मकान नंबर 114, मिसराना मोहल्ला, ज़िला मैनपुरी
उन्होंने अपने शहर तो छोड़ दिए थे, लेकिन वे उन्हें अपने साथ, एक ज़िम्मेदारी की तरह अपने कंधों पर उठाए हुए थे. अक्सर ऐसा ही होता है. शहर पीछे छूट जाने पर भी पीछे नहीं रहते; वे आपको और भी ज़्यादा जकड़ लेते हैं. जब पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाती है, तभी असल में वे आपको घेर लेते हैं.
(बस्ती, इंतिज़ार हुसैन)
मिसराना मोहल्ले का नाम तो ख़ैर अभी बाक़ी है, मगर ख़ालिस ब्राह्मणों की रिहाइश वाली उसकी पहचान जाती रही. मुमकिन है कि मकान का नंबर भी अब वही न रह गया हो, जैसे कि उस घर का भीमकाय काला फाटक नहीं रहा, जैसे कि वे लोग नहीं रहे जो इतिहासकार प्रो.सुधीर चन्द्र की स्मृतियों में अब तक बसे हुए हैं, और जो उनके संस्मरणों की किताब ‘मिसराना मोहल्ला’ के सफ़्हों में हयात हैं. बहुत कम उम्र में शहर छूटा, और वह बस्ती भी जहाँ उनका पुश्तैनी घर था. मगर क्या सचमुच छूट गया, या कि उसकी जकड़ निस्बतन और मज़बूत हो गई, जैसा कि इंतिज़ार हुसैन कहते हैं.
एक मोहल्ले, एक घर और एक कुनबे की स्मृतियों के इस आख्यान का वितान ऐसा है कि इसमें समय, समाज, रीति-रिवाज़, बोली-भाषा, खान-पान, पहनना-ओढ़ना, लोकरंजन और लोकाचार सब समाहित हैं. यादों से आगे बढ़कर जो ख़ास कालखण्ड का दस्तावेज़ बन जाता है. और जिसका केंद्र चौबे समाज ज़रूर है, मगर जो व्यक्तिगत स्मृतियों के हवाले से उस दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और सियासी चेतना का पता भी देता है. प्रो.सुधीर अपने माज़ी को आज के नज़रिये से देखते हैं और दौर-ए-गुज़िश्ता की चेतना के भीतर जाकर भी. यह देखना किसी तटस्थ दर्शक का देखना है, जो बिना किसी राग-विराग के बेबाक और बेमुरव्वत है. संस्मरण लिखते हुए अमूमन ‘मैं’ को लेकर जिस तरह की आत्ममुग्धता का स्पर्श सहज ही आ जाता है, वह यहाँ नदारद है. आत्मालोचन ज़्यादा महसूस होता है. यह इतिहास की किताब नहीं, मगर इतिहास से ख़ाली भी नहीं है.
कितने ही तरह के रसों में पगा यह आख्यान पढ़ते हुए बहुतेरे क़िस्से एकदम नए और टटके मालूम होते हैं, और कुछ ऐसे भी, जिनकी झलक आपको अपने अनुभवों में मिल सकती है. भाषा के बारे में विस्तार से लिखा गया है, और भोजन के बारे में भी. विशिष्ट भाषा और विशिष्ट भोजन, तब का चौबे समाज जिसे सर्वश्रेष्ठ मानकर गर्व से इतराता. ज़ाइक़े के साथ ही पकवान के ब्योरे ललचाते हैं, तो जीमने वाले उस्तादों के क़िस्से गुदगुदाते भी हैं. एक से एक उस्ताद और पंगत में उन्हें खाना परोसने वाले लौंडों की ख़ुराफ़ात. ‘कौआ बोलै काँओं, चौबे बोले खाऔं’. पंगत में मौन रहकर खाने वाले एक बुज़ुर्ग के खीर का सकोरा कई बार ख़ाली करने के बाद इशारा करने हर बार उन्हें रायता परोसने और इसके एवज बाद में डाँट-गाली सुनने वाले लड़के का क़िस्सा पढ़ते हुए पंगत में खीर और रसेदार के कई-कई सकोरे उड़ाने और फिर अरसे तक इसकी शेख़ी बघारने वाले कई उस्ताद याद आते रहे. थाली में रखी रोटियों को एक बालिश्त चार अंगुल नापकर ही खाना शुरू करने वाले भोजन भट्ट के बारे में पढ़ते हुए अपनी ननिहाल के तड़ंगी तिवारी याद आते रहे. पंगत में वह एक किनारे इसलिए बैठते ताकि साथ वालों के उठ जाने के बाद अंगौछे का सिरहाना बनाकर वहीं लेट जाएं. उनकी पत्तल में दो-एक पूड़ियाँ नहीं रखी जाती थीं, पूड़ियों का छोटा-मोटा पहाड़ रखा जाता, जिसे बालिश्त से नापने के बाद ही वह संतुष्ट होते. उनके नापने के क्रम में एक बार किसी ख़ुराफ़ाती लड़के ने ठिठोली की, ‘का बब्बा जादा त नाइ होय गयल!’ उन्होंने उसकी तरफ़ निगाह उठाई और सहमति में सिर हिलाया. उसने पूछा कितनी पूड़ियाँ कम करनी हैं. तिवारी जी ने जवाब दिया,‘ओनली वन.’ उनका यह जवाब बाद में उनकी पहचान बन गया. पीठ पीछे लड़के उन्हें ‘ओनली वन’ ही बुलाते थे.
किताब के एक अध्याय ‘रोज़ीना ज़िन्दगी’ में नित्यकर्म से लेकर पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, हाट-बाज़ार के विस्तृत ब्योरे हैं, भाषा-संवाद की मीमांसा भी है. आशीर्वाद के प्रचलित जुमलों के उत्स की तलाश है और चलन से बाहर हो चुके लफ़्ज़ों का बयान भी. लोकाचार में गालियों के दख़ल के बारे में पढ़ते हुए भाषा-विज्ञानी लेरा बोरोडित्स्की की थ्योरी ज़ेहन में कौंधती है कि भाषा कैसे हमारी सोच, हमारे विचारों को आकार देती है. सोचता हूँ कि अपने शोध में अगर वह मिसराना मोहल्ले को भी शामिल कर लेती तो उनका निष्कर्ष क्या होता? इफ़रात गालियों की चाशनी में पगी ऐसी विशिष्ट भाषा, जो दोस्तों या दुश्मनों के बीच बहस या झगड़े के मौक़ों पर नहीं, बाप-बेटों, दादा-पोते, माँ-बेटों की सहज बातचीत में भी दख़ल रखती. आपका चेतन अगर ‘आधा गाँव’ में इसका साम्य ढूँढने लगा हो तो थोड़ा ठहरकर सोचना, या फिर इसकी सही वजह जानने के लिए कुछ इंतज़ार करना बेहतर. बक़ौल राही, उनके किरदार अगर गाली देते हैं तो उनकी कहानी में गालियों का शुमार लाज़िमी है. ‘मिसराना मोहल्ला’ के लोगों के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं है.
आधी किताब तक पहुँचते-पहुँचते कुकी भाई साहब ने इसका महात्म्य समझाया है, ‘गुरु, तुम पढ़े-लिखे चूतियन की जई प्रॉब्लम है. जान्त खाक नाईं और समझत हौं अपऐं कौं बुकरात. का बदतमीजी ही हम भैया-भैन के चाची संग बोलिबे में? बिच्चोद-भैंच्चोद गारी भर है तुम चूतियन के लऐं. इन गारिन में छिपौ प्यार तुमैं नाइँ दिखाई पत्त. दिखाई देउगौऊ नाइँ. फिरऊ समझाउतैं तुमैं. पंक्चुएसन तौ जांत हौ न! वाक्य में कॉमा, सेमीकोलन, फुल स्टॉप होत हैं कि नाईं? जे बिच्चोद-भैंच्चोद हमाए पंक्चुएसन हैं. प्यार के पंक्चुएसन.’
