प्रो. सय्यद एहतिशाम | प्रगतिशील आंदोलन के अहम् सिद्धांतकार

  • 9:54 am
  • 1 December 2023

प्रोफ़ेसर सय्यद एहतिशाम हुसैन तरक़्क़ीपसंद तहरीक के महत्वपूर्ण स्तंभ थे. उर्दू अदब में तरक़्क़ीपसंद ख़यालात को फैलाने में जिन शख़्सियात ने अहम् भूमिका अदा की, उसमें उनका नाम सबसे अव्वल दर्जे पर आता है. एहतिशाम हुसैन ने यूं तो शायरी की, अफ़साने लिखे, सफ़रनामा लिखा लेकिन उनकी असल व अहम् शिनाख़्त एक तरक़्क़ीपसंद मार्क्सवादी आलोचक की है. अदब का अपने मुआशरे से रिश्ता क़ायम करते हुए, उसे इतिहास और ज़माने के टकराव के पसमंज़र में देखना, एहतिशाम हुसैन का बुनियादी कारनामा था.

एहतिशाम हुसैन की इब्तिदाई तालीम आज़मगढ़ में हुई. आगे की तालीम के लिए वह इलाहाबाद पहुंचे. यह वह दौर था, जब पूरे मुल्क में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आंदोलन चल रहे थे. इलाहाबाद ख़ासतौर पर ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का मरकज़ बना हुआ था. बरतानवी माल का जगह-जगह बायकॉट किया जा रहा था. ऐसे हंगामाख़ेज़ माहौल में एहतिशाम हुसैन ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया. यूनिवर्सिटी में उन्हें जो उस्ताद मिले, उनमें प्रोफ़ेसर सतीश चंद्र देव, फ़िराक़ गोरखपुरी, ज़ामिन अली, अब्दुल सत्तार सिद्दीक़ी और सबसे अव्वल सय्यद एजाज़ हुसैन से वे काफी मुतास्सिर हुए. एक लिहाज़ से कहें तो उनकी ज़िंदगी, शख़्सियत और ज़ेहनी, फ़िक्री बनावट में डॉ. एजाज़ हुसैन की बड़ी भूमिका रही.

यह एजाज़ हुसैन ही थे, जो एहतिशाम हुसैन को अंग्रेज़ी से उर्दू की तरफ़ लेकर आए. इन सब उस्तादों की सोहबत में उन्होंने काफ़ी कुछ सीखा. एजाज़ हुसैन के यहां जो अदबी बैठकें होती, एहतिशाम हुसैन उनमें बाक़ायदगी के साथ शिरकत करते. इन बैठकों ने उन्हें न सिर्फ़ सियासी नज़रिया दिया, बल्कि समाजी मामलों में भी दिलचस्पी बढ़ाई. एहतिशाम हुसैन ने बीस साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. शुरुआत में उन्होंने शायरी, अफ़साने और ड्रामे लिखे. लेकिन बाद में एक बार जो तनक़ीद की ओर रुख़ किया, तो फिर उसी के हो लिए.

मार्क्सवाद और तरक़्क़ीपसंद तहरीक ने प्रोफ़ेसर एहतिशाम हुसैन को हद दर्जे तक मुतास्सिर किया. ख़ुद उनकी नज़र में, “मैं मार्क्सवाद को सबसे बेहतरीन दर्शनशास्त्र समझता हूं और उसी की मदद से ज़िंदगी और अदब को समझने की कोशिश करता हूं. मेरा ख़याल है कि आलोचना और आत्म-आलोचना के मार्ग पर चलकर, हम उस सच्चाई को ढूंढ़ने में कामयाब हो सकते हैं, जिससे ज़िंदगी के मर्म समझ में आ सके. मेरा यक़ीन है कि अदब के समझने में तरक़्क़ीपसंद समाजी नज़रिया सबसे ज़्यादा कारगर साबित हो सकता है.” (‘उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’, पेज-272)

