वी-डे से तीन रोज़ पहले
वैलेंटाइन डे से ठीक तीन दिन पहले, दिल्ली-एनसीआर की एक बीस-बाईस बरस की लड़की ने “हाउ टू किस” की क्लास का ऐलान किया—फ़ीस दो हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति. आधे घंटे की “लाइव क्लास”. लड़के-लड़कियाँ, आमने-सामने. जो सीखना चाहें — “चूमने का हुनर”.
पता चला है कि हज़ार से ज़्यादा नौजवानों ने नाम लिखवा दिया. मगर “उस्तानी” सबको समेट नहीं पाईं.
‘किस’ या चूमने की इस कला का वैज्ञानिक नाम है—फिलेमैटोलॉजी. यूनानी शब्द ‘फिलोस’ से निकला—यानी सांसारिक प्रेम. आम बोलचाल में इसे स्मूचिंग, स्नॉगिंग, मेकिंग आउट, फ्रेंच किस… या बस गाल पर दिया गया एक मासूम ‘पेक’ भी कहते हैं. कभी-कभी इसे “लव की भाषा”, “वीनस का अमृत” या “क्यूपिड की मुहर” भी कहा गया. अगर तीव्र इच्छा से किसी को चूमने का मन हैं—उसे कहते हैं बेसोरेक्सिया. और हाँ, इसमें जो मुख्य मांसपेशी काम करती है उसका नाम है ऑर्बिकुलैरिस ओरिस.
उस तीस मिनट की क्लास में एक रंगीन ‘फ्लायर’ भी दिया जाना था जिसमें चूमने ‘किस’ करने की कला से जुड़ी ज़रूरी बातें समझाई गई थी.
उस लड़की की इंस्टाग्राम पोस्ट का शीर्षक था —“Three Days to V Day.”
इक्कीसवीं सदी की दूसरी चौथाई की शुरुआत में “किस कोचिंग” मुमकिन है. आज के नौजवान हर काम में परफ़ेक्शन चाहते हैं—ख़ासकर जहाँ उनका इश्क, उनका पार्टनर या उनका होने वाला ‘वो’ शामिल हो… चाहे वो अभी टेम्परेरी ही क्यों न हो. मेरे जैसे ‘बूमर युग वाले’ के लिए यह सब प्रेम की उस परिभाषा को उलट देता है, जिसे हम सच मानते आए थे. हम तो ये सच्चाई भी जानते हैं कि:
496 ईस्वी में पोप जेलैसियस प्रथम ने 14 फरवरी को सेंट वेलेंटाइन के शहीदी दिवस के रूप में घोषित किया था. उस समय न कोई कार्ड थे, न गुलाब, न डेटिंग ऐप्स. यह दिन प्रेमियों का नहीं, एक शहीद का स्मरण था.
एक शेर याद आता है:
मोहब्बत का था ज़िक्र कभी इबादत की तरह,
अब पैकेज बनके बिकती है हिदायत की तरह.
और अगर आज अगर प्रेम को भी ट्यूशन की ज़रूरत है, तो शायद ज़माना सचमुच बदल चुका है. बकौल मंटो के “नाक़ाबिले बर्दाश्त” है.
वैलेंटाइन डे और मोहब्बत का कारोबार
अफ़सोस मोहब्बत का ये “कारोबार” भारत में हज़ारों साल बाद आया—तब, जब कामदेव अपने पुष्प-बाण से ऋषियों, मुनियों, देवताओं और असुरों तक के मन विचलित कर सब को मात दे चुके हैं.
माफ़ कीजिए, सेंट वेलेंटाइन साहब इस धरती पर आप कुछ देर से पहुँचे. यहाँ कृष्ण और गोपियों की रासलीला पहले से थी, यहाँ शिव और पार्वती का अमिट प्रेम युगों पहले से था.
वैलेंटाइन डे भारत में अस्सी के दशक के आख़िर में आया, एमटीवी और हॉलमार्क कार्ड्स के साथ. नब्बे के दशक की शुरुआत तक कैडबरी, ज़ी टीवी और हमारी उदारीकरण की नीतियों ने हिंदुस्तान में पश्चिमी हवा के लिए दरवाज़े खोल दिए. प्रेम का भूखा-प्यासा भारतीय युवा इसे लपकने को तैयार था—उत्सुक, बेचैन, और थोड़ा बेक़रार भी.
मार्केटिंग के गुरुओं ने मानो छोटे-छोटे कामदेव बनकर हर विज्ञापन के ज़रिए प्रेम के तीर चलाने शुरू कर दिए. धीरे-धीरे यह दिन एक लहर नहीं, बाढ़ बन गया.
दिल्ली और बाक़ी बड़े शहरों में प्रेम बेचने वाले कुछ नाम खास थे —आर्चीज़, जहाँ ग्रीटिंग कार्डों की दुनिया बसती थी; गिगल्स, जहाँ प्यार हर शक्ल में मिलता था; और कनॉट प्लेस का डी’ पॉल्स, जिसकी कोल्ड कॉफ़ी ने न जाने कितने करन-काजोल पैदा किए— “कॉफ़ी विद करण” के आने से बहुत पहले. शाहरुख ख़ान अनजाने में उस पीढ़ी का चेहरा बन गए—वही बाहें फैलाकर खड़ा प्रेम, वही बारिश में भीगा इज़हार.
उस समय के आइसक्रीम पार्लर भी किसी डेटिंग ऐप से कम नहीं थे. अस्सी के दशक में उगे, नब्बे में जवान हुए. विदेशी ब्रांड, पश्चिमी मीडिया—सबने मिलकर आग को हवा दी.
पहले आए ग्रीटिंग कार्ड—लाल गुलाबों पर सुनहरे अक्षरों वाले. फिर गुलाब आए—देसी नहीं यूरोपीय गुलाब, जो तीन रात तक मुरझाते नहीं थे, तीन रात! फिर चॉकलेट, परफ़्यूम, चकमक अंगूठियाँ, फ़्रेंडशिप बैंड, टेडी बियर, दिल के आकार के गुब्बारे, लांजरी… कारोबार फैलता गया. हर साल बड़ा, और बड़ा.
हम ‘बूमर्स युग’ वालों के लिए रोमांस इतना जटिल नहीं था. सीधा-सादा था. माशूका या लड़की को चाणक्य या अर्चना सिनेमा में मॉर्निंग शो दिखा देना ही बड़ी बात थी. अंधेरे हॉल में एक चुपके से लिया गया चुम्मा—वही हमारा वैलेंटाइन डे था. पूरा हो गया, बस चलो, क्या करनी है पूरी फ़िल्म देख कर-छोड़ो, बाहर चलो, कुछ और करते हैं. बाग़ फूलों से भरे होते थे और उन दिनों के माली डरपोक थे, फूल तोड़ कर लड़की को देने में भी मदद करते थे.
हालंकि इसे बसंत का मौसम कहा जाता है पर असल में दिल्ली उन दिनों ठंड से कांपती थी. सर्द सुबह बाइक की सवारी में ही अपना आलिंगन हो जाता, आगोश की वो गर्माहट जिसे दोनों महसूस तो करते पर एक दूसरे की आँख में आँख डाल कर बेचैन न होते—बीच-बीच में ब्रेक लगते, झटके लगते, जिस्म टकराते—और दिल धक-धक करता.
अंग्रेज़ी फ़िल्म के बाद किसी धुंधली रोशनी वाले रेस्टोरेंट के केबिन में बैठकर कॉफ़ी पीना…जहां प्यार करने वाले प्यासे जोड़ों के लिए काले परदों से ढके छोटे कमरे बने होते-कड़वी कॉफ़ी के साथ-साथ एक और जल्दबाज़ी भरा मीठा चुंबन. बस चलो घर, लेट हो रहे हैं.
अस्सी और नब्बे के दशक के बीयर बार और डिस्कोथेक दोपहर बाद खुलते थे—वो अब बीते समय की चीज़ें हैं. लेकिन उस समय का संगीत, वो संगीत निर्मम रोमांटिक था. कनाट प्लेस के ‘द सेलर डिस्को’ और रंबलेस रेस्तरां में नया अंग्रेज़ी पोपुलर, रॉक और जैज़ संगीत दो हफ़्ते में ही पहुँच जाता था. बीटल्स, रोलिंग स्टोन्स, बोनी एम, एसी-डीसी, ऐबा, डीप पर्पल, लेड ज़ेपलिन, टीना टर्नर, पिंक फ्लॉइड —इनकी धुनों में धुआँ घुला रहता था, और वही धुआँ हमारे छोटे-छोटे वेलेंटाइन धूमधाम का हिस्सा था. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले जोड़े—यूनिवर्सिटी रिज (यानि पहाड़ी), बुद्ध जयंती पार्क, जमना के किनारे, कश्मीरी गेट के तिब्बती ढाबे, रोशनआरा बाग़ के अंदरूनी हिस्से, कमला नगर का अजंता कैफ़े, ग्रेटर कैलाश एम-ब्लॉक के रेस्टोरेंट—में छुपे पाए जाते-यही हमारे ठिकाने भी थे.