गालियों को पंक्चुएशन की तरह इस्तेमाल करने वाले उस समाज में भी वह सारी ख़ूबियाँ-ख़ामियाँ दिखाई देती हैं, जो उस ज़माने के दूसरे समाजों में रही होंगी. समाज और आनजात का भेद मानने के बावजूद बिरादरी के भीतर हैसियत के हवाले से छोटे-बड़े का भेद न होना और शादियों में दहेज के लेन-देन की मनाही ऐसी रवायतें हैं, अब जिनके बारे में सोचकर हैरानी होती है. प्रो.सुधीर चन्द्र ने चौबों के यहाँ ब्याह में फेरों की रस्म दो दिन में पूरी करने और बारातियों के भोज वाली जगह पर ‘मुग़ल पसार’ की परंपरा के उत्स का दिलचस्प क़िस्सा बताया है. मगर ‘चिरुआ लाज’ जैसी रवायत किस तरह चलन में आई होगी, यह न जान पाने का मलाल रह गया. मलाल इसलिए कहता हूँ कि ‘मिसराना मोहल्ला’ पढ़ते हुए जब भी किसी प्रसंग में कोई जिज्ञासा जागी, आगे के पन्नों में उसका जवाब मिल गया. माँ-बेटों के संवाद की गालियों के बारे में ऊपर लिख ही चुका हूँ. इसी तरह माँ के लिए अम्मी का संबोधन, किसी बीमारी की वजह से ख़तने की नौबत और उसके ख़तरे, दालों में अरहर से परहेज़ और गुलथी जैसे कई प्रसंग हैं. गुलथी के बारे में जब तक विस्तार से नहीं पढ़ा था, मेरे दिमाग़ में रामपुरी गुलत्थी घूमती रही थी. पर यह गुलथी तो भात निकली. देश-समाज की बदलती हुई हवा के बीच 1990 और 1992 में रेल के सफ़र के दौरान अपने ख़तने की वजह से किसी मुसीबत की आशंका और दिमाग़ी खलल के अपने तजुर्बे के बारे में उन्होंने मुख़्तसर ही लिखा है, पर रोंगटे खड़े कर देने के लिए उतना ही काफ़ी है.

इंदौर किताब में ज्ञान चतुर्वेदी और सुधीर चन्द्र.
किताब के दूसरे खण्ड एक भले घर के पाँच चेहरे में ताई, बाबाजी, दादीजी, चाचा (पिता) और अम्मी के रेखाचित्र हैं—गहरी संवेदना वाला यह खण्ड आत्मीय है और निःसंग भी. इसमें पुरखों की शख़्सियत का वृहद विश्लेषण है, ख़ूबियों के साथ उनकी ख़ामियाँ भी है, उनके किरदार का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष भी, उनके पूर्वाग्रह और दुराग्रहों के बारे में भी. यों ख़ानदान के इन पुरखों के बारे में प्रसंगवश वह पहले के हिस्से में भी लिखते आए हैं पर यहाँ अपनी यादों और तमाम वाक़यों की बिना पर मुकम्मल तस्वीर बनाने की कोशिश करते हैं. उनकी कोशिश और बेबाकी ने उन्हें किस तरह के भावनात्मक दबाव में रखा होगा, इसकी एक नज़ीर इंदौर किताब उत्सव में देखने को मिली. किताब के इजरे के बाद लेखक से बातचीत का सत्र था. ज्ञान चतुर्वेदी ने प्रो.सुधीर चन्द्र से पूछा, ‘अम्मी आपको अनिकेत और विदेह कहती थीं…’ ‘अनिकेत तो ख़ैर मैं अब भी हूँ, पर विदेह कहाँ हो सका, विदेह होता तो यह सब कहाँ…’ बोलते-बोलते वह भावुक हो गए, गला रुँध गया. मंच पर और सभागार में ख़ामोशी छा गई. मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए ज्ञान चतुर्वेदी ने बातचीत का विषय बदल दिया, मगर सुधीर जी को संयत होने में कुछ वक़्त लगा.
माँ अब नहीं थीं, तो उनकी टीस स्वाभाविक लगती है मगर मिसराना मोहल्ले में उनकी पैदाइश वाले घर का फाटक बदल जाना कोई भौतिक बदलाव भर नहीं लगता, इस मेटाफ़र में इत्मीनान, मस्ती, आत्मीयता और उष्म-रिश्तों वाले एक समाज के बदल जाने की टीस भी है, बोली-भाषा के कितने ही अर्थवान शब्दों के खो जाने का मलाल है, तमाम तरह के दुःख-सुख, रूढ़ियों और पितृसत्ता के दबावों के बीच दिमाग़ खुला रखने की संभावनाओं के छीजते जाने का अफ़सोस भी ज़ाहिर होता है. और वह सब कुछ जो इकट्ठा होकर ‘मिसराना मोहल्ला’ की दुनिया रचते थे. यों गेट बंद कॉलोनियों और अट्टालिकाओं वाली बस्तियों के दौर में मोहल्ले भी कहाँ बचे रह गए हैं!
किताबः मिसराना मोहल्ला
लेखकः सुधीर चन्द्र
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
क़ीमतः 399 रुपये
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किताब | द मॉनेस्ट्री ऑफ़ सॉलिट्यूड
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