साल 1935 में सज्जाद ज़हीर लंदन से अपनी तालीम मुकम्मल करके इलाहाबाद आए. उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के गठन के लिए इलाहाबाद में जो ऐतिहासिक बैठक आयोजित की उसमें अहमद अली, फ़िराक़ गोरखपुरी, प्रेमचंद, अब्दुल हक़, दया नारायण निगम, रशीद जहां और अपने उस्ताद एजाज़ हुसैन के साथ नौजवान एहतिशाम हुसैन भी शरीक हुए. तरक़्क़ीपसंद तहरीक ने एहतिशाम हुसैन पर काफ़ी असर डाला. इस तहरीक ने उनमें एक नज़रिया, एक नई सोच पैदा की. साल 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की पहली कॉन्फ्रेंस लखनऊ में हुई. इस ऐतिहासिक कॉन्फ्रेंस के बाद, जो दो कॉन्फ्रेंस इलाहाबाद में हुईं उनमें एहतिशाम हुसैन ने न सिर्फ़ हिस्सा लिया बल्कि बाक़ी कामों में भी बढ़-चढ़कर मदद और हिस्सेदारी की. एजाज़ हुसैन की संगत में उनका रुजहान तनक़ीद की तरफ़ हुआ और वह बाक़ायदगी से लेख लिखने लगे.

तरक़्क़ीपसंद तहरीक के मुखपत्र ‘नया अदब’ में उनका लेख ‘प्राचीन साहित्य और प्रगतिशील आलोचक’ प्रकाशित हुआ. ‘चकबस्त : नए दौर के रहनुमा’ वह लेख था, जिससे सभी का ध्यान एहतिशाम हुसैन की तरफ़ गया. प्रोफ़ेसर एहतिशाम हुसैन ने तनक़ीद निगारी के मैदान में उस वक़्त क़दम रखा, जब उर्दू अदब में आलोचना संक्रमण के दौर से गुज़र रही थी. आज़ाद, शिबली, हाली और सर सय्यद के बाद अब्दुर्रहमान बिजनौरी, नियाज़ फ़तेहपुरी और मजनूं गोरखपुरी ने तनक़ीद को मार्क्सवादी यथार्थवाद की तरफ मोड़ा. एहतिशाम हुसैन भी उसी रहगुज़र पर चले.

अपने निबंधों के पहले मजमूए ‘तनक़ीदी जाइज़े’ में हिंदुस्तानी तरक़्क़ीपसंद तहरीक की पैरवी करते हुए एहतिशाम हुसैन लिखते हैं, “भारतीय प्रगतिशील आंदोलन दुनिया में प्रगतिशीलता के आंदोलन, समाजवाद के विचार का प्रचार, फ़ासिज़्म के ख़िलाफ़ सांस्कृतिक और साहित्यक मोर्चा क़ायम करने के आंदोलन का एक हिस्सा है. उसे उन आंदोलनों के हिस्से के रूप में देखना चाहिए, लेकिन इससे यह न समझना चाहिए कि यह आंदोलन बाहर से लाया गया है या बाहर के आंदोलनों की नकल है.”

साल 1938 में एहतिशाम हुसैन की नियुक्ति लखनऊ यूनिवर्सिटी के उर्दू महकमे में प्रोफ़ेसर के ओहदे पर हो गई. 1944 में उनकी किताब ‘तनक़ीदी जाइज़े’ शाए हुई और इसके बाद एहतिशाम हुसैन की गिनती मार्क्सवादी चिंतक और आलोचक के तौर पर होने लगी. मुल्क की आज़ादी बंटवारा भी लेकर आई. सांप्रदायिक दंगों में हज़ारों लोग मारे गए और घायल हुए. उस वक्त तरक़्क़ीपसंद अदीबों ने सांप्रदायिक सौहार्द, इंसान दोस्ती और सांझा संस्कृति के मौज़ूअ पर न सिर्फ़ कई कॉन्फ्रेंस की, बल्कि लेख और किताबें भी लिखीं. एहतिशाम हुसैन ने भी फ़िरक़ापरस्ती और कल्चर के मौज़ूअ पर तमाम मज़ामीन लिखें.

‘तनक़ीदी जाइज़े’, ‘रवायत और बग़ावत’, ‘अदब और समाज’ उनके निबंधों की अहम किताबें हैं. इन किताबों में ‘अदब और अख़्लाक़’, ‘नए अदबी रुजहानात’, ‘तरक़्क़ीपसंदी की रवायत’, ‘अदब में आज़ादी-ए-तख़य्युल’, ‘फ़िरक़ापरस्ती और अदब’, ‘अदब और हुब्बुल वतनी और वफ़ादारी’, ‘ग़ालिब की बुतशिकनी’ जैसे शानदार लेख लिखे. एहतिशाम हुसैन के लेखन पर सबसे ज़्यादा असर उनके उस्ताद एजाज़ हुसैन और सज्जाद ज़हीर का था. तरक़्क़ीपसंद तहरीक के विचार को उर्दू अदब में फैलाने में उनका बड़ा योगदान रहा. जब भी तरक़्क़ीपसंद शायरी और तरक़्क़ीपसंद अदीबों पर हमले होते, उनकी आलोचना की जाती, तो उनका जवाब देने के लिए एहतिशाम हुसैन ही सामने आते.

