़ते रहते थे. पढे-लिखे, विज्ञ हैं वे. अफ़सर भी थे तब. मज़ा आता था सुनकर. मैं दोस्तों में श्रोता ही रहा हूँ. ज़्यादा बोलता नहीं हूँ. यूँ कभी-कभी बस मजाक़ भर कर लिया. दूसरों को सम्मान देने की हमेशा मैंने कोशिश की है. स्वयं को सदैव छोटा समझकर ही चला. वह मेरा ही संकोच था कि मैं इन तीन ख्यात लेखकों में से केवल नागरजी के ही निकट पहुँचा.’
कुछ याद करने की सी ख़ास मुद्रा में रुककर सोचा गया है—’एक बार शुक्लजी की कार में बैठकर हम नागरजी के यहाँ गए. देखा—वे बैठकर सिलबट्टे पर भाँग घिस रहे हैं. नागरजी ज़िद पर आ गए कि तुम भी भाँग पीओ. मैंने बहुत कहा कि मैं परहेज़ से रहता हूँ, कभी-कभी सिगरेट पीता हूँ, पर भाँग या शराब नहीं पीता. वे नहीं माने, थोड़ी सी पिला दी. उन दोनों ने ठाठ से पी. साइकोलॉजिकल ही रहा होगा कुछ मेरे साथ कि मेरी तबीयत कुछ गड़बड़ हुई.’ अल्प-सा एक विराम फिर आया. ज़रा देर बाद चहक भरे से फिर बोले, ‘एक रोचक घटना याद आ रही है इस समय, सर्वेश्वरजी के अज्ञेयजी से निकट के संबंध थे. सर्वेश्वर पहले ए.जी.ऑफ़िस में थे. ‘परिमल’ में वे थे ही और अज्ञेयजी के कारण ही ‘दिनमान’ में गए. अज्ञेयजी उनके यहाँ आए हुए थे. नौकर बुलवाने के सिलसिले में मुझे सर्वेश्वरजी की पत्नी से बात करनी थी, इसलिए मैं उके घर गया. अंदर देखा—उस हॉलननुमा कमरे में अज्ञेयजी चारपाई पर बैठे थे. उनसे पहले मिलना-देखना तो हुआ था, पर बातचीत नहीं हुई थी. वे चिंतामग्न बैठे थे. मैं बराबर के कमरे में सर्वेश्वर की पत्नी से बात करके चला गया. सर्वेश्वर की पत्नी ने कहा भी कि ये अज्ञेयजी हैं, पर मैं चला गया. शायद संकोच था. दूसरे दिन सर्वेश्वर इस बात पर बहुत बिगड़ा. मैंने सफ़ाई दी—‘पता नहीं उन्होंने मेरा क्या कुछ पढ़ा भी होगा या नहीं? मैं कैसे इंट्रोड्यूस करता ख़ुद को?’ वह चिल्लाने लगा—’वो एक-एक नए लड़के को जानते हैं. सबको पढ़ते हैं.’ एक दिन सर्वेश्वर ने ही कहा कि तुम पंतजी से जाकर क्यों नहीं कहते. वे सरकार के सलाहकार हैं. मैं गया, पर नतीजा कुछ नहीं निकला. तब तक वे सलाहकार नहीं रह गए थे. फिर स्थितियाँ इतने अंतिम छोर तक पहुँच गईं कि लखनऊ में रहना मुश्किल हो गया. जो कुछ थोड़ा सामान था, उसके साथ लद-फदकर हम लखीमपुर खीरी पहुँच गए. तब हमारे भाई वहाँ ज्युडीशियल अफ़सर थे. वे वहाँ राजा की कोठी के एक पोर्शन में रहते थे. राजा के एक भाई थे. उन्हें हमने देखा भी, उनके बारे में सुना भी. बाद में उन्हीं पर केंद्रित एक कहानी लिखी—’आकाश-पक्षी’.
उसी बीच भैरवजी ने लिखा कि वहाँ कहाँ पड़े हो, यहाँ इलाहाबाद आ जाओ. इलाहाबाद से जब गए थे तो श्रमिक बस्ती में हमारा एक क्वार्टर था. तब दस रुपए किराया था उसका. एक ख़ास मित्र के कहने पर वह क्वार्टर हमने किसी को दे दिया था. देत समय सोचा नहीं था कि लौटना पड़ेगा. दुर्योग कि लौटना पड़ा. उस व्यक्ति का परिवार बस चुका था वहाँ. उससे कुछ नहीं कहा और ख़ुद कुछ दिन ए.जी.ऑफ़िस के भाटियाजी के यहाँ रहा. भैरवजी दिल्ली गए तो उन्होंने शेखर जोशी को अपने घर में रहने को कहा. जोशी भैरवजी के यहाँ लूकरगंज चला गया और मैं जोशी वाले घर में जा पहुँचा. मेरी कहानियों के साथ वही—20/5, करेला बाग़ वाला ही पता छपता था.
(जारी)
कवर | प्रभात
अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.
अपना मुल्क
-
हालात की कोख से जन्मी समझ से ही मज़बूत होगा अवामः कैफ़ी आज़मी
-
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
-
सहारनपुर शराब कांडः कुछ गिनतियां, कुछ चेहरे
-
अलीगढ़ः जाने किसकी लगी नज़र
-
वास्तु जौनपुरी के बहाने शर्की इमारतों की याद
-
हुक़्क़ाः शाही ईजाद मगर मिज़ाज फ़क़ीराना
-
बारह बरस बाद बेगुनाह मगर जो खोया उसकी भरपाई कहां
-
जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं