मंटो : विवाद, सच और प्रासंगिकता

‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ ऐसी किताब है, जो मंटो को सिर्फ़ एक लेखक नहीं, बल्कि एक जीवित, जटिल और बेहद मानवीय इंसान के रूप में सामने लाती है. यह पुस्तक किसी एक लेखक की दृष्टि नहीं, बल्कि कई लेखकों और साथियों की नज़र से मंटो को समझने की कोशिश है—यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है. इसमें कृश्न चंदर, मुहम्मद तुफ़ैल, शाहिद अहमद देहलवी, इस्मत चुग़ताई, बलवंत गार्गी, नरेश कुमार शाद, अहमद नदीम क़ासमी जैसे लेखकों सहित कुल सोलह लेखकों के संस्मरण-आलेख शामिल हैं, जो मंटो के बेहद क़रीबी रहे.

इसलिए यहाँ मंटो की छवि किताबों वाली नहीं, बल्कि ज़िंदगी के बीच से निकलकर आती है. जैसे कृश्न चंदर लिखते हैं—“उर्दू अदब में एक ही मंटो है.” यह पंक्ति ही मंटो की विशिष्टता को स्थापित कर देती है. वहीं इस्मत चुग़ताई के लेख में मंटो के साथ उनके संवाद और टकराव एक अलग ही जीवंतता पैदा करते हैं. उनके बीच की नोक-झोंक सिर्फ़ बहस नहीं, बल्कि दो मज़बूत व्यक्तित्वों का संवाद है. पुस्तक में एक जगह यह प्रसंग आता है कि मंटो ने ‘कबूतरी’ जैसे शब्द पर भी कहानी लिख दी—यह उनकी रचनात्मकता की तीव्रता को दिखाता है. छोटे-छोटे विषयों में भी वे गहरी कहानी खोज लेते थे. इसी तरह रेडियो स्टेशन के दिनों का वर्णन बताता है कि वे कितनी सहजता से टाइपराइटर पर बैठकर तुरंत ड्रामा लिख देते थे—यह उनकी प्रतिभा का एक अनौपचारिक, लेकिन प्रभावशाली चित्र है.

मुहम्मद तुफ़ैल के संस्मरण ‘वो दुनिया जिसने उसे मरने दिया’ में मंटो का एक दर्दनाक पक्ष सामने आता है. यह सिर्फ़ एक लेखक की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है, जिसने अपने सबसे सच्चे लेखक को समझने में देर कर दी. इस लेख में मंटो की संवेदनशीलता और उनके अकेलेपन की झलक बहुत गहराई से मिलती है. वहीं नरेश कुमार शाद द्वारा लिखित ‘मंटो से आख़िरी मुलाक़ात’ में एक टूटते हुए, लेकिन भीतर से अब भी ज़िद्दी और सच्चे इंसान का चित्र मिलता है. यह प्रसंग पाठक को भीतर तक छूता है, क्योंकि यहाँ मंटो किसी विचारधारा के प्रतीक नहीं, बल्कि एक जूझता हुआ मनुष्य बनकर सामने आते हैं. इस पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मंटो के उस रूप को सामने लाता है, जो सिर्फ़ एक कहानीकार नहीं, बल्कि अपने समय से टकराने वाला लेखक था. मंटो ने जो लिखा, वह सिर्फ़ साहित्य नहीं था—वह समाज की सच्चाई का आईना था, और यही वजह है कि उन्हें सबसे ज़्यादा विरोध भी झेलना पड़ा.

मोहम्मद तुफ़ैल के लेख ‘वो दुनिया जिसने उसे मरने दिया’ में यह बात बहुत गहराई से उभरती है कि मंटो की लड़ाई सिर्फ़ समाज से नहीं, बल्कि उस सोच से थी जो सच को स्वीकार करने से डरती है. मंटो ने वही लिखा जो उन्होंने देखा—वह चाहे विभाजन की हिंसा हो, इंसानी क्रूरता हो या समाज की दोहरी मानसिकता. यही ईमानदारी उन्हें ख़ास बनाती है. किताब में कई जगह यह महसूस होता है कि मंटो अपने समय से आगे के लेखक थे. जब समाज नैतिकता के नाम पर चीजों को छुपा रहा था, तब मंटो उन्हें खुलकर सामने ला रहे थे. इसीलिए उन पर अश्लीलता के आरोप लगे, मुकदमे चले, लेकिन उन्होंने अपनी क़लम नहीं रोकी.

