दो सुरों के बीच का मौन हैं रघु राय की तस्वीरें
कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें काग़ज़ पर उतारना आसान नहीं होता. शब्द ठिठक कर रुक जाते हैं और दिल बार-बार अतीत की ओर लौट जाता है. हिंदुस्तान के महानतम फ़ोटोग्राफ़रों में से एक और अपने पुराने ख़ैरख़्वाह साथी रघु राय 26 अप्रैल 2026 को दिल्ली में 83 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गए.
पिछले पैंतीस सालों से अधिक समय तक मेरा उनसे साथ रहा. हमारा रिश्ता ज़्यादातर पेशेवर था, हालाँकि कई बार दोस्त की तरह भी मुलाक़ातें हुईं, कुछ ख़ुशनुमा शामें साथ गुज़रीं और ढेर सारी बातचीतें भी. मगर एक बात आज तक मेरे लिए हैरत का सबब है—मैं रघु राय की केवल एक ही तस्वीर ले पाया. वह भी चुपके से, जब वह नौजवान विद्यार्थियों की वर्कशॉप कर रहे थे.
सच कहूँ तो, उनकी मौजूदगी में कभी कैमरा उठाने की हिम्मत ही नहीं हुई. न डीएसएलआर और न ही मोबाइल. मेरा कैमरा उनके सामने जैसे सहम जाता था. मैं उनका प्रशंसक था, उनका मुरीद. उनकी तस्वीरें मुझे जितनी मोह लेती थीं, उनकी शख़्सियत भी उतनी ही आकर्षित करती थी. कभी-कभार अपनी कुछ तस्वीरें उन्हें दिखाने की गुस्ताख़ी करता, और बदले में उनकी हल्की-सी मुस्कान और एक धीमी-सी हँसी मिल जाती. वही मेरे लिए किसी तोहफ़े से कम नहीं थी.
मैं उनकी तस्वीरों से 1980 के शुरुआती दौर से परिचित हूँ. उन तस्वीरों का असर कुछ ऐसा था जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है. ऐसा लगता था जैसे रघु राय अपने कैमरे से समय को रोक लेते हों. उनकी ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीरों में एक क्षण हमेशा के लिए क़ैद हो जाता था, लेकिन वह रुका, बंधा समय हर नए दर्शक के सामने फिर से जीवित हो उठता था.
उनकी तस्वीरों में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी—ऐसी ख़ामोशी जो बोलती थी. तस्वीर में वो मौक़े की भीड़भाड़ और अनचाहे शोर को हटा देते थे और दर्शक को सीधे उस भावना के सामने ला खड़ा करते थे जो तस्वीर के भीतर साँस ले रही होती थी. 1980 के दौर में भारत में रंगीन फ़ोटोग्राफ़ी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही थी, लेकिन रघु राय पत्रकारिता के अपने काम में श्वेत-श्याम माध्यम को ही प्राथमिकता देते रहे. रंगों को हटाकर वो तस्वीर को दर्शक का ध्यान खींचने की होड़ से जुदा कर देते थे. तब आँखें रंगों पर नहीं, आकृतियों, बनावटों और तस्वीर की भावनाओं पर आ टिकती.
उनकी तस्वीरों में जो ‘दृश्यात्मक ख़ामोशी’ मिलती वो गहरी परछाइयों, साये और चमकीली रोशनी के बीच के बारीक अंतर से जन्म लेती थी. वह ख़ामोशी किसी कविता की तरह महसूस होती थी. कई बार उनकी तस्वीरें इतनी सादगी भरी होती थीं कि एक ख़ाली आसमान, एक सूनी दीवार या फ़्रेम का कोई ख़ाली हिस्सा भी मायनों से भर उठता था. वह ख़ालीपन वैसा ही अंतराल पैदा करता था जैसा संगीत में दो सुरों के बीच का मौन.
शायद यही वजह थी कि उनकी तस्वीरों के दर्शक अपनी यादें, अपने दुख, अपनी ख़ुशियाँ और अपने अनुभव उन तस्वीरों पर उकेर सकते थे . रघु राय हर की हर तस्वीर हर व्यक्ति के लिए एक अलग कहानी बन जाती थी.
जैसे विश्वविख्यात फ़ोटोग्राफ़र पॉल स्ट्रैंड और एन्सल एडम्स सधे हुए फ़ोकस से वास्तविकता के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते थे, वैसे ही रघु राय भी अपनी तस्वीरों में लगभग छू सकने वाली घटना को रच देते. उनकी तस्वीरों को देखते हुए लगता था जैसे पत्थर की खुरदुराहट, धुंध की नरमी या त्वचा की महीन बनावट आँखों के रास्ते महसूस की जा सकती हो. उनकी तस्वीरें वक़्त से अलग होकर किसी पक्के ठहराव का रूप ले लेती थीं.
हाल ही में एक राष्ट्रीय पत्रिका ने उनके सम्मान में The Defining Eye शीर्षक से एक विशेष स्मृति अंक प्रकाशित किया. अस्सी पृष्ठों के इस अंक में रघु राय की कई कालजयी तस्वीरें संकलित हैं. संपादकीय में अरुण पुरी ने लिखा कि रघु राय एक प्रतिभाशाली फ़नकार थे और अधिकांश प्रतिभाशाली लोगों की तरह उनके साथ काम करना आसान नहीं था. उन्होंने यह भी लिखा कि रघु राय चाहते थे कि पत्रिका फ़ोटोग्राफ़ी को और अधिक तरजीह दे. शायद यह विशेषांक उनके उसी अधूरे सपने की ओर एक छोटा-सा क़दम है. साथ ही यह उन दस वर्षों को याद करने का भी अवसर है जब 1981 से 1991 के बीच रघु राय इंडिया टुडे के पिक्चर एडिटर रहे.
उनकी कला और फ़ोटोग्राफ़ी पर मुझसे कहीं अधिक जानकार और योग्य लोगों ने बहुत कुछ लिखा और कहा है. मैं केवल एक छोटी-सी बात जोड़ना चाहता हूँ.
रघु राय की तस्वीरों में मुझे हमेशा ख़ामोशी का हुस्न या सौंदर्य दिखाई देता था.
वो ख़ामोशी जो दो संगीत स्वरों के बीच ठहरती है.
वो ख़ामोशी जो किसी मंदिर के आँगन में सुबह की पहली धूप के साथ उतरती है.
वो ख़ामोशी जो किसी बूढ़े चेहरे की झुर्रियों में छिपी हुई कहानी बन जाती है.
अपने फ़न के उस्ताद होने के साथ-साथ रघु एक बेहतरीन इंसान भी थे. गर्मजोशी से भरे हुए, लगभग हमेशा मुस्कुराते रहने वाले, सलीक़े से कपड़े पहनने वाले, और ऐसी आवाज़ के मालिक जिसमें एक हल्की-सी संगीतात्मक लय थी. बातचीत करना उन्हें पसंद था और उनके साथ समय बिताना हमेशा आनंददायक होता था.
उन्होंने न जाने कितने लोगों के जीवन को छुआ—फ़ोटोग्राफ़रों, कलाकारों, संपादकों, पत्रकारों, छात्रों और नौजवानों को. उनसे मिलने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो उनकी मुस्कान और उनकी आत्मीयता को भूल पाया हो.
अपने लेख के अंत में अरुण पुरी ने लिखा, “दुनिया ने एक प्रतिभा खो दी है. मैंने एक प्रिय मित्र खो दिया है.” मैं भी यही बात दोहराना चाहूँगा. हालाँकि मैं आज भी सोचता हूँ कि क्या मुझे उन्हें अपना मित्र कहने का अधिकार है.

अपनी तस्वीरों और अपने कैमरे के फ़्रेमों में रघु राय ने भारत और भारतीय जीवन के लगभग हर रंग को समेट लिया था. आम आदमी से लेकर कला के पारखियों तक, खेतों से लेकर कला दीर्घाओं तक, संगीतकारों से लेकर नर्तकों तक, संस्कृति से लेकर संघर्ष तक, साधुओं से लेकर राजनेताओं तक, उत्सवों से लेकर त्रासदियों तक—सब उनकी नज़र से होकर गुज़रे. आदिवासी अंचलों से लेकर ताजमहल तक, इंदिरा गांधी से लेकर मदर टेरेसा तक, भोपाल गैस त्रासदी से लेकर ऑपरेशन ब्लू स्टार तक—वह हर उस जगह मौजूद थे जहाँ इतिहास आकार ले रहा था.
सोशल मीडिया पर आई अनगिनत श्रद्धांजलियों में किसी ने लिखा था, “रघु राय ने भारत की आत्मा को कैमरे में कैद कर लिया था.” शायद इससे बेहतर परिचय उनका हो भी नहीं सकता.
रघु राय विश्वप्रसिद्ध मैग्नम फ़ोटोज़ के सदस्य थे. उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैग्नम ने लिखा, “गहरी करुणा और मानवीय संवेदना के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने आसपास की दुनिया और समय की मायावी यात्रा को कैमरे में दर्ज करने में लगा दिया. उनके लिए फ़ोटोग्राफ़ी केवल आँख का विस्तार नहीं थी, बल्कि दिल का विस्तार थी. अपनी पुस्तक Picturing Time में उन्होंने लिखा था कि उनका उद्देश्य था—“लाइफ़’स लॉंगिंग फ़ॉर इटसेल्फ़ (अपनी ख़ातिर जीवन की अभिलाषा.)”
कितनी अद्भुत बात है. शायद इसी एक वाक्य में रघु राय का पूरा फ़लसफ़ा समाया हुआ है.
हम आपको बहुत याद करेंगे, रघु राय, तस्वीरों की दुनिया को आपकी कमी खलेगी.
कवर | राजिंदर अरोड़ा
सम्बंधित
फ़ोटोग्राफ़ी | ‘ब्लूज़’ उदासी नहीं, कला के नाम लिखे सिजदे हैं
उस्ताद-ए-फ़न सुनील जानाः फ़ोटोग्राफ़ी जिनका राजनीतिक बयान भी थी
रघुबीर सिंहः रंगों में हिन्दुस्तान की आत्मा पहचानने वाले स्ट्रीट फ़ोटोग्राफ़र
अपनी राय हमें इस लिंक या feedback@samvadnews.in पर भेज सकते हैं.
न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें.
अपना मुल्क
-
हालात की कोख से जन्मी समझ से ही मज़बूत होगा अवामः कैफ़ी आज़मी
-
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
-
सहारनपुर शराब कांडः कुछ गिनतियां, कुछ चेहरे
-
अलीगढ़ः जाने किसकी लगी नज़र
-
वास्तु जौनपुरी के बहाने शर्की इमारतों की याद
-
हुक़्क़ाः शाही ईजाद मगर मिज़ाज फ़क़ीराना
-
बारह बरस बाद बेगुनाह मगर जो खोया उसकी भरपाई कहां
-
जो ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’... तक पढ़े हैं, जो क़यामत का भी संपूर्णता में स्वागत करते हैं