अपनी किताब ‘रवायत और बग़ावत’ में ऐसे विरोधियों को जवाब देते हुए, वह लिखते हैं, “तरक़्क़ीपसंद अदब न तो विदेशी है, न अश्लील है और न ही नग्नता की हिमायत करता है. न तो मज़हब की मुख़ालफ़त या ख़ुदा की तौहीन में यक़ीन करता है, न हत्या और अपराध, ख़ौफ़ और दहशतपसंदी को ज़िंदगी के किसी हिस्से में जगह देना चाहता है, बल्कि ज़िंदगी की कशमकश में इंसानियत के जो प्रगतिशील तत्व हैं, उनको बढ़ावा देता है. दुनिया को हर क़िस्म के ज़ुल्म और सितम, नाइंसाफ़ी, मुनाफ़ाखोरी, मायूसी और ग़म से बचाने की तमन्ना रखता है, लेकिन वह इंसानियत के ऊंचे मूल्यों को कुछ ख़ास लोगों की नहीं, बल्कि आम इंसानों की मिलकियत बना देना चाहता है. उसकी यह ख़्वाहिश ऐसे तारीख़ी तक़ाज़ों पर आधारित है कि अगर नज़रिए को रहनुमा बनाकर काम किया जाए, तो कामयाबी यक़ीनी है.”

एहतिशाम हुसैन अपनी ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त तक तरक़्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े रहे, साथ ही अपने लेखन से इसको नए मायने और गहराइयाँ दीं, इसका विस्तार किया. अंजुमन तरक़्क़ीपसंद मुसन्निफ़ीन पर जब भी कोई आफ़त आती या उस पर हमले किये जाते, वह तुर्की-ब-तुर्की जवाब देते. ‘तनक़ीद और अमली तनक़ीद’, ‘ज़ौक़-ए-अदब और शऊर’, ‘अक्स और आईने’, ‘अफ़कार-ओ-मसाइल’, ‘एतबार-ए-नज़र’ एहतिशाम हुसैन की अहम तनक़ीद और निबंधों की किताबें हैं. वही ‘साहित्य और समंदर’ उनका सफ़रनामा है. ‘वीराने’ मजमूए में उनके अफ़साने शामिल हैं, तो वही ‘हिंदुस्तानी लिसानियात का ख़ाक़ा’ भाषा-विज्ञान संबंधी उनकी एक किताब है.

‘उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ एक ऐसी किताब है, जिससे हिंदी के पाठकों को उर्दू के बारे में एक नई रोशनी मिलती है. वह उसके इतिहास से वाक़िफ़ होते हैं. यह किताब काफ़ी मक़बूल है और इसके अभी तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. उर्दू साहित्य के इतिहास पर यह प्रमाणिक किताब है. इस किताब का रूसी तर्जुमा भी हो गया है. प्रोफ़ेसर एहतिशाम हुसैन साल 1961 में लखनऊ से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आ गए और साल 1972 तक यहां उर्दू महकमे में प्रोफ़ेसर के ओहदे पर रहे.

एक दिसंबर 1972 को उनका इंतकाल हो गया. एहतिशाम हुसैन के इंतक़ाल के बाद तरक़्क़ीपसंद तहरीक के रूह-ए-रवाँ सज्जाद ज़हीर ने उन्हें अपनी ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए लिखा, “जब आज एहतिशाम हुसैन दामन छुड़ाकर इस दुनिया से उठ गए हैं, हम फ़ख़्र और यक़ीन के साथ कह सकते हैं कि उनकी तहरीर का एक-एक लफ़्ज़ जब तक सादे काग़ज़ पर सच्चे मोतियों की तरह चमकता रहेगा, वह हमें और हम से बाद आने वालों को इस आंदोलन को नई राहों में ले जाने और सच्चाई तथा तरीक़ों की तलाश और बदलते हुए हालात के मुताबिक़ नए फ़िक्र और रचनात्मक कोशिशों के लिए आमादा करता रहेगा और जब हम उस बुलंद और शरीफ़ इंसानियतपसंद मक़सद को हासिल करने की कोशिश करते रहेंगे, तब हर घड़ी हम एहतिशाम हुसैन को याद रखेंगे, इसलिए कि उनकी सारी ज़िंदगी इसी मक़सद को हासिल करने के लिए ख़र्च हुई.”

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