इस्मत चुग़ताई के साथ उनके संवादों में भी यह साफ़ दिखता है कि मंटो किसी भी तरह की बनावट या दिखावे के ख़िलाफ़ थे. वे साफ़, सीधी और कभी-कभी चुभने वाली बात कहते थे. लेकिन उसी में उनकी सच्चाई थी. एक जगह मंटो का यह अंदाज़ दिखता है कि वे अच्छे और बुरे के तय पैमानों को नहीं मानते थे. वे इंसान को उसके पूरे सच के साथ देखते थे. यही वजह है कि उनके पात्र भी बिल्कुल असली लगते हैं—न पूरी तरह अच्छे, न पूरी तरह बुरे, बल्कि हमारे जैसे. अहमद नदीम क़ासमी और अन्य लेखकों के संस्मरणों में मंटो का एक और पहलू सामने आता है—उनकी संवेदनशीलता. बाहर से जितने कठोर और बेबाक, अंदर से उतने ही भावुक और टूटे हुए. उनके जीवन के आख़िरी दिनों का वर्णन यह बताता है कि एक सच्चा लेखक अपने भीतर कितनी पीड़ा लेकर चलता है.

पुस्तक का अंतिम अध्याय—’मंटो का वफ़ातिया (आत्म-तर्पण)’ दरअसल, मंटो की आत्मा की आवाज़ है. इसमें वह अपने जीवन, अपने लेखन और अपने संघर्ष को जिस तरह रखते हैं, वह बहुत ईमानदार और कड़वा सच है. यहाँ मंटो किसी से कुछ छुपाते नहीं हैं—न दुनिया से, न ख़ुद से. यह अध्याय सबसे ज़्यादा असर छोड़ता है. इसमें मंटो जैसे ख़ुद से और दुनिया से बात करते हुए नज़र आते हैं. उनकी यह पंक्ति कि “मेरे अफ़साने मेरी ज़िंदगी हैं.” उनके लेखन और जीवन के बीच के गहरे संबंध को साफ़ कर देती है. आज के समय में मंटो को पढ़ना—समझना और भी ज़रूरी हो जाता है. क्योंकि आज भी समाज कई बार सच से बचता है, उसे छुपाने की कोशिश करता है. मंटो हमें सिखाते हैं कि लेखक का काम सिर्फ मनोरंजन करना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है—चाहे वह कितना भी असहज क्यों न हो.

ज़ाहिद ख़ान का अनुवाद इस पूरी पुस्तक को और मज़बूत बनाता है. उन्होंने उर्दू के भाव, लय और तीख़ेपन को हिंदी में इस तरह ढाला है कि मूल की आत्मा बनी रहती है. यही कारण है कि पाठक मंटो के समय और उनके माहौल को महसूस कर पाता है. भाषा प्रवाह के लिहाज़ से ज़ाहिद ख़ान का अनुवाद सराहनीय है. उर्दू की मिठास और गहराई को बनाए रखते हुए हिंदी को इतना सरल रखा गया है कि पाठक बिना किसी बोझ के पढ़ता चला जाता है. भाषा कहीं भारी नहीं लगती, बल्कि अपनापन बनाए रखती है. इस पुस्तक की शैली भी बहुत ख़ास है—कहीं संस्मरण, कहीं आलोचना, कहीं संवाद, तो कहीं आत्मकथात्मक स्वर. यही विविधता इसे रोचक बनाती है. हर लेखक अपने अनुभव के साथ मंटो का एक नया पहलू खोलता है, जिससे पाठक को एक बहुआयामी चित्र मिलता है. कुल मिलाकर, ‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ सिर्फ़ एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है—एक ऐसे लेखक का, जिसने अपने समय से समझौता नहीं किया. यह हमें मंटो को पढ़ने ही नहीं, बल्कि उन्हें महसूस करने का मौक़ा देती है. किताब हमें बताती है कि मंटो महज़ अफ़सानों में नहीं थे, बल्कि अपने समय, अपने रिश्तों और अपनी जद्दोजहद में भी उतने ही सच्चे थे. मंटो आज भी इसलिए ज़िंदा हैं, क्योंकि सच कभी मरता नहीं—बस समय के साथ और भी ज़्यादा ज़रूरी होता जाता है.

किताब : मंटो साब : दोस्तों की नज़र में
अनुवाद और संपादन : ज़ाहिद ख़ान
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन
क़ीमत : 375 रुपये

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