और फिर इंटरनेट आया. विज्ञापन और प्रचार आया. अमरीका और यूरोप में रहने वाले हिंदुस्तानियों का असर भी आया. जिसके साथ वो सब आया जो आज वेलेंटाइन का हिस्सा है . शुरुआत में इस सब विरोध भी हुआ. “पश्चिमी कूड़ा यहाँ क्यों?” ऐसे शीर्षक अख़बारों में छपे. रास्ते चलते जोड़ों की पिटाई भी होती. हाथ पकड़ना भी जुर्म हो गया. इस डर के बावजूद प्रेम रथ चल पड़ा था. आठ घोड़े लगे उस रथ को रुकना नहीं आता था.
आज और अब तस्वीर अलग है. लड़के-लड़कियाँ का कमरों में एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं है. अपने दोस्त के घर रात बिताना ग़लत नहीं माना जाता. और फिर ऐसे मौक़े पर तो होटल बुक करना भी असामान्य नहीं है. आज रोमांस कम देह की तृप्ति ज्यादा ज़रूरी है. अब सिर्फ़ गाल या होंठों पर चुम्बन नहीं — पूरा, बेकाबू, ‘लिप टू लिप’ और “गिव-मी-योर-टंग” वाला किस या चुंबन आम बात है.
मोहब्बत तब भी चार अक्षरों का शब्द था अब भी वो ही है, बस नए मानी जुड़ गए हैं. और फिर साथी बदलना अब उतना ही आसान, जितना कपड़े बदलना. एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता बंदर भी समय लेता है अच्छे-बुरे की सोचता है, पर आज का प्रेम नहीं.
एक दिन का V-Day अब कम पड़ गया है. अब “लव वीक” आ गया है, पूरे सात रोज़ — रोज़ डे, प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग (आलिंगन) डे, किस डे…और फिर वैलेंटाइन डे. हर दिन का अपना थीम है, हर दिन का नया बाज़ार.
“एक गिफ़्ट रिस्की लग रहा हो तो पूरा हैम्पर भेज दो.” “आपकी ट्रेन छूटने नहीं देंगे…” ऐसे स्लोगन के साथ इंटरनेट पे फूल बेचने वाले पुकार रहे हैं. कुछ ब्रांड हर साल वही लाल रंग और पुराने नाम दोहराते हैं. कुछ दूसरे नए नाम गढ़ते हैं— “हार्ट ब्लश”, “हार्ट स्लीव”…अब “लव कुशन” भी है. कुशन? मैं सोचता रह जाता हूँ.
मुझे बताया गया कि कुछ लड़कियाँ अब महीने भर का ग्रॉसरी लिस्ट भी बॉयफ्रेंड को भेज देती हैं—ब्रांडेड सूप, पैकेज्ड मील — “गिफ्ट” के रूप में चाहियें. ग़ज़ब है भाई इक्कीसवीं सदी.
अपनी किताब “हार्टब्रेक अनफ़िल्टर्ड” के विमोचन में लेखिका मिलन वोहरा ने कहा— “कुछ लोगों के लिए वैलेंटाइन डे उत्सव है, लेकिन जिनका दिल टूटा है, उनके लिए यह दिन बहुत दुखदाई होता है. भले ही चारों ओर गूँजता प्रेम बाज़ार की उपज हो फिर भी उन टूटे दिल आशिकों को अपनी उस मोहब्बत की याद दिलाता है जो अब साथ नहीं रही.” मैंने देखा उस विमोचन में बहुत से लोगों की आँखें भीगी थीं.
और सच भी है, जिसका दिल टूटा हो उसके लिए जश्न का शोर और तीखा हो जाता है. अब ये रही मेरी सलाह – अगर वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे. जो पसंद है, वो कीजिए. कुछ नहीं करना है तो अपने साथ बैठिए. गाना सुनिए, शायरी लिखिए, यह दिन भी गुज़र जाएगा. कभी-कभी खुद तक लौट आना ही सबसे बड़ा प्रेम होता है. मुझे अपना दिल-टूटने के दिनों वाला टीना टर्नर का ये गीत याद आता है — तब मैं मन ही मन ये गुनगुनाता था.
“What’s love got to do, got to do with it…What’s love but a second-hand emotion?”
चलो भई, खुश रहो. मोहब्बत करो — या उससे उबर जाओ. दोनों अनुभव जरूरी हैं. लगाओ हैशटैग #Love #Heartbreak #LoveIsInTheAir❤️

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